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किस्सा खत का

संगीता माथुर
बेटे दीपू के संग खरीददारी कर लौट रही मीना ने दीपू के कदम एक इमारत के बाहर ठिठकते देखे तो स्वयं भी वहीं रुक गई।
’’बेटा, यह पोस्टऑफिस है। तुम स्कूल में पत्र-लेखन सीखते हो न, वे पत्र यहीं से अपने गंतव्य पर भेजे जाते हैं... आओ तुम्हें दिखाती ह।‘‘ मीना उसे बाहर लगे लाल रंग के बडे से लेटरबॉक्स के पास ले जाने लगी। पेशे से अट्टयापिका मीना आठवीं में पढ रहे बेटे को बातों-बातों में इस तरह की जानकारियो उपलब्ट्टा करवाकर उसका सामान्य ज्ञान बढाती रहती थी।
’’लेकिन मो, मोबाइल, कम्प्यूटर के जमाने में अब इन पत्रों और इस डाकघर की क्या अहमियत?‘‘
’’ह, एक मायने में तो तुम्हारी बात सही है। पर थोडा गहराई में जाओगे तो समझ आएगा कि हर चीज अपनी जगह प्रासंगिक है। भावनाओं का जो सम्प्रेषण, क्तदयोद्गारों का जो संश्लेषण पत्रों के माट्टयम से होता है, इन नए माट्टयमों से सम्भव ही नहीं है। प्लास्टिक के फूल क्या प्राकृतिक फूलों की जगह ले सकते हैं? कभी किसी तितली को आकर्षित कर सकते हैं? शायद अभी तुम यह सब न समझ पाओ। कुछ बातों इंसान वक्त आने पर ही समझ पाता है।‘‘
’’अरे मीना बेटी, इट्टार कैसे? आज खत नहीं है तुम्हारा। परसों ही तो लाया था।‘‘
’काका, अ...अभी तो मैं अपने बेटे दीपू को पोस्टऑफिस दिखाने लाई र्ह‘‘ पोल खुलती देचख मीना अचकचा गई थी।
’’तो चलो हम दिखाए देते हैं।‘‘ पोस्टमैन मनोहर काका ने मिनटों में दीपू को पूरे पोस्टऑफिस और उसकी कार्यप्रणाली से अवगत करा दिया था। जब वे चले गए तो दीपू ने अब तक मन में उमडता घुमडता सवाल मो के सम्मुख दाग ही दिया।
’’आप इन्हें कैसे जानती हैं? मैंने तो इन्हें घर कभी कोई खत लाते नहीं देखा।‘‘
अब तक मीना भी मन ही मन जवाब सोच चुकी थी, ’’ये स्कूल आते हैं डाक लेकर।‘‘
’’पर वे तो खत की बात कर रहे थे। मानो नियम से आफ लिए किसी के खत लाते हों?‘‘
मीना चौंक उठी। दीपू के स्वर की तल्खी बता रही थी कि उसकी सोच की सुई किसी गलत दिशा की ओर मुड चुकी है। पति मनीष लगभग आट्टाा महीने बिजनेस के सिलसिले में बाहर ही रहते थे। ऐसे में दीपू ही मीना के हर सुख-दुःख का सहारा और राजदार था। किशोरवय बेटे से मो-पिता दोनों ही दोस्ताना व्यवहार रखते थे और उम्मीद करते थे कि वह उनसे कुछ न छुपाए।
’पर बदले में हमें भी तो उससे कुछ नहीं छिपाना चाहिए। मीना, यही सही वक्त है। दीपू को सब कुछ बता दे।‘ मन की पुकार ने मीना को सावट्टाान कर दिया।
’’तुम जैसा सोच रहे हो वैसा कुछ नहीं है। खत तुम्हारे दादाजी के हैं।‘‘
’’क्या?‘‘ दीपू आसमान से गिरा। ’’पर पापा ने तो एक बार कहा था वे अब इस दुनिया में नहीं है।‘‘
’’उन बाप-बेटे के दिमाग में यही है। दोनों ही एक-दूसरे के लिए मर चुके हैं।‘‘
’’पर क्यों?‘‘
घर आ चुका था। मीना ने वार्ता को विराम दे दिया। ’’तू दूट्टा पीकर खेलने जा, मैं सामान रखती ह।‘‘
पर सयाने दीपू ने अपने लिए दूट्टा गर्म करने के साथ- साथ मो के लिए चाय भी बना दी। ’’मैं आज खेलने नहीं जा रहा। मुझे दादाजी के बारे में जानना है। कहो हैं वे?‘‘
’’इसी महानगर में हैं। बहुत बडा बिजनेस है उनका, बहुत बडी कोठी। तुम्हारे पापा उनकी एकमात्र संतान हैं। बहुत उम्मीदों से पाला था उन्होंने अपनी इकलौती संतान को। शायद इसीलिए उसका एक विजातीय से प्रेमविवाह करना उन्हें रास नहीं आया।‘‘
’’मतलब आप से?‘‘
’’हो। उन्होंने गुस्से में तुम्हारे पापा को न केवल अपने घर से वरन अपनी सम्पा से भी बेदखल करने का निर्णय सुना दिया। मैं तो हक्की-बक्की बस उनके रौध् रूप को देखती रह गई थी। हो, तुम्हारी दादी ने बीच-बचाव का भरसक प्रयास किया था। पति-पुत्र दोनों को समझाने का भरसक प्रयास किया। खूब हाथ-पोव जोडे। पर दोनों में से कोई झुकने को तैयार नहीं था। तुम्हारे दादाजी ने तो उसी वक्त घोषणा कर दी थी कि उनका बेटा उनके लिए मर गया है। तुम्हारे हठी पापा भी कहो पीछे रहने वाले थे। तुरन्त सुना दिया था कि जीते जी उनकी कोठी में कदम नहीं रखेंगे।‘‘
’’फिर?‘‘
’’फिर एक दिन मुझे स्कूल में तुम्हारी दादी का खत मिला। उन्हें हमारे बारे में सारी जानकारी थी। यहो तक कि तुम मेरे पेट में थे, यह भी उन्हें पता था। वे हमसे मिलने के लिए बेतरह छटपटा रही थीं। पर विवश थीं। लिखा था... बेटी छटपटा तो हम दोनों के पति भी रहे होंगे। पर यह जो पुरुषोचित दंभ है न, यह बडी जानलेवा बीमारी है। प्रयास करना कि यदि मेरे पोता हो तो उसे यह छूत की बीमारी न लगने पाए और यदि पोती हो तो तुम्हारी और मेरी तरह बेचारी इसका शिकार न बनने पाए। अपने स्वास्थ्य का ख्याल रखना बेटी और बच्चे के होने की खबर उसकी तस्वीर सहित जरूर भिजवाना।‘‘ साथ में पडोसन का पता था।
मीना ने देखा दीपू कहीं खो-सा गया था। ’’मैंने भी जवाब में तुम्हारी दादी को आश्वासन भरा खत लिखा और इस तरह यह सिलसिला चल निकला। तुम्हारे जन्म की तस्वीर भी भेजी।‘‘
’’एक सैकण्ड... लेकिन आप तो दादाजी के खतों की बात कर रही थीं?‘‘
’’उसी पर आ रही ह। तुम्हारी दादी तुमसे मिलने को इतनी विकल थी कि मैं एक दिन चोरी छुपे तुम्हें लेकर कोठी पहच गई।‘‘
’’फिर... दादाजी को पता चल गया?‘‘ दीपू के चेहरे पर भय उभर आया था।
’’तुम्हारी दादी के तो प्राण सूख गए थे। तुम्हें चूमा, दुलारा तो बहुत, पर आगे से मिलने की सख्त मनाही कर दी। कहने लगी तुम लोग सलामत रहो, यही मेरे लिए बहुत है। आगे से कभी अपने और इस नन्ही सी जान के प्राण खतरे में मत डालना। तुम्हारे दादा को यह सब कभी पता न चल पाता यदि मैंने उन्हें न बताया होता तो।‘‘
’’क्या आपने उन्हें बता दिया? पर क्यों? आपने ऐसा क्यों किया मो?‘‘
’’मैंने ऐसा तुम्हारी दादी के इस दुनिया से चले जाने के बाद किया। तुम्हारे दादाजी ने तो हमें उनके निट्टान की सूचना भी नहीं दी थी। उनके चले जाने के काफी दिनों बाद हमें पता लगा था। तुम्हारे पापा को मैंने तब पहली बार इतना टूटते देखा था। पिता के प्रति कठोरता और कटुता और बढ गई थी। उनसे आजीवन अबोले का प्रण और भी मजबूत हो गया था। पुरुषोचित दंभ के आवरण तले हर कोमल भावना दम तोड देती है।‘‘
’’शायद इसीलिए घर में दादाजी की कोई तस्वीर भी नहीं है।‘‘ दीपू बुदबुदा उठा था।
’’अब तक मेरे पिताजी का भी स्वर्गवास हो गया था। मो का साया तो बचपन में ही उठ चुका था। जिंदगी में किसी बडे की छत्रछाया की कमी बेतरह अखरने लगी थी। अब जाकर अहसास होने लगा था कि विवाह दो इंसानों का नहीं, दो परिवारों का मिलन है। इसी दौरान पीहर पक्ष की एक शादी में जाने का मौका मिला। तेरे पापा ट्यूर पर थे। तुझे गोद में उठाए मैं भाई के साथ हो ली। शादी से निकलते वक्त अचानक तुम्हारे दादाजी से आमना-सामना हो गया। एक पल को तो हम दोनों के कदम अपनी-अपनी जगह चिपक से गए थे। इन कुछ बरसों में उनकी तो सूरत ही बदल गई थी। क्तष्ट-पुष्ट दबंग व्यक्तित्व के तुम्हारे दादाजी बहुत वृ= और लाचार नजर आने लगे थे। चश्मे के पीछे से झोकती ओखें एकटक तुम्हीं पर टिकी थीं। पर एक हिचकिचाहट तुम्हें गोद में लेने से रोके हुए थी। स्थिति की नाजुकता को भोपते हुए भाई यह कहकर खिसक लिया कि मैं बाहर इंतजार करता ह... और पता नहीं कैसे अगले ही क्षण तुम अपने दादा की गोद में थे। वे तुम्हें चूम रहे थे, पुचकार रहे थे। बार-बार तुम्हारे सिर पर हाथ फेर रहे थे। उनकी वे नम ओखें... मुझे आज भी याद है मानो कोई चड्डान पिघल रही थी। फिर कानों में उनके थरथराते बोल पडे... इसकी दादी तो इसे देखने की आरजू मन में लिए ही चल बसी। मैं गुनहगार ह उसका! तुम सबका!‘‘ वे रोने लगे थे। मैं पूरी तरह पिघल गई थी... आप खुद को दोषी ठहराकर दुखी मत होइए। अकेले आप ही कसूरवार नहीं हैं। रही सासूमो की बात तो उन्होंने न केवल अपने पोते को देखा है वरन गोद में खिलाया भी है। मैंने उन्हें उनसे मिलने, पत्र लिखने आदि सब बातें बता दी थीं। उन पलों में अंदर का भय जाने कहो चला गया था।‘‘ मीना बताते-बताते कहीं ख सी गई थी। दीपू ने ’फिर‘ कहकर झिंझोडा तो उसकी चेतना लौटी।
’’फिर तुम्हारे दादाजी भाव-विभोर हो गए। बार-बार मेरा आभार मानने लगे। कहने लगे, इसका मतलब तुम्हारी सास के संदूक से मिली तस्वीर इस छुटकू की है। मैं तो उसे मनीष के बचपन की तस्वीर समझ रहा था। बाप बेटे में कितना साम्य है! लेकिन बेटी, उसमें तुम्हारे खत तो नहीं थे?‘‘
’’जी, आप बाप-बेटे के डर से हम एक-दूसरे के खत पढकर जला देती थीं। पोते की तस्वीर का मोह शायद मोजी छोड नहीं पाई होंगी इसलिए वह बच गई। तुम्हारे दादाजी फिर भावनाओं में बहने लगे थे। आसपास से गुजरते लोग रुककर देखने लगे तो हम सम्भले... एक अहसान करना बहू मुझ पर। सास-बहू के बीच जो खत लिखने का सिलसिला चल रहा था, उसे तोडना मत। मैं तुम्हें तुम्हारे स्कूल के पते पर खत भेजता रहगा और तुम मुझे घर के पते पर और हो समय-समय पर दीपू की तस्वीरें भी भेजती रहना। विशेषकर इसके हर जन्मदिन की तस्वीर तो मुझे चाहिए ही।‘‘ दीपू को मेरी गोद में थमाकर वे तेजी से चले गए थे। मैं अवाक खडी रह गई थी मानो कोई सपना देख रही थी। भाई ही अंदर आकर मुझे ले गया था। ’’कब से बाहर राह देख रहा ह।‘‘
’’मैं इस घटना के कई दिनों बाद तक भी सामान्य नहीं हो पाई थी। कभी लगता सब सपना था। ऐसा कुछ हुआ ही नहीं था। पर फिर एक दिन अचानक तुम्हारे दादाजी का खत आ गया। अविश्वास से जाने कितनी देर मैं उसे पढती रहीं। लगता ही नहीं था कि खत लिखने वाला इंसान और तुम्हारे दादाजी एक ही व्यक्ति हैं। सूखे रेगिस्तान में मानो भावनाओं का सोता फूट पडा था। पर फिर कभी उनसे मिलना नहीं हो पाया। बस पत्र-लेखन का सिलसिला चल रहा है।‘‘
’’आप दादाजी और पापा को मिलवा क्यों नहीं देती?‘‘
’’कई बार सोचा। पर डर लगता है, ज्यादा के लालच में कहीं जितना मिल रहा है उससे ही हाथ न ट्टाोना पडे।‘‘
मीना की बात अट्टाूरी रह गई। फोन बज रहा था। दीपू पापा से वार्तालाप में व्यस्त हो गया और मीना भी खाना बनाने रसोई में घुस गई। अब दो घंटे तक लगे रहेंगे बाप-बेटे फोन पर। स्कूल का, दोस्तों का कोई किस्सा छूटने नहीं पाएगा। मनीष भी तो रस ले लेकर पूछते रहेंगे। न बेटा बताते थकता है, न पाप सुनते। अब तो दीपू का जन्मदिन भी आ रहा है तो फिर तो क्या कहने? दो घंटे तो पार्टी की प्लानिंग में ही निकाल देंगे ये दोनों। फिर मनीष उसके लिए क्या लाऐे यह पूछते रहेंगे। दीपू के प्रति मनीष का अपार प्यार देखकर कई बार मीना को डर लगने लगता था। कहीं कोई असुरक्षा का भाव तो मनीष को नहीं खाए जा रहा है? पर फिर अगले ही पल यह बुदबुदाने लग जाती, ’हे भगवान्, कम से कम इन बाप-बेट का प्यार तो सलामत रखना, इन्हें किसी की नजर न लगे, मेरी भी नहीं।‘
’’खाना बन गया मो, बहुत भूख लगी है।‘‘
’’अरे आप बाप-बेटे की वार्ता इतनी जल्दी खत्म हो गई?‘‘
दीपू कोई जवाब न देकर खाना परोसता रहा और फिर गुमसुम सा ही अपनी प्लेट लेकर खाने बैठ गया। मीना ने भी ज्यादा कुरेदना उचित नहीं समझा और अपनी प्लेट लगाने लग गई। इस वीकऐंड मनीष घर आ रहे हैं। कहीं दीपू पापा को सब बता तो नहीं देगा? नहीं, वह बहुत समझदार है। उसकी मो किसी मुसीबत में पडे, ऐसा कोई कदम वह नहीं उठाएगा।
मनीष के घर आने पर डिनर टेबल पर बातें का दौर चल रहा था कि दीपू ने अचानक हॉस्टल शिय्ट होने की इच्छा जताकर सबको चौंका दिया।
’’एकाएक यह निर्णय क्यों? तुमने तो मुझे भी नहीं बताया?‘‘ मीना ने पूछा।
’’मेरा दोस्त समर शिय्ट हो रहा है तो मैंने सोचा मैं भी हो जाे। वहा पढाई अच्छी हो जाएगी।‘‘
’’समर संयुक्त परिवार में रहता है छोटे से घर में। उसे पढने की समस्या हो सकती है, पर तुम्हें तो ऐसी कोई समस्या नहीं है।‘‘ मीना ने उत्कंठा से कहा।
’’हो, स्कूल बस से आने-जाने में टाइम खराब हो रहा हो तो तुम्हारे लिए अलग गाडी और डत्रइवर लगा देता ह। तुम चले जाओगे तो मम्मी कितनी अकेली हो जाएगी। मैं भी इतना बाहर रहता ह।‘‘ दीपू के जाने की खबर से मनीष रूओसा सा हो गया था।
’’ओके ओके, नहीं जा रहा। बस! पर मेरी दूसरी बात तो आप लोगों को माननी ही होगी, वादा कीजिए।‘‘ दोनों को मजबूरी में गर्दन हिलानी पडी।
’’मैं बीस दिनों के शैक्षणिक भ्रमण पर जा रहा ह।‘‘
’’कहो? कब? कैसे? क्यों?‘‘
’’यहीं दिल्ली में ही है, पर काफी दूर। पता बताने की टीचर ने मनाही की है। वरना अभिभावक मिलने पहच जाऐगे। टीचर का नम्बर मैं आपको दे दगा। पर बहुत जरूरी होने पर ही वे बात करवाऐगे।‘‘
’’यह अच्छी सजा है।‘‘ मनीष का चेहरा लटक गया था।
दीपू को गए चौथा दिन था। स्कूल से लौटी मीना ने दरवाजा खोला तो एक खत आया। देख, चौंक उठी। यह तो दीपू की हैंडराइटिंग है।
’’मनीष, देखो दीपू का खत आया है।‘‘
उनींदा मनीष बिस्तर छोडकर भागा आया। भूखी ओखों से दोनों खत निगलने लगे। इतनी तृप्ति तो शायद फोन पर बात करने से भी नहीं होती। मीना ने पत्र समाप्त करते हुए टिप्पणी की।
’’वाकई दीपू हमें कितना प्यार करता है। कितना मिस कर रहा है हमें! मीना, मेरा लेटरपेड लाओ, मैं भी उसे खत लिखगा। उसे भी तो पता चले कि उसके मो-बाप भी उसे कितना प्यार करते हैं।‘‘
’’पता कहो है हमारे पास? या तो दीपू पता लिखना भूल गया है या अभिभावकों के खत आने की मनाही होगी।‘‘
’’ओह! फिर?‘‘
’’अगले पत्र का इंतजार‘‘ कहकर मीना ”ेश होने चली गई। दीपू के पत्र के इंतजार में मनीष ने अपने सारे बिजनेस ट्यूर स्थगित कर घर पर ही रुकने का निर्णय ले लिया। पर अगला खत आने पर उसे मीना को स्कूल फोन कर बुलाना पडा।
’’ऐसा क्या काम आ गया। स्कूल में परीक्षाऐ चल रही हैं। बडी मुश्किल से आट्टो दिन की छुड्डी लेकर आई ह।‘‘
’’यह सब क्या है मीना? दीपू बाबा के बारे में कैसे जानता है?‘‘ मनीष ने दीपू का पत्र सामने रख दिया था। मीना का हलक सूख गया था। डरते-डरते वह पत्र पढने लगी। आरम्भिक कुशलता और प्यार भरी बातों के बाद दीपू ने लिखा था, मैं जानता ह पापा। आप भी मुझे पत्र लिखने के लिए तरस रहे होंगे। पर मुझे क्यों? मैंने अपने पापा को खत लिखा है, आप अपने बाबा को पत्र लिखिए। यही मेरा बर्थडे गिय्ट होगा।‘‘
मीना के पास सब कुछ बता देने के अलावा कोई चारा नहीं बचा था। सब कुछ जानकर मनीष गुमसुम सा हो गया था। मीना उसकी मनःस्थिति समझ रही थी। इसलिए उसने उसे अकेला छोड देना उचित समझा। पर देर रात स्टडी रूम की लाइट जलती देख उससे रहा नहीं गया। दबे कदमों से जाकर उसने झोका तो मनीष को स्टडी टेबल पर झुककर कुछ लिखने में तल्लीन पाया। ओखों से गंगा जमुना प्रवाहित हो रही थी। मीना दबे पोव लौटकर बिस्तर में घुस गई। बरसों बाद उसे इतनी गहरी नींद आई थी। शायद जो करने का साहस वह इतने बरसों में नहीं जुटा पाई, वह उसका बेटा कर दिखाए।
मीना की उम्मीद गलत नहीं थी। पोच दिन बाद ही बाबा का जवाब आ गया था। उन्होंने सबको तुरनत घर बुलाया था। ’’मैं बाबा की पसन्द के पेडे पैक करवाकर लाता ह, तुम चलने की तैयारी करो। काश, दीपू भी इस मौके पर साथ होता।‘‘
’’भ्रमण से लौटेगा तब उसे भी ले चलेंगे।‘‘ मीना कपडे बदलने चली गई थी। अलमारी खोली तो हाथ अनायास ही मोजी द्वारा दी गई पीली कांजीवरम साडी पर चला गया। जब वह दीपू को चोरी छुपे मोजी से मिलवाने ले गई थी तब मोजी ने यह कीमती साडी उसे भेंट की थी। ’हमारे यहो प्रसूति के बाद बहू को पीला ओढाया जाता है।‘ मनीष के सवाल जवाब से बचने के लिए वह कभी इसे पहनने का साहस नहीं कर पाई थी। आज तो उसका सही मायने में गृहप्रवेश हो रहा है। भला इससे बेहतर वह और क्या पहन सकती थी
घर की दहलीज में प्रवेश करते दोनों ही रोमांच से भर उठे थे। यह खुशी थी या कोई अनजाना भय, कयास लगाना मुश्किल था। सामने ही दादा पोते को इत्मीनान से शतरंज खेलते देख दोनों की दबी-सी चीख निकल गई थी।
’’दीपू, तू यहो?‘‘ दोनों के मह से एक साथ निकला था, ’’त तो ट्यूर पर गया था न?‘‘
’’उस झूठ के लिए सॉरी मो। पर आपने ही सिखाया था न कि अच्छे कारज के लिए बोला गया झूठ, झूठ नहीं होता।‘‘
’’हो बहू, उसके लिए इसे माफ कर दो।‘‘
’’यह आफ सिर पर पड्डी कैसे बाबा?‘‘ पड्डी के बहाने मनीष बाबा से लगभग लिपट ही गया था।
’’एक भयंकर एक्सीडेंट हो गया था। पर तुम लोगों से इसी जन्म में मिलना लिखा था इसलिए भगवान ने मेरे पोते को देवदूत बनाकर भेज दिया।‘‘
मनीष और मीना के मह पर कुछ भी न समझ सकने के भाव थे।
’’मैं बताता ह। कुछ दिनों पूर्व मैं कोचिंग से लौट रहा था तो सडक पर एक भयानक एक्सीडेंट हुआ देखा। भीड से घिरे एक घायल वृ= बेहोश पडे थे। मैं तुरन्त टैक्सी कर उन्हें अस्पताल ले गया। खून चढाना पडा। भाग्यवश मेरा खून मैच कर गया। मुझे उनके घर वालों को सूचित करना था, इसलिए उनका वॉलेट तलाश तो उसमें मेरे ढेर सारे फोटोज देख हक्का-बक्का रह गया। अट्टिाकांश मेरे अलग-अलग जन्मदिन के थे। मुझे तुरन्त मो की बात याद आ गई। मैं समझ गया वे मेरे दादाजी हैं।‘‘
’’यह उस दिन की बात तो नहीं, जिस दिन तूने मुझे फोन करके कहा था कि आज तू कोचिंग के बाद दोस्त के घर पढने रुकेगा?‘‘ मीना ने टोका।
’’हो मो, यह उसी दिन की बात है। रातभर दादाजी के साथ हॉस्पिटल रुकने के बाद सवेरे मैं उन्हें घर ले आया था। उन्हें होश आ चुका था और उन्होंने मुझे पहचान भी लिया था। वे अपने किए पर पछता रहे थे। उनका अकेलापन और तडप मुझसे देखी नहीं गई। प्लस का चिँ दो माइनस के चिँों से बनता है न। इसका मतलब है सारी नकारात्मक चीजों को सकारात्मक किया जा सकता है। बस, दृष्टिकोण सकारात्मक होना चाहिए। मैंने निश्चय कर लिया कि कुछ भी हो मैं आप सबको मिलाकर रहगा और फिर मैंने वो ट्यूर पर जाने का नाटक किया। जबकि हकीकत में मैं यहीं दादाजी के साथ था।‘‘
’’और वो खत, उसमें लिखे आखर वो भी नाटक था?‘‘ मनीष विचलित था।
’’नहीं, वो सच्चा था। जब खत लिखने बैठा तो न भावनाओं पर नियंत्रण रहा न लेखनी पर। मो आपने सही कहा था खत में एकतरफा सम्प्रेषण होने के कारण हम रिक्त कागज के टुकडे पर अपना पूरा दिल उतारकर रख देते हैं। फोन और चैट की तरह कोई सामने टोकने वाला जो नहीं होता।‘‘
’’हो बहू, मेरा लिखा खत भी सच्चा था। एक-एक शब्द सीट्टाा दिल से निकलकर कागज पर टंकित हो गया था। जब लडाई अपनों से हो तो हारना भी अच्छा लगता है।‘‘
’’बाबा, मेरा खत भी एकदम सच्चा था। मैं तो अब तक अपने आप से ही लड रहा था। खुद को जीतना अच्छा लग रहा है।‘‘ मनीष भी कहे बिना नहीं रह सका।
’’हम सबका प्यार सच्चा है, विश्वास सच्चा है और पश्चाताप भी सच्चा है। हमसे गलतियो हुइङ, पर इतने सालों बाद गलतियों का वह संग्रह अब अनुभव बन गया है। जो भविष्य में हम सबको सफलता की ओर ले जाएगा।‘‘ मीना ने कहा।
’’बिल्कुल बहू, बिजनेस करते बाल सफेद हो गए पर बिजनेस का मर्म अब समझ आया है। जिंदगी की बैंक में जब प्यार का बैलेन्स कम हो जाता है तब हेसी खुशी के चैक बाउंस होने लगते हैं। इसलिए हमेशा अपनों के साथ नजदीकियो बनाए रखो।‘‘
बैंक बैलेन्स फुल करने का फार्मूला जानकर सबके चेहरे खिल उठे थे।