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कमलेश्वर के उपन्यासों में नारी जीवन का यथार्थ

अनिता प्रजापत
स्वातंत्र्योत्तर काल के प्रमुख कलाकारों में विशिष्ट कमलेश्वर ने साहित्य को नई जमीन प्रदान की। जीवन की असंगतियों के बीच तालमेल बैठाने की जड्ढोजहद करने वाले कमलेश्वर ने साहित्य में युग और समाज को सम्पूर्ण परिवेश में प्रकट किया है। ’’सर्वहारा के संघर्ष में शामिल, परिवर्तन के लिए प्रतिब= और उसी से सम्ब= समान्तर रचना ही वह कारगर विकल्प है, जो हमारे समय में संगत तथा मनुष्य के लिए सार्थक हो सकती है। सत्य निरपेक्ष नहीं है। हर सत्य मनुष्य और समय सापेक्ष है।‘‘१ कमलेश्वर द्वारा एक भाषण में कहे गये ये शब्द उनके साहित्य में पूर्णतः प्रतिबिम्बित होते हैं, जहो वे मनुष्य और समय सापेक्ष सत्य का उद्घाटन निरन्तर करते हैं।
कमलेश्वर के उपन्यासों की कथाभूमि जीवन के यथार्थ को अपने वास्तविक रूप में चित्रित करती है। उन्होंने अपने युग को नये मोड और नयी सोच प्रदान की है। अपने आसपास फैली दुनिया को खुली नजर से सही और साफ देखने की कोशिश इनके उपन्यासों को महवपूर्ण बनाती है। कमलेश्वर ने नारी को परम्परागत आदर्श प्रतिमा से मुक्त कर यथार्थ भूमि पर प्रस्तुत किया है।
कमलेश्वर के उपन्यासों की स्त्रियो अपने अधिकारों की प्राप्ति या अस्मिता की रक्षा के लिए साहसपूर्ण कदम उठाने की पहल करती हैं। प्रश्न चाहे जीवनसाथी चुनने का हो या कार्यक्षेत्र चुनने का, वे अपना निर्णय खुद लेती हैं। ’समुध् में खोया हुआ आदमी‘ उपन्यास की तारा अपने माता-पिता की इच्छा के विरु= जाकर हरबंस से सम्बन्ध स्थापित करती है और विवाह का निर्णय लेती है। ’डाक बंगला‘ की इरा अपने पिता से विधेह कर विमल के साथ रहने लगती है। ’काली आंधी‘ की मालती जगदीश बाबू से प्रेम विवाह करती है, तो ’वही बात‘ की समीरा अपने पति की अति महवाकांक्षा और सफलता की दौड के कारण, अकेलेपन और खालीपन को दूर करने के लिए, पति से तलाक लेकर नकुल से पुनर्विवाह करती है। ’तीसरा आदमी‘ की चित्रा पति की संदेहवृा और पलायनवृा से तंग आकर नौकरी करने का निर्णय लेती है और पति के मना करने पर भी अपने निर्णय से पीछे नहीं हटती। ’आगामी अतीत‘ की चाँदनी कमलबोस के साथ जाने का प्रस्ताव ठुकराकर वेश्यावृा से ही अपना जीवनयापन करती है। ’कितने पाकिस्तान‘ की सलमा मुस्लिम विधवा होते हुए भी हिन्दू अदीब से सम्बन्ध स्थापित करती है और इच्छाओं को पूरा करती है। इस प्रकार उपन्यासकार ने जिन नारी चरित्रों को प्रस्तुत किया है, वे आज की स्वनिर्णय की जन्दगी जीने वाली स्त्रियो हैं, जो किसी अन्य द्वारा थोपी गई मान्यताओं, परम्पराओं की जन्दगी नहीं जीती।
आज नारी अपने अधिकारों के प्रति अधिकाधिक सजग होने लगी है तथा उसके प्रति समाज के दृष्टिकोण में भी बदलाव आ रहा है। कमलेश्वर ने नारी के प्रति पुरुष वर्ग की मानसिकता में आ रहे बदलाव को अपने उपन्यासों में अनेक पात्रों द्वारा प्रकट किया है। ’काली आंधी‘ उपन्यास में जगदीश बाबू राष्टत्र् निर्माण में स्त्री-पुरुष के समान योगदान की आवश्यकता बताते हुए कहते हैं, ’’देश के निर्माण में औरतों को भी आगे आना चाहिए। औरतें यानी हमारी आधी जनसंख्या जब तक इस तामीर में हाथ नहीं बटाऐगी, तब तक हर काम की स्पीड आधी रहेगी... यह बेहद जरूरी है कि हमारे घरों की औरतें आगे आऐ और हर काम में मदोङ का हाथ बटाऐ...‘‘२ नारी के प्रति समाज की मानसिकता में जो बदलाव आ रहा है, उसे ’वही बात‘ उपन्यास में भी देखा जा सकता है, जहो खजांची बाबू तथा नकुल नामक पात्रों के माध्यम से विवाह सम्बन्ट्टा को लेकर स्त्री-पुरुष समानता की बात की गई है। नकुल शादी को निभाने की जिम्मेदारी स्त्री-पुरुष दोनों की बताते हुए कहता है - ’’शादी एकतरफा खेल नहीं है... औरत किसी की जरखरीद गुलाम नहीं है।‘‘३ अन्य स्थान पर खजांची बाबू औरत के अपनी जन्दगी अपने ढंग से जीने की वकालत करते हुए कहते हैं, ’’औरत को अपनी जन्दगी जीने का हक क्यों नहीं है? हम कब तक उसे बेइज्जत करते रहेंगे?‘‘४ आदमी और औरत के लिए समाज द्वारा अलग-अलग नियम लागू करने की मानसिकता पर व्यंग्य करते हुए वे कहते हैं, ’’आदमी औरत बदल ले, तो ठीक! औरत आदमी बदल ले तो गलत! वाह!...वाह! क्या मैथेमेटिक्स है।‘‘५
नारी के प्रति कमलेश्वर का दृष्टिकोण प्रगतिशील है, समानता स्थापित करने वाला है। ’डाक बंगला‘ उपन्यास की इरा बिना विवाह किये अपने प्रेमी विमल के साथ रहती है और फिर विमल के चले जाने के बाद अनेक पुरुषों से उसके सम्बन्ध बनते हैं, जिससे उसकी जन्दगी डाक बंगला बन जाती है। जहो मुसाफिर आते हैं, ठहरते हैं और चले जाते हैं। इरा अपनी जन्दगी के इस यथार्थ को किसी से छुपाती नहीं, बल्कि खुलकर बात करती है। वह बताती है, ’’मेरी आत्मा का कोना-कोना यादों से भरा हुआ है। मेरी ओखों में हर उस व्यक्ति की तस्वीर है, जिसके साथ मैंने थोडे-से भी दिन गुजारे हैं।‘‘६ वह अपने कॉलेज के दिनों के बारे में बताते हुए कहती है, ’’तब हर हमउम्र लडका मुझे ऐसा ही राजकुमार लगता था और मैं ओखें चुरा-चुरा कर हर लडके को देखती थी, उसके सपने बुनती थी।‘‘७ अपने मन की कमजोरी या मजबूरी को स्वीकार करते हुए इरा कहती है, ’’अपनी सारी बुराइयों, बेइमानियों और बेवफाइयों के बावजूद हर आदमी मुझे बहुत मासूम लगता है। जब भी मैंने आदमी को अकेले में देखा है, मेरा मन उसके लिए करुण हो आया है, क्योंकि हर आदमी जीवन में बहुत दुःखी है और उसके दुःखों के बदले उसे सिर्फ प्यार ही दे सकती ह। मैं हर आदमी से सच्ची तरह बोलने के लिए, प्यार करने के लिए मजबूर ह।‘‘८ इरा के
माध्यम से लेखक ने एक ऐसी स्त्री के मन की परतें खोली हैं जो अपने मन की कमजोरियों, भावनाओं और परिस्थितियों के कारण भटकन की शिकार हो जाती है। ’वही बात‘ की समीरा भी विवाहेार सम्बन्ट्टा को अपने पति के सामने स्पष्ट शब्दों में स्वीकार करती है। इस बारे में अपने पति से बात करने में उसे कोई हिचक नहीं होती। वह साथी नकुल से कहती है, ’’जिस सच्चाई को मैंने तुम्हारे साथ मंजूर किया है, उसे प्रशान्त के सामने भी मंजूर करने में मुझे कोई हिचक नहीं है।‘‘९ ’लौटे हुए मुसाफिर‘ की सलमा भी अपने विवाहेार सम्बन्ध के बारे में बेखौफ बात करती है। उसके और साार के छुप-छुप कर मिलने के सम्बन्ध में जब साार से पूछताछ की जाती है तो वह बडी स्पष्टता से कहती है, ’’यह सब मुझसे पूछिये। मेरे बारे में बात पूछनी है तो मैं खुद ह, जो पूछिये, उसका जवाब मैं दगी।... मैं बताये देती ह... मैं इसके साथ भुतहे मकान में गई थी।‘‘१०
कमलेश्वर के उपन्यासों में जो भी स्त्री पात्र आये हैं, वे अत्यन्त जीवन्त एवं वास्तविक हैं। ’एक सडक साावन गलियो‘ की बंसिरी, ’आगामी अतीत‘ की चाँदनी, ’काली आंधी‘ की मालती, ’डाक बंगला‘ की इरा, ’समुध् में खोया हुआ आदमी‘ की तारा आदि सभी पात्र अपने किरदार को यथार्थ रूप में प्रस्तुत करते हैं। बंसिरी एक नौटंकी कलाकार है तथा उसका चित्रण भी सर्वथा इसके अनुरूप है। ’’लैला की सखियों में बंसिरी थी। सीधी-सादी लडकी कूल्हे मटकाना सीख गई थी, ओख मारती थी।... उइ दइया कहकर लजाती थी और खुले हुए गंदे मजाक करती थी।... देखने वालों के इशारों का जवाब वह अपना पार्ट अदा करते-करते दे रही थी।‘‘११ नौटंकी कलाकार का उड्ढेश्य दर्शकों को आकर्षित करना होता है। गोवों में मेलों के दौरान स्त्री कलाकारों द्वारा इशारे करना, ओख मारना दर्शकों को नौटंकी से बोधे रखने का ही तरीका होता है। बंसिरी भी मेले में इसी रूप में दिखाई देती है। ’आगामी अतीत‘ की चाँदनी एक वेश्या है। उसका व्यवहार, गाली-गलौज युक्त भाषा, सभी एक वेश्या के चरित्र को साकार कर देते हैं। उपन्यास के नायक कमलबोस द्वारा नाम पूछे जाने पर चाँदनी कहती है, ’’अरे साला! इसमें नाम-वाम से क्या लेना- देना! तुम तो मगज चाटने लगे... आज साले सब मरदुए ही आ रहे हैं...‘‘ और वह झझलाती हुई उसके पास से हट गई।‘‘१२ एक जगह चाँदनी कहती है, ’’अच्छे और बुरे को मारो गोली। मुझे यहो काहे के लिए लाके बिठाया है? काम-धन्धे वाली औरत ह... सीधे-सीधे अपना काम करो तो मेरा पैसा भी पटता जाये। जबर्दस्ती भार चढ रहा है।‘‘१३ ’काली आंधी‘ उपन्यास में मालती के माध्यम से लेखक ने एक राजनीतिज्ञ के जीवन और चरित्र को साकार किया है। मालती एक कुशल राजनीतिज्ञ के सभी गुणों - संयम, कूटनीति, अवसरवादिता, कुशल वक्ता आदि से युक्त है। सम्पूर्ण उपन्यास में मालती के राजनीतिक चरित्र को प्रस्तुत करने वाले अनेक उदाहरण मिल जाते हैं। अपने पति और बेटी से दूर होने का दर्द वह अकेले म महसूस करती है, लेकिन सामाजिक, राजनीतिक जीवन में ऐसे रहती है, जैसे कुछ हुआ ही न हो। अपने जज्बातों को वे शीघ्र ही सम्भाल लेती है। अपने कोमल भावों को राजनीति में कहीं आडे नहीं आने देती। गुरुसरन बताता है, ’’मालती में अद्भुत आत्मशक्ति और ट्टाीरज है। ऐसे मौके बहुत कम आए हैं, जब उनकी व्यक्तिगत जन्दगी के दर्द का अहसास किसी को हुआ हो। लिली को लेकर भी उन्होंने कभी ज्यादा बात नहीं की। शायद उन्हें भरोसा था कि जन्दगी में वे जब भी चाहेंगे, लिली को भी जीत लेंगी।... फिर जीतते जाने तथा वक्त आने पर जीत लेने का आत्मविश्वास उनकी बडी शक्ति रही है।‘‘१४ मालती की विशेषता यही है कि उनमें सहने, खोने और पाने का एक विचित्र संतुलन बना रहता है। ऐसा नहीं था कि लिली की उन्हें याद न आई हो या जग्गी बाबू के आने पर वे डावोडोल नहीं हुई हों, पर उस वक्त जो कुछ उन्होंने सहा या खोया, उसके मुकाबले उन्होंने क्या पाया, यह वे अच्छी तरह जान रही थी... और यह जानना भी उनकी सफलता का एक अहम जरिया था।‘‘१५
विगत वषोङ में नारी की स्थिति में बहुत बदलाव आया है। कमलेश्वर के उपन्यासों में इस बदलाव को बहुत साफ तौर पर देखा जा सकता है, लेकिन ऐसा भी नहीं है कि नारी की स्थिति बिल्कुल ही बदल गई हो। आज भी वह अपने अधिकारों की प्राप्ति के लिए, मुक्ति के लिए संघर्ष कर रही है। ’डाक बंग्ला‘ में इरा कहती है, ’’यह तुम्हारी दुनिया बहुत कमीनी है। यहो औरत बगैर आदमी के रह ही नहीं सकती... चाहे उसके साथ उसका पति हो, या भाई, या बाप। कोई न हो तो नौकर ही हो। पर आदमी की छाया जरूर चाहिए। यह विधान कैसा है? तुम इसे नहीं समझ सकते, क्योंकि तुम औरत नहीं हो। पर मैंने बडी गहराई से यह महसूस किया है। किसी भी आदमी की आड में चाहे वह आदमी काठ का ही हो... अच्छी से अच्छी और बुरी से बुरी जन्दगी शान से चल सकती है, पर बगैर आदमी के न वह अच्छी जन्दगी जी सकती है, और न बुरी।‘‘१६ समाज का, नारी जीवन का कटु यथार्थ है कि युगों-युगों से नारी को भोग्या, मात्र शरीर समझा गया है। आज नारी के प्रति सोच में कुछ परिवर्तन तो आया है, परन्तु स्थिति अभी भी सोचनीय है। ’डाक बंगला‘ में स्त्री जीवन की पीडा को व्यक्त करते हुए इरा कहती है, ’’आज मैं किसी के लिए निहायत बुरी औरत हो सकती ह तिलक! पर अगर उसी को अपना तन दे द तो बहुत अच्छी हो जाेगी। चार दिन बाद वह मुझसे छिटककर अलग जा सकता है, पर फिर मुझे बुरा नहीं कहेगा, बल्कि अपने अहं में चूर होकर दया देने की कोशिश करेगा। वह मेरा मसीहा बनने की कोशिश करेगा, क्योंकि तुम्हारे इस समाज में हर आदमी कुछ करने आता है और हर औरत भोगने आती है। इसलिए हर क्वांरी मो की कोख से तुम्हारे प्यार भरे पापों ने जबरदस्ती संतानें पैदा की हैं और उन संतानों को तुमने पैगम्बरों का दर्जा दिया है।‘‘१७
समाज के एक वर्ग विशेष की महिलाओं की बात छोड दें तो सामान्यतः अधिकांश महिलाऐ आज भी अपनी इच्छानुसार, अपनी जन्दगी जीने के लिए स्वतंत्र नहीं है, वे भीतर-भीतर छटपटा अवश्य रही हैं, पर इस स्थिति में नहीं है कि वे कोई ठोस निर्णय ले सकें। इसका कारण आर्थिक परनिर्भरता या असुरक्षा का भय, कुछ भी हो सकता है। परन्तु वे इसे ही अपनी नियति या मर्ज समझकर, एक थोपी हुई, अन्य द्वारा निर्धारित जन्दगी जी रही हैं या कहें कि ढो रही है। कमलेश्वर के उपन्यासों की स्त्रियो, स्त्रियों के उस वर्ग का
प्रतिनिधित्व करती हैं, जो स्वतंत्र एवं स्वनिर्णय की जन्दगी जीने की छटपटाहट से युक्त है। ऐसी जन्दगी की ओर अग्रसर है। इन महिलाओं के संघर्ष, परिस्थितियों, पीडाओं का यथार्थ चित्रण उपन्यासकार ने किया है।
संदर्भ ः
१. सं. मधुकर सिंह, कमलेश्वर. सं. १९७७, शब्दकार प्रकाशन, तुर्कमान गेट, दिल्ली, पृ. २२१
२. कमलेश्वर समग्र उपन्यास - काली आंधी, सं. २०११, राजपाल एण्ड संस, दिल्ली, पृ. ३६६
३. कमलेश्वर समग्र उपन्यास - वही बात, सं. २०११, राजपाल एण्ड संस, दिल्ली, पृ. ५४८
४. कमलेश्वर समग्र उपन्यास - वही बात, सं. २०११, राजपाल एण्ड संस, दिल्ली, पृ. ५५७
५. कमलेश्वर समग्र उपन्यास - वही बात, सं. २०११, राजपाल एण्ड संस, दिल्ली, पृ. ५५७
६. कमलेश्वर समग्र उपन्यास - डाक बंगला, सं. २०११, राजपाल एण्ड संस, दिल्ली, पृ. २२९
७. कमलेश्वर समग्र उपन्यास - डाक बंगला, सं. २०११, राजपाल एण्ड संस, दिल्ली, पृ. २२९
८. कमलेश्वर समग्र उपन्यास - डाक बंगला, सं. २०११, राजपाल एण्ड संस, दिल्ली, पृ. २५७
९. कमलेश्वर समग्र उपन्यास - वही बात, सं. २०११, राजपाल एण्ड संस, दिल्ली, पृ. ५४३
१०. कमलेश्वर समग्र उपन्यास - लौटे हुए मुसाफिर, सं. २०११, राजपाल एण्ड संस, दिल्ली, पृ. ९६
११. कमलेश्वर समग्र उपन्यास - एक सडक साावन गलियो, सं. २०११, राजपाल एण्ड संस, दिल्ली, पृ. ३१
१२. कमलेश्वर समग्र उपन्यास - आगामी अतीत, सं. २०११, राजपाल एण्ड संस, दिल्ली, पृ. ४८४
१३. कमलेश्वर समग्र उपन्यास - आगामी अतीत, सं. २०११, राजपाल एण्ड संस, दिल्ली, पृ. ५००
१४. कमलेश्वर समग्र उपन्यास - काली आंधी, सं. २०११, राजपाल एण्ड संस, दिल्ली, पृ. ३७२
१५. कमलेश्वर समग्र उपन्यास - काली आंधी, सं. २०११, राजपाल एण्ड संस, दिल्ली, पृ. ३९६
१६. कमलेश्वर समग्र उपन्यास - डाक बंगला, सं. २०११, राजपाल एण्ड संस, दिल्ली, पृ. २३८
१७. कमलेश्वर समग्र उपन्यास - डाक बंगला, सं. २०११, राजपाल एण्ड संस, दिल्ली, पृ. २३९