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गोल्डन जुबिली

डॉ. क्षमा चतुर्वेदी
अभी हाल ही में अपनी भाभी जया की शादी की पचासवीं वर्षगोठ में शामिल होकर लौटी है वीणा। एक सप्ताह हो गया पर लग रहा है जैसे अभी झोसी में ही है। भैया, भाभी ने कितने भव्य तरीके से सारा आयोजन किया था। एक-एक रस्म शादी की दोबारा निभाई गई। भाभी को तो इतना सजा दिया गया था कि पहचान में ही नहीं आ रही थीं।
’’वाह! भाभी इस खूबसूरत लहंगे में तो आप जैसे नई नवेली दुल्हन ही लग रही हो, लग ही नहीं रहा है कि आपकी शादी के पचास साल हो गए हैं।‘‘ उसके मह से निकल ही गया था और भाभी सचमुच शर्मा गई थीं, भैया खूब हेसे थे।
’’वीणा, बात तो तू ठीक कह रही है।‘‘
फिर तो भैया के साथ सब लोग ही हेस पडे थे।
सारी तैयारियो विवाह जैसी ही तो थी, रिश्तेदार भी खूब इकद्दे हो गए थे। भाई, भतीजे, चाचा, ता, सबके बच्चे। उस विशाल बगीचे के बीचों-बीच एक छोटा-सा मण्डप बना दिया गया था और उसे खूब सजाया गया था।
महिलाऐ दुल्हन की तरफ से और पुरुष दूल्हे की तरफ से बराती बने थे। खूब जोश-खरोश के साथ जयमाला कराई गई।
और तो और बडे भैया ने पंडित के मंत्र भी पढ दिए थे। इट्टार बच्चा पार्टी कभी जूते छिपाने की बात करती तो कभी नेग मोगने की, नाच-गाने चल ही रहे थे।
फिर पंडाल में ही भोजन का प्रबन्ट्टा था।
खाने के बाद फिर ढोलक की थाप के साथ गाने-बजाने होने लगे। करीब पूरा दिन ही उत्सव की तरह बीता था। इसी बीच भतीजी प्रीति ने आकर एलान कर दिया।
’’अरे अब तो वीणा बुआ की भी दो महीने बाद शादी की गोल्डन जुबिली होगी, तो सब उसका इंतजार करो।‘‘
’’अरे वाह!‘‘ अब तो सब लोग वीणा को बट्टााई देने लगे थे।
’’अरे! सुहास जीजाजी कहो हो, अब बच नहीं सकते, शानदार फंक्शन होगा।‘‘
फिर तो सुहास की भी खूब खिंचाई हुई।
पर वीणा तो सोच में ही पड गई थी। यह सच था कि दो महीने बाद उसकी शादी की वर्षगोठ थी, पचास वर्ष हो जाऐगे। पर बैंगलोर में अकेले पति-पत्नी हैं और अभी-अभी ही वहो शिय्ट हुए हैं। ज्यादा परिचित लोग वहो है नहीं, बेटा-बहू दिल्ली में है। कहो क्या फंक्शन मनाऐगे।
पहली बार लगा कि कानपुर का घर छोडकर बैंगलोर में शिय्ट होना एक गलत निर्णय रहा। वो तो बेटा रितेश ही पीछे पडा था कि मो हम लोग यहो बैंगलोर में बडा-सा य्लेट ले रहे हैं, अतः आप भी यहो आ जाओ सब लोग साथ रह लेंगे, वहो अकेले कानपुर में।‘‘
अरे अकेले कहो थे कानपुर में, इतने रिश्तेदार, मिलने वाले और फिर झोसी, लखन सब शहर पास ही थे। सारे रिश्तेदार पास ही थे और फिर रितेश और बहू रिचा दोनों तो प्रतिनियुक्ति पर दिल्ली चले गए, वहो एक बडे से अस्पताल में अच्छा ऑफर मिला था।
बस बैंगलोर में वह और सुहास रह गए, अकेले उस बडे से य्लेट में। पोता वैभव भी अपनी पढाई के सिलसिले में केलीफोर्निया में है। पेड के नीचे पडी कुर्सी पर बैठी वीणा एक गहरी सोच में डूब गई थी। उत्सव का सारा उत्साह ही जैसे फीका पड गया था। तभी प्रीति भी पास आकर बैठ गई।
’’क्या सोच रही हो बुआ! अरे चिंता मत करो, हम सब लोग मिलकर खूब ठाठ से मनाऐगे आपकी शादी की गोल्डन जुबिली और आप अभी बैंगलोर जा भी क्यों रही हो, यहीं रुक जाओ। फिर सब यहीं आ जाऐगे, सारे इंतजाम पापा करवा ही देंगे।‘‘
प्रीति की बात सुनकर फीकी सी हेसी हेस दी थी वीणा। सोच रही थी कि यह कैसे सम्भव है। अगले ही दिन तो लौटना था, टिकट पहले से ही बुक थे।
अब यहो आए हुए आठ दिन तो हो गए हैं, अभी भी वह उसी सोच में डूबी है।
सबको पता है कि इस बार उसकी शादी के पचास वर्ष पूरे हो जाऐगे। पर बेटे बहू को ही पता नहीं है। दोनों व्यस्त डॉक्टर हैं। समय ही कहो है उनके पास, यह सब सोचने का।
सोचते हुए फिर से सिरदर्द होने लगा था।
तभी सुहास ने पूछा था, ’’अरे खिडकी के पार टकटकी लगाए क्या सोच रही हो। देख रहा ह कि जब से झोसी से लौटी हो, खोई-खोई सी हो, आखिर क्या बात है? कुछ तो है।‘‘
’’हो है।‘‘ वीणा के मह से निकल ही गया था।
’’वहो देखा था, विजय भैया और जया भाभी की शादी की वर्षगोठ कितने खूबसूरत ढंग से मनाई गई और एक हम लोग हैं। हमारे तो बेटा बहू तक को पता नहीं है कि दो महीने बाद हमारी शादी की गोल्डन जुबिली होगी।‘‘
’’अरे तो फोन करके बता दो न उन्हें, क्या प्रॉब्लम है।‘‘
सुहास अब भी समझ नहीं पा रहे थे कि इसमें हैरानी की बात क्या है। पर वीणा और झल्ला गई थी।
’’अच्छा तो फोन करके उन्हें कहें कि हमारी शादी की गोल्डन जुबिली है, तुम लोग आ जाओ। यह जानते हुए कि फोन तक करने की फुर्सत नहीं है उन्हें। आजकल किसी खास सर्जरी के सिलसिले में वहो है, विदेश से भी कई विशेषज्ञ बुलाए गए हैं।‘‘
’’अरे, जब सब पता है तो क्यों परेशान हो। भई शादी की वर्षगोठ ही तो मनानी है, हम दोनों कहीं बाहर जाने का प्रोग्राम बना लेते हैं। बताओ कहो चलना है, अभी तो कहीं घूमे भी नहीं हैं। तो टिी, कोडई कनाल, मुठार किसी भी हिल स्टेशन पर चलेंगे।‘‘
’’नहीं।‘‘ वीणा ने सपाट सा उार दे दिया था।
’’मन तो मेरा है कि हमारी शादी का यह उत्सव भी खास हो, जया भाभी की तरह हम लग भी अपनी शादी की यादें ताजा करें। अरे गोल्डन जुबिली के साथ डायमण्ड जुबिली तक तो पता नहीं जिंदा भी रहेंगे या नहीं।‘‘
उसका गला रुेट्टा गया था।
’’वीणा तुम भी क्या बेकार की बातें लेकर बैठ जाती हो। भई उत्सव होता है मन का, रोज मनाओ न। कौन मना करता है और फिर व्यक्ति को उसे जो भी मिला है, उससे संतुष्ट रहना सीखना चाहिए। इतनी उम्र के बाद भी तुम यही नहीं सीख पाई और दूसरों से तुलना करके दुःखी होती रहती हो।‘‘
वीणा फिर चुप रह गई थी। सोच रही थी कि शायद सुहास ठीक ही कह रहे हैं। बहुत कुछ मिला भी तो है उसे। यहीं बैंगलोर में ही मना लेंगे शादी की वर्षगोठ। मैसूर पास ही है, कार से ही चले जाऐगे।
’’चलो, अब तुम चाय बनाओ और कुछ नाश्ता भी, मुझे तो भूख लग रही है।‘‘
सुहास ने फिर टोका तो वीणा की विचार तंध टूटी थी। बाहर दरवाजे पर बाई भी घंटी बजा रही थी।
प्रीति ने तो मजाक किया था, उसने बेकार सारी बातों को इतनी गंभीरता से ले लिया। सोचते हुए वह दरवाजा खोलकर रसोईघर में आ गई थी।
बाई को कुछ निर्देश देकर नाश्ते की तैयारी करने लगी। फिर याद आया कि झोसी के पास तो सभी रिश्तेदार रहते हैं तो इकद्दे हो गए थे। यहो बैंगलोर तक तो कोई आएगा भी नहीं और अब उसकी गोल्डन जुबिली भी किसे याद रहेगी। बहुत हुआ तो भैया-भाभी फोन पर बट्टााई दे देंगे या बहिन नयना का लखन से फोन आ जाएगा।
फिर उसे बेटे-बहू की याद आई। हो, फोन तो वे लोग भी करेंगे, पर उन्हें यह तो याद नहीं है न कि यह साल खास है, गोल्डन जुबिली वर्ष है।
छोडो, क्या फर्क पडता है। सुहास शायद ठीक ही कहते हैं कि इंसान को रोज ही ऐसे जीना चाहिए जैसे यही दिन खास है।
सारे कामकाज के बीच वह अपनी उदासी भी भूल गई थी। थोडा बहुत अब अपनी बिल्डिंग के और लोगों से भी परिचय हो गया था तो समय ठीक कटने लगा। शाम को नीचे पार्क में सब लोग इकद्दे होते, गपशप होती और अकेलापन दूर हो जाता।
’’हो, तो भई क्या प्रोग्राम है? कहो चलना है?‘‘
’’चलना, मतलब?‘‘
’’अरे पहले तो शादी की वर्षगोठ को लेकर इतनी परेशान थी और अब खुद ही भूल गई।‘‘
’’हो तो...‘‘
’’तो क्या, चाहे तो दुर्ग चलें। अच्छी घूमने लायक जगह है, होटल बुक करा लेते हैं। तुम नई-नवेली दुल्हन की तरह सज लेना।‘‘
’’अरे हटो, तुम्हें भी मजाक सूजता है। पर हो दुर्ग तो चल सकते हैं।‘‘
तभी दरवाजे की घंटी बजी और बाहर जा रही नौकरानी ने ही दरवाजा खोला था।
’’अरे, बडी आवाजें आ रही थीं। कहो जाने का प्रोग्राम बन रहा है, हम तो यहो आए हैं।‘‘
रितेश, रिचा के साथ वैभव को भी देखकर सुखद आश्चर्य में डूब गए थे सुहास और वीणा।
’’अरे व्हॉट ए प्लेजेंट सरप्राइज, बिना खबर किए अचानक और विभु तू, तू कब आया अमेरिका से...‘‘
सुहास ने वैभव को गले से लगा लिया था। रितेश और रिचा पैर छूने के लिए नीचे झुके।
’’मो, आप लोगों ने बताया नहीं और हम लोग इतने व्यस्त हो गए थे कि भूल ही गए थे कि इस बार आपकी शादी की गोल्डन जुबिली है। वह तो वैभव ने बताया और कहा कि वह भी पहच रहा है।‘‘
’’पर तुम लोगों ने बताया क्यों नहीं?‘‘
’’अरे आप लोगों को सरप्राइज देना था न इसलिए। अब तैयार हो जाओ, कल के बडे सरप्राइज के लिए।‘‘
वैभव ने जैसे एलान कर दिया था।
’’अरे तो क्या है सरप्राइज!‘‘
’’दादाजी, सरप्राइज क्या बताया जाता है और हो, दादी अब बताओ कि अभी आप क्या खिलाऐगी?‘‘
’’अरे बेटा, जो तू कहेगा वही।‘‘ कहते हुए वीणा रसोई में घुस गई थी। अचानक जैसे ढेर सी फुर्ती आ गई हो। मेहमानों को देखकर नौकरानी भी अंदर आ गई थी।
फिर सामान रखकर रिचा भी किचन में आ गई।
अब तो जैसे घर गुलजार हो गया था।
कुछ ही देर में मेज पर कई व्यंजन सज गए थे। पर रिचा और रितेश को आपस में खुसर-फुसर करते देख वीणा पूछे बिना नहीं रह पाई थी। ’’भई, क्या बात है, हम लोगों को देखते ही तुम लोग चुप हो जाते हो।‘‘
’’सरप्राइज देना है न दादी।‘‘ वैभव ने फिर से चुटकी ली थी।
फिर सुबह उठते ही बट्टााई के साथ रिचा ने कहा था, ’’मो, नाश्ता करके आप तैयार हो जाओ। आपको ब्यूटी पार्लर जाना है।‘‘
’’पर इतने काम...‘‘
’’अरे आज आपकी शादी की वर्षगोठ है तो आज तो पूरा रिलेक्स है, आफ लिए। हो, आपको वहो छोडकर हमें दूसरी जगह भी जाना है।‘‘
’’पर।‘‘
’’पर वर कुछ नहीं। मैंने वहो पार्लर में बात कर ली है, वह मेरी परिचित ही है। आपको अच्छी तरह तैयार करेगी और थोडा टाईम भी लगेगा। यह सेट भी रख लो और साडी मैंने आफ बैग में डाल दी है। बस आपको पूरी तरह तैयार होकर ही वहो से निकलना है। हम आपको ले लेंगे।‘‘
’’तो क्या होटल बुक हो गया है।‘‘ वीणा पूछे बिना नहीं रह पाई थी।
’’हो, यही समझ लो, बस सीट्टो होटल चलेंगे।‘‘
रितेश ने फिर रिचा को आगे कुछ कहने से रोक दिया था। बस यही कहा था, ’’पापा को मैं अपने साथ ले जाेगा।‘‘
फिर रिचा ने वीणा को एक बडे से ब्यूटी पार्लर में उतार दिया था और ब्यूटीशियन उसे अंदर ले गइङ।
हेयर डत्र्ेसिंग, फेशियल से लेकर सारे मेकअप की तैयारी थी। करीब दो-तीन घंटे बाद जब साडी पहनाकर वीणा को शीशे के सामने खडा किया तो जैसे वह अपने आपको ही नहीं पहचान पा रही थी।
उम्र जैसे दस साल कम हो गई थी। सुन्दर कांजीवरम की गुलाबी साडी, मोतियों का सेट और फूलों की सजावट में वह सचमुच नई दुल्हन ही लग रही थी।
रिचा ठीक समय ही उसे लेने आ गई थी।
’’अब कहो चलना है?‘‘ वीणा पूछ रही थी।
’’बस देखते जाओ मो‘‘ रिचा ने हेसकर कहा और कार स्टार्ट कर दी।
जब बडे से गार्डन होटल में कार रुकी तो वीणा दंग रह गई। यहो तो जया भाभी, विजय भैया, नयना, प्रीति के साथ बहुत से य्लेट के पडौसी भी जमा थे।
बट्टााई, कांग्रेच्युलेशन्स...फूलमाला और गुलदस्तों के साथ आवाजें गज रही थी और जब सुहास पास आकर खडे हुए तो शानदार र्‍ीम कलर के कुर्ते पजामे में उनकी भी पर्सनेलिटी अलग ही लग रही थी।’’ये सब लोग यहो कब आए?‘‘ वीणा के साथ सुहास भी चकित थे।
’’दादाजी, दादी यही तो सरप्राइज था। आपने नहीं बताया पर हमें तो जश्न शानदार तरीके से मनाना था न!‘‘
वैभव कहे जा रहा था और उसका कैमरा भी ऑन था। उट्टार, विजय भैया कह रहे थे कि हमें भी इन लोगों ने कुछ भी कहने से रोक दिया था और जान-बूझकर कल होटल में ही ठहराया।
’’बस, अब जयमाला की तैयारी करो।‘‘
वैभव की आवाज सुनी तो सबके चेहरे पर मुस्कान आ गई थी। उट्टार सारे जश्न के बीच वीणा यही सोच रही थी कि वाकई कितना बडा सरप्राइज दिया है बच्चों ने उसे। वह बेकार सोच रही थी कि इस सुदूर प्रांत में वे लोग अकेले हैं।