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दोस्ती

माधुरी शास्त्री
नीम और अरडू दोनों पौट्टो बचपन में, आसपास ही अंकुरित हुए थे। पास ही खेत था, उसकी मेड ;बाउण्डत्रीद्ध में लगे कोटों ने उड-उडकर, बिखर-बिखर कर उनकी रक्षा की थी। जब ये दोनों कुछ बडे हुए तो एक-दूसरे के पक्के दोस्त बन गये। आदमियों के आवागमन से दिनभर तो सहमे-सहमे रहते, लेकिन रात में दोनों आपस में खूब हेसते, खेलते और बतियाते रहते। चन्ध्मा की चोदनी आकर उन्हें दुलराती, पुचकारती, बिल्कुल मो जैसा प्यार दुलार देकर वह वापस चली जाती।
ये दोनों जमीन से सात-आठ इंच ेचे हुए ही थे कि किसी राहगीर की नजर अरडू के पौट्टो पर पड गई। इससे पहले दोपहर में हल्की बरसात हो चुकी थी। इसलिए उसने मिड्डी को अेगुलियों से खोदा और जड समेत वहीं झाडी में अटकी प्लास्टिक की थैली में रखकर चलता बना। नीम सब कुछ देखता रहा, पर उसकी समझ में यह नहीं आया कि आखिर यह व्यक्ति कर क्या रहा है। जब वह चला गया तब उसने, अरडू को नदारद पाया तो उसकी रुलाई फूट पडी। कोटों ने भी देखा था लेकिन वे भी कुछ नहीं कर पाये। एक तो अकस्मात, दूसरा उस व्यक्ति ने पैरों में मोटे-मोटे जूते पहन रखे थे। अब नीम अकेला रह गया।
रात को चोद निकला, चोदनी आई। नीम को अकेला और उदास देख उसके पास गई और प्यार से पूछा, तेरा दोस्त कहो गया? नीम ने दिन में घटी सारी घटना चोदनी को सुना दी। सुनकर चोदनी को भी मन में बहुत बुरा लगा लेकिन उसने नीम को समझाते हुए कहा, ’’तुम घबराना नहीं, मैं आज ही अरडू को ढढकर तुम्हें पता ठिकाना सब कल आकर जरूर बता दगी।‘‘ चोदनी ढढती-खोजती अरडू के पास भी गई, उसे अच्छा भला देखकर खुश भी हुई। दूसरे दिन उसने नीम को अरडू का पता ठिकाना बताकर यह भी कहा कि ’’वह अच्छी तरह से है, उसकी चिन्ता मत करना। कल फिर आेगी।‘‘ वो नीम पर प्यार से हाथ फेरकर चली गई।
उस आदमी ने अरडू के पौट्टो को अपने घर के कच्चे बाडे में लगा दिया था। चारों तरफ थोवला बनाकर पानी भी दिया। उचित देखभाल और चारों तरफ कच्ची जमीन देखकर अरडू ने पैर फैला लिए, देखते ही देखते वह जंगी पेड बन गया। उस घर में चार-पोच बकरियो भी थीं। वे अरडू के झडे पाों को बडे चाव से खाती थी। उसी पेड के नीचे सोती, बैठी रहती थी। दिनभर मै....मै सुनते-सुनते अरडू का मन भी लगा रहता। इस तरह से वषोङ गुजर गये।
अचानक पेड लगाने वाले व्यक्ति को भगवान ने अपने पास बुला लिया। उसके जाने के कुछ महीनों बाद बकरियों को भी उसके लडकों ने बेच दिया। अब अरडू भी बिना पानी के रहने लगा। ट्टाीरे-ट्टाीरे वह सूखने और मुरझाने लगा।
एक दिन नीम का वृक्ष उससे मिलने आया। उसने देखा कि उसका मित्र उदास और दुबला हो गया है। अपने मित्र की दुर्दशा देख नीम बहुत दुःखी हुआ। दोनों मिले, घंटों बातचीत करके नीम उसे समझा- बुझाकर वापस चला गया।
फिर वषोङ बीत गये। इट्टार नीम बहुत मोटा हो गया था। कारण ये कि जिस खेत की मेड के पास वह पैदा और बडा हुआ था, वहो खेत न रहकर एक जंगी होटल बन गई थी। कोटे-वोटे सब हटाकर अब वहो एक सुंदर बगीचा बन चुका था। नीम इसलिए नहीं हटाया ;काटाद्ध गया क्योंकि वह एक कोने में जो था। उसकी छाया में लोहे के झूले लग गये थे। दिनभर बच्चों, बडों और बूढों की चहल-पहल बनी रहती। फिर भी कभी-कभी उसे बचपन के दोस्त की याद आ ही जाती थी। बाद में उसकी ओखें नम हो उठतीं कि जाने वह जिंदा भी है या...!
सालों बीत गये थे, नीम और अरडू को मिले हुए। आज तो नीम ने मन में ठान ही लिया कि चाहे जो कुछ हो जाए मैं अरडू से मिलने जरूर जाेगा और वह चल दिया। रास्ते में उसके पैर चल तो अवश्य रहे थे, लेकिन मन शंका से भरा हुआ था। वह विचारमग्न आगे बढ ही रहा था कि उसके कानों में दनादन कुल्हाडयो चलने की आवाजें सुनाई दीं। उसका माथा ठनका...नहीं...नहीं, मैं अपने बचपन के साथी को इस हालत में देख नहीं पाेगा। उसके पैर वहीं जमीन में जड हो गये। उसके मन में आया कि लौट जाे। लेकिन मित्रता ने मन में जोर मारा कि नहीं यार... आया ह तो मिलकर ही जाेगा, आगे जो होगा देखा जाएगा।
मन में वह सोच रहा था कि संकट के समय लोग चारभुजा और अष्टभुजा को याद करते हैं, जबकि हम वृक्ष अपनी सैकडों भुजाओं से मानव की रक्षा करते हैं। अपने फल, फूल, छाया और अंतिम समय में भी लकडयो प्रदान करते हैं... ऑक्सीजन देकर उन्हें जीवित रखते हैं...हम देते ही देते रहते हैं, फिर भी हमारे साथ ऐसी र्‍ूरता करने से बाज क्यों नहीं आते? जब तक काम बना, तब तक साथ रखा, फिर चलवा दीं कुल्हाडयो।
नीम और आगे बढा। उसे बहुत कुछ बदला-बदला सा लगा। झोपडयो गायब हो चुकी थीं, कच्चे मकान पक्के से हो गये थे। वह घर भी एक मंजिल का न रहकर दो मंजिला हो गया था। पिता के जाने के बाद बेटों ने अपनी-अपनी सुविट्टाानुसार मकान निर्माण कर लिया था। नीम ने संकुचित होकर उस मकान के अंदर पैर रखा, अरडू जैसे प्रतीक्षा ही कर रहा हो, लपक कर नीम से गले मिला। दोनों एक-दूसरे को सकुशल देखकर गद्गद् हो गये। वषोङ-वषोङ बाद मिले थे न! इसलिए!!
एक-दूसरे को सकुशल पा जब थोडा विरह का आवेग मिटा तो नीम ने अरडू से पूछा, ’’ये तो बता तेरा कायाकल्प कैसे हो गया? पिछली बार मिला था तो मैं, तो तेरे जीवित रह पाने की आशा ही छोड चुका था।‘‘ अरडू ने बताया कि कुछ भाग्यशाली लोग पिर की मंजिल में आ गये हैं। उनके किचन ;रसोईद्ध के पानी से जमीन तर रहने लगी है। इससे ज्यादा तो एक विशेष बात तू सुन, ’’उनके तीन छोटे-छोटे बच्चे दिनभर मेरे पास खेलते हैं। एक ने एक दिन अपनी मो से कहा, मम्मी इस पेड में रस्सी से झूला डाल दो.... हम लोग झूला झूलेंगे। तब उसकी मम्मी ने बताया, नहीं बेटे, अरडू की शाखें पोली होती है, उनमें उतना दम नहीं होता। जितना नीम और आम में होता है। तब मुझे पता चला कि मैं नाजुक ह...पोला ह।‘‘
कहकर अरडू कुछ रुका फिर हेसते हुए बोला, जैसे उसे फिर कोई वाकिया याद आ गया हो... बोला, ये सारे बच्चे एक दिन भगवान जी से प्रार्थना कर रहे थे कि हे भगवान जी इतने बडे पेड में यदि अमरूद लग जाऐ तो मैं तो खूब खाेगा। दूसरा बोला, मैं खाेगा भी और मास्टर जी की बेटी टीना को भी दगा। तीसरे ने भी कुछ कहा पर मुझे उन बच्चों की कल्पना पर खूब जोर की हेसी आ गई और मैं हेसता रहा।
अरडू की बात पूरी हो गई तो उसने नीम से पूछा, तू कैसा है? नीम ने कहा, मेरे तो ठाठ ही ठाठ हैं। उसने भी अपनी सारी राम कहानी सुना दी। दोनों ओर संतुष्टि का साम्राज्य था। नीम बोला, ’’अब चलना चाहिए, सूरज उगने वाला है।...हो ये ले... तेरे लिए मीठी-मीठी, पकी-पकी निबोलियो लाया ह।‘‘ अरडू ने उसके हाथ से वे पीली-पीली निबोलियो लेकर दनादन मह में रख लीं, जैसे कोई चॉकलेट या टॉफी खा रहा हो।
दोनों मित्र खुशी-खुशी गले मिले। फिर नीम वापस लौटने लगा। इस बार नीम के मन में शांति थी, पहले जैसी अशांति नहीं। विदा होते समय दोनों की ओखें नम हो गई। अरडू, नीम को जहो तक उसकी नजर पडती रही, अपलक देखता रहा। निबोलियो उसके हाथ में अब भी थीं, जो सच्ची मित्रता की खुशबू से महक रही थीं।