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चार कविताऐ

दशरथ कुमार सोलंकी
काव्य-सर्जना
दशरथ कुमार सोलंकी
चार कविताऐ
;१द्ध
पूजा की रीत
बचपन में
मो द्वारा पूजा की रीत
मुझे बहुत भाती थी
आज भी याद हैं वे शब्द
जो पूजा के समय रोज उचारती थी मो
’’पूरे मुल्क का भला कर
मेरा भी भला करना
हे प्रभु‘‘ ......
मो ने नहीं पढे थे शास्त्र,
सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, निष्काम कर्म का
नहीं किया कभी पारायण,
’’वसुट्टौव कुटुम्बकम्‘‘ का सि=ान्त
नहीं बोचा उसने कभी,
बु= के अपरिग्रह का उपदेश
और सत्य के बडे-बडे आदशोङ का
कभी नहीं किया पाठ
तथापि
मो हर आदर्श और सि=ान्त में सि=हस्त थी
हर विचार को जीती थी
अपनी दिनचर्या में हर समय
हर जगह
ओगन में, रसोई में, पूजा में.....
;२द्ध
काश !
बचपन में
जब खो जाती थी कोई चीज
या भूल जाते थे रखकर
नहीं मिलती थी
भरसक कोशिशों के बाद भी
तब मो अपने पल्लू में गोठ लगाकर
बोट्टा देती थी चोर को
फिर तो मिनटों में मिल जाती थी
खोई हुई वह चीज
अब तो
कितना कुछ खो गया लगता है
चैन-सुकून-नींद-सपने-अपने
और भी बहुत कुछ
काश
मो अब भी होती
तो लगा देती गोठ
बोट्टा देती चोर को
चंद मिनटों में मिल जाते
खोए हुए ये सभी कुछ।
;३द्ध
श्रेय और प्रेय
श्रेय व प्रेय
अपनी ट्टवनिगत समानता के बावजूद
कितने भिन्न होते हैं
मनुष्य की भावना में
प्राप्ति की इच्छा, आकांक्षा व उत्कंठा को लेकर
शुचिता, शाश्वतता, श्र=ा एवं
सत्यम् शिवम् सुन्दरम् के शिखर स्वरूप सा है श्रेय
जो साट्टाना के सर्वोच्च साट्टान से
बनता है साट्टय, प्राप्य, लभ्य...
प्रेय संकुचन है श्र=ा का
भावों का भंगुरण है वह
स्वार्थ का प्रस्फुटन, कि वह रहे बस मेरा ही
व्याप्ति हो बस स्वयं तक ही
कि वह न हो प्राप्य किसी और को
कभी भी, कहीं भी, किसी भी हाल में
यदि श्रेय ही बन जाए प्रेय
राट्टाा के लिए ज्यों कान्हा
तो खिल उठे सौन्दर्य समष्टि का
हर पुरुष कान्हा
हर स्त्री राट्टाा बन जाए
फिर कुछ न रहे अप्राप्य किसी को भी।
;४द्ध
न्नेम और नवसृजन
विशाल वृक्षों की ेचाई पर
लहलहाते, इतराते हरे पो
अन्ततः हो जाते हैं पीले जर्द
और पृथक हो जाते हैं अपनी देह से
बिछ जाते हैं ट्टारती पर
फडफडाते हैं कुछ दिन
राहगीर के पैरों तले कुचले जाते हैं
टुकडे-टुकडे हो विलीन हो जाते हैं
सृष्टि के अथाह अस्तित्व में
फूटती हैं नव-कोंपलें
उन जगहों को भरती हैं पुनः
हरियाली फिर दे जाती है वृक्ष को
पुरजोर सौन्दर्य और यौवन
उन पीले पाों ने सिखाया है मुझे
जीवन की क्षणभंगुरता के साथ
नश्वरता का पाठ
समर्पण-त्याग को निस्पृहता से आत्मसात् कर
प्रेम और नवसृजन का पाठ।