fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

उपहार

तरुण कुमार दाधीच
आज पीयूष का जन्मदिन बडी धूमधाम से मनाया जा रहा था। दूसरी खुशी साथ में यह कि आज ही पीयूष का दसवीं का परीक्षा-परिणाम निकला था। वह द्वितीय श्रेणी में उाीर्ण हुआ। जन्मदिन पर पीयूष ने अपने खास दोस्तों को घर पर बुलाया।
’’पीयूष, जन्मदिन की बधाई।‘‘ कुलदीप ने कहा।
’’धन्यवाद कुलदीप।‘‘ पीयूष ने हेसते हुए कहा।
’’अरे वाह! आज तो एक साथ खुशी के दो-दो अवसर।‘‘
’’बहुत-बहुत शुभकामनाऐ पीयूष।‘‘ वर्मा अंकल ने प्रसन्नता के साथ कहा।
’’आपका आभार अंकल।‘‘ पीयूष ने वर्मा का हाथ जोडकर अभिवादन किया।
सभी दोस्तों, परिवार वालों और रिश्तेदारों ने पीयूष को कई तरह के उपहार दिये। आज के दिन उसके पापा उसे कीमती उपहार देने आये थे, परन्तु आज उन्होंने पीयूष को एक पेन दिया। पीयूष ने पापा से पेन लिया और अपनी जेब में रख लिया।
पीयूष का जन्मदिन मनाने के बाद धीरे-धीरे सभी अपने-अपने घर जाने लगे। पीयूष वहीं बैठा रहा और सभी उपहारों को खोलकर देखने लगा। सभी ने कीमती उपहार दिये थे। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि पापा ने आज उसे पोच-सात रुपये का पेन ही दिया है। सोचते-सोचते वह उदास हो गया। पीयूष के मम्मी-पापा और छोटा भाई आयुष वहीं पर आ गये।
’’क्या हुआ बेटा, उदास क्यों हो?‘‘ मम्मी ने सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा।
’’कुछ नहीं मम्मी, सिर में दर्द हो रहा है।‘‘ पीयूष ने बात टालते हुए कहा।
’’लो बाम लगा देती ह, अभी थोडी देर में सिरदर्द मिट जायेगा।‘‘ मम्मी ने प्यार से कहा।
’’नहीं मम्मी, रहने दो।‘‘ पीयूष ने अनमने होकर कहा।
’’भैया आज पास भी हो गये हो। आईस्र्‍ीम नहीं खिलाओगे?‘‘ आयुष ने हेसते हुए कहा।
’’आज रहने दो छोटू, कल खिला दगा।‘‘ पीयूष ने आयुष को टरकाते हुए कहा।
पीयूष के पापा पास बैठे सब देख-सुन रहे थे। वे समझ गये कि पीयूष उदास क्यों है।
’’मेरा उपहार कैसा लगा पीयूष?‘‘ पापा ने सहजता से पूछा।
’’जी पापा... बहुत अच्छा।‘‘ पीयूष ने गर्दन झुकाये हुए कहा।
’’उपहार अच्छा लगा तो तुमने गर्दन क्यों झुका रखी है?‘‘ पापा ने उत्सुकता से पूछा।
’’बस पापा य ही... पर आप तो मेरे जन्मदिन पर कीमती तोहफा देते आये हो। आज आपने मुझे सस्ता पेन उपहार में दिया।‘‘ पीयूष ने शिकायत भरे स्वर में कहा।
’’हो तो यह बात है पीयूष।‘‘ पापा ने हेसते हुए कहा।
’’मैंने तुम्हें जानबूझ कर पोच-सात रुपये का पेन दिया। पहले मेरे साथ आओ। हम सभी छत पर चलते हैं।‘‘ पापा ने कहा।
’’ठीक है पापा।‘‘ पीयूष ने कहा।
मम्मी-पापा, पीयूष और आयुष चारों छत पर आ गये। सभी उत्सुक थे कि पापा सबको छत पर लेकर क्यों आये हैं।
’’हो तो पीयूष आकाश की तरफ देखकर बताओ कितने तारे हैं?‘‘ पापा ने सहजता से कहा।
’’पापा, अनगिनत।‘‘ पीयूष ने हेसते हुए कहा।
’’अच्छा बताओ ..... तारा कौनसा है?‘‘ पापा ने पूछा।
’’पापा, पता नहीं।‘‘ पीयूष ने कहा।
’’और.... तारा कौनसा है?‘‘ पापा ने जिज्ञासा से पूछा।
’’मुझे नहीं पता पापा।‘‘ पीयूष ने निराश होकर कहा।
’’अच्छा ये तो बताओ ध्रुव तारा कौनसा है?‘‘ पापा ने हेसते हुए पूछा।
’’पापा वो है ध्रुव तारा।‘‘ पीयूष ने दृढता से कहा।
’’बिल्कुल सही कहा तुमने। वही ध्रुव तारा है और अगर अपनी जन्दगी बनानी है तो तुम्हें भी इसी ध्रुव तारे के समान बनना होगा।‘‘
’’मैं समझा नहीं पापा।‘‘ पीयूष ने उत्सुकता से पूछा।
’’इतने सारे तारों में तुम दूसरे तारों को नहीं ढढ पाये, परन्तु ध्रुव तारे को तुमने ढढ लिया ना।‘‘ पापा ने सहजता के साथ कहा।
’’हो पापा, ध्रुव तारे की विशेष पहचान है।‘‘ पीयूष ने कहा।
’’बस मैं यही तुम्हें कहना या समझना चाहता ह कि ट्टाु्रव तारे की तरह अपनी पहचान पढाई में बनाओ। तुम द्वितीय श्रेणी में उाीर्ण हुए हो, तुमने आसमान के तारे नहीं तोड लिये। जैसे इतने तारों में ध्रुव तारा अपनी पहचान रखता है, वैसे ही तुम्हें भी अपनी पहचान बनानी होगी। समझे।‘‘ पापा ने पीयूष के कंधे पर हाथ रखकर कहा।
’’हो पापा, आप बिल्कुल सही कह रहे हैं।‘‘ पीयूष ने सहजता से कहा।
’’अच्छा तो बोलो अब तुम्हें कौनसा उपहार द? अपनी पसन्द का उपहार बता हो।‘‘ पापा ने कहा।
’’नहीं पापा, मुझे कुछ भी नहीं चाहिए। मुझे आज सबसे कीमती उपहार मिल गया है।‘‘
पीयूष मम्मी-पापा और आयुष से लिपट गया। जन्मदिन का उपहार पाकर पीयूष बहुत प्रसन्न था। चारों छत से नीचे आकर खाना खाने लगे।