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उसका जाना

सूरज सिंह नेगी
उसके जाने के बाद आज दय्तर में मेरा पहला दिन था। किसी काम में मन नहीं लग रहा था। पिछले तीन साल से वह दय्तर में क्लर्क के पद पर कार्यरत था, लेकिन महसूस ही नहीं हुआ कि वह एक सरकारी मुलाजिम है। वह किसी के लिए छोटा भाई, किसी का बडा भाई, किसी का भतीजा, किसी का बेटा और किसी का दोस्त बन चुका था। मुझे वह भाई साहब कहकर पुकारने लगा था।
मैंने जब उस दय्तर में ज्वाइन किया था, वहो अलग-अलग गुट बने हुए थे। कर्मचारी एक-दूसरे के गुट के साथ बैठना तो दूर बातचीत तक करना पसन्द नहीं करते थे। सबके निजी स्वार्थ थे। यदि किसी के निजी हितों पर कुठाराघात हो जाए, बस वहीं से दुश्मनी आरम्भ। मैं कुछ महीनों तक यह सब देखकर परेशान, हैरान होता रहा। किस्मत से मेरी ज्वाइनिंग के छह माह बाद ही सि=ार्थ पदस्थापित होकर आया।
कुछ ही दिनों में वह सब में घुल मिल गया। आरम्भ में वहो पनप चुके सभी गुटों ने उसे अपने-गुट में शामिल करना चाहा। एक दिन तो उसने कमाल ही कर दिया। लंच समय में अलग-अलग गुट के कर्मचारियों को यह कहकर निमंत्रण दे डाला कि उसका जन्मदिन है और वह बर्थ-डे पार्टी देना चाहता है। ट्टाीरे-ट्टाीरे पूरा ऑफिस उसकी पार्टी में शामिल हो गया। सभी शामिल तो हो गए लेकिन अलग-अलग गुटों में बैठे हुए थे। मुझे यह देख संतोष था कि चलो पूरा ऑफिस एक मंच पर तो आया।
घटना के तीन दिन बाद मेरे हाथ में सि=ार्थ की सर्विस बुक आई। देखा, उसका जन्मदिन तो बीस अप्रैल को था। फिर उसने तीन महीने पहले ही बर्थ-डे क्यों सेलिब्रेट कर लिया, मैं सोच में पड गया। मुझसे रहा न गया, मैंने चपरासी भेज उसे बुलावा भेजा, ’’बोलिए भाई साहब, कैसे याद किया?‘‘ यह कहते हुए वह मेरी सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया।
सि=ार्थ तुम्हारा जन्मदिन तो तीन महीने बाद आता है न, फिर ....?‘‘
इस बार हेस पडा था वह, ’’छोडए भाई साहब। इस बहाने ऑफिस के सभी लोग एक जगह आ तो पाए।‘‘
मैं चुप था। ऑफिस में पनप चुकी गुटबाजी को दूर करने के लिए ही शायद उसने यह सब किया हो। मैंने सिर हिलाकर जैसे उसका समर्थन किया हो।
तिवाडी गुट में शामिल क्लर्क मनोज ने बहिन की शादी के लिए एक सप्ताह की छुड्डी का प्रार्थना पत्र हैड ऑफिस भेजा, लेकिन ’विाीय वर्ष की समाप्ति पर काम की अट्टिाकता होने से केवल दो दिन का अवकाश स्वीकृत किया जा सकता है।‘ इस रिमार्क सहित वापिस आ गया। मनोज उस दिन बेहद परेशान रहा। घर में सम्पूर्ण व्यवस्था उसी के जिम्मे थी। यह बात सि=ार्थ की जानकारी में आ गयी। अगले दिन वह लंच तक ऑफिस नहीं पहचा। न ही कोई छुड्डी, न फोन। बडा अटपटा-सा लगा। दरअसल मैं उसकी उपस्थिति का आदी-सा हो गया था। एक वही था, जो मुझे कार्यालय समय में भी भाई साहब कह कर सम्बोट्टिात करता था। शुरू में यद्यपि यह अटपटा जरूर लगा, लेकिन मैं भी ट्टाीरे-ट्टाीरे इस सम्बोट्टान का अभ्यस्त हो गया था। मुझे भी यह सुनना अच्छा लगने लगा था। एक मैं ही क्या, वहो कार्यरत सभी को उसकी उपस्थिति अच्छी लगने लगी थी। दोपहर दो बजे वह मेरे कक्ष में पहचा।
’’लो भाई साहब! मनोज की पूरे सात दिन की छुड्डी स्वीकृत करा लाया।‘‘ कहते हुए उसने मेरे सामने स्वीकृत शुदा आदेश रख दिया।
मैं कभी सि=ार्थ का मह देख तो कभी स्वीकृत शुदा अवकाश आदेश की तरफ। कल तक तो हैड ऑफिस से मनाही थी, यह चमत्कार कैसे! मैं कुछ समझ नहीं पा रहा था। वह मेरी उलझाहट को दूर करते हुए कहने लगा, ’’मैं हैड ऑफिस जाकर मनोज के जिम्मे का काम अवकाश काल में स्वयं के नाम करवा लाया। जब तक वह अवकाश पर रहेगा, मैं उसकी सीट का काम करूेगा।‘‘
मेरे पास कहने को शब्द नहीं थे।
मिश्रा गुट में शामिल चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी रोशन की बेटी की शादी थी। जी.पी.एफ. लोन के लिए आवेदन किया, लेकिन समय पर लोन स्वीकृत न हो सका। कई दिनों तक वह परेशान रहा था। ऑफिस में सभी के आगे हाथ फैला चुका था लेकिन ’मुसीबत में सभी मह मोड लेते हैं‘ वाली कहावत चरितार्थ हो रही थी। सि=ार्थ को जैसे ही ज्ञात हुआ, बैंक जाकर एक लाख रुपये निकाल लाया और रोशन को सुपुर्द कर दिये। उसकी ओखों में ओसू भर आए, स्नेह से सि=ार्थ को गले लगा लिया।
ऑफिस में ट्टाीरे-ट्टाीरे परिवर्तन दिखाई देने लगा था। वहो कार्यरत लोग तमाम मतभेद भुलाकर एकजुट होने लगे थे। सभी का ट्टयेय विभाग द्वारा सौंपे गये कायोङ को समय पर पूरा करना बन गया था। मेरे लिए यह किसी चमत्कार से कम नहीं था। ओखों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था लेकिन सच्चाई यही थी कि कुछ महीनों में ऑफिस की काया पलट हो गई थी।
एक दिन प्रातःकालीन भ्रमण पर जाते समय मैंने देखा, सि=ार्थ ऑफिस कैम्पस में जगह-जगह उग आई जंगली घास को उखाड रहा है। पास जाने पर देखा, पूरा बदन पसीने से लथ-पथ हो गया था। वह था कि एक ही ट्टाुन में अपने कार्य को अंजाम दे रहा था। उसे यह अंदाजा भी नहीं हुआ कि मैं उसे कब से देख रहा ह। मुझे स्वयं पर शर्मिन्दगी हुई। मुझसे रहा न गया। मैं भी उसका हाथ बेटाने लगा। कुछ ही दिनों में पूरा ऑफिस कैम्पस साफ हो गया। ऑफिस के प्रत्येक कर्मचारी को सि=ार्थ ने स्वच्छता अभियान में हाथ बेटाने को प्रेरित कर दिया था। इसी का परिणाम था कि पूरे जिले में स्वच्छता अभियान में ऑफिस को प्रथम स्थान मिला था। इतना ही नहीं, अंतर विभागीय खेलकूद प्रतियोगिताओं और सांस्कृतिक कार्यर्मों् में भी ऑफिस का दबदबा रहा।
एक दिन की बात है, मुझे ऑफिस पहचने में कुछ देरी हो गई थी। मैंने देखा सि=ार्थ सभी कर्मचारियों के साथ ऑफिस कैम्पस में खडा किसी चर्चा में व्यस्त है। पास जाने पर मैं भी चर्चा का हिस्सेदार बन गया। सि=ार्थ ने सबके सामने एक प्रस्ताव रखा था कि हम सभी अपने-अपने जन्मदिन पर ऑफिस कैम्पस में एक-एक वृक्ष लगाकर उसकी देखभाल का संकल्प लेंगे। प्रस्ताव आरम्भ में अटपटा जरूर लगा, लेकिन दूरगामी परिणाम को देखते हुए सभी ने सहमति दे दी। इोफाक से वह सि=ार्थ का जन्मदिन था। उसने अपने साथ में लाए एक अशोक का पौट्टाा कैम्पस के बीचों बीच लगा दिया था। फिर क्या हुआ, कुछ ही महीनों में पूरे कैम्पस में विभिन्न प्रकार के पेड लगा दिए गए। यहो तक कि परिवार के किसी प्रियजन के जन्मदिन, विवाह की वर्षगोठ पर तक वृक्षारोपण किया जाने लगा। यह अभियान केवल वृक्ष लगाने तक ही सीमित न रहकर सभी कर्मचारियों का उन वृक्षों से एक आत्मीय लगाव सा हो गया था। अन्य विभागों में भी इस कदम की चर्चा होने लगी। स्टेट लेवल से अट्टिाकारियों ने आकर इस अनूठी पहल को सराहा। उस वर्ष का पर्यावरण संरक्षण पुरस्कार भी कार्यालय को ही प्रदान किया गया।
ऑफिस में कार्यरत स्टाफ, समूचे कैम्पस और विभाग के प्रति आमजन एवं उच्चाट्टिाकारियों की सोच में जो सकारात्मक बदलाव आया था, उसका श्रेय सि=ार्थ को था। वह पूरे तीन साल यहो रहा। ऐसा लगा जैसे उसका और मेरा जन्मों का सम्बन्ट्टा है। ऐसा केवल मैं ही नहीं सोचता अपितु जो कोई भी उससे मिला, हर कोई उसके बारे में यही सोचता है।
जाने से एक दिन पहले मेरे कक्ष में आकर दार्शनिक दृष्टिकोण में विभिन्न मुड्ढों पर चर्चा करने लगा। दर्शन पर उसकी तर्कसम्मत व्याख्या से मैं हतप्रभ था। दुनिया के विभिन्न मतों, ट्टामोङ पर उसकी सटीक व्याख्या को मैं सुनता रहा। ज्ञान के अतुलित भण्डार से युक्त सि=ार्थ किसी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर से कम नहीं लग रहा था। लग रहा था कि बस सुनता जाे। मेरे मन में उसके प्रति अगाट्टा श्र=ा उमड आई। उसके ज्ञान के आगे मैं स्वयं को बौना महसूस कर रहा था। यद्यपि मैं कार्यालय अट्टयक्ष था, लेकिन मेरे से कई गुना बडा उसका कद महसूस हो रहा था। बातों- बातों में कहने लगा, ’’सर, हम सरकारी तंत्र से जुडे लोग सरकार को अपनी छोटी-छोटी मोगों के लिए कोसते रहते हैं। सोचा कभी, हमारे भी कुछ दायित्व हैं। उनसे क्यों विमुख होते हैं। अरे सरकारी कर्मचारी तो सरकार का आईना होते हैं। सरकार की छवि बहुत कुछ उसके कर्मचारी, उच्च अट्टिाकारियों पर निर्भर करती है।‘‘
इतना कहकर वह चुप हो गया, लेकिन मेरे मस्तिष्क में अनेक प्रश्न उत्पन्न कर गया। मैं सोचने को मजबूर था, आखिर सि=ार्थ ठीक ही तो कह रहा था।
कुछ देर कमरे में खामोशी छाई रही। उसने अपनी जेब से एक मुडा हुआ कागज निकाल मेरी तरफ बढा दिया। मैं समझ न सका। ओखों से इशारा कर उसने उसे खोलने को कहा। मैंने खोल कर देखा। मेरे पोवों तले जमीन खिसक गई। यह कागज नहीं नौकरी से उसका त्याग पत्र था। मैं स्तब्ट्टा था। वहो एक गहरा मौन छा चुका था। मेरी उलझाहट को समझ उसने मुझे संयत करते हुए बताया कि यह उसकी पोचवी नौकरी है। इससे पहले वह कई विभागों में अलग-अलग पदों पर कार्य कर चुका है। उसी ने अवगत कराया कि वह शिक्षाशास्त्र में स्नातक और दर्शनशास्त्र में डॉक्टरेट के साथ ही यूनिवर्सिटी का गोल्ड मेडलिस्ट है।
मैं हतप्रभ था। ’इतनी उच्च योग्यता के बावजूद एक मामूली क्लर्क की नौकरी करना बेवकूफी नहीं है क्या?‘ मैं ट्टाीरे से बुदबुदाया था। शायद वह सुन चुका था।
’’सर कार्य करते समय पद कोई मायना नहीं रखता, यह केवल हमारी सोच है। ऑफिस के निम्न से लेकर उच्च पदों पर आसीन लोगों की एक ही सोच होनी चाहिए कि उनके प्रत्येक क्षण का उपयोग कैसे हो, ताकि सौंपे गए दायित्वों को पूर्ण किया जा सके। जिस ऑफिस में ेचे और निम्न पदों को लेकर कसमकश चलती रहेगी, वह कभी तरक्की नहीं कर सकता।‘‘
मैं चुप था।
’’अब क्या करोगे?‘‘ मेरे प्रश्न का जवाब उसके पास तैयार था।
’’मुझे कल ही आदिवासी क्षेत्र में एक प्राइमरी विद्यालय में बतौर शिक्षक ज्वाइन करना है।‘‘ कहते हुए उसने अपना अपॉइन्टमेंट लेटर मेरी तरफ बढा दिया।
मैं कुछ न कह सका। कुछ कहने को था भी नहीं, मैं उसकी सोच के आगे नतमस्तक था।
’’अच्छा सर, सॉरी... भाई साहब! अब चलता ह, जिन्दगी में फिर किसी मोड पर मिलेंगे।‘‘
कहते हुए वह वहो से बाहर निकल गया। उसके चेहरे पर आई चमक और शरीर के फुर्तीलेपन के रहस्य को मैं नहीं समझ सका।
आज रास्ते में कैशियर त्रिवेदी मिला, उसी ने बताया कि सि=ार्थ अपनी तनख्वाह में से केवल आवश्यक जरूरतों को पूरा करने के लिए आवश्यक ट्टानराशि लेता था। शेष राशि अनाथालय और समाजसेवा के निमिा दान में दिया गरता था। उसका कद मेरी नजर में और ेचा हो गया।
अपने कक्ष की ओर आते हुए मेरी नजर सि=ार्थ द्वारा रोपे गए अशोक के पौट्टो पर गई। मानो वह कह रहा हो, भाई साहब! मेरी याद इसी कैम्पस में रची-बसी रहेगी। तुम चाहते हुए भी मुझे नहीं भुला पाओगे और स्वयं से अलग नहीं कर सकोगे। सच में सि=ार्थ को मैं ही क्या, कोई भी न तो भुला पाएगा, ना ही कोई स्वयं से अलग कर पायेगा...। उसका जाना मेरे लिए ही नहीं, इस कार्यालय के लिए भी एक व्यक्तिगत क्षति है...।