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पांच कविताऐ

न्नियंका खेराडया
;१द्ध
ये उजाले तुम्हारे हैं
बने-बनाये रास्तों पे
कदमों के निशां रहा नहीं करते
जो खुद से जीता करते हैं
वो कभी फिर हारा नहीं करते !
मंजिल तुम्हें नचाती है या तुम मंजिल को
शायद तुम तैयार नहीं पसंदीदा मंजिल को
ठान लो तुम कुछ पाने को फिर देखो
सूरज उगते ही अस्त हुआ नहीं करते !
जो खुद से जीता करते हैं
वो कभी फिर हारा नहीं करते।
जज्बात तुम्हारे हैं या तुम जज्बातों के हो चुके
ये उजाले तुम्हारे हैं या तुम रातों के हो चुके
जो खुद से उम्मीद रखा करते हैं
वो खाली कभी फिर रहा नहीं करते
जो खुद से जीता करते हैं
वो कभी फिर हारा नहीं करते।
;२द्ध
हे जगजननी
मुझे सब्र दे या दे दे कोई अब्र
दे कोई साख या बना दे मुझे राख
तेरी मर्जी बिना मेरा कुछ भी न हो
तू बुला ले मुझे, मैं चली आेगी।
दे मुझको भक्ति या दे दे मुझको शक्ति
दे दिल बडा या बना दे मुझे बडा
जमाने की रीत से नींद मेरी उड गई
तू सुला दे मुझे, मैं सो जाेगी।
तेरी मर्जी से ही तो जिन्दा ह मैं
तेरी मर्जी से ही तो उम्दा ह मैं
वरना पग-पग मौत बुलाती है मुझे
तू सम्भाले मुझे, मैं सम्भल जाेगी।
हे जगजननी, हे जगदम्बे मो
तू कर दे करम मुझ पर अम्बे मो
तूने जैसा बनाया, मैं बनकर रह
तू सेवारे मुझे, मैं सेवर जाेगी।
खेलने को तो हर कोई खेला है मुझसे
कोई हिला भी न पाया मुझे, बिना पूछे तुझसे
तूने मुझमें रखा है वो उजाला तेरा
तू जगा दे मुझे, मैं जाग जाेगी।
;३द्ध
अच्छा नहीं लगता
ना जाने मुझे आजकल मेरा लिखा अच्छा नहीं लगता,
आपकी रूह को ना छूए ऐसा लिखा अच्छा नहीं लगता।
आपकी तरफ से भी कोई तो हो हाथ बढाई,
हर तरफ से मुझे मेरा सिला अच्छा नहीं लगता।
जिस तरह मेरी मो ने सूखे में सुलाया था
मेरी औलाद का भी मुझे बिस्तर गीला अच्छा नहीं लगता। दुनिया जिस चलन में है मैं क्य चल वो
मुझे मेरा दामन जरा सा भी मैला अच्छा नहीं लगता।
खुद के किये करम पे दे खुदा कोई इनाम
वो तो मैं ले ल मगर खैरात का मिला अच्छा नहीं लगता। बेटी की खिलखिलाहट से घर में बहार है,
बेटी ना हो तो कोई फूल भी खिला, अच्छा नहीं लगता।
;४द्ध
तार-तार हो गये
जो खता की ही नहीं उसके भी कसूरवार हो गये
दिल के ट्टाागे बेट्टो थे उनसे, सब तार-तार हो गये।
वो तो हमसे क्या बिछडे होंगे कभी
हम खुद से इतना बिछडे हैं कि ओसू जार-जार हो गये।
इश्क की इक ही आदत ने उनके सामने झुकाया
इतने झुके कि मिड्डी से सराबोर हो गये।
मिड्डी की फितरत मुझको मुझसे अच्छी लगती है
उडे तो कभी नहीं, बिखरे तो बिखरते बार-बार गये।
ऐ दोस्त एक तू तो वफा करता जाता दिल के साथ
उसने भी छीना, तूने भी लूटा ये जख्म वक्त की मार हो गये।
;५द्ध
मस्त रहने दो
तुझसे मोहब्बत है ये शोर कायनात तक पहचा है
मैंने ही कहा खुद को, थोडी शांति रहने दो
उसे उसके हाल में मस्त रहने दो।
जिद पे नहीं है दिल इस बात पर खैरियत है
सबपे करम है तेरा मुझ वास्ते गैरियत है।
ना हो दिल में कोई जुमला, खुदा र्‍ांति रहने दो
उसे उसके हाल में मस्त रहने दो।
जा रहा है तो जाने दो चैन अमन वास्ते
मोहब्बत ठुकराई है उसे आना है नमन वास्ते
मेरे बगैर वो खुश है, खुदा ये भ्रांति रहने दो
उसे उसके हाल में मस्त रहने दो।