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हिन्दी यात्रा-साहित्य में बौद्ध धर्म की अभिव्यंजना

हेमन्त कुमार
ट्टार्म का संस्थागत रूप समय के साथ कर्मकाण्डों, रूढयों व जडताओं से आब= हो जाता है। वैदिक ट्टार्म भी हिंसक यज्ञानुष्ठानों व अतिशय पौरोहित्य जकडबंदी से बेट्टाकर दुर्वह व जटिल हो गया, जिसकी प्रतिर्या स्वरूप महावीर स्वामी का जैन ट्टार्म व तथागत का बौ= ट्टार्म आविर्भूत हुआ। कालान्तर में ये ट्टार्मद्वय भी अनेक सम्प्रदायों में विभक्त होते चले गए। गौतम बु= प्रवर्तित ट्टार्म जिसे स=र्म भी कहा गया, ने अपने नैसर्गिक गुणों के अतिरिक्त राज्याश्रय, समर्पित प्रचारकों आदि के कारण अपना भरपूर प्रसार किया। भारत के बाहर भारतीय संस्कृति के प्रसार में भी बु= मत का महवपूर्ण स्थान है। हिन्दी यात्रा-साहित्य में भी बौ= ट्टार्म विषयक प्रचुर सामग्री प्राप्त होती है।
यात्रा-साहित्य में बौ= ट्टार्म विषयक मान्यताओं के संदर्भ ः
;पद्ध आर्य सत्य ः आर्य शब्द को ’श्रेष्ठ‘ तथा ’प्रजाति‘ दोनों संदभोङ में प्रयुक्त किया जाता है, पर परम्परा में आर्य शब्द भी विशेष अर्थ संदर्भ से जुडा है। बौ= दर्शन में आर्य शब्द के दो अर्थ होते हैं - एक तो जिन्होंने दर्शन प्राप्त किये हैं, उन्हें आर्य कहते हैंऋ दूसरे वैभाषिक दर्शन मार्ग को भी आर्य कहते हैं।१ बु= मत में चार आर्य सत्यों या महासत्यों की प्रतिष्ठा है। बु= ने संसार को दुखमय माना है। दुःख है तो दुख का कारण है, कारण है तो निवारण है। इन चतुरार्य सत्यों का संकेत भी यात्रावृाों में मिल जाता है।२
;पपद्ध अष्टांगिक मार्ग ः बु= ने संसार को दुःखमय मानकर दुःख निरोट्टा का मार्ग बतलाया था। वह दुःख निवारण का मार्ग बु= मत में अष्टांगिक मार्ग३ कहलाता है। इसका उल्लेख भी यात्रा-साहित्य में आता है -
’’बु= ने कहा था, जीवों के सभी दुःखों का मूल कारण उनकी असंख्य प्रकार की इच्छाऐ और उनसे प्रेरित कर्मजाल है। अतः वही जीव मात्र के अनवरत जन्म-मरण के चर्‍ का हेतु है। इससे निर्वाण अथवा मुक्ति का मार्ग मट्टयम पथ है, जो अष्टमार्ग का अनुसरण करने में है। ये अष्ट मार्ग हैं - सद्विचार, सदाशय, सद्वाक, सत्कर्म, सद्-आजीविका, सत्प्रयास, सन्मानसिकता तथा सदेकाग्रचिाता अथवा सद्ट्टयान।‘‘४
;पपपद्ध पंचशील ः बौ= ट्टार्म में पंचशीलों का पालन उपासक व श्रमण दोनों के लिए आवश्यक है। बौ= विद्वान् एवं यायावर-साट्टाक कृष्णनाथ ने हिमालय त्रिक के प्रथम पुष्प - ’स्पीति में बारिश‘ में इनका विवरण-विवेचन प्रस्तुत किया है।
’’उपासकों के ये पंचशील हैं - प्राणातिपात विरति, अदाादान विरति, काम मिथ्याचर विरति, मृषावाद विरति तथा सुरामेरय प्रमाद स्थान विरति। प्रहाण शील, संवर शील और अवीतर्म शील - प्रत्येक शील के पोच पहलू हैं।‘‘५
उक्त में से प्राणातिपात विरति का अर्थ प्राण लेने या हिंसा से दूर रहना, उदाादान विरति - बिना दी हुई वस्तु को न लेना, काम मिथ्याचार विरति - यानी काम भाव से विरत रहना, मृषावाद विरति - यानी असत्य न बोलना है तथा सुरामेरय प्रमाद स्थान विरति का अभिप्राय मादक पदाथोङ के सेवन, आलस्य आदि से दूर रहना है। स्पष्ट है, बौ= ट्टार्म में अन्य भारतीय ट्टामोङ के समान आचारशील ट्टार्म अट्टिाक है। इसीलिए इसे सद्ट्टार्म की अभिट्टाा भी दी गई है।
;पअद्ध त्रिशरण व अष्टमंगल चिँ ः बौ= ट्टार्म में ’त्रिशरण‘६ का बडा महव है। बु= ट्टार्म एवं संघ त्रिशरण के आट्टाार हैं। ’बु=ं शरणं गच्छामि, ट्टाम्मं शरणं गच्छामि, संघं शरणं गच्छामि‘। ये शरण्य हैं। संघ में भिक्षु-भिक्षुणी दोनों के लिए अलग-अलग प्रबन्ट्टा हैं।
त्रिशरण के अतिरिक्त अष्टमंगल चिँों का उल्लेख यात्रावृाों में आया है। ’ये अष्टमंगल हैं - मत्स्य, छत्र, शंख, श्रीवत्स, ट्टवज, पद्म और चर्‍।‘ कहते हैं ये आठ चीजें भगवान बु= के पृथ्वी पर आने पर देवताओं ने भेंट की। ये अष्टमंगल बु= के तलुए में और अनेक चीजों पर लिखे जाते हैं।७
बौ= ट्टार्म के विभिन्न सम्प्रदाय ः बु= मत में मतांतर हो जाने से अनेक सम्प्रदायों का प्रादुर्भाव हुआ। हीनयान महायान मुख्य भेद हैं, किन्तु अवान्तर भेद भी है। जिनका विवरण देते हुए कृष्णनाथ ने लिखा है -
’’ज्ञातव्य है कि बौ= ट्टार्म के तीन यान हैं - श्रावक यान, प्रत्येक बु=यान और महायान। इनमें भी महायान में दो नय हैं - प्रज्ञापारमिता नय और मंत्र नय। मंत्र नय को वज्रयान भी कहते हैं। इसके अन्तर्गत मूल रूप से भारत, फिर तिब्बत में तंत्र का अपूर्व विकास हुआ है।‘‘८
इसके अतिरिक्त बौ= ट्टार्म जहो-जहो गया, उसने वहो-वहो स्थानीय परम्पराओं से खुद को जोडा। तिब्बत, चीन, जापान, थाइलैण्ड, वियतनाम जैसे देशों में बौ= ट्टार्म ने स्वयं को स्थानीय आवश्यकताओं, परम्पराओं व युग सत्यों के अनुरूप ढाला है। यदि जापान की ही बात की जाए तो ’तेरहवीं शताब्दी में बौ=-ट्टार्म कई ट्टााराओं में प्रवाहित दिखाई दिया। होनेन नामक महात्मा ने ’अमित सम्प्रदाय‘ की नींव डाली। ...होनेन के प्रट्टाान शिष्य शिन्रेन् ने ’अमित सम्प्रदाय‘ को सुट्टाार कर ’शिन सम्प्रदाय‘ खडा किया।‘९
बौ= व्रतोत्सव ः बौ= ट्टार्म के अपने व्रतोत्सव हैं। ’बु= पूर्णिमा, अमावस्या और दोनों अष्टमी को उपोसथ कहते हैं। स्थानीय लोग उसे ट्टार्म-दिन कहते हैं। ...उस दिन उपासक-उपासिकाऐ त्रिशरण, पंचशील लेते हैं।‘ बु= पूर्णिमा के उत्सव के ठीक एक माह बाद तिब्बत में ’सागा दावा‘ मनाया जाता है।१० छेशु-छंग जैसे पारम्परिक पर्वोत्सव तो हैं ही।
बौ= देवता व अवतारवाद एवं अन्य विश्वास ः
बौ= मत में पंचट्टयानी बु=ों, बोट्टिासत्वों, आर्या तारा, करुणा के देवता अवलोकितेश्वर, मंजुश्री, वज्रपाणि, योगिनी, डाकिनी, महामुध के अतिरिक्त बु= के अवतारों की अवट्टाारणा है तथा नागार्जुन, चोखांपा, पद्मपाणि आदि में भी देवत्व का अट्टिाष्ठान है। पोचवें भावी बु= के अवतार मैत्रेय के अलावा बु= मत में शाक्य मुनि के एक हजार अवतारों का विश्वास है।११ लामा परम्परा में अवतार को ’टुल्कू‘ कहा जाता है।१२
इसी प्रकार सृष्टि प्रलय के विषय में थेरवादी विश्वास है - ’’सात बार अग्नि से प्रलय होता है तब एक बार जल से होता है। फिर सात बार अग्नि से प्रलय होता है तब एक बार जल से प्रलय होता है। ऐसा जल प्रलय सात बार होता है तो फिर एक बार वायु से प्रलय होता है।‘‘१३
इसी तरह मने मंत्र ;े मणि पद्महे हुंद्ध, थंका ;चित्रित वस्त्रद्ध, खदक ;स्वागत में पहनाए जाने वाला वस्त्रद्ध, पताकाऐ, मृत्यु संस्कार आदि बौ= संस्कारों का उल्लेख भी यात्रावृाों में मिलता है। भारत तिब्बत व अन्यत्र भी भोटी भाषा बौ= ट्टार्म की ’ट्टार्म भाषा‘ है, पाली, संस्कृत का भी अपना महव है। बु=, बु=त्व एवं बौ= ट्टार्म को समर्पित कृष्णनाथ के यात्रावृा ’स्पीति में बारिश‘, ’किन्नर ट्टार्म लोक‘, ’लड्ढाख में राग-विराग‘, ’हिमाल यात्रा‘, ’कुमाे यात्रा‘, ’किन्नौर यात्रा‘, ’नागार्जुनकोण्डा ः कहो है नागार्जुन‘ के अलावा गगन गिल, श्रीराम परिहार, सुदर्शन वशिष्ठ, अशोक जेरथ, मट्टाु कांकरिया, कृष्णा सोबती जैसे अनेक यात्रिकों के सर्जन में बौ= ट्टार्म के विभिन्न पक्षों पर प्रकाश पडता है।
बौ= ट्टार्म में पोच प्रकार के चक्षुओं का विश्वास है - मानस, दिव्य, प्रज्ञा, ट्टार्म एवं बौ= चक्षु। इस प्रकार पंचस्कंट्टाों की अवट्टाारणा -
’’रूप, वेदना, संशा, संस्कार और विज्ञान - इन पोचों पदाथोङ को पंच स्कंट्टा कहते हैं। सुखकारक, दुखकारक वेदना और उपेक्षा वेदना - इन तीन प्रकार की वेदनाओं को वेदना स्कंट्टा कहते हैं। घर, पेड, गोव आदि विषयक को संज्ञा स्कंट्टा कहते हैं।‘‘१४
जन्म से मृत्यु तक के विविट्टा संस्कार - संहिता भी बौ= ट्टार्म की निजी है। यद्यपि वह अन्य भारतीय ट्टामोङ की सजातीय सगौत्रीय है। मरणोार संस्कार भी हैं। गगल गिल ने लिखा है -
’’सुना है, वहो एक जगह है, डोल्मा ला, तारा देवी का स्थान, तिब्बती लोग वहो अपने प्रियजनों को देवी तारा की रक्षा में छोड जाने के लिए परिर्मा करते हैं। कैलाश कोरा, प्रियजन की इस्तेमाल की हुई वस्तु, वस्त्र, बाल आदि छोड आओ, तो देवी सदा उनकी रक्षा करती है।‘‘१५
मंत्र, इष्ट वचन, ट्टार्म ग्रंथ, गोम्पा, विहार, चिा स्वरूप चैत्य, स्तूप, ट्टार्म गुरु इत्यादि के प्रति आस्था, दान, त्याग, मानव सेवा, जीव दया जैसे तव बौ= मत के मौलिक रूप में अंतर्हित हैं। जैसे गंगा स्नान से पाप ट्टाुल जाने की ट्टाारणा है, वैसे ही ट्टार्म चर्‍ को घुमाने से पाप मोचन का विश्वास हिमालय के बु=ानुयायियों में है। यही हिन्दी का यात्रा-साहित्य प्रणेता भारतीय चिा की अंतःप्रज्ञा और लोकमति में व्याप्त एकता का दर्शन कर लेता है - ’’...चाहे मैदान हो या पहाड तमाम वैज्ञानिक प्रगतियों के बावजूद इस देश की आत्मा एक जैसी। लोगों की आस्थाऐ, विश्वास, अंट्टाविश्वास, पाप-पुण्य की अवट्टाारणाऐ और कल्पनाऐ एक जैसी।‘‘१६
हिन्दी यात्रावृाों में ट्टार्ममतों के प्रति, स्वस्थ परम्पराओं के प्रति, आकर्षण एवं राग भाव है, वहीं अस्वस्थ व अप्रिय स्थितियों के प्रति निष्पक्ष, निर्मम आलोचना दृष्टि भी वर्तमान है। लड्ढाख में बौ= ट्टार्म की स्थिति देखकर मट्टाु कांकरिया लिखती हैं -
’’बु= की इस नगरी में बु=त्व कहीं नहीं था। जिस कर्मकाण्ड और पूजा-पाठ के विरु= बौ= ट्टार्म की स्थापना हुई थी, वह आज तरह-तरह के कर्मकाण्ड, अंट्टाविश्वास और अंट्टाश्र=ा के दलदल में ट्टोसा हुआ था। बु= ने कहा था कि संसार की असीमितता, संसार की विराटता, संसार का विस्तार संसार में नहीं, मन में है। वही मन यहो माला, चोला, झण्डा, मंत्र, चर्‍, ट्टवज और ताबीजों में डूबा हुआ था।...सच्चाई यह है कि लड्ढाख में आज दो ट्टााराऐ बहती हैं - एक सिंट्टाु नदी की और एक कर्मकाण्ड की। जन्म से लेकर मरण तक बल्कि मरने के उपरान्त भी लड्ढाखियों को कर्मकाण्ड से मुक्ति नहीं है। गोव की हर गतिविट्टिा के केन्ध् में होते हैं लामा।‘‘१७
और अंत में लेखिका का क्षुब्ट्टा चिा निष्कर्ष पर पहच जाता है - ’बु= ने अंट्टाकार से लडा, पर आज जो बु= के नाम पर जो अंट्टोरा पसर पडा है उससे लडने कौन बु= आएगा? लड्ढाख का बीज शब्द है ट्टार्म, पर इस ट्टार्म का यहो मनुष्य की मुक्ति से कोई सम्बन्ट्टा नहीं है। लड्ढाख की प्रगति के लिए जरूरी है कि कुछ समय के लिए लड्ढाख से ऐसे ट्टार्म को देश-निकाला मिल जाए।‘१८
संदर्भ ः
१. गोविन्द मिश्र*- रंगों की गंट्टा ;२द्ध, पृ.४२, किताबघर, दिल्ली, सं.२०१०
२. कृष्णनाथ*- स्पीति में बारिश, पृ.११४, वाग्देवी, बीकानेर, सं.१९९८
३. ’फिर दुःख सत्य है। इसके छुटकारे का रास्ता भी बु= ने बताया है।‘ वही, पृ.१०१
४. स्पीति में बारिश, पृ.१३५ पर - सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वचन, सम्यक ट्टार्म, सम्यक जीविका, सम्यक व्यायाम, सम्यक स्मृति व सम्यक समाट्टिा को अष्टांगिक मार्ग कहा है। नाम भेद से वह ही ’कश्मीर से कन्याकुमारी‘ में उल्लिखित हैं।
५. डॉ. राजेश कुमार व्यास, कश्मीर से कन्याकुमारी, पृ.७४-७५, नेशनल बुक टत्र्स्ट, दिल्ली, सं.२०१२
६. कृष्णनाथ*- स्पीति में बारिश, पृ. ११२, वाग्देवी, बीकानेर, सं. १९९८
७. ’बु= शरण, ट्टार्म शरण, संघ शरण, अनन्य शरण नहीं जा पाता। इससे मेरा दुःख और गहरा होता है।‘ कृष्णनाथ, स्पीति में बारिश, पृ.६३, वाग्देवी, बीकानेर, सं. १९९८
८. कृष्णनाथ*- लड्ढाख में राग-विराग, पृ. ९४, वाग्देवी, बीकानेर, सं. २०००
९. कृष्णदा पालीवाल - जापान में कुछ दिन, पृ. १९८, किताबघर, दिल्ली, सं. २०११
१०. कृष्णनाथ*- अरुणाचल यात्रा, पृ. ११६, वाग्देवी, बीकानेर, सं. २००२
११. गगन गिल - अवाक कैलाश मानसरोवर ः एक अंतर्यात्रा, पृ. २६, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, सं. २००९
१२. कृष्णनाथ*- लड्ढाख में राग-विराग, पृ. २४, वाग्देवी, बीकानेर, सं. २०००
१३. कृष्णनाथ*- पृथ्वी परिर्मार, पृ. ११८, अपाला प्रकाशन, लखन, सं. १९९०
१४. कृष्णनाथ*-*किन्नर ट्टार्म लोक, पृ. १५७, वाग्देवी, बीकानेर, सं. १९९९
१५. कृष्णा सोबती*- बु= का कमण्डल ः लड्ढाख, पृ. १३४, राजकमल, दिल्ली, सं. २०१२
१६. गगन गिल*- अवाक कैलाश मानसरोवर एक अंतर्यात्रा, पृ. १३, वाणी प्रकाशन, दिल्ली, सं. २००९
१७. मट्टाु कांकरिया*- बादलों में बारूद, पृ. ५८, किताबघर, दिल्ली, सं. २०१४
१८. मट्टाु कांकरिया, बादलों में बारूद, पृ. १४८, किताबघर, दिल्ली, सं. २०१४