fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

अनोखा जन्म दिन

पवन पहाडया
निष्ठा अपने मम्मी-पापा की लाडली बिटिया थी। उसके मम्मी-पापा उसे बहुत प्यार करते थे। निष्ठा जिस चीज की फरमाईश करती वह चीज तुरन्त निष्ठा के हाथ में होती। ट्टाीरे-ट्टाीरे निष्ठा कुछ बडी हुई। मम्मी पापा ने उसका एडमिशन एक अच्छे विद्यालय में करवा दिया। निष्ठा को स्कूल जाने में बडा मजा आता था। डत्रईवर गाडी में बिठाकर निष्ठा को रोज स्कूल छोडने जाता और छुड्डी होते ही गाडी लिए गेट पर तैयार मिलता। रास्ते में एक ऐसा मोहल्ला भी पडता था, जिसमें से गुजरते समय निष्ठा वहो खेल रहे मेले कुचैले बच्चों को देखती तो वह सोचने में डूब जाती कि ये नहाते ट्टाोते क्यों नहीं हैं? ये स्कूल पढने क्यों नहीं आते हैं? क्या ये इसी तरह बिना पढे लिखे बडे हो जाऐगे? अगर ये इसी तरह बडे हो जाऐगे तो आगे जाकर करेंगे क्या? तुरन्त उसके मन में विचार आया कि कहीं ऐसे बच्चे ही तो बडे होकर जेबकतरे नहीं बन जाते होंगे या लूटपाट कर भाग जाने वाले तो नहीं हो जाते होंगे। यदि ऐसा है तो यह समस्या इस देश में दिन-प्रतिदिन बढती ही जाएगी। इस समस्या का कैसे समाट्टाान किया जाए या इन सबको कैसे रोका जाए
ऐसे विचार निष्ठा के मन में हमेशा आते रहते तथा वह डत्रईवर अंकल से इसका निदान भी पूछती रहती।
डाईवर अंकल उसे समझाता - ’’बिटिया तुम जब बडी होकर कुछ बनो तो इन विचारों को विस्मृत मत होने देना। मुझे बहुत खुशी है बिटिया! ऐसा सोचने वाले तुम्हारे जैसे कम ही होते हैं।‘‘
कल निष्ठा का आठवो जन्मदिन मनाया जाना है। घर को अच्छी तरह से सजाया जा रहा है। मम्मी पापा अपने सभी जान-पहचान वालों व रिश्तेदारों को कार्ड बोटने में लगे हुए हैं। बडे हॉल में सोफों को हटाकर मंच जैसा मनाया जा रहा है। उस मंच से निष्ठा अपनी सहेलियों व मम्मी पापा के साथ केक काटेगी।
शाम ढले जब मम्मी पापा घर लौटे तो उनके साथ नौकरों ने बडे-बडे बैग उठा रखे थे। निष्ठा ने पूछा तो उसके सामने ही मम्मी पापा ने नौकरों से बैग वहीं रखवा कर निष्ठा से बोले, ’’इन सबमें जितना सामान है, वह तुम्हारे जन्मदिन के लिए है। कल तुम्हारा जन्मदिन इतने ठाठ-बाट से मनाऐगे कि तुम्हें खुद आश्चर्य होगा और तुम्हें यह सब देखकर गर्व भी होगा कि आखिर तुम किसकी बेटी हो।‘‘
पर पापा! मैंने तो कुछ और ही ठान रखा है तथा मैं कल मेरा जन्मदिन इस तरह कतई नहीं मनाेगी। आप सारा सामान व ऑर्डर वापस कर दें, मुझे इस तरह कुछ नहीं करना है।
मम्मी पापा अवाक से निष्ठा को देखते रह गए। मम्मी ने पूछा, ’’क्या हो गया हमारी बिटिया को? कोई भूल हो गई हो तो तुरन्त बताओ, अभी निस्तारण करा दिया जाएगा। ऐसा कैसे हो सकता है कि हमारी बिटिया का जन्मदिन हो और वह मनाना नहीं चाहे।‘‘
’’हो-हो बताओ निष्ठा। अगर कोई चूक हुई हो तो बताये बगैर कैसे पता चलेगा? इसमें इस तरह का फैसला लेने की कहो जरूरत है?‘‘ पापा ने माथे पर हाथ फैरते हुए पूछा।
’’आप मेरा जन्मदिन मनाना ही चाहते हैं तो मैं जैसा चाहगी, वैसा करोगे तो मैं जन्मदिन मनाने को तैयार ह।‘‘ निष्ठा ने जोर देकर यह बात कही।
’’अरे वाह! यह भी कोई बात हुई बिटिया रानी! तुम कहो तो सही। संसार की कोई चीज जो हम ला सकते हैं वो मोगो और अगर नहीं लाऐ तब तो कुछ कहना। बताओ तो सही हमारी बिटिया रानी क्या चाहती है?‘‘
’’देखो पापा! मैंने जिस तरह का सोचा है, यदि आप उस तरह कर सकते हैं तो यह फालतू का खर्चा तो आपको बंद करना ही होगा। न मुझे केक काटना है, न आपको कोई पार्टी रखनी है। मेरा जन्मदिन मनाने का मैंने कुछ अलग ही सोच रखा है। आप बताइए मेरे जन्मदिन पर कल आप कितना खर्चा करोगे? वो सारा खर्चा आप मुझे नकद देने को तैयार हैं क्या? यदि हो, तो आप उस राशि को मैं जैसे बताे, उस प्रकार व्यय कर सकते हैं, तो मैं जन्मदिन मनाने को तैयार ह।‘‘
’’अरे बेटा! तुम जितनी राशि मोग सको वो मोग कर देखा तो सही, हम नकद दे देंगे लेकिन पार्टी के खर्चे की तुम क्यों चिंता करती हो?‘‘
’’बस पापा! मैंने कहा न कि मेरी जन्मदिन की पार्टी पर जितना खर्च लगेगा वो आप नकद दे दो और किसी तरह की कोई पार्टी वार्टी नहीं करनी है। मैं इन रुपयों से गरीब बच्चों को सरकारी स्कूल में दाखिला दिलवाेगी। उनके लिए यूनीफॉर्म, बैग, जूते, मौजे, किताबें, पेन, पेन्सिल व जामेटत्री बॉक्स आदि चीजें खरीद कर देना चाहती ह ताकि वे पढ-लिखकर इंसान बनें, चोर-उचक्के, जेबकतरे नहीं। इसी तरह आने वाले प्रत्येक जन्मदिन के खर्चे से मैं उन बच्चों का भविष्य सेवारना चाहती ह।‘‘
’’हम तो ट्टान्य हो गए, तेरी जैसी बिटिया को पाकर!‘‘ निष्ठा के मम्मी-पापा एक साथ बोले। ’’आज तुमने हमारी ओखें खोल दी। हम पैसे वाले कभी यह नहीं सोचते हैं कि हमारे बच्चों की तरह गरीबों के भी बच्चे होते हैं तथा उनके भी कुछ अरमान होते हैं। हमें तुम्हारे पर गर्व है निष्ठा! जन्मदिन तो कल मनाऐगे ही, लेकिन अब हॉल में नहीं, उन बच्चों के साथ जिनको तुम सुट्टाारना चाहती हो। हम तुम्हारे साथ हैं निष्ठा! तेरे जैसे विचारों वाली बिटिया हर घर में पैदा हो तो कहना ही क्या!‘‘
निष्ठा ने तुरन्त अपने माता-पिता के चरण छूकर उनसे आशीर्वाद लिया और मन ही मन सोचने लगी कि काश! सभी माता-पिता अपने बच्चों में ही सब कुछ नहीं देखकर, गरीबों के बच्चों को सुट्टाारने का ठेका ले लें तो मेरे जैसे बच्चों का जन्मदिन मनाना सार्थक हो जाए।