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कितनी गलत थी मैं

विमला महाजन
एक लम्बे प्रवास के पश्चात् मैं वापिस अपने घर जा रही थी। सारे रास्ते मेरा मन सात-आठ माह से छोडे हुए अव्यवस्थित घर को व्यवस्थित करने में उलझा रहा। राशन, पानी, खान-पान सबका नए सिरे से प्रबन्ट्टा करना था। समझ लो, सारी गृहस्थी दुबारा जमानी थी, उस पर बंद घर में जमी ट्टाूल मिड्डी। इसलिए सबसे अट्टिाक चिन्ता अपनी रोजमर्रा के काम में सहायता करने वाली बाइयों की थी। आजकल ’मेड-सर्वेन्ट‘ जीवन की प्रमुख आवश्यकता बन गई है। क्या करें? जीवनशैली ही ऐसी हो गई है। मैंने घर पहचने से पहले ही फोन द्वारा उन्हें सूचित करना चाहा, पर फोन लग ही नहीं रहा था।
घर पहच कर झाडू-पौंछा करने वाली राजो मिल गई, पर बर्तन साफ करने वाली रानी से सम्फ न हो सका। इसलिए एक दूसरी बाई राट्टाा को काम पर रख लिया। कुछ दिनों की भाग-दौड के बाद सब काम सुचारु रूप से चलने लगा, मन की बेचैनी दूर हो चुकी थी। मानव मन भी अजीब गुत्थी है, बडी-बडी समस्याओं में अडिग खडा रहता है, पर छोटी-छोटी बातों। पर व्यर्थ ही तनावग्रस्त हो जाता है।
एक दिन अचानक ही रानी आ पहची। रानी ने आते ही पूछा, ’’आंटी जी! अब अंकल की तबीयत कैसी है?‘‘
’’तुम्हें कैसे पता चला कि अंकल बीमार है?‘‘ मैंने उत्सुकतावश पूछा।
’’आंटी जी! मैं एक दिन पहले भी आई थी, तभी सामने वाली वर्मा आंटी ने बताया था। यहो से तो आप ठीक-ठाक गई थी, फिर कैसे इतना बीमार हो गए कि ऑपरेशन करना पडा। मैं उन्हीं का हाल-चाल जानने आई ह।‘‘ उसने बडी आत्मीयता से पूछा। उसके मह से सहानुभूति पूर्ण आत्मीय शब्द सुनकर आश्चर्य भी हुआ और अच्छा भी लगा। उसका अपनी अति व्यस्त दिनचर्या से समय निकाल कर मात्र कुशलक्षेम पूछने आना, उसके आंतरिक लगाव का प्रतीक था, अन्यथा आजकल जीवन में व्यस्तताऐ इतनी बढ गई हैं कि सगे-सम्बन्ट्टाी तक मात्र औपचारिकता निभाने से भी कतराने लगे हैं। उसके सहानुभूति पूर्ण दो बोल अन्दर तक सराबोर कर गए।
’’काम करोगी?‘‘ मैंने पूछा।
’’आंटी जी! मेरे पास काम बहुत है, घर पहचते-पहचते दोपहर के तीन बज जाते हैं। वैसे आपने क्या काम करवाना है?‘‘ उसने जानना चाहा।
’’वैसे तो झाडू-पौंछा, बर्तन, कपडे सब काम के लिए व्यवस्था हो गई है, पर अगर सुबह आट्टाा घंटा तुम आ जाओ, तो मुझे मदद हो जाएगी।‘‘ मैंने कहा।
’सुबह‘ वह सोच में डूब गई। फिर कुछ देर सोचकर बोली, ’’सुबह बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करना होता है। खैर, थोडा जल्दी उठकर आने की कोशिश करती ह।‘‘ उसने कहा।
’’तुम आ जाया करो, चाय-नाश्ता यहीं कर लिया करना।‘‘ मैंने कहा।
तीसरे दिन वह सुबह-सुबह आ गई। कुछ दिन सब कुछ सुचारु रूप से चलता रहा। फिर एक दिन बोली, ’’आंटी जी! कल से मैं आट्टाा घंटा देर से आेगी।‘‘
’’क्यों?‘‘ मैंने जानना चाहा।
’’छोटू के स्कूल से शिकायत आई है कि वह समय पर स्कूल नहीं जाता। अब मैं स्वयं ही उसे स्कूल तक छोडकर आया करूेगी। उसके पापा के बस की बात नहीं है।‘‘ उसने शिकायती लहजे में कहा।
शिक्षा के प्रति उसकी ललक देखकर मैं मन ही मन बहुत खुश थी। मैं अक्सर उसके बच्चों के लिए खाने-पीने का सामान, फल-बिस्किट, कपडे-लो देने लगी। कभी-कभी उसके बच्चों के लिए कॉपी, पेन्सिल, स्टेशनरी का सामान भी ले आती।
एक दिन मैंने बच्चों के लिए लीची दी। वह हैरान होकर बोली, ’’आंटी जी! इसे खाते कैसे हैं?‘‘
अब हैरान होने की बारी मेरी थी। मैं मन ही मन सोच रही थी, यह लोग भी इसी देश के वासी हैं, पर मानो इनकी एक अलग ही दुनिया है।
फिर वह अचानक ही कुछ दिनों के लिए काम से नदारद हो गई। इतने दिन काम पर न आने का कारण पूछने पर बोली, ’’बच्चे बीमार थे, मुझे उनकी देखभाल के लिए रुकना पडा। उनके पापा से तो कोई उम्मीद नहीं है।‘‘ स्वर में रुक्षता थी।
’’तुम मुझे फोन तो कर सकती थी।‘‘ मैंने उसके फोन की तरफ इशारा करके कहा।
’’आंटी जी! मुझे नम्बर मिलाना नहीं आता।‘‘ उसका उार था। मैंने अपना नम्बर स्पीड डायल पर डालकर उसे समझा दिया कि यह नम्बर दबाते ही मेरा फोन मिल जाएगा। ’’और अपना फोन स्वीच-ऑफ न रखा करो। मैंने कई बार मिलाया, पर मिला ही नहीं।‘‘
’’आंटी जी! वह बच्चों की बीमारी में चार्ज करना ही भूल गई थी।‘‘ वाह री मो की ममता, मैं सोच रही थी।
एक दिन मेरा फोन बजा, उट्टार रानी थी। मेरे फोन उठाते ही रोती हुई बोली, ’’आंटी जी! मैं काम पर नहीं आ सकती। मेरा बेटा पता नहीं कहो चला गया है।‘‘
कई दिनों बाद वह काम पर आई। बेटे के विषय में पूछने पर उसने बताया कि उसके पति ने शराब के नशे में बेटे को इतना पीटा कि वह गुस्से में घर से भाग गया। ढढते हुए उसके किसी दोस्त ने स्टेशन पर उसे देख लिया और वह लोग जबरन उसे घर ले आए। ’’क्या नशे में वह तुम पर भी कभी हाथ उठता है?‘‘ मैंने जानना चाहा। सुनकर गुस्से में उसका चेहरा तमतमाने लगा, उसका ऐसा रौध् रूप देखकर मैं हैरान रह गई।
’’शुरू में एक-दो बार उसने ऐसा किया जरूर, पर एक दिन मैंने भी उसका हाथ पकड लिया और ऐसा ट्टाक्का मारा कि दूर जा गिरा। वह दिन और आज का दिन, दुबारा उसकी हिम्मत नहीं पडी।‘‘
फिर बात आगे बढाते हुए वह बोली, ’’आंटी जी! नशा तो एक बहाना है। क्या शराब पीकर किसी पुरुष ने अपनी मो या बहन पर कभी हाथ उठाया है? अपनी मो, बहन, बहू, बेटी के प्रति अति संवेदनशील होने वाले पुरुष भी अपनी पत्नी के लिए संवेदनहीन हो जाते हैं। शायद स्त्री जाति पर अपना वर्चस्व स्थापित कर अपने अहं की संतुष्टि वह इसी प्रकार करते हैं।‘‘
उसकी बेबाक बातें सुनकर मैं उसका मह देखती रह गई। उसमें मुझे नारी का सशक्त रूप दिखाई दिया। न समाजसेवी संस्थाओं का बीच-बचाव, न पंचायत का हस्तक्षेप, न कोर्ट-कचहरियों के चक्कर, न रिश्ते-नातेदारों की मट्टयस्थता, न किसी से सहारे की याचना, बस अपने ही बलबूते पर अपने अस्तित्व, अपनी अस्मिता और अपनी गरिमा को बनाए रखने का वह एक उदाहरण लगी। मट्टयवर्गीय, अभिजात्य वर्ग या य कहें तथाकथित बु=जीवी वर्ग की स्त्रियो शारीरिक, मानसिक उत्पीडन सहकर भी लोक-लाज के भय से जिस सच्चाई को छिपा जाती है या आसानी से नकार जाती है, उसने उसी सच्चाई को बिना किसी लाग-लपेट के उट्टोड कर रख दिया था।
कितनी गलत थी मैं, उसे आज तक अबला, लाचार ही समझती रही। उसने मुझे समझा दिया कि जीवन जीवटता जीने में है, जीवन से भागने में नहीं। ’यह संसार वैसे नहीं चलता, जैसे हम चलाना चाहते हैं।‘ यह बात सर्वथा सत्य है, पर अपने जीवन पर तो हमें पूरा अट्टिाकार है। कोई भी रिश्ता जीवन से बडा नहीं होता। किसी भी रिश्ते को जीवित रखने के लिए स्वयं को खत्म कर देना समझदारी नहीं है। इसलिए तभी तक समझौता करना चाहिए, जब तक तुम्हारे अस्तित्व पर चोट न आए। शायद यही नारी की सच्ची आजादी है।