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तीन कविताऐ

शिल्पी कुमारी
;१द्ध
माता-पिता
सुनो बच्चों नयी डगर पर
सदा सम्भल के चलना तुम
उन्नति कर लो चाहें जितनी
कभी अभिमान ना करना तुम
मम्मी ने पाला पोसा तुमको
पापा ने जीवन सम्भाला है
ना भूलो कभी उनकी कृपा को
हर सुख तुमने पाया है
छोव में जब हम सोते थे
ट्टाूप में मेहनत वो करते थे
पढाने लिखाने को हमें सदा वो
नेक सलाह ही दिया करते थे
सुनो मेरे प्यारे भाई बहिनों
माता-पिता का सम्मान करो
हो ईश्वर को जपने से पहले
सदा उनका ट्टयान करो।
;२द्ध
गुरु की महिमा
सूरज की रोशनी जैसे गगन में
चोद खूबसूरत है जैसे तारों के चमन में
चमके हम वैसे इस जहो में
यही स्वप्न मेरे गुरु के मन में।
ज्ञान का दीप हरेक मन में जले
अज्ञान का तमस हट ज्ञान मिले
सबको देते हैं जीवन का ज्ञान
मिट जाय चारों तरफ अज्ञान।
राष्टत्र् के निर्माता हैं जो
भाग्य के विट्टााता है वो
समाज करता इनकी पूजा
इन सा नहीं कोई दूजा।
इंसानियत की मिसाल
देवता स्वरूप हैं वो
सदा हमें मिले उन्नति बस
यही चाहते हैं वो।
;३द्ध
मेरा नटखट भाई
सबसे अच्छा मेरा भाई
मुझे बहुत भाता है
सुख-दुःख में साथ निभाता है।
कई सारे वो खेल दिखाता है
सबका राज दुलारा है
कितना भोला भाला है।
शैतानी करे कान्हा जैसी
नटखट मुझे सताता है
पर मुझे बहुत भाता है
रेशम के ट्टाागे से बेट्टाा
हमारा प्यार भरा रिश्ता
मुझे अच्छा लगता है।
आये कोई मुश्किल
मेरे साथ खडा रहता है
मुझे बहुत अच्छा लगता है।