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दोंडु (शब्द चित्र )

अपूर्वा चौमाल
ढोंडू से मेरी मुलाकात भी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं। बात उन दिनों की है जब एम.टेक. करने के लिए बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में मेरा एडमिशन हुआ। कॉलेज में मुझे ’एस सी डे‘ महिला हॉस्टल में कमरा मिला। यहो प्रिया मेरी रूम पार्टनर थी। कुछ ही दिनों में हॉस्टल में रहने वाली अन्य लडकियों से भी मेरी दोस्ती हो गई।
एक दिन जब हम कॉलेज के बाद हॉस्टल लौट रहे थे, तब हॉस्टल के मुख्य दरवाजे पर हमने घायल अवस्था में एक छोटे से पिल्ले को देखा। पास जाकर पता चला कि उसकी गर्दन पर घाव है। शायद उसे कुछ ही देर पहले किसी ने चोटिल किया था। उसके रिसते घाव से इंफेक्शन के डर से एक-एक कर सभी लडकियो वहो से खिसक ली।
मैं प्रिया की मदद से उसे एक पशुचिकित्सक के पास लेकर गई। उन्होंने पिल्ले की मरहम पड्डी की और एक इंजेक्शन भी लगाया। दर्द से राहत पाकर पिल्ला मेरी गोद में दुबक गया। अब समस्या यह थी कि उसे इस हालत में कहो छोडा जाए।
हालोकि प्रिया इसके पक्ष म बिल्कुल नहीं थी, लेकिन फिर भी मैं पिल्ले को अपने कमरे में ले आई मैंने एक गो के डिब्बे में मुलायम दुपड्डा बिछाकर उसके लिए अस्थाई घर बनाया और उसे पीने के लिए दूट्टा दिया।
तीन-चार दिन तक मैं उसकी मरहम पड्डी करवाती रही। अब उसका घाव काफी हद तक ठीक हो चुका था। पिल्ला अब मुझे पहचानने लगा था। मैंने उसका नाम रखा ’ढोंडू‘।
कुछ ही दिनों में ढोंडू बिल्कुल स्वस्थ हो गया और हॉस्टल में सबसे खूब घुल-मिल गया। हम कॉलेज जाने से पहले उसे खिला-पिला कर जाते थे। दोपहर में जब वापस आते थे तो ढोंडू मुख्य दरवाजे पर हमारे इंतजार में बैठा मिलता। वह मेरे साथ-साथ कमरे में आता और फिर दूसरे दिन सुबह तक वहीं मेरे कमरे में ही जमा रहता। प्रिया का कपडों वाला बैग ढोंडू के सुस्ताने की सबसे प्रिय जगह थी। वह उसमें फिट होकर ऐसा मस्ती में सोता जैसे ये जगह उसी के लिए बनी हो।
कहने को तो ढोंडू एक पिल्ला था, लेकिन अपनी अजीबोगरीब हरकतों से सबका मन बहलाये रखता। उसके आने से मेरा अकेलापन तो दूर हुआ ही, हॉस्टल में भी एक रौनक सी हो गई। वह सिर्फ मेरा ही नहीं, बल्कि हॉस्टल में सभी का चहेता बन गया था। दिनभर वह सबके कमरों में बिंदास घूमता-फिरता रहता, लेकिन रात को सोता सिर्फ मेरे ही कमरे में था।
मैंने पालतू जानवरों की समझदारी और सूझबूझ के बहुत से किस्से पढे और सुने थे, लेकिन उन पर कभी यकीन नहीं कर पाई थी। ढोंडू ने मुझे इस बात का यकीन दिला दिया कि पालतू जानवर विशेषकर कुो बहुत केयरिंग और समझदार होते हैं। बेशक वे बेजुबान होते हैं, लेकिन अपने हावभाव से हमें सब कुछ महसूस करवा देते हैं।
ढोंडू जब मेरे साथ होता था तो अपने आपको शेर समझने लगता था। हमारे हॉस्टल में अक्सर एक बिल्ली आया करती थी। पिड्ढा ढोंडू उसे देखकर ऐसे गुर्राता था जैसे उसे कच्चा चबा जाएगा। वह बिल्ली भी कहो कम थी... एक दिन उसने ढोंडू को अकेला देखा तो लपक लिया और कस कर दो चोटे जड दिये ढोंडू के गाल पर...। ढोंडू मिमियाता सा क-क करता कमरे में आकर दुबक गया। उस दिन के बाद ढोंडू ने उससे पंगा लेना छोड दिया था। हो! अच्छी बात ये भी हुई कि ढोंडू के डर से बिल्ली के भी हॉस्टल के फेरे कम हो गए।
प्रिया बनारस के पास की ही रहने वाली थी। इसलिए एक-दो दिन की छुड्डी मिलते ही अपने घर चली जाती थी। जब प्रिया अपने घर जाती थी तब कमरे में सिर्फ मैं और ढोंडू ही होते थे। उस समय ढोंडू के मिजाज गौर करने लायक होते थे। मैं जब अपने लैपटॉप पर गाने सुनती तो ढोंडू भी चुपचाप बैठकर उनका मजा लेता था। वह मेरे साथ लैपटाप पर फिल्म भी एक अच्छे दर्शक की तरह चुपचाप बैठकर देखता था। और तो और गानों पर मेरे साथ अपने अगले दोनों पंजे उठाकर नाचता भी था।
एक बार तो गजब ही सीन हुआ। मैं और ढोंडू लैपटॉप पर ’गैंग्स ऑफ वासेपुर‘ फिल्म देख रहे थे। अचानक फिल्म में मारट्टााड के दृश्य आने लगे और गोली चलने की आवाज हुई। डोंडू ने एक बार मेरी तरफ देखा और फिर अचानक लैपटॉप पर टूट पडा। बडी मुश्किल से लैपटॉप को स्विच ऑफ किया तब कहीं जाकर वह शांत हुआ। उसके बाद भी कितनी ही देर तक मुझसे सटा हुआ बैठा रहा।
अपने खाने-पीने को लेकर ढोंडू बहुत ही सतर्क रहता था। जब उसे भूख लगती थी तो वह मेरा पाजामा पकड कर अपने ’पै्यी ग्री‘ के पास ले जाता था और प्यास लगने पर अपना पानी पीने वाला प्याला मह में दबाकर ले आता था। पोड्डी या पेशाब आने पर अपने पंजों से दरवाजे को खरोंचने लगता था। मैं दरवाजा खोल देती तो वह चुपचाप बाहर निकल जाता था। बिना किसी प्रशिक्षण के ही ढोंडू इतना समझदार था कि हर किसी को उस पर प्यार आता था।
मेरे पहले सेमेस्टर की परीक्षा शुरू हो चुकी थी। मैं नींद की बहुत लालची ह। रात में कितनी भी देर तक जाग कर पढ ल लेकिन सुबह जल्दी उठना मुझे बहुत बुरा लगता है। मेरा पहला पेपर तो अच्छा हो गया था लेकिन दूसरे की मुझे फिर्‍ थी क्योंकि वह सुबह आठ बजे ही शुरू होने वाला था। मैं रात तीन बजे तक पढती रही और ढोंडू मेरे पास बैठा रहा। सोने से पहले मैंने ढोंडू से कहा, ’’अगर सुबह नींद नहीं खुली तो मेरा पेपर छूट जाएगा।‘‘ ढोंडू ने मेरी तरफ ऐसे देखा जैसे उसे मेरी बात समझ आ ही गयी हो।
सुबह छः बजे ढोंडू के कूकने की आवाज से मेरी नींद टूटी। मैंने उसे शोर करने के लिए डटा और फिर से कम्बल में घुस गई, लेकिन ढोंडू का कूकना लगातार जारी था। मैंने गुस्से में उठकर उसे बाहर निकालना चाहा तो अनायास घडी की तरफ नजर पडी।
अरे बाप रे! सात बज रहे थे। मैं हडबडा कर उठी और फटाफट बाथरूम की तरफ भागी। वापस आकर देखा तो ढोंडू प्रिया के बैग में दुबका आराम से सो रहा था। मुझे नींद से जगाने की उसकी इस हरकत पर मुझे उस पर बहुत प्यार आया।
इसी तरह एक शाम की बात है। मुझे घर वालों की बहुत याद आ रही थी। मन बहुत ही उदास हो रहा था। मैं ओखों म ओसू लिए खिडकी से बाहर की तरफ देख रही थी। तभी ढोंडू आया और चुपचाप मेरे पैरों पर अपना सिर रखकर सो गया। न मैं हिली और न ही ढोंडू... दोनों चुपचाप आत्मीयता से भीगे... एक दूसरे के दर्द को महसूस करते बैठे रहे। थोडी देर बाद मेरा मन शांत हुआ तो हम दोनों कमरे से बाहर निकल कर गार्डन की तरफ आ गए।
ऐसी न जाने कितनी ही बातें हैं जो हम दोनों की नजदीकियों और आपसी जुडाव का उदाहरण थी। ढोंडू मेरे हर खुशी और गम का अंतरंग साथी बन गया था।
ढोंडू अब कुछ बडा हो गया था। एक दिन वार्डन मैडम ने कहा, ’’हॉस्टल में जानवर रखने की अनुमति नहीं है... इस पिल्ले को हॉस्टल से बाहर कहीं दूर छोडकर आओ...‘‘ मैं बहुत उदास हो गई लेकिन क्या करती... हॉस्टल के अपने नियम कायदे होते हैं।
सेमेस्टर के बाद हमें घर जाने के लिए पन्ध्ह दिन की छुड्डी मिली। हम सब अपने-अपने घर जाने की तैयारी करने लगे, लेकिन हमारी सहपाठी सोनाली गेट परीक्षा की तैयारी के लिए हॉस्टल में ही रुकने वाली थी। मैंने सोनाली से कहा, ’’मेरे घर जाने के बाद तुम ढोंडू को हॉस्टल से बाहर भिजवा देना... मैं अपनी ओखों के सामने उसे जाते हुए नहीं देख पाेगी...।‘‘
मैं घर आ गई और मम्मी-पापा से मिलने के बाद एक बार तो ढोंडू को भूल सी गई। उसी दिन शाम को सोनाली का फोन आया। उसने कहा, ’’जब से तुम गई हो, ढोंडू तुम्हारे कमरे के आगे ही बैठा रहता है... यहीं कुछ खाने को दे दो तो खा लेता है वरना भूखा ही रहता है। दरवाजे पर पंजों से खरोंचे मारता रहता है।‘‘ सोनाली की बात सुनकर मेरी ओखों से ओसू आ गए। मैंने उसे कहा, ’’तुम वीडियो चैट पर ढोंडू को दिखाओ।‘‘
सोनाली ने लैपटॉप में वीडियो चालू किया। मैंने देखा कि ढोंडू गुमसुम सा अपने अगले पंजों पर मह टिकाये मेरे कमरे के बाहर बैठा है।
’’ढोंडू...‘‘ मैं जोर से चिल्लाई। आश्चर्यजनक रूप से ढोंडू चौंका और इट्टार-उट्टार देखने लगा। सोनाली ने लैपटॉप की स्र्ीपन उसके सामने कर दी तो वह मुझे देखते ही स्र्ीान पर पंजे मारने लगा। यह दृश्य देखकर मेरे मम्मी-पापा भी अभिभूत हो गए। किसी इंसान के लिए जानवर की चाहत का यह रूप उन्होंने भी पहली बार देखा था। मेरा मन ढोंडू से मिलने के लिए तडपने लगा।
अपनी छुड्डियों के दौरान मैं हर रोज सोनाली के लैपटॉप पर ढोंडू से बात करती रही। वह भी शायद समझ गया था कि मैं कमरे के भीतर नहीं, बल्कि बाहर कहीं दूर ह। ये बात भी मुझे सोनाली ने बताई कि वह जब भी अपना लैपटॉप ऑन करती है, ढोंडू उसे एकटक देखता रहता था।
खैर मेरी छुड्डियो खत्म हुई और मैं वापस हॉस्टल पहची तो ढोंडू मुझे देखते ही जिस उल्लास से मेरे पैरों से लिपटा, उसे वर्णित करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं। उसका पोवों को चाटना... अपने दोनों पंजे उठाकर मेरे घुटनों पर टिकाना... कमरे में पहचने तक मेरे आगे-पीछे चक्कर लगाते हुए चलना... किसी कहानी के हिस्से सा लग रहा था। जैसे ही मैंने अपना कमरा खोला, ढोंडू मुझसे भी पहले अंदर घुसा और अपनी प्रिय जगह यानि प्रिया के बैग पर साट्टिाकार बैठ गया।
हमारी वार्डन मैडम को भी ढोंडू के बारे में सब कुछ पता चल गया था। मैंने उनसे प्रार्थना की कि वे ढोंडू को हमारे साथ हॉस्टल में रहने दे, जिसे उन्होंने थोडी सी हिदायतों के साथ स्वीकार कर लिया।
एक रोज ढोंडू बेचैनी से कमरे में चक्कर काट रहा था। उस समय रात के लगभग तीन बजे थे। मुझे लगा उसे बाहर जाना है। इसलिए मैंने उठकर दरवाजा खोल दिया और वापस कम्बल में घुसकर सो गई। थोडी देर बाद ढोंडू मेरी कम्बल खींचने लगा तो मुझे उठना पडा। मैंने देखा कि ढोंडू ने कमरे के कोने में रखे अखबार पर उल्टी कर रखी थी। मैंने वो अखबार उठाकर बाहर फेंक दिया। अभी मैं वापस कम्बल में घुस ही रही थी कि ढोंडू ने फिर से उल्टी कर दी। अब मुझे फिर्‍ हुई। मैंने प्रिया को जगाया और डॉक्टर को फोन किया। डॉक्टर की सलाह से हम दोनों ढोंडू को हॉस्पिटल लेकर गये।
ढोंडू निढाल सा मुझसे चिपटा था और मेरी ओखें लगातार गीली हो रही थी। जोच करने के बाद डॉक्टर ने बताया कि ढोंडू ने जहर खा लिया था। लेकिन सोचने की बात ये थी कि कमरे में जहर आखिर आया कैसे? तभी प्रिया ने बताया कि मिठाई में चींटियो लग रही थी इसलिए उसने डिब्बे के चारों तरफ ’लक्ष्मण रेखा‘ लगा दी थी। उन चींटियों को खाने के चक्कर में ढोंडू ने शायद लक्ष्मण रेखा चाट ली थी। ये तो अच्छा हुआ कि उसे उल्टियो होने से जहर का असर अट्टिाक नहीं हुआ था। खैर! किसी तरह ढोंडू ठीक हुआ और हमने चैन की सोस ली।
ढोंडू अक्सर शाम को मेरे साथ घूमने जाता था। एक दिन हम दोनों घूमते-घूमते दो-चार हॉस्टल आगे निकल आए। एक जगह मैंने देखा कि वहो कुछ पिल्ले और भी थे जो हूबहू ढोंडू जैसे ही लग रहे थे। तभी एक कुतिया आई और ढोंडू को प्यार करने लगी। ढोंडू भी उनके साथ खेलने लगा था। शायद यह उसका बिछडा हुआ परिवार था। मैं ढोंडू को वहीं छोडकर चुपचाप वहो से खिसक आई।
दूसरे दिन शाम को मैं और प्रिया फिर से उसी हॉस्टल की तरफ निकल गए। ढोंडू अपने परिवार के साथ खुश दिखाई दे रहा था। हमारी आहट और शायद खुशबू भी पहचानते ही वह हमेशा की तरह लपक कर आया और मेरे पैरों से लिपट गया। हम कुछ देर साथ खेले और फिर ढोंडू को उसके परिवार के साथ छोडकर हॉस्टल चले गए। मैं अपने जाने से पहले ढोंडू को उसके परिवार को सौंप कर बहुत खुश थी। कभी-कभी शाम को मैं ढोंडू से मिलने जाती रहती थी और उसे उसका प्रिय भोजन ’पैडी ग्री‘ भी खिला कर आती थी।
दो साल में मेरी एम.टेक. समाप्त हो गई और मैं आखिरी बार ढोंडू से मिलने गई। ढोंडू अब एक बडा कुाा बन चुका था, लेकिन मेरे लिए तो आज भी मेरा प्यारा ढोंडू ही था। मुझे देखते ही पैरों से लिपट गया... आगे-पीछे घूमने लगा।
मैंने उसे खूब दुलारा और उसके साथ ढेरों सेल्फियो लीं। ढोंडू शायद समझ गया था कि ये हमारी आखिरी मुलाकात है क्योंकि उसकी ओखें नम थी। मैं उसकी यादें दिल में और फोटो मोबाइल में लिए वापस बीकानेर आ गई। आज भी जब कोई पिल्ला देखती ह तो बरबस ही ढोंडू याद आ जाता है।