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भीष्म साहनी का कथा साहित्य :मूल्य संक्रमण

निशा उपाध्याय
साहित्यकार पर तत्कालीन जीवन और युगीन आचार-विचार, रहन-सहन और भावना, आदर्श तथा सामाजिक परिवेश और मान्यताओं का प्रभाव पडता है। इन्हीं सब का संश्लिष्ट चित्रण उनकी रचनाओं में अभिव्यक्ति पाता है। अतः छायावादी कवि पंत व निराला के साहित्यिक मूल्य यदि आगे चलकर दो विश्व समरोार प्रतिर्यााओं माक्र्स, गोट्टाी, अरविन्द के प्रभाव स्वरूप बदल गए तो इसमें आश्चर्य की गुंजाइश कहो रह जाती है। छायावादी काव्य के मूल्यों में जहो वैयक्तिता, सुकोमल कल्पनाशीलता, आदर्शवादिता और सौंदर्यपरकता का प्राट्टाान्य दिखाई पडता है। वहीं प्रगतिवादी काव्य में सामाजिकता, कटु यथार्थवादी वास्तविकता और उपयोगिता का महवपूर्ण स्थान है। इन दो काव्यट्टााराओं के साहित्यिक मूल्यों में पाये जाने वाले परिवर्तन का कारण तत्कालीन परिवेश में बदलाव ही है।
अतः परिवेश मूल्यों में परिवर्तन का महवपूर्ण कारक है। मूल्य समय सापेक्ष अवट्टाारणा है, जो प्रत्येक स्थान एवं काल के अनुसार अपना स्वरूप ग्रहण करते हैं। एक काल के मूल्य दूसरे काल में अर्थहीन सि= होने लगते हैं एवं नये मूल्यों का सृजन प्रारम्भ होता है।
मूल्य ः अर्थ एवं स्वरूप
’मूल्य‘ शब्द मूल + यत् से निष्पन्न है, जिसका अभिप्राय है किसी वस्तु के विनिमय में दिया जाने वाला ट्टान, दाम बाजार।१
सामान्य रूप से मूल्य पद का यही अभिट्टोयार्थ लिया जाता है। कालान्तर में ’मूल्य‘ पद के अर्थ में विस्तार होता है, अब यह मानदण्ड के अर्थ की भी अभिव्यक्ति करने लगा है। वर्तमान में संस्कृति के साथ मूल्य का घनिष्ठ सम्बन्ट्टा माना जाने लगा है।
’’मूल्य समाज की वह आट्टाारशिला है, जिस पर सभ्यता और संस्कृति का भव्य प्रासाद निर्मित होता है। समाज में मूल्य सदैव बनते-मिटते आये हैं। आदि समाज में भी कतिपय मूल्य रहे होंगे। समाज के निर्माण में मूल्यों ने महवपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया है। समाज का सम्बन्ट्टा मानव जगत से है, अतः मूल्यों का सम्बन्ट्टा भी मानव से है।‘‘२
मूल्यों का क्षेत्र बहुत व्यापक है। मनुष्य की बोट्टा र्या् सहित समस्त विट्टााओं का लक्ष्य मूल्यों का उत्पादन है। मूल्यांकन मानव व्यवहार की सार्वभौम विशेषता है एवं मूल्यान्वेषण की जिज्ञासा उसमें युग- युगान्तर से रही है।
मनुष्य सृजनशील प्राणी है। अपने सृजनात्मक रूप से वह मूल्यों की उपलब्ट्टिा को ही सर्वोपरि मानता है। वे मूल्य अनुभूति की समग्रता में भौतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक व आट्टयात्मिक स्तर पर वह उपलब्ट्टा करता है। ट्टार्म और ईश्वर भी सांस्कृतिक स्तर की कल्पनाऐ हैं और वे उच्च मूल्यों की प्रतीक है। मनुष्य के जीवन में मूल्य उसी प्रकार संचरित होते हैं, जिस प्रकार शरीर में रक्त प्रवाहित होता है। शरीर के किसी भाग में यदि रक्त पहचना बंद हो जाता है तब वह अंग निष्र्यक हो जाता है। वैसे मूल्यों के अभाव में मानव जीवन का कोई भी पहलू दृष्टिविहीन अथवा समाप्त प्रायः सा हो जाता है।
जब मनुष्य अपने भौतिक और आट्टयात्मिक जीवन में आवश्यक संगति व अनुशासन की स्थापना करने में सफल हो जाता है तब ही वह सर्वोम मूल्यों की स्थापना करने में सफल हो पाता है। मानव का स्वयं का विवेक ही मूल्यों के खरेपन के लिए कसौटी का कार्य करता है।
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने साहित्य में मूल्यों की प्रासंगिकता के संदर्भ में स्पष्ट लिखा है, ’’साहित्य सामाजिक मंगल का विट्टाान है। यह सत्य है कि वह ;साहित्यद्ध व्यक्ति विशेष की प्रतिभा से ही रचित होता है, किन्तु और अट्टिाक सत्य यह है कि प्रतिभा सामाजिक प्रगति की ही उपज है। एक ही मनोराग जब व्यक्तिगत सुख-दुःख के लिए नियोजित होता है तो छोटा हो जाता है, परन्तु जब सामाजिक मंगल के लिए नियोजित होता है तो महान हो जाता है, क्योंकि वह सामाजिक कल्याण का जनक होता है।‘३
साहित्य में मूल्यगत प्रासंगिकता के सम्बन्ट्टा में मुक्तिबोट्टा का चिंतन भी महवपूर्ण है। उन्होंने नैतिक मूल्यों में निहित औचित्य की भावना को साहित्य में आवश्यक माना है। उनके अनुसार, ’जब कलाकार ही अपने औचित्य को स्थापित करना चाहता है, तब साहित्य में अपने आप ही नैतिक मूल्यों का आगमन हो जाता है। कलाकार अपने औचित्य की स्थापना के लिए, आत्मविस्तार के लिए, अपने को उच्चतर स्थिति में उद्बु= करने के लिए, अपना परिचय अन्तः दार्शनिक भाव-ट्टााराओं से कराता है। उसके पास एक विचारट्टाारा होती है, जिसके आट्टाार पर वह जीवन चित्र प्रस्तुत करता है।‘‘४
ऐतिहासिक परिवर्तनों के साथ-साथ मूल्यों में भी परिवर्तन अवश्य घटता है। मूल्य सदैव उपयोगितावादी, सुख, श्रम तथा चरमोत्कर्ष आदि से आयोजित होते हैं तथा मनुष्य की रुचियो एवं अनुभूतियो मूल्यों की बीज होती हैं। मानव की उन्नति-अवनति चाहे तो आंतरिक स्तर पर घटित हो अथवा बाह्म स्तर पर, मूल्यों पर आवश्यक प्रभाव डालती है, पर यह प्रभाव पूर्व मूल्यों को पूर्णरूपेण विलीन नहीं करता, परिवर्तन प्रर्याप सतत एवं अनंत हैं। समाज के बदलाव में इसकी महवपूर्ण भूमिका सदैव बनी रहेगी।
मूल्य संर्ममण
मूल्य एक महवपूर्ण अवट्टाारणा है। मानव जीवन का व्यवस्थित ढांचा मूल्यों पर आट्टाारित है। मूल्य काल सापेक्ष अवट्टाारणा है। एक समय विशेष के अनुरूप समाज की आवश्यकतानुसार मूल्यों का निट्टाार्रण होता है, किन्तु कालानुसार उसकी अर्थवाा में परिवर्तन दृष्टिगोचर होने लगता है। उसकी सार्थकता निर्मूल अनुभव होने लगती है, जिसके परिणामस्वरूप नए मूल्य अस्तित्व में आने की प्रर्याद में सम्मिलित होते हैं, जिसके कारण पुराने एवं नए मूल्यों में अन्तर्द्वन्द्व प्रारम्भ होने लगता है, जिसे हम मूल्य संर्म्ण के रूप में पहचानते हैं।
मूल्य संर्म।ण एक सार्वभौमिक सत्य है। प्रत्येक काल एवं देश के मूल्यों में संर्म्ण कहीं ट्टाीमी गति से होता है तो कहीं तीव्र गति से। कहीं दृश्यमान होता है तो कहीं इसका अनुभव अत्यन्त सूक्ष्म रूप में दृष्टिगत होता है। संर्मंण परिवर्तन पर आट्टाृत है और परिवर्तन की प्रर्यात सतत एवं शाश्वत प्रर्याि है। यह नैसर्गिक प्रर्याक है जिसे किसी भी प्रकार से रोका या दबाया नहीं जा सकता है।
ज्ञान-विज्ञान और औद्योगिक विकास ने नए समाज, सम्बन्ट्टा एवं मूल्यों की स्थापना की है। मूलतः स्रर्मनण की प्रर्यार दीर्घकालीन प्रर्याे है। औद्योगिक र्‍ांति के उपरान्त विश्व में एक प्रकार से मूल्य संर्मदण की प्रर्यां प्रारम्भ होती है और यह प्रर्यां बदलाव की स्थितियों में ज्यादा लक्षित होती है। वैज्ञानिक विकास ने इन प्रर्या ओं को गति प्रदान की है। संचार र्‍ांति और पारस्परिक सम्बन्ट्टाों में वृ= से भी संर्मीण की प्रर्याज प्रभावित होती है।
साट्टाारण संर्मंण तो सदैव र्यापशील रहता है, परन्तु यातायात एवं आवागमन के साट्टानों में वृ= के फलस्वरूप सामाजिक मूल्य संर्म ण की गति बढ जाती है।
परिवर्तन की प्रर्या आट्टाुनिक युग में जितनी तीव्र गति से हुई है, वैसी अन्य किसी काल में देखने को नहीं मिलती है। ये परिवर्तन इतने अल्प समय में हो जाते हैं कि मनुष्य अपनी स्थिति और कायोङ को जीवनभर निश्चित नहीं कर पाता है और मूल्य संर्म ण की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। मनुष्य को इन परिवर्तित मूल्यों के साथ समन्वय करना ही पडता है, अन्यथा स्थिति अत्यन्त विकट हो जाती है। ग्रीन इस सम्बन्ट्टा में सटीक टिप्पणी करते हैं।
’’मानववाद के उदयकाल में ईश्वर जैसी किसी मानवोपरि साा या उसके प्रतिनिट्टिा ट्टार्माचायोङ को नैतिक मूल्यों का अट्टिानायक न मानकर मनुष्य को ही इन मूल्यों का विट्टाायक मानने की प्रवृा विकसित होने लगी थी... इस समय पहली बार यह स्वीकार किया गया था कि पुराने मूल्य अब मिथ्या पडने लगे हैं।‘‘५ सम्भवतः यही मूल्य संर्म ण की सत्यता का आभास दिलाने वाला ऐतिहासिक दिन माना जा सकता है। मानव इस प्रकार अलौकिक से लौकिक, असाट्टाारण से साट्टाारण की ओर उन्मुख होकर यथार्थ की ओर अग्रसर हुआ है। सामाजिक व अन्य मूल्य भी मानव की प्रवृायों के साथ बनते एवं पुनः नवीन रूप से सामने आते हैं।
मूल्य संर्मंण की यह प्रर्याआ तो अनवरत है। इतिहास में जब भी परिवर्तन आया तो मूल्यों में अन्तर उपस्थित हुआ। समय और परिस्थिति के अनुरूप ही मूल्यों ने भी अपना “ाृंगार किया। समग्रतः मूल्यों की अपनी कोई शाश्वत साा नहीं है। इनका उत्थान, पतन, विकास क्तास मानव की वैचारिक प्रगति और अवनति की अभिव्यंजनाओं पर आट्टाारित है।
सामाजिक आन्दोलन एवं चेतना के परिणामस्वरूप साहित्य में परम्परागत मूल्यों के साथ ही समाज द्वारा अपनाये जा रहे युगानुकूल प्रगतिशील चेतना के परिणाम स्वरूप नए मूल्यों की अभिव्यक्ति को साहित्य में स्थान मिलने लगा है। बदलते समय के प्रभावों के फलस्वरूप समाज में दो पीढयों का संघर्ष, परम्परागत ट्टाारणाओं, विश्वासों एवं मान्यताओं में टकराहट साहित्य के कथानक में सहज रूप से देखा जा सकता है।
परिवार सामाजिक संगठन का मूल है। भीष्म साहनी ने अपने साहित्य में परिवार के नए बनते बिगडते स्वरूप को अभिव्यक्ति दी है। परिवार के विविट्टा स्वरूपों की अभिव्यक्ति साहित्य में देखने को मिलती है। आर्थिक स्थितियों ने समाज में परिवार के स्वरूप को प्रभावित किया है। समय के अनुरूप परिवार के प्रति व्यक्ति की आस्था टूटने लगी। व्यक्ति की परिवार के प्रति मान्यता खत्म होने लगी है। व्यक्तित्व के विकास में परिवार को अवरोट्टाक के रूप में अनुभूत किया जाने लगा है।
कथा साहित्य और मूल्य संर्मसण
भीष्म साहनी के उपन्यास साहित्य में ’कडयो‘ इस रूप को देखा जा सकता है। महेन्ध् का कथन इस संदर्भ में प्रासंगिक है।
अव्वल तो, जहो औरत भी काम करती हो और मर्द भी, वहो आर्थिक निर्भरता खत्म हो जाती है। रह गई बच्चों की बात, उनका पालन सरकार अपने हाथों में ले सकती है। आज नहीं तो कल लेगी।
परिवर्तन के युग में व्यक्ति स्वातंत्र्य की भावना ने परम्परागत परिवार की अवट्टाारणा को प्रभावित किया है। परम्परागत पारिवारिक व्यवस्था में परिवर्तन की आवश्यकता महसूस की जाने लगी है। संयुक्त परिवार के स्थान पर आणविक परिवार को महव दिया जाने लगा है।
समय और परिस्थितियों के अनुकूल इस संस्था में परिवर्तन आया है। सामाजिक परिवर्तन ने व्यक्तिगत जीवन को प्रभावित किया है। काम, अर्थ एवं ट्टार्मगत आयामों को वैज्ञानिक युग ने नवीन संदर्भ दिए हैं। आज की यांत्रिक सभ्यता में मानव जीवन यंत्रवत् हो गया है। प्रेम, सेवा, सहानुभूति, सहिष्णुता, सहअस्तित्व आदि के स्रोत क्षीण होते जा रहे हैं। समयाभाव ने मानवीय सम्बन्ट्टाों को प्रभावित किया है, उनमें पहले जैसी उष्णता नहीं रही है।
विवाह को परिवार की रीढ माना गया है। वर्तमान युग में वैवाहिक मूल्यों में भी र्‍ांतिकारी परिवर्तन उपस्थित हुए हैं। अब विवाह परम्परागत सामाजिक बंट्टान न रहकर यौन क्षुट्टाातृप्ति का साट्टान मात्र रह गया है। तलाक प्रथा ने परम्परागत वैवाहिक स्वरूप को छिन्न-भिन्न कर दिया है।
यौन सम्बन्ट्टाों से उत्पन्न उारदायित्व को सही दिशा प्रदान करने के लिए सम्भवतः विवाह संस्था का जन्म हुआ। विवाह स्त्री-पुरुष की आदिम काम भावना को सामाजिक स्वीकृति देता है। यौन स्वेच्छाचार को विवाह ने एक सीमा तक नियंत्रित किया। कालान्तर में विवाह को ट्टार्म से संयुक्त कर काम सि= का आट्टाार माना गया। इस प्रकार परिवार का जनक होकर भी विवाह स्वयं एक पारिवारिक सामाजिक मूल्य बन गया।
समाज के इकाई भूत परिवार परम्परागत दृष्टिकोण निरर्थक हो गया। विवाह की, दो आत्माओं का पुनीत मिलन, जन्म-जन्मांतर का सम्बन्ट्टा, स्त्री-पुरुष का स्थायी बंट्टान आदि जैसी परम्परागत ट्टाारणाऐ क्षीण हो चुकी हैं। आज विवाह एक समझौता अथवा मैत्री सम्बन्ट्टा के रूप में स्वीकार किया जाता है। महानगरीय जीवन में विवाह सम्बन्ट्टाी उन सभी परम्पराओं को पूरा करने का न तो किसी को अवकाश है और न इसकी आवश्यकता समझी जाती है। विवाह संस्कार हमारी सामाजिक व्यवस्था का सुदृढ आट्टाार है। प्रारम्भ में इसे पवित्र और अटूट बंट्टान के रूप में देखा जाता था। देश और काल सापेक्ष परिवर्तन के साथ विवाह के प्रति आस्था का भाव परिवर्तित होने लगा है। आज विवाह के प्रति दृष्टिकोण बिल्कुल बदल गया है। परम्परागत वैवाहिक मूल्यों में र्‍ांतिकारी परिवर्तन होने लगे हैं।
’कडयो‘ उपन्यास में भीष्म साहनी ने विवाह के टूटन को रेखांकित किया हैं।
मैं तुम्हारे साथ नहीं रह सकता, यह शादी भूल थी। मैंने फैसला कर लिया है।६
महेन्ध् का कथन, ’’मैं दकियानूसी नहीं ह, बल्कि आज की नजर रखने वाला आदमी ह, देशकाल के चौखटै में वस्तुस्थिति को देख-परख कर अपना निष्कर्ष देने वाला आदमी ह।‘‘
मैं समझता ह, विवाह की प्रथा अब ज्यादा देर टिकेगी नहीं, उसने दार्शनिक अंदाज में कहा, ’’कोई कारण नहीं कि वह ज्यादा देर तक टिक जाए।‘‘७
विवाह के सम्बन्ट्टा में महेन्ध् का दृष्टिकोण इन पंक्तियों में उद्घाटित हुआ है, ’’सोप के मह में छिपकली, छोडे तो अेट्टाा, खाए तो मौत, यह है हमारे यहो विवाह की स्थिति।‘‘८
महेन्ध् स्पष्ट शब्दों में कहता है, ’’साफ बात है, हर मर्द की औरत किसी न किसी वक्त बासी पड जाती है। वह उससे बि जाता है, कुदरती बात है। ऐसा युगों-युगों से चला आया है और चलता रहेगा। पर गृहस्थी तोडने या बनाए रखने की बात अलग है...।‘‘९
’कुंतो‘ उपन्यास में भी विवाह सम्बन्ट्टा में आए परिवर्तन को, उसकी निरर्थकता को ट्टानराज इन शब्दों में व्यंजित करता है, ’’यह भी कुदरत का कोई कानून ही होगा भइया, जिसके तहत थुलथुल का ब्याह मेरे साथ हुआ। किसी दूसर के साथ ब्याही गई होती तो शायद सुखी होती। गलत आदमी के साथ उसे बोट्टा दिया गया तो बेचैन रहती है, रोती बिलखती है।‘‘१०
उसने हेसकर कहा, ’’अगर बच्चे बोतलों में पैदा होने लगें तो ब्याह और गृहस्थी की जरूरत ही कहो रह जाएगी?‘‘११
स्त्री-पुरुष सम्बन्ट्टा में बदलाव आने लगे हैं। निम्न कथनों से इस तथ्य का प्रमाण प्राप्त किया जा सकता है।
’’मैं उन आदमियों में से नहीं ह जो सैक्स को पाप मानते हैं। सैक्स का सवाल अलग है और गृहस्थी बनाए रखने का सवाल अलग।‘‘१२
विवाह की परम्परागत ट्टाारणा में प्रगतिशील विचारों के प्रवेश से प्रेम विवाहों की संख्या बढती जा रही है। प्रेम-विवाह के अट्टिाकांश जोडे शिक्षित ही हैं। अभिप्राय यह है कि शिक्षित समाज में प्रेम विवाह का प्रचलन बढा है। स्वतंत्रता के बाद के हिन्दी उपन्यासों में हिन्दू मुस्लिम युवक-युवतियों में कहीं-कहीं प्रेम तो मिलता है, पर स्पष्ट रूप से विवाह अथवा प्रेम विवाह और उसकी सामाजिक स्वीकृति के दर्शन नहीं के बराबर हैं। दाम्पत्य जीवन के मनमुटाव, संघर्ष अथवा घुटन से मुक्ति पाने के लिए तलाक को मान्यता मिली है। तलाक से अभिप्राय बिगडते वैवाहिक सम्बन्ट्टाों को कानूनी दृष्टि से विच्छेद कर देता है। परम्परागत वैवाहिक सम्बन्ट्टाों में परिवर्तन आया, तो तलाक की आवश्यकता का अनुभव किया गया। तलाक की स्थिति अट्टिाकांशतः प्रेम विवाहों में आई है अर्थात् जिन्होंने साहस करके प्रेम विवाह किया, उन्होंने उसे तोडने का अट्टिाकार सुरक्षित मान लिया है।
निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि विवाह की परम्परागत ट्टाारणा में युगानुकूल परिवर्तन आया है। विवाह सम्बन्ट्टाी परम्परागत मूल्य टूट रहे हैं। पर यह मूल्य विघटन की प्रर्या ग्रामीण समाज की अपेक्षा शहरों में अट्टिाक तीव्र गति से चल रही है। समग्रतः भीष्म साहनी के साहित्य में सामाजिक मूल्य संर्महण के विविट्टा आयामों को सहज रूप से देखा जा सकता है।