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जोडी(मराठी कहानी) / मूल लेखक : श्री द.मा. मिरासदार

आनन्द विजय चिंचा*कर

आनन्द विजय चिंचा*कर
जोडी ;मराठी कहानीद्ध / मूल लेखक ः श्री द.मा. मिरासदार
कार्तिक में लगने वाला मवेशियों का बाजार भिनभिना रहा था। सभी ओर मवेशी ही मवेशी दिखइार् दे रहे थे। लोगों की आवाजाही लगातार चल रही थी। जगह-जगह गोबर गिर पडा था। कडबी बिखरी पडी थी। जमीन कूडे-करकट से भरी पडी थी। मवेशियों के तलवार जैसे लम्बे सींग चमक रहे थे और उनके गले की घंटियो लगातार बज रही थी। पानी वाले मवेशियों को पानी लाकर दे रहे थे। खटी वाले खटियो बेच रहे थे। ट्टाूल लगातार पिर उठ रही थी। इस भीड से होकर ही लोग मवेशियों को देखते हुए घूम रहे थे। कोई य ही देख रहा था। कोई खरीदने की दृष्टि से देख रहा था। बहुत ही हो-हल्ला हो रहा था।
बाजार के बीचोंबीच तात्या और उनका लडका अ्या जमाकर बैठे थे। पीछे गाडी खडी की थी। उसमें ठस-ठसकर कडबी भरी हुई थी। दो युवा मवेशी एक बाजू में रस्से से खटी के साथ बोट्टो हुए थे। दोनों बैल फुर्तीले थे। एक का रंग सफेद था तो दूसरे का हल्का नारंगी था। उनकी चमडी चमकदार थी। उनके सींग अक्कडबाज थे। वे कभी मह नीचे कर कडबी खाते तो कभी अपने मालिक की ओर देखते। कभी आने-जाने वाले लोगों को देखते। उनकी चमडी रह-रहकर थर्रा रही थी। बीच-बीच में उनकी दुम एक लय में पिर-नीचे हो रही थी।
बूढा तात्या कम्बल पर बैठकर बीडी पी रहा था। उसके मह और शरीर पर झुर्रियो थीं। उसके अस्त-व्यस्त साफे से सिर के सफेद बाल दिखाई दे रहे थे। मह में दोत नहीं थे। वह बूढा चुपचाप बीडी पी रहा था। पैर के पास रखे डिब्बे के खाख जमा हो रही थी। उसका नौजवान लडका गर्दन झुकाकर शांत बैठा था। जमीन पर एक तिनके को इट्टार-उट्टार घुमाते हुए समय काट रहा था। पास की पगडण्डी से लोगों की आवाजाही चल रही थी। उनमें से कोई जाते-जाते बीच में ही रुक जाता। गर्दन हिलाते हुए बैलों को देखता। किसी दूसरे से कुछ बोलता। ये दोनों बाप-बेटे चौकन्ना होकर देखते। कोई कुछ पूछे तो खडा होकर बोलते। उनके चले जाते ही तात्या फिर से बीडी पीते हुए शांत बैठा रहता। लडका एक पैर खडा रखकर सिर के साफे में बायो हाथ घुसेड कर बैठ जाता। थोडी देर के बाद पैर बदल लेता।
यही र्मज बहुत देर तक चल रहा था।
दोपहर हो गई। सर्दी के मौसम की गरमाहट पैदा करने वाली ट्टाूप अब ट्टाीरे-ट्टाीरे तपने लगी थी। रूखापन बढने लगा था।
गाडी की ओट लेकर दोनों खाना खाने बैठ गए। रोटी की गठरी खोली। पीतल की लोटियो सामने रखीं।
लाल-लाल चटनी तेल में भिगोई थी। तात्या ने रोटी का एक बडा टुकडा तोडकर उस चटनी के साथ मह में डाला।
मह हिलाते हुए वह बोला, ’’भगवान, बेटा कल तुझसे एक गलती हुई।‘‘
कौर निगलकर भगवान बोला। ’’क्यों? क्या हुआ?‘‘
’’खरीददार आए थे। छह सौ में मोग रहे थे तो दे देना चाहिए था। ये परेशानी तो न झेलनी पडती।‘‘
भगवान ने मह टेढा किया। ’’तुम्हें क्या इतनी परेशानी हुई?‘‘
’’परेशानी नहीं तो और क्या? ट्टाूप में यों ऐंठना! मेरा सिर दर्द करने लगा है। खरीददार तो आते नहीं। केवल नाम का बाजार है साला!‘‘
’’तो ठीक है। अपने मवेशियों को वापस ले चलो।‘‘
’’वाह भाई! तो हम बाजार किसलिए आए हैं?‘‘
’’तो क्या करूे? अपने घर की सोडों की यह जोडी, य ही सस्ते में बेच द क्या? तुम तो कुछ भी बोले जा रहे हो!‘‘
तात्या ने बीच में ताम्बे की लुटिया उठाकर गटगट पानी पी लिया और फिर एक बडी-सी डकार ली। गर्दन हिलाते हुए वह बोला, ’’मुझे ऐसा लग रहा है कि बाजार का काम तू नहीं कर सकेगा।‘‘
भगवान का हाथ रोटी तोडते-तोडते रुक गया। ’’मतलब?‘‘
’’कुछ नहीं।‘‘
’’पहेली मत बुझाओ।‘‘ भगवान के स्वर में तीखापन आया हुआ था। नाक फूल गई थी। ’’जो कहना हो वह सीट्टाा कहो।‘‘
’’तू बैलों को पगहे से निकालकर लाने में भी आनाकानी कर रहा था। तू यहो आना ही नहीं चाहता था। सच है कि नहीं?‘‘
भगवान ने ’आप कुछ भी बोल रहे हैं‘ के अर्थ में गर्दन हिलाई।
’’और, आप भी कहो खुश हैं? कल से देख रहा ह, आप शांत बैठे हैं।‘‘
’’कल तुमने ना क्यों कहा था, मुझे बस इसका जवाब दो।‘‘
ेची आवाज में वह बोला, ’’अब मुझे मत सिखाओ। कल जब खरीददार मोग रहे थे तब तुमने टोका क्यों नहीं? कर देता मैं सौदा।‘‘ बोलते-बोलते उसके सिर की नसें फूल गइङ।
तात्या ने निषेट्टा व्यक्त करते हुए कहा, ’’अब कह रहे हो, किया होता सौदा। पर मैं सब कुछ जानता ह।‘‘
’’क्या जानते हो?‘‘
’’इन मवेशियों को बेचने की तुम्हें इच्छा ही नहीं है।‘‘
’’ठीक है, तुझे ऐसा लगता है तो मर्जी तुम्हारी।‘‘
भगवान तंग आकर बोला। इसी तरह आगे बातचीत चली। दोनों के मिजाज गरम थे। पर बाप की ओर देखकर उसने हार मान ली। फिर थोडी देर तक दोनों शांत बैठे रहे। अपने हिस्से की रोटी खाकर भगवान ने ताम्बे की लुटिया से गटगट कर पानी पी लिया। पीतल के बर्तन में हाथ ट्टाोकर वहीं बालू में कुल्ला कर दिया। हाथ की मुद्दी से मह पर पानी लगाया। वही हाथ उलटा कर मह पोंछ दिया। गीला हाथ ट्टाोती से पोंछ लिया और निराशाभरी ओखों से कहीं देखता रहा।
बूढा जो बोल रहा था उसमें झूठ क्या था? पहले से ही उसे इस जोडी से लगाव था। ये दोनों सोड घर की गाय के हैं। जन्म के दिन से उन्हें उसकी आदत पडी थी। उन गायों ने उसकी मो के सिवा अन्य किसी को दूट्टा दुहने नहीं दिया था। ये सोड भी उन्हीं पदचिँों पर चल पडे। इसके सिवा दूसरे किसी के वश में नहीं हुए। दूसरे के हाथ की कडबी उन्होंने कभी नहीं खाई। बाजरे को, घास को मह नहीं लगाया। किसी को पीठ थपथपाने नहीं दी। पर उतने ही गरीब भी हैं ये दोनों।
उसने एक बार झालर खुजलाई और पीठ थपथपा दी कि बाद में किसी को भी नजदीक खडा करो उसे कुछ करेंगे नहीं। कोई छोटा बच्चा भी रास पकडकर बेझिझक पानी पीने के लिए ले जा सकता है। किसी को डंक नहीं। सीट्टाा चले जाऐगे और ये बहुत गुणी भी हैं। उसके केवल ’ह‘ करते ही दौडना शुरू। एक बार ऐसे ही कोई मेहमान आए थे। आठ-दस मिल दूर स्टेशन पर उन्हें जाना था। उनकी गाडी चुक गई। तब उसने कहा, ’’आप चिंता मत कीजिए। मैं आपको घंटे भर में स्टेशन ले जाता ह।‘‘ उसे विश्वास नहीं हो रहा था। फिर उन्हें जबरदस्ती गाडी में बिठाया। वह रास लेकर गाडी पर खडा हो गया और बैलों को बोला, ’’दोस्तों अब लाज राखो। गाडी ऐसी जानी चाहिए कि वाह!...‘‘ ये बेजुबान जानवर जैसे यह भाषा समझ गए। उस दिन कोडा लगाने ही नहीं दिया। हवा से भी तेज गति से गाडी चल रही थी। घंटे भर में स्टेशन पहच गए। मेहमानों ने वाहवाही की्! ये बेचारे मह से झाग निकालते हुए खडे रहे... ऐसी कितनी बातें हैं। ऐसी यह जोडी बेच द? केवल इसी कारण से कल करीब-करीब पूरा हो रहा सौदा मैंने होने नहीं दिया था। हो, झूठ क्यों बोल? मेरी इच्छा ही नहीं है। बूढा सच बोल रहा है। उनसे जो लगाव है, वही बीच में टोग अडा रहा है। पर यह बूढा इतना गरीब है, क्तदय में उसके प्रेम है, फिर उसका मन पसीजता क्यों नहीं
भगवान सोचता हुआ शांत बैठा रहा। उसकी ओखों में ओसू घिर आए। उसके दिल की बेचैनी जैसे तात्या ने भोप ली हो। थोडी देर के बाद वह सहसा समझाते हुए शांत स्वर में बोला, ’’देख, गुस्सा मत कर। हम सब खुशमिजाज हैं पर सामने समस्या खडी हो गई है तो क्या करेंगे? इन्हें बेचना है यह तो तय है ना? तो फिर बेटे, इनसे लगाव रखना अच्छा नहीं है।‘‘
’’मैं कहो कुछ बोल रहा ह?‘‘
भगवान शांति से बात कर रहा है यह देखकर बूढे ने उसे और दो-चार बातें सुनाइङ। ’’दिनभर में एकाट्टा खरीददार आता है। अच्छी कीमत देने वाला मिलेगा या नहीं, मालूम नहीं। ऐसी स्थिति में एक खरीददार कल गेवा दिया, यह ठीक नहीं हुआ। ’इससे अच्छा खरीददार आएगा‘, कहकर तुमने अपने आप को ट्टाोखा दिया। पर सच यह है कि यह सौदा करने की तुझे इच्छा ही नहीं थी। ऐसा नहीं चलेगा। इतना लगाव अच्छा नहीं।‘‘
’’क्या हमें बुरा नहीं लग रहा?‘‘
’’मैंने कब ऐसा कहा?‘‘
’’ये हुई ना बात!‘‘
तात्या ने कुहनी तक हाथ ट्टाो लिए। कुल्ला किया। मह पोंछ लिया।
’’अरे बाबा, लाचारी है। क्या कर सकते हैं?‘‘
’’हो‘‘
’’फिर और क्या चाहिए। वे तो जानवर ही हैं ना! आदमी को तो बेच नहीं रहे हैं हम?‘‘
भगवान ने गर्दन हिलाई। वह आगे कुछ बोला नहीं। वह जानता था कि उनके यहो पैसों को लेकर समस्या खडी हुई है। इस जोडी को बेचकर जो थोडा पैसा आएगा उससे उनकी समस्या हल हो सकती है। दूसरा कोई चारा ही नहीं था। ऐसा करना अच्छा नहीं। सौदा अगर ठीक तरह से हो रहा हो तो हमें भी मनवाना पडेगा। इसे नजरअंदाज करना ठीक नहीं। इस दृष्टि से देखा जाए तो कल उससे गलती ही हुई थी। उसने सोचा उनके मवेशी असली रेवड जाति के तो है नहीं। कल छह सौ की जोडी मोग रहे थे, उसमें बुरा क्या था? अच्छा होता, अगर दे दी होती तो। पर उसने ’नहीं‘ कहा था। मुझसे तो गलती हुई। पर कल यह बूढा क्यों चुप बैठा था? अगर इसने टोका होता तो वह सौदा करने को राजी हो जाता। पर बाजार ही ठीक नहीं दिखता। खरीददार भी बहुत नहीं आ रहे। य ही केवल देखने वाले ही ज्यादा हैं। बूढा सच बोल रहा है। पर अब सीख देकर क्या फायदा है
ऐसा सोचते हुए भगवान ने बटुवे से पान-तम्बाकू निकालकर खा ली। चेहरा मुरझाकर वह गाडी को पीठ लगाकर बैठ गया। य ही बैठा रहा। तात्या ने बीडी निकालकर पी ली। थोडी देर ट्टाुओ निकालते हुए बैठा रहा। बाद में छोव की तरफ कम्बल डाल कर लेट गया। साफे का तकिया बनाकर सो गया। जल्दी ही खर्राटे भरने लगा।
भगवान ने बैठे-बैठे ओखें मद लीं। ट्टाीरे-ट्टाीरे ट्टाूप का ताव कम होता गया। दिन ढलने लगा। ट्टाूप का ताव कम होते ही बाजार में फिर से जान भर गई। लोगों का आना-जाना शुरू हुआ। हो-हल्ला बढने लगा। मह पर पानी फेर कर बाप-बेटे तैयार होकर बैठ गए।
बहुत लोग आकर चले गए। कोई य ही बैलों को देखकर गया। कोई पूछताछ करके गया। कोई कीमत का अंदाज लेकर आगे खिसका। इससे आगे की बात किसी ने नहीं की। लगने लगा कि दिन व्यर्थ गया। बाप-बेटा दोनों के चेहरे मुरझा गए थे।
पर शाम के समय एक खरीददार आ गया। अकेला ही।
उसने बहुत छानबीन की। पूछताछ की। बैल गाडी में जोतकर देखे। उसे तसल्ली हुई। जब बात कीमत की ओर बढी तब भगवान ने बदमिजाज होकर पूछा, ’’लैना तय है ना?‘‘
साफे वाले आदमी का शरीर मजबूत था। लम्बा कद और हड्डा-कड्डा था। वह किसी काशी के पंडे जैसा काला था। अपनी मछ पर ताव देते हुए वह बोला, ’’बागाईत खेती है मेरी। य ही बाजार में घूमने की आदत नहीं है मुझे।‘‘
भगवान सहम गया, पर उसे आशा थी।
’’तो फिर एक ही कीमत बोल?‘‘
’’हो। मुझे ठीक लगी तो लेता ह, नहीं तो चला जाेगा।‘‘
’’आठ सौ रुपये लगेंगे।‘‘
साफेवाले ने भगवान की ओर घूरकर देखा। दाढी के खट खुजलाए।
’’ज्यादा हो रहे हैं।‘‘
’’आफ बस में हो तो लो।‘‘
’’वो तो है... मैं बोल?‘‘
’’बोलो ना। बोलने में क्या जाता है?‘‘
साफेवाला थोडी देर रुक गया। फिर उसने दाहिने हाथ की पोच ेगलियो दिखाई।
’’नहीं, नहीं।‘‘
’’ठीक है और पच्चीस।‘‘
’’कल खरीददार छः सौ का मोग रहे थे, तो मैंने नहीं कहा। साहब जी ये नहीं होगा।‘‘
साफे वाले ने फिर थोडा सोच-विचार किया। एक बार बैलों की जोडी की ओर देखा। एक बार भगवान की ओर देखा। ओखें मद कर खोली।
’’तो ठीक है। मैं भी वही कीमत देता ह।‘‘
खरीददार ने देखते-देखते कीमत सौ तक बढा दी। यह देखकर भगवान समझ गया कि खरीददार मतवाला है, सौदा करने आया है। अगर थोडा खीचेंगे तो चलेगा। उसने गर्दन हिलाकर नकार दिया। इस पर थोडी खींचातानी हुई, फिजूल की बातें हुइङ। पर भगवान अपनी बात पर अडिग रहा। साफे वाले ने आखिरकार ओकडा साढे छह सौ तक बढा दिया। आखिरकार बोला, ’’देखो, सोच लो। अब हो या ना ही बोलना है बस।‘‘
तात्या ट्टाोती का पल्ला पकडकर इतनी देर य ही बैठा रहा था। बीच में कुछ भी बोला नहीं था। भगवान ने उसकी तरफ देखने पर उसने गर्दन हिलाकर अपनी स्वीकृति दे दी।
फिर भी भगवान ने झट से हो नहीं कहा। वह थोडी देर शांत बैठा। सोच-विचार करने का नाटक कर वह बोला, ’’तो ठीक है। कीमत मंजूर है। पर रसीद का खर्चा आपको देना पडेगा।‘‘
बाजार में मवेशियों की बिर्‍ी पर ग्राम पंचायत टैक्स लेती है। टैक्स ज्यादा नहीं होती। क्लर्क के मिलाकर चार-पोच रुपयों की बात। पर फिर भी थोडी खींचातानी हुई। साफे वाला आखिरकार रसीद का खर्चा भी देने के लिए राजी हो गया।
आखिरकार सौदा पक्का हो गया और भगवान को एकदम खालीपन महसूस होने लगा।
साफे वाला जल्दी में था और दिन भी ढल रहा था। इसलिए उसने चुटकी बजाते हुए कहा, ’’मैं नई रास लेकर आता ह। क्लर्क को भी साथ लाता ह। समय क्य व्यर्थ गेवाए?‘‘
भगवान ने केवल गर्दन हिलाई। बातों-बातों में इतनी देर समझ में नहीं आया पर अब उसका दिल बेचैन हो गया। अब बात तय हो गई। अब यह बैलों की जोडी वापस नजर नहीं आने वाली। दिख भी जाए तो उसका क्या फायदा? अपना बेटा मानकर इन मवेशियों को पाल-पोसकर बडा किया। अब ये हमारे अपने नहीं रहे। ये अब दूसरों के हो गए। रिश्ता खत्म हुआ। अब ये दूसरों के पगहे से बेट्टा जाऐगे। उनके यहो का खाना खाऐगे। थोडे दिन में हमें भल जाऐगे। पर मेरे दिल पर क्या बीती है, ये इन्हें कभी समझ में आ सकता है क्या? कैसे समझ में आएगा? ये तो बेजुबान जानवर ही हैं। थोडे ही दिनों में अपने आप भूल जाऐगे। मेरा यह बूढा, आदमी होकर भी मुझे दोष देता है। तो फिर इन बेचारों की क्या गलती है
भगवान की ओखों से ओसू बहने लगे।
साफे वाला अपनी ही ट्टाुन में था। उसने फिर से पूछा, ’’मैं जाे क्या?‘‘
’’जाओ।‘‘
भगवान ट्टाीरे से पीछे मुडा और दोन बैलों के बीच जाकर खडा रहा। दोनों हाथों से बैलों की पीठ सहलाते हुए उसने गर्दन झुका ली।
तात्या उसकी ओर देख रहा था। खरीददार जाने को हुआ, तो वह सहसा बोला, ’’भगवान!‘‘
भगवान ने पिर देखा, ’’क्या है?‘‘
’’तुम ही जाओ और क्लर्क को लेकर आओ। इनको इट्टार ही रुकने दो।‘‘
साफे वाला बोला, ’’इनको क्यों तकलीफ? मैं ही जाता ह।‘‘
’’इसको जाने दो। हम कुछ बातें करते हैं। तुम जाओ।‘‘
भगवान बैलों के बीच से बाहर आया और चुपचाप चला गया। दूर भीड में नजर से ओझल हो गया। साफे वाला और तात्या दोनों ही वहो रह गए।
इतनी देर तक तात्या बहुत कम ही बोल रहा था। पर साफे वाला अकेला ही रह जाने पर वह बोला, ’’आइए, साहब जी बैठ जाइए।‘‘
’’हो!‘‘
साफे वाला आकर कम्बल पर बैठ गया। दोनों भी थोडी देर तक बैलों की ओर देखते हुए शांत बैठे रहे।
बैलों ने अपनी गर्दन पिर-नीचे की। नये आदमी की ओर एक बार घूरकर देखा। उनके गले की घंटियो गज उठी।
तात्या ने जेब से एक बीडी निकाली। बीडी केवल हाथ में पकडकर वह बोला, ’’आप कहो से हैं?‘‘
बैलों की तरफ से ट्टयान हटाकर साफे वाला बोला, ’’भोगाव। हम भोगाव के चव्हाण हैं।‘‘
’’मतलब, बेलापुर।‘‘
’’हो, हम वहीं से हैं।‘‘
’’आपकी खेती है?‘‘
’’हो‘‘
’’कितनी है?‘‘
’’आठ-दस एकड हैं। सब बागाईत है।‘‘
’’कमकर कितने हैं?‘‘
साफे वाले ने गर्दन हिलाई।
’’नहीं हैं। सारा काम मैं अकेला ही निपटाता ह। अगर जरूरत पडे तो कमकर रखता ह और काम हो जाने के बाद निकाल देता ह।‘‘
’’और मवेशी कितने हैं?‘‘
’’दो बैल थे। बूढे हो गए थे। उनसे काम लेना मुश्किल हो गया था। फिर उन्हें रखकर क्या फायदा? इसलिए उन्हें बेच दिया, तभी तो यह जोडी खरीद ली मैंने।‘‘
बाद में तात्या उसे कई बातें पूछता रहा। साफे वाला भी दिल खोलकर बोल रहा था। अंत में तात्या ने पूछा*- ’’आपकी बागाईत खेती आठ-दस एकड में फैली है ना?‘‘
’’हो।‘‘
’’तो इतना सारा काम दो बैलों से कैसे निपटाओगे?‘‘
साफे वाला अपनी मछों पर ताव देकर हेस पडा। कडे स्वर में बोला, ’’अरे भाई, करने वाले का सब काम हो जाता है।‘‘
तात्या निरा हेस दिया। बोला, ’’बात सही है। पर मवेशियों की ताकत ज्यादा नहीं होती। इतना काम उनसे नहीं हो सकता।‘‘
’’इतना ख्याल करना अच्छा नहीं है। उस काम में मुझे महारथ हासिल है।‘‘ साफे वाला फिर से हेस पडा।
’’मतलब?‘‘
’’ऐसे में जम के कोडे लगाओ तो ही काम बनता है।‘‘
’’हो, हो।‘‘
तात्या बस इतना ही बोला। उसने एक बार साफे वाले की ओर देखा। फिर अपने बैलों की जोडी की ओर देखा। हाथ में रखी बीडी उसके सामने की।
’’लो। पी लो।‘‘
’’नहीं, नहीं।‘‘ साफे वाले ने गर्दन हिलाई।
’’क्यों? क्या हुआ?‘‘
’’बीडी पीने की आदत नहीं है मुझे।‘‘
’’बिलकुल भी नहीं?‘‘
’’बिलकुल नहीं।‘‘
भगवान का बटुवा पास ही पडा था। बटुवा सामने रखकर तात्या बोला, ’’तो ठीक है, ये पान खा लो।‘‘
साफे वाले ने फिर से गर्दन हिलाई, ’’नहीं, नहीं।‘‘
’’मतलब?‘‘
’’मैं पान नहीं खातां‘‘
’’ठीक है, थोडी तम्बाकू तो ले लो।‘‘
’’नहीं, नहीं।‘‘
’’क्यों भाई? क्या हुआ?‘‘
’’इसमें से किसी भी चीज की आदत नहीं है मुझे। बीडी, पान, तम्बाकू किसी की भी नहीं।‘‘
’’ठीक है।‘‘
तात्या ने बीडी जेब में रख दी। बटुवा बाजू में रख दिया। गर्दन झुकाकर वह य ही बैठा रहा। पोच-दस मिनटों में भगवान वापस लौट आया। वह बोला, ’’क्लर्क अभी दूसरे किसी की रसीद बना रहा है। काम होते ही वह आ जाएगा।‘‘
’’कुछ दिक्कत नहीं। मैं रुक जाता ह।‘‘
इतना कहकर साफे वाले ने गर्दन हिलाते हुए सहमति दी। उसने जेब में से दस-दस के नोटों का बण्डल निकाला और वह नोट गिनने लगा।
तात्या ने नोट देखे। वह सहसा खडा हुआ और तीखे स्वर में बोला, ’’अब बैठो मत, उठो।‘‘
साफे वाले की समझ में कुछ नहीं आया। हाथ में नोट पकडकर वह अचरज से देखता रहा।
’’पर हुआ क्या है?‘‘
तात्या एक-एक शब्द ट्टाीरे से, पर जोर देकर बोला, ’’कुछ हुआ नहीं है। यह सौदा मुझे नहीं करना है।‘‘
सहसा ये शब्द सुनते ही साफे वाला चौंक गया। वह भी उठ खडा हुआ।
’’क्या?‘‘
’’हो, यह सौदा मुझे नहीं करना है। ये बैल मुझे नहीं बेचने हैं।‘‘
भगवान इतनी देर तक एक तरफ खडा रहकर सब सुन रहा था। उसे भी अचरज हुआ। उसने हरहराते हुए बाप के पास आकर बदमिजाज होकर पूछा, ’’इसका क्या मतलब है?‘‘
’’मतलब वगैरह मुझे कुछ पता नहीं। मुझे बैल नहीं बेचने हैं, बस। तू बीच में मत बोल।‘‘
बाप-बेटे दोनों भी एक-दूसरे की ओर देखते रहे। साफे वाले ने अपने आप को सेभाला। नोटों का बंडल जेब में डाला। सिर का साफा ठीक किया। दुःखी स्वर में वह बोला, ’’तो ठीक है। आप बाप-बेटों में ही मेल नहीं है तो आप बाजार में आए ही क्य?‘‘
बदमिजाज होकर तात्या बोला, ’’ठीक है, हम एक पागल हैं। पर आपने खरीदी किसलिए?‘‘
’’मैं क्या आफ पीछे पडा था कि आफ मवेशी हमें ही दो?‘‘
बोलते-बोलते उसकी नाक फूल गई। वह खीझ गया और कुछ बडबडाते हुए वहो से चल दिया। पीछे मुडकर देखे बिना वह जल्दी से वहो से निकल गया।
भगवान उसकी ओर देखता ही रह गया। उसके जाने के बाद खीझ कर बाप को बोला, ’’आप क्या पागल हो गए हैं? या आपका दिमाग खराब हो गया है?‘‘
इतनी देर तक तात्या खडा ही था। वह झट से नीचे बैठ गया।
’’मेरा दिमाग ठीक है।‘‘
’’फिर ऐसा क्य किया?‘‘
’’क्या किया?‘‘
’’खामखां अच्छा खासा खरीददार गेवा दिया ना!‘‘
तात्या ने गर्दन हिलाई।
’’मैं क्य ऐसा करूेगा?‘‘
’’फिर?‘‘
बूढे ने थककर ओखें मद लीं। हाथ हिलाते हुए वह निराशा से बोला, ’’तुम्हारे जाने के बाद मैंने उसे यहो बिठाया। पूछताछ की। इस आदमी के पास आठ एकड बागाईत खेती है। एक कुओ है। इन दो बैलों को लेकर ही पूरी खेती का काम वह करने वाला था।‘‘
यह बात भगवान के दिमाग में ठीक से नहीं बैठी। वह नासमझी में बूढे की ओर देखता रहा। ’’तो उसका क्या?‘‘
बूढे ने ’तू कुछ नहीं जानता‘ के अर्थ में गर्दन हिलाई। उसने ओखें खोलीं।
’’अरे बाबा, अपने बैलों की जान निकल जाएगी। इस आदमी को पान-तमाकू की लत है नहीं, वह बीडी भी पीता नहीं है। जब इच्छा होती है तो कम-से-कम तमाकू खाने के लिए तो आदमी रुक ही जाता है। इससे मवेशी भी आराम कर सकते हैं। पर इस आदमी को किसी की लत है ही नहीं। अरे, अपने बैल तो मर जाऐगे! नहीं, नहीं। मुझे यह सौदा करना ही नहीं है।‘‘
बूढा इतना ही बोला। बीडी का ट्टाुओ निकालते हुए वह चुप बैठा रहा। भगवान ने बैलों को कडबी खिलाई। उनकी पीठ थपथपाई। फिर वह भी बाप के सामने य ही बैठा रहा। बाप-बेटा दोनों एक-दूसरे की ओर देखते रहे।