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वन देवता का आशीर्वाद

गोविन्द भारद्वाज
एक गोव में जग्गू नाम का बहेलिया रहता था। वह पास के घने जंगल में रंग-बिरंगे और सुन्दर-सुन्दर पंछियों को पकडता। फिर वह उन पंछियों को चोरी-छुफ शहर ले जाकर ेचे दामों में बेच देता। शहर के लोग उन्हें पिंजरों में कैद करके रखते थे।
एक दिन जग्गू बहेलिये को जंगल में बहुत ही सुन्दर एक चिडया हाथ लग गयी। उसकी सुन्दरता को देखकर उसने उस नन्ही चिडया को अपने घर के पिंजरे में ही बंद कर लिया।
नन्ही चिडया पिंजरे में बहुत उदास रहने लगी। उसे अपने बच्चे बहुत याद आ रहे थे। वह रोजाना ईश्वर से प्रार्थना करती और कहती, ’’हे वन देवता, मुझे यहो से मुक्ति दिलवा दो।‘‘
एक दिन जग्गू की छः साल की बेटी स्कूल से लौट रही थी। रास्ते में उसका किसी ने किडनेप कर लिया। उसकी प्यारी-सी बेटी जब घर नहीं लौटी तो जग्गू और उसकी पत्नी बडे परेशान हो गये। दोनों ने मिलकर गोव का चप्पा-चप्पा छान मारा, लेकिन उनकी बेटी कहीं नहीं मिलीं। रात भी होने लगी थी। आखिर वे हार-थक कर सुबह होने का इंतजार करने लगे। जग्गू की पत्नी का रोते-रोते बुरा हाल था। अचानक बैठे-बैठे उसकी ओख लग गयी। उसने एक सपना देखा कि एक वृ= आदमी उनके घर आया और बोला, ’’पुत्री! मैं वन देवता ह। मुझे पता है कि तुम्हारी बिटिया कहीं गायब हो गई है। तुम उसी की चिंता में रो रही हो।‘‘ ’’हो...बाबा, मैं सचमुच बहुत दुःखी ह। यह मेरी इकलौती बेटी है। पता नहीं मेरी बच्ची कहो और किस हाल में होगी।‘‘ जग्गू की पत्नी ने रोते हुए जवाब दिया।
वन देवता ने बडी सहजता से कहा, ’’लेकिन बेटी कभी तुमने सोचा है कि तुम्हारे पति ने मेरे जंगल से न जाने कितने परिंदों को अपने जाल में फेसा कर उन्हें शहर में बेच दिया। वे भी तो किसी के बच्चे या मो-बाप रहे होंगे। इतना ही नहीं, बल्कि आज भी तुम्हारे घर के पिंजरे में एक सुन्दर चिडया कैद है। उसके दो बच्चे कई दिनों से अपनी मो की तलाश कर रहे हैं। तुम अच्छी तरह जानती हो, जंगल के पेडों की कटाई करना या पंछियों को बंदी बनाकर बेचना कितना बडा गुनाह है। ये पर्यावरण को शु= बनाए रखने के लिए कितने उपयोगी हैं।‘‘
वन देवता का उपदेश सुनकर जग्गू की पत्नी ने हाथ जोडकर कहा, ’’हे वन देवता, हमें माफ कर दो। मैं अभी उस चिडया को पिंजरे से आजाद करती ह, किन्तु मेरी बिटिया मुझे मिल जाए, ऐसा आशीर्वाद अवश्य देना।‘‘
’’तथास्तु...!‘‘ वन देवता ने अपना आशीर्वाद देते हुए कहा। जग्गू की पत्नी बडबडाती हुई जाग गई। उसने घबराते हुए अपने पति को सपने की सारी बात बता दी। जग्गू को भी उसके सपने पर भरोसा हो गया। उसने तुरन्त पिंजरा खोल कर उस नन्ही चिडया को आजाद कर दिया। चिडया चहचहाती हुई जंगल की तरफ उड गयी।
जैसे ही सूरज की पहली किरण ट्टारती पर आई कि जग्गू का किसी ने दरवाजा खटखटाया। वह दौडकर दरवाजा खोलने गया। सामने उसकी बेटी उससे लिपट कर रोने लगी। जग्गू की पत्नी भी वहो आ गई और अपनी बेटी को पाकर खुशी के मारे रोने लगी। उनकी बेटी ने बताया कि, ’’मुझे एक बूढा आदमी अपने घर ले गया था और मुझे अच्छी-अच्छी चीजें खाने को दीं। ढेर सारे खिलौने भी दिए। इतना ही नहीं, वो मुझे छोडने के लिए अपने घर तक भी आए थे।‘‘
बिटिया की बात सुनकर उनको यकीन हो गया कि वह वृ= आदमी और कोई नहीं, वन देवता ही थे। जो सपने में भी आए थे।
उस दिन से ही जग्गू बहेलिये ने कसम उठाई कि वह पंछियों को पकडना छोड देगा।