fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

ताँगेवाला

योगेशचन्ध् शर्मा
अपनी सवारियों को स्टेशन पहचाकर रमजान अपने तोगे में खाली ही लौट रहा था। उस उम्मीद थी कि लौटते समय दस-पन्ध्ह रुपये की सवारी मिल ही जायेगी, परन्तु काफी कोशिशों के बाद भी उसे कोई सवारी नहीं मिली। रमजान मन ही मन आज के जमाने को कोस रहा था, जिसमें हर आदमी जल्दी में रहता है। बडे लोगों ने तो अपनी-अपनी कारें खरीद ली हैं, जो दिनभर फर्राटे से इट्टार-उट्टार दौडती रहती हैं। मट्टयम वर्ग के लोग अब ऑटो या टैक्सी पसन्द करते हैं। पता नहीं, लोगों के पास इतना पैसा कहो से आ गया। दो पहिए के साइकिल-रिक्शों ने तो तांगों की जान ही निकाल दी। न कोई खर्च और न झंझट। तोगों से भी कम किराये में, वे लोगों को इट्टार से उट्टार पहचा देते हैं। छोटे लोगों को इन रिक्शों ने छीन लिया और तोगे रह गये अब अपनी किस्मत के सहारे। रमजान खुद कई बार अपने तोगे और घोडे को बेचकर ऑटो या साइकिल रिक्शा खरीदने की सोचता रहता है, मगर तोगे और घोडे का कोई खरीददार तो मिले। उसे यह भी डर सताने लगता है कि पता नहीं अपनी इस ढलती उम्र में वह ऑटो या साइकिल रिक्शा को सम्भाल भी सकेगा या नहीं।
सुबह सात बजे से रमजान ने अपना तोगा जोता हुआ था और अब रात के नौ बजे तक वह केवल सार रुपये कमा पाया था, वह भी उन आखिरी सवारियों के कारण। उनसे तय तो बीस रुपये ही हुए थे, मगर रमजान के व्यवहार से खुश होकर उन्होंने उसे अपने आप ही तीस रुपये दे दिये थे। दो ही तो व्यक्ति थे वे। एक तो वृ= पुरुष और दूसरी शायद उनकी पत्नी थी। रमजान ने तयशुदा रकम से ज्यादा लेने से मना किया तो महिला ने कहा था, ’’यह दस रुपये हम तुम्हारे लिए नहीं, तुम्हारे घोडे के लिए दे रहे हैं। इसे आज दस रुपये का माल ज्यादा खिला देना।‘‘ यह सुनकर नमजान मना भी करता तो कैसे करता।
लौटते हुए रमजान ने अपने घोडे के लिए तीस रुपये का रातब और घास ले लिया। रोजाना वह इसके लिए बीस रुपये खर्च करता था। आज तीस रुपये खर्च कर दिये। घोडे के लिए प्राप्त ट्टान को वह अन्य किसी रूप में खर्च करना नहीं चाहता था। एक किलो उसने आटा खरीद लिया और पचास पैसे का पोदीना ले लिया, चटनी के साथ रोटी खाने की इच्छा से। आज उसने अपनी छोटी बेटी शकीला से, उसके कुर्ते के लिए कपडा लाने का भी वायदा किया था, लेकिन अब अपनी कमाई को देखकर उसने वह वायदा तोड देना ही ठीक समझा। उसका बेटा शकूर स्कूल में सातवीं क्लास में पढ रहा था। सभी अट्टयापक उसकी योग्यता की तारीफ भी करते थे, मगर आज पन्ध्ह तारीख हो जाने के बावजूद रमजान अभी तक उसके स्कूल की फीस अदा नहीं कर पाया था। रोज ही शकूर उससे तकाजे करता और कल तो उसने स्कूल से आकर रोते हुए कहा था कि उसके हैडमास्टर ने तीन दिन की मोहलत और दी है। यदि इन तीन दिनों में भी फीस जमा नहीं की जा सकी तो उसका नाम स्कूल से काट दिया जाएगा। सो रमजान सोच रहा था कि किसी न किसी तरह उसे फीस का तो इंतजाम करना ही है। चाहते हुए भी अपनी दो बेटियों को वह नहीं पढा सका तो न सही, लेकिन बेटे को तो उसे पढाना ही है। वह नहीं चाहता था कि उसका बेटा शकूर भी उसकी तरह घोडे और सवारियों के बीच में झूलता रहे।
रमजान ने घर पहचकर अपना तोगा खोल दिया। उसने घोडे के सामने घास डाल दी और तोगे को एक तरफ कर दिया। आटा और रातब तोगे में ही रखे हुए थे। उसकी इच्छा हुई कि वह उन्हें भी ले ले, परन्तु कुछ सोचकर उसने उन्हें वहीं रहने दिया। दिनभर की मेहनत से वह बहुत थक गया था। सो, सोचा कि बच्चे उठा ले जाऐगे। वह घर के अन्दर घुसा तो सबसे पहले उसकी छोटी बेटी शकीला ही उसकी ओर बढी। उसे उम्मीद थी कि आज अब्बा, उसके कुर्ते के लिए कपडा जरूर लाये होंगे, लेकिन रमजान की ओखों में निराशा और मजबूरी देखकर सह सहम गई। वह जानती थी कि अगर अब्बा कपडा ले आते तो खुद ही आगे बढकर शकीला बेटी को उससे लपेट देते और हेसकर कहते, ’’हमारी शकीला बेटी इस कपडे में कितनी अच्छी लग रही है?‘‘ मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ। सो, सहज ही शकीला समझ गई। शिकायत करना फिजूल था। वह अपने अब्बा की मजबूरियो जानती थी। तेरह वर्ष की आयु में ही परिस्थितियों ने उसे काफी कुछ समझा दिया था। उसने जबरदस्ती अपने होठों पर मुस्कान लाकर अब्बा का स्वागत किया। शकूर ने आगे बढकर स्कूल की रिपोर्ट देते हुए कहा कि आज हैडमास्टर ने अपनी चेतावनी फिर दोहराई है कि मोहलत खत्म होने में अब केवल दो दिन बाकी है। रमजान ने बाकी बचे हुए रुपये शकूर के हाथ में रखते हुए कहा, ’’दो दिन में तो तेरी फीस का इंतजाम जरूर हो जाएगा। चिंता न कर।‘ बडी बेटी जमालो खाना पकाने के लिए, सूखे कण्डे उठा रही थी। वहीं से उसने एक नजर अपने अब्बा की तरफ देखा और फिर अपने काम में लग गई। रमजान जब अपनी इस बेटी की तरफ देखता तो उसे अपनी गरीबी का दर्द और भी टीस पहचाने लगता। पूरे बीस साल की हो चुकी थी जमालो। लेकिन उसके निकाह के लिए वह अभी तक कुछ भी नहीं कर पाया था।
रमजान की पत्नी नूरी ने अन्दर से आते हुए कहा, ’’आटा भी लाये या नहीं? बच्चे भूख से बिलबिला रहे हैं।‘‘
रमजान ने मुस्कराते हुए अपनी बेटी शकीला से कहा, ’’जा तो बेटी, बाहर तोगे में सामान रखा है। जल्दी से ले आ।‘‘ शकीला बाहर जाने लगी तो शकूर भी उसके पीछे चला गया, सामान लाने में हाथ बेटाने के लिए।
जमालो अब तक सूखे कण्डे अपने हाथ पर रख चुकी थी। चूल्हा सुलगाने के लिए वह उन कण्डों को लेकर अन्दर चली गई।
जाती हुई जमालो की तरफ देखते हुए नूरी बोली, ’’इसके निकाह की भी कुछ फिर्‍ है। पूरे बीस साल की हो गई। कब तक घर में बैठाये रखेंगे?‘‘
रमजान लम्बी सोस लेते हुए बोला, ’’कहीं से हाथ में कुछ पैसे आयें, तभी तो निकाह के बारे में कुछ सोचा जा सकता है।‘‘
’’पैसे क्या आसमान से टपकेंगे? साहूकार से कर्ज के लिए बात क्यों नहीं करते? खुदा ने चाहा तो ट्टाीरे-ट्टाीरे सब चुका देंगे।‘‘
’’कर्ज के लिए भी तो साहूकार कुछ गिरवी रखना मोगता है। बिना कोई चीज गिरवी रखे मुझे कर्ज कौन दे देगा? और फिर गिरवनी रखने के लिए हमारे पास है ही क्या?‘‘ कहते हुए रमजान पास में पडी अट्टाबुनी खटिया पर बैठ गया। फिर नूरी को कुछ दिलासा देते हुए बोला, ’’चिन्ता न कर! अब जल्दी ही एक मेला भरने वाला है। शहर से थोडी दूर पर एक नुमाइश की भी तैयारी हो रही है। खुदा ने चाहा तो इस बार कुछ न कुछ इकद्दा हो ही जायेगा।‘‘
इतनी देर में शकीला आटा लिये हुए चली आई। शकूर के हाथ में रातब था और साथ ही चमडे का एक बैग भी।
शकूर अपने हाथ के बैग को दिखाते हुए बोला, ’’अब्बा, यह थैला किसके लिए लाये हैं आप? मेरे लिए ही ना? मैं इसमें अपनी स्कूल की किताबें ले जाया करूेगा।‘‘
रमजान आश्चर्य से उठ खडा हुआ। उसने आगे बढकर बैग थाम लिया। किसका हो सकता है यह बैग? वह बडबडाया। अचानक ही उसे खयाल आया, यह बैग तो उस महिला के हाथ में था, जिसे वह अभी-अभी रेलवे स्टेशन छोडकर आया है। उसने बैग को उलट- पलट कर देखा। साट्टाारण बाजारू बैग था। खोलने के लिए एक तरफ चैन लगी हुई थी। उसने उत्सुकता से चैन खोली। शकूर और शकीला के साथ नूरी भी वहो आ खडी हुई थी।
चैन खुलते ही सब चौंक पडे। उसमें ठसाठस नोट भरे हुए थे। नूरी ने पिर की तरफ हाथ उठाते हुए कहा, ’’खुदा ने हमारी सुन ली। तभी तो छप्पर फाडकर यह दौलत हमारे पास भेजी है।‘‘
शकीला और शकूर भी खुशी से नाच उठे। शकूर कह रहा था कि अब वह कल ही स्कूल में अपनी फीस दे आयेगा और सभी किताबें खरीद लेगा। दोस्तों से किताबें मोगते-मोगते वह थक गया है।
शकीला ने भी तत्काल अपनी मोग पेश कर दी, ’’अब वह एक नहीं पोच कुर्ते बनवायेगी और सब एकदम शानदार।‘‘
जमालो भी चूल्हा सुलगाकर बाहर आ गई थी, आटा लेने के लिए। यहो पर यह चमत्कार देखा तो आटा लेना भूल गई। नोटों से भरे हुए थैले पर एक नजर डाली और फिर अपने फटे कपडों पर। यकायक ही कुछ सेाचकर उसके चेहरे पर लाज की लाली छा गई। मह से तो उसने कुछ भी नहीं कहा लेकिन उसके ओठों पर खिली हल्की मुस्कान और चेहरे की लाली बहुत कुछ कह रही थी।
रमजान अब भी आश्चर्यचकित खडा था। उसके हाथों में बैग था और उसकी नजरों के सामने बार-बार वह वृ= महिला आ रही थी, जिसने बडे स्नेह से उसके घोडे के लिए दस रुपये ज्यादा दिये थे। महिला के साथ ही उसके पति का सरल व्यक्तित्व भी बार-बार उसकी नजरों के सामने आ रहा था। तोगे में बैठे बैठे, आपस में वे जो बातें कर रहे थे, उससे रमजान ने अंदाजा लगाया था कि वह व्यक्ति यहीं किसी नौकरी में था। अब रिटायर होकर वापिस अपने गोव जा रहा है, वहीं पर स्थायी रूप से रहने के लिए। रमजान ने सोचा, शायद यही उस व्यक्ति की जिन्दगी भर की कमाई है।
इस बीच उसके बच्चे उस बैग के बारे में क्या कह रहे हैं और क्या सोच रहे हैं, इसकी तरफ उसका ट्टयान ही नहीं था। उसका ट्टयान जब टूटा तो नूरी उसे झंझोडते हुए कह रही थी, ’’क्या सोच रहे हो? रुपयों का तमाशा क्यों बनाया हुआ है? कहीं कोई आ गया तो बेकार परेशानी में पड जायेंगे। जल्दी से रुपये गिन लो और अंदर संदूक में रख दो।‘‘
’’सन्दूक में?‘‘ आश्चर्य से रमजान बोला। उसे स्वयं को लगा जैसे उसकी आवाज कहीं बहुत दूर से आई हो।
’’हो, हो! अभी तो उस टूटी संदूक में ही रख देते हैं। कल सुबह फिर बाजार से जाकर नया बक्सा ले आना। अभी तुम गिनो तो सही।‘‘ नूरी की उत्सुकता सीमा पार कर रही थी। उसने लगभग जबरदस्ती रमजान को चारपाई पर बैठा दिया और बैग को उसके सामने उलट दिया।
रमजान ने गिना। पूरी पन्ध्ह ग्ययो थीं। सभी नोट एक-एक सौ के थे। यानी कि पूरे डेढ लाख रुपए। इतने रुपये तो उसने जिंदगी में कभी देखे भी नहीं थे। क्षणभर के लिए वह कोप गया। ये रुपए तो उसकी सारी समस्याओं को पलभर में हल कर सकते हैं। तोगा चलाना छोडकर वह छोटा-मोटा ट्टांट्टाा शुरू कर सकता है। उसकी बेटी जमालो का किसी अच्छी जगह निकाह हो सकता है। उसका बेटा शकूर अच्छी तालीम प्राप्त कर सकता है। परन्तु, अगले ही क्षण उसके दिमाग में उस वृ= दम्पा का ख्याल आ गया। कितना सदमा हो रहा होगा, उन्हें इस बैग को खोकर? न जाने कितनी मेहनत से इकद्दे किए होंगे उन्हने ये रुपये। मगर अब वह करे भी तो क्या? अब तक तो वे शायद गाडी से चले भी गये होंगे।
अगले ही क्षण रमजान के दिमाग में दूसरा विचार कौंट्टाा। किसे पता, गाडी शायद लेट हो और वे अब तक न जा पाये हों। फिर इतनी रकम खोकर क्या वे सरलता से जा सकेंगे? शायद रकम ढढने के लिए वे रुक ही गये हों।
रमजान ने जल्दी-जल्दी नोटों के बंडल वापिस बैग में रखे और बैग को बंद करके खडा हो गया। नूरी ने आगे बढकर बैग लेना चाहा तो रमजान ने उसे रोक दिया, ’’नहीं नूरी! ये रुपये हमारे नहीं हैं। जिसके हैं, उसी को लौटाने जा रहा ह।‘‘
नूरी और बच्चों पर जैसे बिजली गिर पडी। सभी सकते में आ गये। नूरी तनिक क्षुब्ट्टा होकर बोली, ’’हम क्या किसी के यहो चोरी करने गये थे। खुदा ने जब हमें यह दौलत दी है, तो उसे ठोकर मारना कहो की अक्लमंदी है?‘‘
’’खुदा तो केवल मेहनत का फल देता है नूरी! इस तरह से पाई हुई दौलत, भले ही चोरी की न हो, पर गुनाह तो है ही। हो सकता है कि हम, लोगों की नजरों से अपने इस गुनाह को छुपा लें, लेकिन खुदा की नजरों से इसे कैसे छुपा सकेंगे।‘‘
’’मैं नहीं समझती, आप क्या कह रहे हैं? दौलत खुद अपने पैरों से चलकर हमारे यहो आई है। अब हम उसे इस घर से बाहर नहीं जाने देंगे।‘‘ कहकर नूरी चुनौती के रूप में रमजान के सामने खडी हो गई।
’’यह नामुमकिन है नूरी!‘‘ रमजान के स्वर की दृढता ने नूरी की चुनौती को दहला दिया। मैं इस दौलत के असली मालिक को ढढने जा रहा ह। स्टेशन पर ढढगा और अगर वहो नहीं मिला तो उस स्थान से पता लगाेगा, जहो से वे तोगे में बैठे थे। कैसे भी हो, इसे इसके असली मालिक तक अवश्य पहचाेगा।‘‘
’’यदि मालिक को ढढने में हर तरह से नाकामयाब रहे तो?‘‘ नूरी ने व्यंग्य से पूछा।
’’तो इसे मुल्क के किसी काम में लगा दगा।‘‘ रमजान ने उसी दृढता से जवाब दिया और अपने कदम दरवाजे की ओर बढा दिये।
नूरी ने अपनी तरकश का आखिरी तीर काम में लेते हुए कहा, ’’क्या तुम्हें अपने इन बच्चों की भी चिंता नहीं है? जमालो का विवाह, शकूर की पढाई...।‘‘
रमजान के बढते हुए कदम एक क्षण के लिए रुक गये। वह बोला, ’’मुझे सबकी चिंता है नूरी। उसके लिए मैं मेहनत करूेगा, लेकिन अपना जमीर नहीं बेचगा। बेईमानी के रुपयों से जमालो का अगर निकाह हो भी गया या शकूर पढ भी गया तो भी यह फल-फूल नहीं सकेंगे।‘‘
’’सारी दुनिया जब हर तरह से पैसा इकद्दा करके शान-शैकत की जिंदगी बिता रही है, तब ईमानदारी का ठेका अकेले तुम्हारे लिए ही तो बचा है।‘‘ नूरी का व्यंग्य बडा पैना था।
रमजान ने अविचल भाव से उार दिया, ’’मेरे पास आज शान-शौकत तो नहीं है नूरी! मगर मेरा ईमान और मेरा जमीर जिंदा है। यही मेरी दौलत है और अपनी इसी दौलत के आट्टाार पर, मैं इन शान-शौकत वाले लोगों से कहीं बढकर ह।‘‘ कहकर रमजान रुका नहीं। तीर की तरह दरवाजे से निकल गया।
रमजान के जाते ही नूरी फर्श पर ट्टाम्म से बैठ गई। उसका अन्तर्मन कह रहा था - रमजान सही है। मगर वह अपनी इस सहमति का अपनी समस्याओं के साथ समझौता नहीं कर पा रही थी। शकूर और शकीला उदास हो गये। जमालो, क्षणभर के लिए अपने ओठों पर आई मुस्कराहट को भूलकर, निर्लिप्त भाव से आटा लेकर अन्दर चली गई।