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नैना अश्क न हो

विमला नागला
वह मेरे लिए एक अबूझ पहेली बन गई थी। मेरी ओखों के सामने वह कई बार चक्कर लगाती... पर एक अजनबी की तरह। भूले-भटके कभी मेरी नजरें उससे चार हो जाती तो वह मुस्कुरा भर देती।
मेरी बेटी की उम्र की ही थी वह। फिर भी ना जाने क्यों, मुझसे नजरें मिलाने से बचती थी। उसकी इस उपेक्षा के बावजूद भी मैं उसके प्रति स्नेह से सराबोर थी।
आज सुबह उठते ही मन अशांत सा था। मैंने उठते ही टी.वी. ऑन कर दिया। ओह... यहो का दृश्य देखकर मन की व्याकुलता और बढ गई। आतंकवादी हमले के समाचार चल रहे थे। सैनिकों के साथ किए गए बर्बरतापूर्वक घिनौने कृत्य, उनके परिजनों, मासूम बच्चों तथा पत्नियों की चीत्कार के बाद भी टी.वी. पर देशभक्ति की बातें सुन रोंगटे खडे हो गये। मन ही मन उन्हें नमन किया, पर ज्यादा देर तक यह दृश्य देखा नहीं गया।
बाहर बालकनी में आ गई, पर... पर यहो भी दो दिनों से उसका दिखाई न देना, मुझे बेचैन कर रहा था। मेरा उससे कोई दिली रिश्ता ना होने पर भी, मेरी बेटी की छवि उसमें दिखाई पडने से, मैं हमेशा उसे निहारती रहती। वह मेरे सामने वाली छत के दूसरे कोने पर बने आशियाने में रहती थी। उसे मेरे लगातार उस पर टकटकी लगाये रहने का भान था, पर वह हमेशा इसको नजरअंदाज कर अपने में ही मस्त रहती थी।
अजीब सी ही थी, हमेशा मौनी बाबा ही बनी रहती। उसके दो गोल मटोल सुंदर प्यारे-प्यारे बच्चे थे। सुंदरता की मूरत ही थी। हमेशा सजी-संवरी सी रहती थी, पर रहती हमेशा गुमसुम। मुझसे तो क्या, पूरी कॉलोनी में किसी से बातचीत नहीं करती। कभी-कभी भूले-बिसरे वह मेरे सूक्ष्म अवलोकन के प्रत्युार में एक प्यारी से मुस्कान जरूर बिखेर देती। मैं तो उससे ही निहाल हो उठती। मैंने कभी उसके पति या परिजनों को नहीं देखा... हो, यदाकदा एक पुरुष आया करता था। उसे बच्चे मामा-मामा कह चहक उठते। मेरा तो सारा ट्टयान इस अबूझ पहेली पर ही रहता है।
पर यहो भी उसका दो दिन से दिखाई नहीं पडना, मुझे और बेचैन कर रहा था। उसका भाई ही उन मासूम बच्चों की देखभाल कर रहा था। बडा तो स्कूल चला जाता, पर छोटा तो रो-रोकर पागल हो रहा था। वह बेचारा चुप कराने की लाख कोशिश कर रहा था, पर बच्चों को सम्भालने में भला पुरुषों को कहो महारत हासिल होती है। कभी सफल हो जाता तो कभी असफल।
मेरा मन अनजानी आशंका से कोप उठा। डरते-डरते मैंने जोर से आवाज दी... भैया! शायद उसने ट्टयान नहीं दिया, फिर मैं जोर से बोली, भैया! बच्चे को क्यों रुला रहे हो, इसकी मो कहो है? उसने आश्चर्यमिश्रित लाचारी और बेबसी से मेरी ओर देखा और बोला*- आंटी जी! इसकी मो अस्पताल में भर्ती है... दो रोज से। चलो उसने मुझसे बात तो की। मैं उसकी सकारात्मकता से प्रसन्न हुई। होती भी क्यों ना, आखिर मुझे भी तो मनचाही मुराद मिल गई, इस परिवार से बात करने की।
अरे भैया! इसमें परेशान होने की क्या बात है। पडोसी होते ही किसलिए हैं। एक-दूसरे के दुःख-सुख के पूरक ही होते हैं। लाओ मुझे दो बच्चे को और उसने मजबूरीवश बच्चे को मेरी गोद में डाल दिया। बच्चा भी मो का ओचल समझ चुप रह गया।
मैं एक अन्वेषक की भोति खोजी प्रश्न पूछने लगी।
मैंने कहा, ’’आफ साथ कोई महिला नहीं आई?‘‘
’’परिवार में से किसी को बुला लो।‘‘
’’इनके पति कहो है?‘‘
’’भई... हारी-बीमारी में ही परिवार वाले नहीं आये, तो भला किस काम के।‘‘
उसके निरुार मौन को भोपकर मैं सहम गई, मुझे मेरी भूल का अहसास हुआ कि...’’मैं कैसी निरर्थक बातें कर रही ह।‘‘ यदि सम्भव होता, तो क्या यह मेरी राय का इंतजार करते या राय लेकर ही बुलाते। जरूर कोई मजबूरी रही होगी।
मैंने मुन्ने की जिम्मेदारी सहजता से ले ली। उसका भाई अस्पताल चला गया। मैं भी सोचने लगी कि आखिर मजबूरी में इंसान कितने समझौते कर लेता है। कल तक जो परिवार बात तक नहीं करता था, आज वही अनजान हाथों में निश्चिंतता से अपने कलेजे के टुकडे को सौंप रहा है। मैं भी तो आज बहुत वषोङ बाद इतनी खुश हुई। मेरा ओचल ममता से भर उठा। जहो सुबह से मूड खराब था, वहीं आज के सुखद पल हेतु भगवान को बारम्बार ट्टान्यवाद दिया और लग गई नंदलाल की सेवा में। मैं बरसों बाद इतना खुश भी, मेरा भी तो हेसना-मुस्कुराना, समय की गर्द में समा गया। रह गई थी, ओखों में नमी। आज जी भर के हेस रही थी, खिलखिला रही थी। मानो मेरा जीवन २५ बरस पीछे उड गया हो। मेरे बच्चे पुनः बालावतार में लौट आए हों। उनके प्रदेश गमन के बाद तो मैं टूट ही गई थी।
इट्टार बच्चों का मेरे पास होना कॉलोनी में भी कौतूहल का विषय बन गया। कुछ इशारों से पूछ रही थी तो कुछ अजीब-सी दृष्टि से देख रही थी। लो पुष्पा और शीलू तो घर ही आ गई। ’’भाभी यह बच्चे आफ पास कैसे?‘‘ दोनों लगभग एक ही साथ बोल पडी। मेरे उार से पूर्व ही पुष्पा झट से बोल पडी, ’’आज तो महारानी कहो चली गई, देखा उसका मिजाज किसी से बात तक नहीं करती।‘‘ शीलू मह बनाते हुए बोली, ’’अरे यह तो छोडो भाभी। देखती तक नहीं और हो कभी नजरें भी मिल जाए तो झट नजरें फेर लेती है। बडी घमंडी औरत है।‘‘ मैंने उनकी बात काटते हुए कहा, ’’जो भी हो, वह अभी अस्पताल में है। हमारा र्काव्य है उसके मासूमों की हिफाजत करने का।‘‘
मेरा उनके विचारों से सहमत नहीं होना, उन्हें बुरा लगा। बताइए, भला वह भी कितनी देर टिकती मेरे पास। ठीक है, भाभी आप ही सम्भालो इन्हें, कहती हुई वह जल्दी ही चल दी। आज तो मुझे भी कहो समय था फालतू बातों का। मैं यशोदा रानी बनी अपने लालों में मस्त थी। दोनों की अलग-अलग जिम्मेदारी निभाते-निभाते, जो बैरन दिन रात कटे नहीं कटते, उनके सरकने का पता ही नहीं चलता। पता नहीं कैसे समय भागता-सा निकल गया।
अब चार-पोच दिन में वह ठीक होकर घर आ गई। कमजोरी के कारण उससे उठा नहीं जा रहा था। बच्चे अभी भी मेरे ही पास थे। पर देखो तो तीन दिन घर आए हो गए... मैं सोच रही थी, मुझे जरूर बुलाएगी, पर पता नहीं क्यों...। ’मैं भी स्वाभिमानी बिना बुलाए तो क्यों जाे भला उसके घर।‘ आज चौथा दिन था, उसका भाई बच्चों को लेने आया। बच्चों को भारी मन से विदा कर रही थी। तभी उसके भाई ने कहा, ’’आंटी जी! आपको भी सिया बुला रही है। मेरा दिल प्रतीक्षित पूर्णत्व से जोर-जोर से ट्टाडकने लगा। मैं बिजली सी फुर्ती से उसके सामने थी।
जाते ही सिया मेरे गले से लिपट कर जोर-जोर से रोने लगी। एक भयंकर मेघ गर्जन सी गरज बरस कर। अब वह शांत हो गई, परन्तु उसकी ओखें अभी भी रो रही थी। वह नन्हे डरे शावक सी मेरे आगोश में समा गई। मैं भी तो सिहर गई, उसमें मुझे मेरी पुल्लू जो मुझसे कोसों दूर थी, उसका अक्स नजर आने लगा तो भला मेरी ओखें कब तक रुकती। दोनों तरफ से ही गंगा जमुना बहने लगी। थोडा संयत होकर अनायास उसके मह से निकला... मो! क्या मैं आपको मो कह सकती ह। मेरे भाई ने आफ बारे में मुझे सब कुछ बता दिया। आपने मेरे बच्चों पर जो उपकार किया, वह निस्संदेह एक मो ही कर सकती है।
’’हो, हो क्यों नहीं।‘‘ बरबस ही फूट पडे, मेरे शब्द।
सिया बोली, ’’मो शब्द मात्र भावना नहीं, एक सम्पूर्ण अहसास है। आज आपने मेरी मो की कमी पूरी कर दी। वह भी मेरी ओखों में तैरते प्रश्नों के बारे में जान चुकी थी। सहसा बोल उठी वह... मो मुझे पता है, आफ मन में कई प्रश्न उठ रहे होंगे, जैसे... मेरी मो, परिवार, रिश्तेदार... और ना जाने क्या-क्या। आफ और मेरे रिश्ते की सौगन्ट्टा, आज में आपको अपने बारे में सब कुछ बताना चाहगी।
सिया की ओखों में बरसते बादल उठ कर उसे अतीत के सागर में ले जाने लगे। वह अतीत के सागर में खो गई और कहने लगी, मो मैं एक छोटे-से गोव के जमींदार की बेटी ह। हमारा गोव बहुत साट्टाारण सा था। वहो सब गरीब मजदूर तबके के लोग रहते थे। शिक्षा का पूर्णतः अभाव था। पुरुष प्रट्टाान समाज था और वही समाज का सर्वेसर्वा होता था। मात्र उनको ही पढने की अनुमति थी। वह भी सिर्फ हमारे परिवार के पुरुष पढे-लिखे थे। आवागमन के साट्टानों का पूर्णतया अभाव था। बस बैलगाडी, घोडागाडी, साट्टान थे और वह भी सिर्फ हमारे यहो। बाकी लोग पैदल ही जाते थे। कुल मिलाकर २१वीं सदी के भारत में यह गोव १८वीं सदी का कहो तो भी अतिश्योक्ति नहीं थी।
हमारी दिनचर्या भोर के तारे के साथ ही प्रारम्भ हो जाती थी। सूर्योदय तक सोना घर में अपशकुन माना जाता था। मेरी दादी जी व कोई भी घर की दो महिलाऐ प्रातः उठते ही घड्डी ;गेह पीसने के पत्थर के पाटों की बनी हस्त मशीनद्ध पीसती थी। प्रतिदिन १०-१२ किलो आटा पीसा जाता था। उस पीसने के साथ-साथ ही दादीसा के कंठ से सुमट्टाुर ट्टाुन में प्रभातियो ;प्रातःकालीन बेला में गाए जाने वाले भजन, जिनमें ईश्वर को उठाने, मंजन कराने, नहलाने, मिश्री माखन का कलेवा करवाने का वर्णन होता थाद्ध शुरू हो जाती। मजाल है जो साथ बैठी महिलाऐ इसमें साथ न निभाए। पूरे गोव में इसी प्रकार का वातावरण रहता। सभी घरों से प्रभातियों के स्वर, उसके साथ ही गायों, भैंसों की दुहारी की जाती। दुग्ट्टा ट्टाार के समवेत स्वर, घर के महिला-पुरुष साथ में यह भागीदारी निभाते। दूट्टा दोहने में यदि जरा सी भी देर हो जाती तो बछडे रम्भा रम्भा कर घर को ऐसे सिर पर उठा लेते, जैसे बच्चा भूख से व्याकुल होकर र्न्द न करता है।
संयुक्त परिवार था। घर में छोटे बडे ३०-४० सदस्य थे। चार-पोच हाली ग्वाल रहते थे। आपसी स्नेहयुक्त रिश्तों में गजब की ष्णिता थी। दादाजी घर के मुखिया थे। प्रेम, वात्सल्य, ममता की सरल सादी मूरत थे, परन्तु अनुशासन में सख्त थे। आज की विभागीय श्रम व्यवस्था मेरे घर में भी उस समय थी। घर में प्रत्येक विभाग के इंचार्ज अलग थे। गृहकायोङ का निट्टाार्रित समय विभाग-चर्‍ तथा कायोङ के समायोजन में, निष्पादन में पारदर्शिता से कभी घर में कोई नाराजगी नहीं थी। समानता व पक्षपात रहित जीवन से पुरुष तो क्या, कभी कोई महिला भी निराश नहीं थी।
घर में सुबह का खाना कौन-कौन बनाऐगे... शाम की व्यवस्था किसकी होगी, कुऐ से पानी कौन लाएगा? पीने के पानी को गोव में दूसरों को छूने तक की इजाजत नहीं थी। गोव में पीने के पानी वाले कुओं की भी अलग-अलग जाति आट्टाारित व्यवस्था थी। गेह की पिसाई, गायों की दवाई, छाछ बिलौने, उपले बनाना... गायों के चारा-पानी छोटे बच्चों की जिम्मेदारी, सभी पूर्ण रूप से विभाजित थी। महिलाओं में सबसे मुख्य जिम्मेदारी दादीजी पर थी। वह गृहमंत्रालय की खाद्य एवं रसद मंत्री भी थी। सामान समाप्ति के कई दिनों पूर्व घर के मुखिया को नोट करवाना होता कि घर में किस-किस सामान की जरूरत है। एक बार घर में शक्कर कम बची, दादाजी को तो जैसे ही मालूम हुआ, भयंकर रूप से बिगडे थे दादीजी पर। सामान बाहर से आता इसलिए उनका परेशान होना भी तो स्वाभाविक ही था।
महिलाओं के समान पुरुषों के भी काम बेटे हुए थे। जैसे पशु-पक्षियों से लेकर, खेत-खलिहान की बुवाई, मंडी तक माल लाना, घरेलू तथा अन्य सामाजिक जिम्मेदारियों से युक्त पूर्ण संतुलित कार्य विभाजन था। और तो और हम बच्चों के भी काम थे, सुबह चिडया कबूतर को चुग्गा डालना, पालतू जानवरों के बच्चों का दाना-पानी, घर में बने खाने का पहला भाग ठाकुर जी के मंदिर में भोग लगाने ले जाना। वह भी इतना कि पूरा पंडित परिवार भरपेट जीम सके। साथ ही सुबह शाम की आरती का घी-तेल ले जाना... ये सब कुछ। कहने का अर्थ है मेरे घर में पक्षपात रहित वातावरण था। मैंने कभी किसी को लडते-झगडते नहीं देखा। घर में सभी बहुत खुश थे। सभी निरोगी थे, लक्ष्मी जी की असीम कृपा थी। परन्तु सरस्वती जी के भंडार से महिला वर्ग को दूर ही रहने की इजाजत थी। हमें पुस्तकों को छूने की भी आजादी नहीं थी।
इन सब बातों का विरोट्टा करने की हिम्मत आती, उससे पहले ही १० बरस की उम्र में मेरे हाथ पीले कर दिये गये। हम पोच बहनों की शादी थी। ज्यादा स्मृतियो शेष नहीं हैं... पर गोव में खूब ट्टाूम-ट्टाडाके से हमारी बिन्दोरी निकलती। गोव के भोले-भाले लोग हमारे घर के विवाह में पागलों के समान नाचते-गाते, जैसे इंसान के घर नहीं, देवता के घर शादी हो। हम यानि मैं १० बरस की, गंगा ८ की, ६ की रूकमा, ३ की उम्र और ६ महीने की रामघणी थी। सजी-संवरी बैलगाडयों में रोज-रोज नए परिट्टाानों में करीब ५ दिन बिंदोरी निकाली गई। रामघणी की मो यानी रानी काकीसा ही उसे लेकर हमारे साथ बिंदोरी में बैठती थी। ढोल नगाडे, शहनाई की ट्टाुन, मंगल गीतों की स्वर लहरियो, नाचना-गाना, खाना सब मस्त थे। हो, पूरे सात दिन तक गोव का भोज हमारे यहो ही था।
मेरी शादी राजपुरा के रामसिंह से हुई थी। जिसे रामसिंह की बजाय...राम्या के नाम से जाना जाता था। वह आठवीं के छात्र थे। मुझे खुशी जरूर हुई थी कि वह पढाई-लिखाई में होशियार है। सुन्दर और सुशील तथा हमारी तरह उच्च कुलीन जमींदार है। सानंद शादी सम्पन्न हो गई और तीन बरस बाद तेरह को होते ही मेरा गौना भी कर दिया गया। इन्होंने भी हायर सैकेण्डरी प्रथम श्रेणी से उाीर्ण कर ली। इनमें देशभक्ति का जज्बा कूट-कूट कर भरा था। इनको भी मेरी ही तरह छुआछूत, वर्ग भेद, वर्ण भेद, जाति प्रथा, शोषक शोषित के मट्टय का व्यवहार पसन्द नहीं था। विरोट्टा के स्वर उग्र होने पर कई बार इन्हें भी नाराजगी झेलनी पडती। परन्तु इस बार यह अपने दृढ निश्चय से सबके विरोट्टा के बाद भी सेना में भर्ती हो गए।
यह घर से दूर चले गए। मैं ससुराल वालों की सेवा में रह गई। इट्टार संयोग से पहली बार मेरे ससुराल में एक महिला अट्टयापिका की पोस्टिंग भी हो गई। नौकरी वालों का गोव में बडा मान होता था और वह भी महिला तो सम्मान और बढ गया। उन्हें घर में परिवार के सदस्यों के साथ ही रख लिया गया। घर में सभी से उनका बहुत लगाव था। वह मुझे पुत्रीवत् प्यार करती। मेरे विचारों, मेरी बु=मता और मेरी सीखने समझने की उत्कंठा को भोप गई। उन्होंने बहुत मुश्किल से घरवालों को मुझे पोचवी की परीक्षा स्वयंपाठी के रूप में देने हेतु मना लिया। इस कारण उन्हें मेरे परिवार की महिलाओं की भी काफी सुननी पडी। ’’बहनजी या चार आखर पढकर माने मिनक ही न समझे ली। अरे हो... घर का भी कोई कानून कायदे होवे है कि नहीं। घर का कानून कायदे ताक में रख देसी।‘‘
मैडम जी ने खूब समझाया, यह तो अभी भी पढी लिखी है। डेढ हाथ का घघट खींच, पूरे दिन तो आप लोगों की सेवा में लगी रहती है। वैसे घर वालों का भी मुझ पर असीम लाड प्यार बरसता था। वह मेरी सेवा से बहुत सन्तुष्ट थे। पर पढकर मेरे बदल जाने पर आशंकित भी थे। पर बहुत ही हिदायतों के बाद आखिर मान भी गए। मैं भी बहुत खुश थी अब। घर के कामों में और पढने में ज्यादा जी-जान से जुट गई, क्योंकि मेरी आशाओं, अभिलाषाओं को आगे बढने के लिए पर जो मिल गए थे।
टत्र्ेनिंग की समाप्ति पर इनकी पोस्टिंग हो गई। ट्टाीरे-ट्टाीरे मैंने भी स्वयंपाठी के रूप में सैकेण्डरी पास कर ली। चाहती तो सरकारी नौकरी लग जाती, पर घर वालों से किया वादा, उनके मान-सम्मान की खातिर एक पुत्रवट्टाू ही बनी रही। यह देश सेवा में और मैं हमेशा घर सेवा में रत रहते।
एक बार इनकी पोस्टिंग देहरादून में हो गई, इन्हें रहने को आवास भी मिल गया। घर वालों के लाख विरोट्टा के बावजूद भी इस बार तो यह मुझे जिद करके अपने साथ ही ले गए। हरी-भरी वादियों में मो पहली बार खुलकर स्वतंत्र रूप से श्वास ली। पहली बार अपने अनुसार जीवन जीने की साट्टा पूरी हुई। दोनों समान प्रगतिशील विचारट्टाारा के प्राणियों में लेशमात्र भी मतभेद की कोई गुंजाइश नहीं थी। दो वर्ष पलभर में ही बीत गये, परन्तु एक नवजीवन दे गये। बडा बेटा होने वाला था, तभी मैं वापस घर लौटी थी।
थोडे समय ससुराल में रहने के बाद जचकी के लिए मुझे पीहर भेज दिया गया। बडे नेकचार निभाए जाते हमारे यहो। यहो पहला बच्चा भी पीहर में ही होता है। पुत्र रत्न की प्राप्ति पर दोनों घरों में जोरदार जश्न मनाया गया। गरीबों में खैरातें बोटी गई। रिश्तेदारों में बहन-बेटियों को ढेरों उपहार दिये गये। विशाल स्नेहभोज का आयोजन हुआ। सब कुछ बहुत सुखद, बहुत ही... मट्टाुर स्मृतियो मो... बहुत ही मट्टाुर स्मृतियो।
मुझे ससुराल में रहने पर अब ज्यादा सतर्कता बरतनी पडती। कहीं मेरे पढ-लिख लेने से इनके सम्मान को भूलकर भी कभी कोई ठेस ना लगे। न ही परिवार मेरे बाहर रहकर आने पर कोई प्रश्नचिँ लगा बैठे। इन भावनाओं को आहत होने से बचाने के लिए मैं पूरा लम्बा घघट रखती, परम्परागत पोशाक पहनती, चूल्हा- चौका से लेकर गोबर बाशिंदा, खेत खलिहान, पानी लाना... और इन सबसे अलग रोज रात को दादी मो और सासू मो के तेल मालिश करना भी मेरा ही कर्म था। कामदारों की कमी न थी, पर बहू तो मैं ही थी ना।
ट्टाीरे-ट्टाीरे गोव में विकास का आगमन होने लगा। परन्तु विकास भौतिक ही था, वैचारिक नहीं। हमारे यहो टेलीविजन आ गया। समाचार पत्र, विभिन्न पत्र- पत्रिकाऐ भी आने लगी। मैं व्यस्तता में भी अखबार पढना नहीं भूलती। टीवी घर के बच्चे बडे ही देखते। परन्तु दादा सा को समाचार देखने का शौक था। टीवी रसोई की खिडकी से दिखाई देती, मैं खाना बनाते हुए भी समाचार देख लेती थी।
उस दिन मैं बहुत खुश थी, होती भी क्यों ना... अब की बार पूरे दस महीने बाद, यह दो महीने की लम्बी छुड्डियों में गोव आ रहे थे। आज खुशी के मारे मेरे पोव जमीन पर ही नहीं पड रहे थे। इस बार हमने दक्षिण भारत में घूमने का प्रोग्राम भी बनाया। हर पल साथ रहने की कल्पना से ही मन रोमांच से भर उठता।
इनके आते ही मेरे जीवन में एक बहार सी आ जाती, पर यह क्या... मेरी बहार में एकाएक पाला पड गया। मेरी प्यारी खुशी को ग्रहण लग गया। इनका प्रमोशन पछ सेक्टर में कर दिया गया तथा इन्हें तत्काल ज्वाइन करने का आदेश मिला। कल ही इन्हें वापस जाना था। आज की रात हम दोनों ने ओखों ही ओखों में काट दी। ईश्वर से कई बार प्रार्थना कर चुकी थी कि... रवि देव आज उदय ही न हो। भोर ही ना हो... पर यह तो मेरा कोरा वहम ही था। मिलन के पल क्षण-क्षण क्षीणता की ओर बढ कर विरह की बेला की ओर बढ रहे थे। पता नहीं क्यों मैं आज उनके जाने से ज्यादा बेचैन थी। वह भी कश्मीर के हालात को जानकर थोडा उग्र और बेचैन ही थे।
मुझे आगोश में लेते हुए वह प्रेम से कहने लगे... मेरी बात सुनो कल मुझे बॉर्डर पर जाना है। तुम्हारी जिम्मेदारी और बढ गई। तुम एक प्यारे से बच्चे की मो हो तथा कहीं दूसरा भी जल्दी ही तुम्हारी गोद में हो सकता है... और वह हेस पडे।
फिर एकाएक गंभीर हो बोले, ’’यदि मैं शहीद हो जाे, तो...‘‘ उनके कहते ही मैं झटके से उठ बैठी। मेरा हाथ उनके मह पर था, ’’’शुभ शुभ बोलो जी‘‘, मैं बोल पडी। मरेंगे तो, पर हमारे दुश्मन।‘‘
हो हो, मैं तुम्हें विश्वास दिलाता ह कि अंतिम समय तक मैं दुश्मनों का सर्वनाश करूेगा, पर आज प्लीज तुम्हें मुझसे तीन वादे करने पडेंगे। उन्हें इस प्रकार की बातें करते देख... मैं फफक पडी पर फिर थोडा संयत होकर अपने प्रियतम के प्यार के खातिर तीन वादे मानने को वचनब= हो गई।
वह बोले, ’’पहला वादा... यदि मैं आतंकवादी हमले में शहीद हो जाे तो तुम कभी विट्टावा का वेश ;सफेद साडीद्ध ट्टाारण मत करना, क्योंकि शहीद कभी मरता नहीं। वह अजर-अमर होता है और उसकी पत्नी सदा सुहागन।‘‘
’’दूसरा वादा... तुम्हारे प्यारे नैनों में कभी अश्क ;ओसूद्ध न हो, क्योंकि मुझे दुनिया में सबसे ज्यादा आहत तुम्हारी ओखों के ओसू ही करते हैं। तुम्हारी प्यारी मुस्कुराहट मुझमें हमेशा जीने के उत्साह का संचार करती है।‘‘
’’तीसरा.... मेरे बेटे को तुम पढा-लिखाकर सेना में जरूर भेजना। हमारा जन्म देशसेवा के लिए हुआ है। वतन पर मर मिटना ही हमारे जीवन का मुख्य लक्ष्य है।‘‘
मैं वादे कर चुकी थी। उनके सामने न रोने का वचन भी दे चुकी थी। मैंने मो... अपने अश्कों को बहुत काबू में रखा। अकेले में फूट पडी, परन्तु उनके सामने जैसे पत्थर ही हो गई। ओखों की नमी भोप कर स्टेशन पर बोल पडे, ’’नैना अश्क ना हो‘‘। घर के बुजुगोङ के समक्ष वार्तालाप की अनुमति न थी। मात्र नैनों से ही अभिव्यक्ति सम्भव थी, वह भी चोरी छिपे घघट की ओट से। अब नैनों से ओझल होती टत्र्ेन मेरे प्राणाट्टाार को मुझसे दूर ले जा रही थी। मेरे सब्र का बोट्टा टूट गया। अरे हो... हम सब बैलगाडयों में सवार होकर स्टेशन तक छोडने जाते। वह भी सजा-सेवार कर। गोव वाले भी गव की सडक तक पैदल आते। सभी प्रेम से विदा करते थे, भारत माता के लाडले सपूत को।
अब कभी-कभी फोन भी आने लगा था। गोव में हमारे घर में फोन भी आ गया। वह भी इनकी वजह से लगाया, फोन भी ज्यादा आते ही नहीं थे। कभी-कभी ही बात सम्भव हो पाती। वह बताते कि आए दिन आतंकवादी घटनाओं से देश की रक्षा कैसे की जाती है। कभी-कभी तो सुनकर मेरे मह से चीख सी निकल पडती। वह हेस देते और मैं उन्हें ढेर सारी नसीहत दे डालती। उस दिन सुबह ही फोन आया कि आज उनका आतंकवादियों के खिलाफ एक बडा सर्च ऑपरेशन है। टीवी में समाचार आ रहे थे कि आतंकवादियों को मार गिराने पर, सैनिकों में हर्ष की लहर, उट्टार यह जश्न मना रहे थे और इट्टार मैं प्रसव पीडा से मुक्त होकर एक स्वस्थ सुन्दर बच्चे को जन्म दे चुकी थी। जब उन्हें खबर मिली तो वह भी बहुत प्रसन्न हुए और बोले, भारत माता की रक्षा के खातिर एक और सपूत का जन्म हुआ है।
इन सुखद समृतियों में हिलोर लेती हुई, वह एकाएक चीख पडी... थरथर कोपने लगी। मैं भी घबरा गई। मैंने उसे पानी पिलाने की कोशिश की, पर उसने पानी छुआ तक नहीं। मो... लगभग एक माह तक उनका कोई फोन नहीं आया और हम चाह कर भी वहो के हालातों के कारण फोन पर बात नहीं कर पा रहे थे। एक पत्र जरूर आया कि हम बहुत दूर पहाडी क्षेत्र पर हैं, वहो से किसी प्रकार का सम्फ सम्भव नहीं... आते ही स्वयं बात करूेगा। सब अपना ट्टयान रखना। बस यह खत ही उनके आने का इंतजार बढा रहा था। पर मो... वह दिन... वह मनहूस दिन आ गया मेरे जीवन में, जब उनका पार्थिव शरीर तिरंगे में लिपटा आया। पूर्ण सैन्य सम्मान से वीर सपूत की अन्त्येष्टि कर दी गई। मीडिया वालों को घर वाले सपूत की वीरता पर गौरव की बात बता रहे थे। गोव का जर्रा जर्रा रो पडा था। मेरे तो बस प्राण ही नहीं निकले मो। छोटू को भी रस्मोरिवाज के नाम पर श्मशान ले जाया गया। पिता को मुखाग्नि देने और बेचारे ने पहली और अंतिम बार अपने पिता का स्पर्श किया मो।
मो ग्रामीण परिवेश में विट्टावा होना बहुत बडा अपशकुन माना जाता है। मुझे श्वेत वस्त्र थमा दिये गये, जबरन मेरी मोग पौंछ दी गई। मेरी कोच की सुन्दर लाल हरी चूडयो तोड दी गई और जोर-जबरदस्ती मेरे सारे आभूषण उतार दिये, परन्तु मैंने बहुत विरोट्टा किया। मेरे आवास की व्यवस्था घर के पिछवाडे में बने पुराने कमरों में कर दी ताकि मेरे घर के किसी पुरुष पर मेरी मनहूस परछाई ना पड सके। परन्तु मो मैंने लाख जुल्मों के बाद भी पति से किए वादे का मान रखा। पहली बार जीवन में विरोट्टा के स्वर मुखरित हुए, पीहर, ससुराल में सभी के कोप का शिकार हुई। मुझे भड्ढी-भड्ढी गालियो सुननी पडी। जो लोग मुझे अब तक पलकों पर बिठाते थे, वही आज एक पति का साया उठने से मेरे जानी दुश्मन बन गए। मुझ पर चारित्रिक लांछन तक लगाने का प्रयास किया गया। मुझे बेरहमी से वस्त्र परिवर्तन हेतु मजबूर किया गया। अत्यन्त प्रताडना पर मैं शेरनी सी दहाड उठी... नहीं ह, मैं विट्टावा नहीं ह। मेरा पति देशहित में शहीद हुआ, इस कारण उन्हें अजर और अमरत्व मिला। परन्तु बदले में एक शहीद की पत्नी को कुलक्षिणी, बेशर्म, बेहया समझ लिया गया। अब तो हद ही हो गई जब घर के सदस्यों ने यहो तक इल्जाम लगा दिया कि यह “ाृंगार से घर के पुरुषों को रिझाएगी। घर का माहौल खराब हो जायेगा। यह विट्टावा स्त्री घर का सर्वनाश कर देगी।
मो... आप शायद कल्पना भी नहीं कर सकते, उनके जुल्मों की, जो उन्होंने मुझ पर ढाये। सभी की नजरों में मैं संस्कारी बाला एक घोर अपराट्टिानी बन गई। मुझे...मुझे मात्र मैडम जी की सहानुभूति थी। पर वह भी अभी मूकदर्शक, मौनी बाबा सी थी। पारिवारिक परिस्थितियों को देखकर या निजी मामलों में दखलअंदाजी करना शायद उन्हें उचित नहीं लग रहा होगा। उनकी ओखों में जरूर मेरे लिए ममता व करुणा थी।
एक दिन तो सबने सारी हद ही पार कर दी। मेरा घर के कमरे से बाहर निकलना हुआ, उसी समय पिताजी का गोव जाना। बस हो गया अपशकुन, बहुत जंग मची और अंत में मुझे मेरे बच्चों सहित ट्टाक्के मार कर घर से निकाल दिया गया। अब ना कोई मेरा पीहर था, न ससुराल। अनजान डगर थी, घर की बहूरानी आज सडक पर आ गई। निकल पडी अपने कलेजे के टुकडों के साथ... ना कोई घर ना कोई ठिकाना... गोव की सरहद रोते-रोते जैसे-तैसे पार की। तभी मैडम जी भी अपने गोव जाने के बहाने आ गई। उन्होंने बस आते ही मुझे इशारे से बैठने को कह दिया और कुछ दिन अपने पास रखा। यह जो मेरा भाई है ना, यह मेरे काकाजी का बेटा है, जिसने मुझे पढना लिखना सिखाया। उसे खबर कर दी, फिर मो दोनों ने मिलकर यहो शहर में मेरे आवास की व्यवस्था की। यही दोनों मेरे दुःख-सुख के साथी हैं। यह भी परिवार वालों से छुपकर आता है। किसी को कुछ पता नहीं, मैं कहो ह, किस हाल में ह... फिर रो पडती है।
मो! उनकी बरसी थी, इट्टार आतंकवादी हमले के शहीदों की खबर से मैं अवसादग्रस्त हो गई कि समाज में फिर कभी किसी शहीद की पत्नी का हाल मेरे जैसा ना हो और मुझसे लिपट कर रोने लगी। इस दारुण दास्तो से मेरी ओखें भी झरने लगी। पर मैं ऐसी वीरबाला को बेटी के रूप में पाकर निहाल हो उठी। मैंने उसके माथे पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा... प्यारी बिटिया! नैना अश्क ना हो। आज से तुम्हारे पास तुम्हारी मो है और वह स्मृतियो विशेष को याद कर हेस पडी और बच्चे भी मेरी गोद में समा गये।