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कथागीतों में लोकविश्वास

कृष्णा गहलोत
मनुष्य ने जब से वाणी पर अट्टिाकार प्राप्त किया है, तभी से कथा कहने की प्रवृा ने भी जन्म लिया। इस बात को स्वीकार करने में शायद किसी भी सामाजिक व्यक्ति को आपा नहीं है, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति इसी प्रर्याक को अपने परिवार के बीच में एक स्वयंसि= सत्य के रूप में देखता है। ये कथाऐ गद्य रूप में तो होती ही हैं। इनका पद्य रूप भी बहुत लोकप्रिय होता है। इन्हें कथागीत कहते हैं। ये गीत नायक के सम्पूर्ण जीवन का वर्णन करने वाले भी होते हैं। मनुष्य की मौखिक परम्परा के साहित्य में लोककथाओं तथा कथागीतों का स्थान सर्वोच्च माना जाता है।
वेद, उपनिषद्, पुराण, ब्रा॰ण, आरण्यक, बौ=, जैन एवं अन्य दार्शनिक ग्रंथों में लोककथाओं को ग्रहण किया गया है। ये कथाऐ ज्ञान का भण्डार होती हैं। इनमें वर्णित रीति-रिवाज, मान्यताऐ, पहनावा, जीवनमूल्य आदि हमारी संस्कृति के परिचायक होते हैं।
राजस्थान का कथागीत साहित्य काव्यात्मकता, संस्कृति और सामाजिक दृष्टि से भी महवपूर्ण है। लोक साहित्य में लोक की समस्त लोक मानवीय प्रवृायो सम्मिलित रहती हैं। जनमानस की अलिखित परम्पराऐ जैसे अनुष्ठान, जादू-टोना आदि इनमें निहित रहती हैं। ये उसके मौखिक साहित्य का अभिन्न अंग होती हैं।
लोक मानवीय प्रवृायों का सहज विलास, इसका वैशिष्ट्य है। लोक मानवीय विश्वासों की अभिव्यक्ति भी कथागीतों में देखने को मिलती है। कथागीतों का ताना-बाना इन्हीं लोक विश्वासों के चारों ओर बुना होता है।
ये लोक विश्वास हमारी मान्यताओं को अभिव्यक्त करते हैं। साथ ही साथ हमारे उस आदिम जीवन की ओर संकेत करते हैं, जिसे हमने हजारों साल जीया है।
ये लोक विश्वास दो तरह के होते हैं - परम्परागत तथा परिस्थितिजन्य भय और आशंकाओं से आर्‍ान्त हमारा मन न जाने कितने विश्वासें को जन्म देता है। यदि ऐसा हुआ तो ऐसा हो जाएगा। यदि वैसा हुआ तो वो हो जाएगा, आदि-आदि।
इस तरह से भाव मन में आकर किसी सम्भावित घटना के प्रति डर पैदा करते रहते हैं। निराट्टाार होते हुए भी ये विश्वास लोकमानस में समाए हुए हैं।
समाज के अशिक्षित और अज्ञानी मनुष्य ही नहीं बल्कि पढे-लिखे, भले-चंगे लोग भी इन विश्वासों को अपनाते हुए मिल जाते हैं।
अब छींक का ही उदाहरण लें तो यह बात सामने आती है कि छींक को लेकर सभ्य कहे जाने वाले देशों में भी अनेक शुभ-अशुभ विश्वास फैले हैं। हिन्दू छींक आने पर ’शंतजीवि‘ या ’चिरंजीवी‘ कहते हैं तो अंग्रेज ळवक ठसम ल्वन।
इसी प्रकार यूनानियों, रोमन और यहूदियों में भी इस प्रकार के विश्वास प्रचलित हैं। छींक को लेकर एक पूरा शकुन शास्त्र बना हुआ है। एक बार छींकना अशुभ, दो बार छींकना शुभ तथा तीन बार लगातार छींकना अशुभ माना जाता है।
सामान्यतः प्रत्येक लोक विश्वास के पीछे कोई न कोई घटना होती है। लोक मानस इतना भोला होता है कि वह साट्टाारण-सी घटना पर भी अविलम्ब विश्वास कर लेता है। यहो तक कि अपने बुजुर्ग व्यक्तियों की बातों पर वह कभी संदेह नहीं करता। इस विश्वास से लोक विश्वास को और मजबूती मिलती है।
कथागीतों में वर्णित प्रमुख लोक विश्वास ः
कथागीतों में विभिन्न प्रकार के लोक विश्वास वर्णित हैं, जैसे यात्रा सम्बन्ट्टाी, तंत्र-मंत्र सम्बन्ट्टाी, खेती के लिए शकुन लेने सम्बन्ट्टाी तथा गुरु गोरखनाथ सम्बन्ट्टाी लोक विश्वास।
यात्रा सम्बन्ट्टाी लोक विश्वास ः
यात्रा पर जाने से पहले शुभ शकुन देखना प्राचीन भारतीय परम्परा रही है। जब भी लोग लम्बी यात्रा पर जाते थे या व्यापार करने जाते थे तो शकुन का अवश्य ख्याल रखते थे।
यात्रा के समय अश्रुपात नहीं करना, सर्प का बोयी ओर आना, सिंह या सिंहनी का मार्ग रोकना, अश्व का पीछे की ओर पोव पटकना, विट्टावा ब्रा॰णी का सामने आना, खाली घडा लिए किसी स्त्री का सामने आना, शुष्क काष्ठ दर्शन, गीदड या लोमडी का रास्ता रोकना तथा शुभ मानी जाने वाली सोन चिडी का बबूल पर बैठे मिलना आदि अशुभ संकेत हैं।
वहीं यात्रा के समय सर्प का दाहिनी ओर मिलना, जम्बूक का बोयी ओर बोलना, स्त्री के बोये अंग फडकना, पानी का घडा लिए सुहागिन स्त्री का सामने आना शुभ माना जाता है।
क्षत्रिय द्वारा किसी कार्य पर जाते समय सामने आने वाले सुअर को मार देना कार्यसि= का प्रतीक माना जाता था।
इस तरह के कितने ही विश्वास जनमानस में रचे-बसे हैं।
’पाबूजी‘ कथागीत में वर्णन है कि जब पाबूजी बारात लेकर जाते हैं तो रास्ते में अनेक अपशकुन होते हैं -
’’मारग में देख्यो छै आडो कालो वासिक नाग,
तो राह तो बगन्ती रै राठौडी जानां रुक गई।‘‘
’’चांदा डामा आं जानां रा सूंण विचार,
कोई किसडे तो सूंणा पर थै यो सिंघणी मारग रोकियो।‘‘१
’तेजाजी‘ कथागीत में जब तेजाजी अपनी पत्नी को लेने जाते हैं तो मार्ग में उन्हें कई अपशकुन होते हैं। तेजाजी उनकी परवाह किए बगैर चलते रहते हैं। जब वे अपने घर से रवाना हुए, तभी सबसे पहले उनकी घोडी ने दाना-पानी से पीछे हटकर अपशकुन का संकेत दिया।२
तंत्र-मंत्र विषयक विश्वास
राजस्थान कथागीतों में जादू, तंत्र-मंत्र विषयक विश्वास भी उपलब्ट्टा हैं। इन कथागीतों में रूप परिवर्तन या तंत्र-मंत्र के बल पर मानव को पशु-पक्षी बनाकर एक स्थान पर भेजना आम बात है।
निहालदे सुलतान कथागीत में बेगमों और पानवालियों ने सुलतान और उसके साथी को तोता और खरगोश बना दिया।३
ये तंत्र-मंत्र भलाई कार्य के लिए तथा दूसरे बैर-विरोट्टा तथा बुराई के लिए होते हैं। भलाई वाले जादू-टोनों में भूत निकालने, आट्टाा शीशी या बायावादी और सर्प-बिच्छु के झाडे देने, तेजरा, इक्यांतरा आदि तावों ;बुखारोंद्ध के डोरे करना, छपाका, पीलिया, गाय-भैंस के डोरे, बच्चा जीन, बच्चा होने तथा निजर-फिटोडा लगने पर लोटी ढालने आदि मनुष्य हितार्थ कार्य के लिये होते हैं।
बैर-विरोट्टा वाले तंत्र-मंत्रों में अपनी किसी दुश्मनी में दुश्मन पर मूठ मारने-मरवाने, पुतले गाडने, दाह लगाने, कलेजा निकालने, वश में करने आदि कार्य दूसरों को अहित पहचाने के लिए किये जाते हैं, जो सर्वथा निन्दनीय गिने जाते हैं।४
राजस्थान में कुछ टोटके बडे विलक्षण ढंग से लोक क्तदय में बसे हैं। जैसे - ओख दुखने पर छोत निकालना, नजर लगने पर ट्टाूल ेवारना तथा कहना -
घांची की मोची की, तेली की तमोली की,
आये गए की, मो-बाप की, भाई-भोजाई की,
जीव नाव की निजर लगी हो तो वह चली जाये।५
उलसनी ;फोडे-फुंसियों का चर्म रोगद्ध ठीक करने के लिए आक के पीले पो पर उल्टी वर्णमाला लिखवा कर छप्पर पर या दरवाजे पर टांग दिया जाता है। जैसे-जैसे पाा सूखता है, वैसे-वैसे उसलनी के फफोले सूख जाते हैं।
डाकण-स्यारियों से थुकवाकर बच्चों को बचाया जाता है। शाम के समय घर के बाहर पानी की ट्टाार दी जाती है। सोपों की पूजा होती है। चुडैल, भूत-प्रेत और जिन्द को देवता रोके रखते हैं।६
गुरु गोरखनाथ सम्बन्ट्टाी लोक विश्वास ः
राजस्थानी कथागीतों में गुरु गोरखनाथ का वर्णन अनेक बार आया है। राजस्थानी लोगों के विश्वास के अनुसार गोरखनाथ अमर हैं। वे गुप्त वेश में आज भी संसार का भ्रमण करते हैं।
राजस्थान में हम आज भी कनफटे साट्टाु देख सकते हैं। ये साट्टाु प्रायः किसी तीर्थस्थान के आस-पास ट्टाूनी रमाये रहते हैं। राजस्थानी कथागीतों में गुरु गोरखनाथ के अनेक चमत्कारों का वर्णन आया है।
’निहालदे सुल्तान‘ कथागीत में गोरखनाथ के आशीर्वाद से ही चर्व र्ती राजा बैन और रानी कर्णावती को पुत्र की प्राप्ति हुई। यही बालक आगे चलकर सुल्तान के नाम से विख्यात हुआ।
सुल्तान को गुरु ने अनेक बार विपदाओं से बचाया। पूरे कथाचर्‍ में सुल्तान गुरु के आशीर्वाद से हर समस्या से छुटकारा पा जाता था।७
’गोगाजी‘ कथागीत में गोगाजी का जन्म भी गुरु गोरखनाथ की कृपा से हुआ था। गोगाजी की माता बाछल ने गुरु की बहुत सेवा की। इसी सेवा से प्रसन्न होकर गुरु गोरखनाथ ने बाछल को एक अद्भुत बालक की माता बनने का वरदान दिया।८
गुरु गोरखनाथ अपने शिष्यों पर कृपा दृष्टि रखते हैं। वे अपने चमत्कारों से अपने चेलों के हर दुःख को दूर करते हैं। उनके चेले गुरु का स्मरण करने मात्र से बाट्टाामुक्त हो जाते हैं।
निष्कर्ष ः
लोक संस्कृति के निर्माण तवों में उपरोक्त सभी विश्वासों का न केवल अपना महव है अपितु जीवन के यथार्थ को परखने का प्रयत्न करें तो महसूस होगा कि समाज का सम्पूर्ण मानवोचित कार्य व्यापार ऐसी ही मान्यताओं से निर्मित हुआ है। इन्हीं विश्वासों के बीच हमारी दिनचर्या निर्बाट्टा चल रही है।
लोक विश्वास में कल्पनाऐ तथा भावनाऐ भी निहित होती हैं। भावनाओं का उन्मेष आनन्द का द्वार है। लौकिक, अलौकिक र्याओकलापों को भी वह नित्य जीवन के दैनिक कार्यकलापों के समान व्यक्त करता है।
श्री विथहैम के अनुसार, ’’अपने गाथा नायकों के प्रति श्र=ातिरेक के कारण, रचयिता नायकों द्वारा अनेक अतिमानव र्यारकलापों का होना बतलाया गया है। उनकी व्याख्या वह कैसे करें। केवल मानव पात्रों के माट्टयम से इस प्रकार के र्या व्यवहार श्रोता के मन में अविश्वास उत्पन्न करते हैं, अतः रचयिता दैविक प्रेरणा और अमानव पात्रों की सहायता लेता है।‘‘९
संसार में प्रायः सभी जगह लोकमानस अंट्टाविश्वासी एवं ट्टार्म और भगवान के प्रति श्र=ावान रहता है, ग्रामीण जनमानस आज भी भोला-भाला सरल क्तदय वाला है।
ऐसा भावुक क्तदय वाला जनमानस अनेक प्रकार के लोक विश्वासों से सराबोर रहता है। यदि ये विश्वास न हो तो हमारी सांस्कृतिक विरासत, हमारी परम्पराऐ समाप्त हो जाएगी। हमारी सभ्यता जीवित तो होगी पर जिन्दादिली न रहेगी।
संदर्भ ः
१. डॉ. कृष्ण बिहारी सहल, राजस्थानी लोकगाथा, पृ.१७२-१७३
२. वही, पृ. ३८
३. वही, पृ. ७८
४. नानूराम संस्कृर्ता, राजस्थानी लोकसाहित्य, पृ. २४९
५. वही, पृ. २५०
६. वही, पृ. २५०
७. डॉ. कृष्ण बिहारी सहल, ’निहाल-दे-सुल्तान‘, पृ. १०२
८. डॉ. कृष्ण बिहारी सहल, ’गोगाजी‘, पृ. ७८
९. ’डिवाइन सुपरस्टीशन आर आलसो रिवेल्ड इन दी बैलेड्स‘, पृ. २८