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पाँच कविताऐ

हर्षा ’अनुभूति‘
(1)
आस
आस की गर्भ में
न जाने कब...
एक नन्हा स्वप्न भ्रूण
पलने लगता है।
आस ही सींचती है उसे
अपनी र्काव्यनिष्ठ,
समर्पण-भावनाओं से।
कभी बिखर जाने का डर...
असह्य वेदनाओं,
अनंत पीडाओं का वमन।
कभी सहेज पाने की खुशी !
ट्टौर्य और करुणा - कलियों से
महकता मन-उपवन।
असीम सम्भावनाओं से
गुजरता हुआ शनैः शनैः
अभीष्ट रूप में
ढलना चाहता है।
जन्म लेने को आतुर...
एक स्वस्थ, परिपक्व शिशु बन
मूर्त हो जाना चाहता है।
प्रसवोपरांत,
शिशु-किलकारी
आस की पूर्णता का
यथार्थ यशोगान है।
और एक प्रत्यक्ष
पूर्ण मूार् आत्म-अनुभूति।
(2)
जन्मदिन
आज तुम्हारा जन्मदिन है !
ठीक एक बरस पहले,
आज ही के दिन...
तुम कोख से निकल कर
मेरे सीने से लगी थीं।
तुम्हारी किलकारियो
मेरे क्तदय को मातृत्व-सुरों से
गजायमान कर रही थीं।
तुम ही नहीं जन्मी थीं तब...
तुमने मुझे भी जन्म दिया,
मैं मो बनी!
तुमने जन्म दिया...
तुम्हें अपनी बाहों में सिमटाये,
पितृ-वृक्ष की सुकूंभरी छोव देने वाले
अपने पिता को।
दादी की कहानियो...
दादी बन जाने के सुख को
लाड-प्यार से तुम्हें सुना रही थी।
हाथी-घोडा बन दादा की पीठ
अपने नन्हे सवार की उछल-कूद की
प्रतीक्षा में उतावली हुई जा रही थी।
नाना-नानी भी तुम्हारी छवि में
एक बार फिर...
मानो मेरे ही नन्हे रूप को निहारकर
संतृप्त हो रहे थे।
इतना ही नहीं,
चाचा, बुआ, मामा, मासी...
और तुमसे जुडे हर रिश्ते को
जन्म दिया था तुमने !
और आज तुम्हारा जन्मदिन है!
तुम्हारा ही नहीं...
उन सब रिश्तों का भी जन्मदिन है,
जिन्हें अस्तित्व मिला तुम्हारे ही जन्म से।
आज तुम वर्षगोठ मनाओ !
संग अपने, उन सब रिश्तों की भी,
जो तुम्हारे इस जहो में आने से तुम्हें मिले हैं
और साथ तुम्हारे वे भी बडे हो रहे हैं।
हो, तुम्हारे स्नेह से परिपक्व हो रहे हैं।
आज तुम्हें दुलार और
ढेरों शुभाशीष मिल रहे हैं!
तुम भी उन सब रिश्तों का
अभिनंदन करो...
अंतस से अशेष शुभकामनाऐ और
अनंत आभार की अभिव्यक्ति दो।
जो सिर्फ तुम्हारे ’होने‘ से अभिभूत हैं !
(3)
रूपान्तरण
नई थी जगह,
था नया दिन, नया सवेरा,
नई थी फिजा,
था नया-नया अपना बसेरा।
चमकीली ओखों में
मचल रहा था मृदुल सपना,
अपनी ही माटी में
रच-बस गया जीवन अपना।
चले जब किन्तु गर्म हवाओं के बवंडर,
तडत प्रहार से हुई छिन्न-भिन्न संवेदना।
यह किनारा नहीं, था छल।
एकबारगी आहों में भर उठा उद्वेलन,
भीतर के शल्य कर रहे थे...
दूर-दिगंत तक विस्थापन।
ट्टाूल-ट्टाूसरित होकर भी
फिर समेटना है खुद को...
माटी में गिर कर ही
मिलने हैं फिर -
जुडाव के, उठ खडे होने के हौंसले।
लाज कैसी ?
अगर चन्द लोगों के
निर्मम प्रतिकार ने
अनावृा कर दिये हैं
मेरी कोमल संवेदनाओं के
निर्दोष सपने।
या फिर उन्हीं की संकुचित सोच...
लेकिन अब...
और सहज हो गई ह मैं।
खुद अपना आलम्बन बन,
नई चुनौतियों के अनुरूप,
ढालती खुद को।
(4)
सोच
कितनी रातें...
जागती रही,
कितनी...
जागती रहगी
बूझने अनकहे,
अनसुने अहसास,
मूक रह गई
मन की बात,
ढढने अनुारित
प्रश्नों के जवाब -
एक बार फिर जागी
मैं पूरी रात।
(5)
मेरी काव्य-कामना
जीवन-ताल में,
हर कोई चाहता है
लहरों पर तैरना।
लेकिन मैं,
सिर्फ और सिर्फ
डूबना।
गहन अनुभूतियों के
अतल में स्व-जीवन की !
और पुनः तैरकर
सतह पर आे,
मैं होकर अलंकृत
अभिव्यक्ति-रत्नों से !
रत्न जो,
रहते हैं छिपे,
गर्भ में
गहन अनुभूतियों के।
मिलते हैं केवल
डूबकर ही जीवन में !
मेरी निजी
गहनानुभूति के
अभिव्यक्ति-रत्नों की
आभा में,
किन्तु, देख पाये सब
अपने-अपने
जीवन के
अबूझ अनुभवों के
अनुारित प्रश्नों के
संभावित समाट्टाानों
के बिम्ब !