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रमते राम की डायरी

अम्बिका दत्त
... य डायरी में कविता के अलावा और कुछ इधर-उधर का तो पहले भी लिखा जाता रहा, लेकिन यदा-कदा। कविता की ही तरह। रिटारयमेन्टोपरान्त रोज कुछ लिखने, लिखते रहने का काम चुना। अब रोज कविता या कहानी जैसा तो लिखा नहीं जा सकता न। इसलिए जब जो जैसा गुजरा, घटा वह रोजनामचे में दर्ज किया। यह क्या है, क्या नहीं है, इस विचार, मतलब से परे। बहरहाल जो भी है जैसा भी है...। अपने वक्त के जीवन की धडकनें दर्ज करें। अगर कोई लेखक इतना भी कर सके। तो...शायद, बेहतर भले न हो... बुरा क्या है।
३० जून २०१६
सरकारी नौकरी में आखिरी दिन
सरकारी नौकरी में आज मेरा आखिरी दिन है। कबीर ने कहा है - ’जब होगी उम्मर पूरी। तब छुटेगी हुकुम हुजूरी।।‘ देखिए कब होती है उम्मर पूरी और कब छूटती है हुकुम हुजूरी। हालोकि आज नॉन वकिङग डे है, फिर भी दय्तर तो जाना ही होगा।
पिछले कई दिनों से कई लोग पूछ रहे हैं, ३० जून को क्या करोगे? ३० जून के बाद क्या करोगे? लोग पता नहीं क्या करने की सोचते हैं, सेवानिवृा के बाद। मैंने तो कभी सोचा नहीं इसके सिवा कुछ कि - लिखना-पढना करेंगे... और... बस दय्तर नहीं जाऐगे। सो मैंने अपने अंदाज में ज्यादातर को यही उार दिया कि, ’’३० को तो दय्तर जाेगा और उसके अगले दिन से दय्तर नहीं जाेगा।‘‘ मेरे जैसे आदमी के लिए रोज दय्तर जाना और कभी दय्तर न जाना, दोनों ही बातें मायने रखती हैं। अलग-अलग तरीके से।
क्या करूेगा, क्या नहीं करूेगा इसके बारे में अभी ज्यादा कुछ बात करना ठीक नहीं है। काम तो कई हैं। अन्य कामों के नियोजन के अलावा मैंने सोचा है, दो डायरियो रखगा। जिसमें से एक तो हो - रोजनामचा, जिसमें अपने रोजमर्रा की जो बातें, खयाल, विचार, जैसे भी आऐ उन्हें लिख लो और दूसरी - याददाश्त की बही। याददाश्त की बही में जो कुछ जब भी जहो-कहीं का याद आ जाएगा, दर्ज करते चलेंगे। ’बही‘ शब्द सही है न! मैं पहले दुकानदारों के हिसाब-किताब लिखने वाली बही में ही कविताऐ लिखा करता था। मेरी कई सारी कविताऐ इन्हीं बहियों में दर्ज हैं। लाल जिल्द वाली मोटे धागे से सिली, मोटे चिकने कागज वाली बही। एक बही जो आती है, उसमें तो यह चिकना कागज पीले रंग का होता है। पीले, मोटे, चिकने कागज पर निब वाले फाउन्टेन पेन से लिखने का मजा ही कुछ और है।
५ जुलाई २०१६
सूता बालाजी
नित्य लिखना कहाँ होता है। सब कुछ अपने हाथ में नहीं होता। ३ जुलाई को सुबह ७ः०० बजे अन्ता से निकले। बारां-शिवपुरी-ग्वालियर-मुरैना होकर, मुरैना-भिण्ड रोड पर अम्बाह पहचे शाम को ४ः०० बजे। अम्बाह आम कस्बों जैसा कस्बा है। वैसी ही सडकें, नालियो, गंदगी, बाजार...। वैसी ही अंध व्यवस्था। कोई क्या कर सकता है। मुरैना से भिण्ड की दूरी लगभग १०० किमी है, फिर भी इन दोनों का नाम एक साथ लिया जाता है, जैसे कोटा-बूंदी। इसकी वजह शायद इस क्षेत्र में व्याप्त एक-सा प्रभाव हो। हत्या, डकैती, लूट, फिरौती, अपराधादि का आतंक, लेकिन इस सबके बीच भी जीवन चलता है, चलता रहता है।
रात्रि विश्राम करके ४ जुलाई को सुबह ७ बजे अम्बाह से वापस निकले।
ग्वालियर से शिवपुरी सीधे जाने के बजाय ग्वालियर बाईपास से झोसी। रास्ते में डबरा और दतिया आया। यहो सुप्रसि= पीताम्बरा पीठ है। बसावट सुन्दर है। रास्ता भी सुन्दर है, रुके नहीं, गुजर गये।
झोसी पुराना शहर है। झोसी की रानी लक्ष्मीबाई को स्मरण करना एक गर्व और औदात्य की अनुभूति कराता है। झोसी की रानी वाली कविता हिन्दी साहित्य की अविस्मरणीय धरोहर है। क्या झोसी की चर्चा होने पर किसी को मैथिलीशरण गुप्त की भी याद आती है। हिन्दी साहित्य के एक मूर्धन्य साहित्यकार जिनका जन्म भी झोसी में ही हुआ था, उनके पुण्य स्मरण को भी नमन।
झोसी में होटल सीता में कुछ देर विश्राम, स्नान, भोजन करके तीन बजे के करीब झोसी से निकले। हमारे बहनोई रवीन्ध् जी के सम्फ के लोग हर जगह मिल जाते हैं। झोसी विश्राम उन्हीं के एक मिलने वाले खुल्लर साहब का सौजन्य था।
लौटते समय शाहबाद की घाटी की प्राकृतिक छटा ने आकर्षित किया। बाईपास से न निकल कर शाहबाद कस्बे के अन्दर गए। सुन्दर पहाडी की तलहटी में बसा, कस्बा। प्रवेश के समय पुष्कर की याद आई। शाहबाद के एडीएम मेरे साथी रामप्रसाद जी थे। वे वहो नहीं थे।
एक चाय की दुकान पर चाय बनवा कर चाय पी। कम मीठी बनाने का कहने के बावजूद चाय अच्छी खासी मीठी थी। थोडी गाढी और कडक होने से अच्छी लगी। कलाकन्द की तो पूछो मत। गजब का मीठा। पर मावा शु= था, एक पाव लिया। शुगर होने के बावजूद एक-एक डली सबने खाया। घाटी चढकर वापस बाईपास पर आ गए।
गजनपुरा बामूलिया की सेव-पपडी की खातिर बारां में अन्दर गए। ताजा बन रही गरम पपडी ली। रात करीब सवा आठ बजे अन्ता आ गए।
रात को खाने के बाद टहलते हुए रवीन्ध् जी और मैंने तय किया सुबह नागदा चलेंगे। म.प्र. में रतलाम के पास वाला नागदा नहीं, अन्ता के पास वाला नागदा।
अन्ता से तकरीबन छः किमी दूर कालीसिंध नदी के किनारे स्थित एक ग्राम है नागदा। वहीं एक प्राचीन शिव मंदिर है। कई सीढयो उतरने के बाद नदी की एक उपधारा के समीप सनातन काल से गोमुख से गिरती आ रही है जलधारा। उसी कुण्ड में उस अजस्त्र जलधारा के नीचे स्नान करने का आकर्षण है, जिसका माहात्म्य है।
सुबह होने पर नागदा जाने के बजाय वैसे ही घूमने टहलने निकल पडे, मैं और रवीन्ध् जी। मौसम अच्छा था। मालियों के मंदिर के सामने से होकर सीसवाली रोड पर चले। पुराना अस्पताल सडक ेची हो जाने से दब-सा गया है। रेल की फाटक बंद थी। बगल से निकल गए। खैमजी तक गए। सडक के दोनों तरफ आबादी बस गई और भी बस रही है।
लौटते वक्त पटरी की फाटक के पास एक जीप खडी दिखी। किशन जी जोशी मा. साब ने मुझे दूर से देखकर भी पहचान लिया था और जीप रोक कर खडे थे। नजदीक जाने पर मैंने भी पहचान लिया। रामा-श्यामी हुई। जीप चालू थी, बंद नहीं कर सकते। स्टाटिङग टत्र्बल बताई। बंद करने पर धक्का लगाना पडेगा। जीप में पंडित जसराज का गायन उच्च स्वर में बज रहा था। वाहन में बजने वाले संगीत का स्वर वाहन की आवाज से ेचा होने पर ही सुना जा सकता है। आगे की सीट के पिर बिजली के बल्ब को जलाने-बुझाने का जो लटकने वाला खटका होता है, ’नाईट स्विच‘, वैसा एक सफेद स्विच लटक रहा था। माट-साब ने उसका खटका दबा कर पंडित जसराज को चुप कराया और हमसे कहा, ’’आओ हरियाली का नजारा कर आयें।‘‘ जुलाई का महीना, वर्षा (तु। सुबह का वक्त, मौसम ठीक ही था। वर्षा के बाद की उमस और सुबह की ठण्डी हवा का मिला-जुला मजा, हमें कहीं जाने की जल्दी न थी। दोनों, मैं और रवीन्ध् जी, माट साब जोशी जी की बगल में आगे वाली सीट पर बैठ गए, जीप चल पडी। फाटक र्‍ाॅस करते ही गुरुजी ने टेप का खटका दबा दिया। पंडित जसराज का वही उच्च स्वर, जिसमें पुरानी डीजल की जीप की आवाज दब जाए। पंडित जसराज गा रहे थे, ’’भरत भाई... कवि से उ(ण हम नांहि।‘‘
गुरुजी की सीसवाली रोड पर रातडया ग्राम में लम्बे रोड कई बीघा जमीन हैं। वहीं उनकी गाऐ हैं। उनको सम्भालने वाला परिवार भी वहीं था। वहो उन्होंने कपिला गाय का धारोष्ण दूध पिलाया और बताया कि, ’’कपिला गाय का दूध पीने से अकाल मृत्यु नहीं होती।‘‘ तो यह तो तय हो गया कि जब भी हमारी मृत्यु होगी, सुकाल होगी।
जोशी जी के बारे में क्या कह। वे हमारे आदरणीय हैं। हमारे अभिन्न मित्र शिव स्वरूप जोशी के बडे भ्राता। य समझिये हमारे वरिष्ठ मित्र। अखण्ड स्वभाव-चरित्र के व्यक्तित्व हैं। अनक घटनाओं-दुर्घटनाओं से भिड चुके हैं। अनेक आधियो-व्याधियो उनके आगे-पीछे रहती हैं, साथ चलती हैं। जिन्हें वे चिलम के धुऐ में उडा देते हैं। कुछ समय पहले एक लाख की मोटर साइकिल खरीदकर लाए थे, वो आजकल पता नहीं, कहाँ है। एक बार स्थानीय अदालत परिसर में खडी मजिस्टत्र्ेड की नई गाडी से अपनी गाडी जा भिडाई। बवाल मचा। थानेदार, सिपाहियों, वकीलों ने गुरुजी की महिमा का बखान किया तो बात मजिस्टत्र्ेट की भी समझ में आ गई। मामला अपने आप शांत हो गया। संगीत के शौक का अंदाजा तो आपको लग ही गया होगा। कहने लगे, ’’पहले हर साल ढोलक, तबले की जोडी मेगवानी पडती थी, अब सुभीता हो गया है। अच्छे से अच्छा संगीत पेन डत्रइव में मिल जाता है। उन्होंने अपने घर-परिवार के किस्सों की महाा और विग्रह बयान किए। हमारे पास सिवा सुनने के और कोई विकल्प न था। रवाना होते इससे पहले पूछा, ’’सूते बालाजी कब गए थे?‘‘
सूते मतलब सोए हुए। बालाजी मतलब हनुमान जी। हनुमान जी के इस स्थान के बारे में सुना तो कई बार था। गया आज तक नहीं था। क्या कहता। उन्होंने कहा, ’चलो।‘
लौटने के लिए रवाना होने के बजाय उनके साथ हो लिए। हमें लगा, गुरुजी नहीं ले जा रहे, हनुमान जी ने पकड बुलाया है। बैठ गए जीप में। सीसवाली मुख्य सडक से थोडा हटकर अन्दर बरडे में है सूते बालाजी। माईक पर हो रहे संकीर्तन, जाप की आवाज आ रही थी। मन में आया, देखो कैसे, सुबह-सुबह टेप चलाकर यांत्रिक भक्ति की जा रही है, लेकिन नजदीक जाने पर देखा कि हनुमान जी के समक्ष एक टपरी में माइक के आगे एक प्रौढ सज्जन हारमोनियम पर गा रहे थे। ’’श्री राम, जय राम, जय जय राम।‘‘ एक सधा हुआ सुरीला-स्वर। पास ही बैठा एक नौजवान तबले पर संगत कर रहा था। एकदम मानसिकता बदल गई। रिकार्डेड अलग होता है, लाइव अलग।
हनुमान के चबूतरे पर चढना मना है, नीचे से ही दर्शन किए।
लौटते वक्त माट साब अपनी जीप में हमें अपने घर तक ले जाने वाले थे नाश्ता करने, लेकिन मालियों के मंदिर के यहो मुझे लगा कि कपिला गाय का धारोष्ण दूध भी एक सीमा तक ही आपकी अकाल मृत्यु से रक्षा कर सकता है, उससे आगे नहीं। सो हम वहीं उतर गए।
६ जुलाई २०१६
अन्ता
कल नागदा जाना नहीं हुआ। दाल-बाटी खाकर सोना हुआ। साथ में एक किताब थी ग्यारहवीं शताब्दी के काश्मीर के संस्कृत लेखक क्षेमेन्ध् की पुस्तक, ’समय मातृका‘ का। ।क्छ भ्।ज्ञै।त् ;आदित्य नारायण धैर्यशीलद्ध द्वारा अंग्रेजी में किया गया अनुवाद ;जीम बवनतजमेंदश्े ाममचमतद्ध क्षेमेन्ध् के अपने जीवनकाल के रचनाकाल के बारे में कहा गया है कि -
अभी तक क्षेमेन्ध् का धार्मिक व भक्ति चेतना के अतिरिक्त काव्यशास्त्र-छन्दशास्त्र से सम्बन्धित कार्य ही उल्लेखित है। सामाजिक व्यंग्य तथा काश्मीर राज्य के लुप्तप्राय इतिहास के संदर्भ के बारे में उनके कृत्य को कम जाना गया है। गत शताब्दी में किए शोध के अनुसार उनके द्वारा अठारह पुस्तकें रचित होना तो पुख्ता रूप से पाया गया है। इसके अतिरिक्त सोलह का उल्लेख उ=रण-संदभोङ में मिलता है। उपरोक्त कार्य से क्षेमेन्ध् के बहुमुखी और विपुल साहित्य के रचियता होने का पता चलता है और महवपूर्ण शास्त्रीय ग्रंथों के उल्लेख से इस स्थापना की पुष्टि होती है।
इस किताब के साथ मुंशी प्रेमचन्द जी की कहानियों की एक किताब भी अन्ता के पुस्तक संग्रह में दिखी। उसमें से मुंशी जी की पहले पढी हुई कहानी ’पंच-परमेश्वर‘ पुनः पढी।
एक आध्यात्मिक साधना की प्रश्नोार शैली में रचित पुस्तक भी कुछ उलटी-पलटी।
अनूप श्रीवास्तव मिलने आए। अनूप हमारे अन्ता के पुराने मित्र हैं। काफी समझदार और सुलझे हुए। दुष्यंत विजय को मोबाइल फोन से अपने आने की सूचना दी। दुष्यंत विजय वकील हैं, उनकी अपनी व्यावसायिक अदालती व्यस्तताऐ होती हैं। उन्होंने तीन बजे के करीब मिलने आने को कहा, आए। दुष्यंत प्रतिभावान, अध्ययनशील, नई समझ के कवि हैं। अच्छी कविताऐ लिखते हैं। अभी पिछले रविवार को ही राजस्थान पत्रिका के रविवारीय परिशिष्ट में उनकी एक अच्छी कविता छपी है।
अनप से कुछ बातें हुई। वे पोच बजे फिर मिलने का कहकर चले गए।
मैं भी टहलने निकल पडा।
अन्ता में छोटे भाई दिनेश जी की बच्ची का विवाह २८ फरवरी २०१७ का तय हुआ है, उसके लिए तय किया गया विवाह स्थल ;मैरिज गार्डनद्ध भी देखना था।
मैं पुरुषोाम जी गोस्वामी, जिन्हें पी.टी.आई. सा. के नाम से भी जाना जाता है, उनके यहो आ गया।
पीटीआई साब का घर पीछे से काफी खुला है। उसमें कई वृक्ष हैं। बगिया सी है। गुसाइयों में मृत्योपरांत अंतिम संस्कार शवदाह करके नहीं करते। शव को ससम्मान जमीन में गाड दिया जाता है, तदुपरान्त मृतक की स्मृति में चबूतरा/छतरी बना दी जाती है। पीटीआई साब के मकान के परिसर में ऐसी कई पुरानी छतरियो बनी हुई हैं। पहले पीछे खेत थे, अब मकान बनने लगे हैं। इसके बावजूद खुलापन है। यह खुलापन, वृक्ष घरेलू बगिया में लगे जामुन, नीम के वृक्ष, क्यारियों में लगे फूलों, सब्जियों के पौधे, लताऐ और उस पर चिर शांति प्रदायिनी पुरानी छतरियो। यह सब मुझे हमेशा से अच्छा लगता आया है और इस पर पीटीआई साब का पूरा परिवार सद्भावी और स्नेहशील है। उनका और उनकी पत्नी का आत्मीय स्नेह मेरे लिए दुर्लभ उपलब्धि है। उनके बच्चे मेरे प्रति बहुत ही सौजन्य रखते हैं। मैं जब भी अन्ता आता ह, एक बार यहो अवश्य आता ह।
यहीं घर से दिनेश का भी समाचार मिल गया कि घर वाले भी मैरिज गार्डन पहच रहे हैं।
हम निकलते इससे पहले ही अनूप और दुष्यंत गाडी लेकर आ गये। मैं और पीटीआई साब उनके साथ बैठकर चौहान वाटिका जा पहचे। चौहान वाटिका रहमान की है। बताया गया कि रहमान की घरवाली का गौत्र चौहान है।
रहमान के परिवार में पुश्तैनी नीलगर का काम होता था। रहमान की मो को मैंने बडे-बडे ताम्बे पीतल के हण्डों में कपडे रंगते देखा था। इसके साथ ही मैंने इनके पिता ख्वाजा जी को, स्टोव, गैस ;पेटत्रेमैक्सद्ध, छाते वगैरह सुधारते भी देखा था। रहमान का टेंट हासि भी है और यह चौहान वाटिका भी उसी की है। दिनेश जी का मित्र है। लगभग आठ बीघा जमीन में स्टेज और छः कमरे और एक छोटे हॉल, पाकिङग की जगह वाला मैरिज गार्डन अन्ता जैसे कस्बे में होना मेरे लिए सुखद आश्चर्य था।
२०.८.२०१६
मुय्त का नाश्ता
चिाौड से आने के बाद पिछले दो दिन से घूमने जाना नहीं हो रहा था, बारिश भी थी। सुबह उठने का आलस्य तो था ही। सुबह उठने की जितनी महिमा है, हम जैसे लोगों के जीवन में सुबह पडे रहने की महिमा उससे सवाई है।
आज भी बारिश तो थी पर थोडा खुला तो नागेन्ध् जी से फोन पर बात हुई। वे वहीं थे, बाग में। मैं भी छाता लेकर निकल पडा। पक्के रास्ते पर घूमे। लौट कर वापस अपने ठिए पर आ बैठे। तालाब की पाल पर से म्यूजियम, आर्ट गैलेरी की तरफ जो ढलवां रास्ता है, उसके मुहाने पर स्काउट के ऑफिस के पास है ठिया। यहो एक पेड है छरेल का। उसके नीचे रेलिंग के किनारे एक महिला ने चाय का ठेला लगा रखा है। सुबह सैर समाप्त करके यहीं आ बैठते हैं, मैं और नागेन्ध् जी। फीकी चाय का आनन्द लेते हैं, गपोडों के साथ। कभी कामरेड भी होते हैं, कभी त्रिपाठी जी, कभी अजय शर्मा और कभी पंचोली जी। जिस दिन पंचोली जी होते हैं, उस दिन गपोडों के साथ ठहाके भी होते हैं।
इन दिनों रामदेवरा जाने वाले पैदल यात्रियों का सिलसिला जारी है। चाय वाली बाई ने भी पैदल यात्रियों की सेवार्थ अपने ठेले के आगे वाटरन्नूफ टेंट में रामदेव जी की झोकी बनाकर जातरुओं के सेवा- पानी का इंतजाम किया है। इसी में कुछ कुर्सियो पडी हैं, प्लास्टिक की। तख्तों पर गड्ढे-चादर बिछा कर आराम करने का इंतजाम भी किया हुआ है। टीवी पर सी.डी. या पेन डत्रइव के जरिये भक्ति के नाच-गान के वीडियो अनवरत चलते रहते हैं। आजकल यहीं बैठकर चाय पी जाती है। हमारे आते ही कोई एक कार्यकर्ता अखबार लाकर दे देता है। म्यूजिक की आवाज भी थोडी कम कर देता है।
हम जब आकर बैठे। दो कार्यकर्ता लहसुन छील रहे थे। बडा आम भण्डारा तो तीन तारीख को होगा, लेकिन रोज निकलने वाले जातरुओं में से कोई करना चाहे तो भोजन तैयार है। फिर जो कार्यकर्ता हैं, वे भी तो भोजन यहीं करते हैं।
वर्षा (तु में, खुले में, घर से बाहर बना हुआ सामूहिक भोजन करने का अलग आनन्द है। नागेन्ध् जी ने सम्मति दी कि जिस रुचि, मनोयोग से ये तैयारी कर रहे हैं, उससे लगता है भोजन तो अच्छा ही बनता होगा। कुल मिलाकर कह सकते हैं कि वे भोजन बनाने की तैयारी कर रहे थे और हम भोजन करने की मानसिकता की तैयारी। भूमिका-प्रस्तावना बनती बनाती, इससे पहले ही देखा तालाब पाल पर तेजाजी के मंदिर के पास कोई एक आदमी, बडा-सा थैला लिए, थैले में से निकाल-निकाल कर कुछ बोट रहा है। नागेन्ध् जी ने दिखाया। यहो के कार्यकर्ता महाराज भी वहो गए।
कागज में धर-धर कर दे रहा था। अनुमान से कुछ समोसा या ब्रेड बडा जैसा लग रहा था। चाय वाली बाई ने आकर बताया, ’’ये रोज आता है। नित नई-नई चीजें लाता है खाने की, सबको देता है, सबको बोटता है।‘‘ मैंने नागेन्ध् जी से कहा, ’’अपने को भी चलना चाहिए।‘‘ नागेन्ध् जी ने एतराज जताया, ’’यह अपने लिए ठीक नहीं।‘‘
लोगों की जन्दगी में झोकने का। शब्दों में कहें तो दूसरों के फटे में पोव फसाने का अपना स्वभाव है और अपने इस स्वभाव का जस्टिफिकेशन भी अपुन ने गढ रखा है। एक लेखक का ऑब्जरवेशन बहुत व्यापक और गहन होना चाहिए। चीजों को रुक कर देखना चाहिए, उनके नजदीक जाना चाहिए, उन्हें छूना चाहिए। उनमें घुसना चाहिए। इतना ही नहीं, इन चीजों, घटनाओं के जरिये जीवन में धंसना चाहिए। जीवन में रमना चाहिए।
अपने से रुका नहीं गया। जाने पर पता चला, वो श्रीमान् जिनका नाम संजीव बधवा है, एक बहुत बडे आदमी है। उनके साथ उनकी एक ८-१० साल की छोटी बच्ची भी थी। राकलैण्ड, कोटा-झालावाड रोड पर होटल है, उसके मालिक हैं। निराला दंत मंजन, जो कस्तूरी दंत मंजन की तर्ज पर बना है, तम्बाकू वाला लाल रंग का मंजन। जिसकी लत औरतों, लडकियों तक को लग गई हैं, इन्हीं का है। कुछ वषोङ पहले शहर में नीलू राणा हत्याकांड हुआ था, जिसमें अंकुश बधवा आरोपित था। उन्होंने बताया, वो इनका भतीजा है। मैंने पूछा, ये क्य करते हो? रोजाना कुछ न कुछ लाकर सौ सवा सौ आदमियों को बोटते हो। ऐसा सीधा सवाल शायद उनके लिए अप्रत्याशित था। उनसे कोई जवाब नहीं बन रहा था। उन्हें कुछ नहीं सूझ रहा था। उन्होंने थैले में से ही एक कागज निकाला, उस पर दो ब्रेड और एक कचोरी रखी और झिझकते-झिझकते मेरी ओर बढाया। मैंने ले लिया और उनको सवाल का जवाब देने में थोडी सहूलियत हो, इसलिए विकल्प दिया। ’’स्व-प्रेरणा से करते हो या किसी ने कहा है इसलिए करते हो?‘‘ उन्हें जैसे थोडी राहत मिली। उन्होंने विकल्प लपकते हुए कहा, ’’स्व-प्रेरणा से।‘‘ अपने हाथ से जितना निकल जाए, उतना ही अच्छा है न! बहस का न कोई सवाल था, न गुंजाइश, न मंशा। मैंने सिर्फ इतना कहा, ’’अच्छी बात है।‘‘ मैंने देखा इस बीच उन्होंने ऐसा ही एक पैकेट तैयार किया, जिस पर ब्रेड के साथ समोसा था। शायद हमारे ठिये का वालिन्टियर नागेन्ध् जी के लिए ले जा रहा था। मुझे कचोरी की बनिस्बत समोसा ज्यादा अच्छा लग रहा था। मैंने कहा, ’’मुझे कचोरी के बजाय समोसा दे दीजिए।‘‘ उन्हने, थैले में रखे पुडकों में से टटोल कर मुझे समोसा दे दिया। मैं जब तक लौटकर आया तब तक नागेन्ध् जी के पास ब्रेड और कचोरी पहच चुकी थी। बाकी सब वालेन्टियर भी अपना-अपना हिस्सा ले आए थे। महाराज तो चटनी ;खड्डी-मीठीद्ध भी लाए थे, हमने निःसंकोच नाश्ते का आनन्द लिया। तत्पश्चात कागज के छोटे डबूशों में दो-दो घूंट बराबर फीकी चाय पी।
उठने से पहले मैंने नागेन्ध् जी को कहा, ’’देखो भगवान सबकी सुनता है। कुछ देर पहले अपुन ने भण्डारे में मुय्त में भोजन की इच्छा की थी। भगवान ने कहा, भोजन में तो अभी देर है। इससे पहले नाश्ता तो करो।‘‘
इसी दौरान पुरातत्व विभाग के एक सहायक कर्मचारी ने नमस्कार किया। वो मुझे जानता था। मैंने उसका परिचय पूछ लिया। कोटा के पास ही एक पुरातात्विक स्थान है, ’चन्ध्ेसल‘, वहो महादेव जी का मंदिर है। मठ भी है। दरअसल एक स्थानीय चम्बल की सहायक नदी है ’चन्ध्सेल‘, उसी के किनारे है यह मठ। उसने उनकी कथा और माहात्म्य बताया। बताया कि अभी चालीस लाख रुपये मंजूए हुए हैं, जीर्णो=ार के लिए। हमने जब किसी दिन चन्ध्ेसल जाने की बात उससे कही तो उसने कहा, ’’जरूर चलिए।‘‘ देखिए चन्ध्ेसल कब जाना होता है, जीर्णो=ार से पहले या बाद में।
२३.८.२०१६
कुछ नहीं वाला दिन
;१द्ध
कल कुछ नहीं हुआ। ऐसा भला कभी होता है कि किसी दिन कुछ न हो। कुछ न कुछ तो होता ही है। आदमी का वक्त कभी निष्र्‍य और अकेला नहीं गुजरता। कुछ न कुछ चलता रहता है, लेकिन एक लेखक के लिए कुछ होने का मतलब कुछ और होता है और कुछ नहीं होने का मतलब बहुत कुछ भी हो सकता है।
हमारे एक शायर दोस्त हैं, जनाब शाहिद मीर सा। उर्दू की दुनिया में जाना-पहचाना नाम है। हिन्दी के लोग जो उनसे परिचित हैं, उनके मधुर स्वभाव और अच्छी शायरी के बारे में जरूर जानते हैं। मीर साब शास्त्रीय संगीत के जानकार हैं। आवाज बहुत अच्छी है। गाते बहुत अच्छा है। जो उनको सुनता है उसके मह से बरबस वाह निकल पडती है। उनसे बांसवाडा प्रवास के दौरान मुलाकात हुई, सुयोग से जब मैं बाडमेर में था तब वे भी वहीं थे, तब भी एक बार मुलाकात हुई, आश्चर्यजनक तरीके से। वैसे वे सिरोंज भोपाल के हैं। मैं एक बार भोपाल गया, उन्होंने इतना सौजन्य दिखाया कि जहो मैं ठहरा था, वहो मुझसे मिलने आए। खुदा उन्हें लम्बी उम्र दे। वे गजलों के तो माहिर हैं ही, गीत और दोहे भी बहुत अच्छे रचते- गाते है।। उनकी गजलों के कई शेर, कई दोहे मुझे याद हैं। वे मेरे पसन्दीदा शायरों में हैं। उनकी एक गजल का मतला है -
एक गजल जो पूरी है
दिन भर की मजदूरी है।।
एक शायर के लिए एक दिन की दिहाडी एक गजल है। मेरा आशय भी यही था, कल कुछ नहीं हुआ।
पर जैसा मैंने पिर कहा कि भला ऐसा कभी होता है कि कुछ न हो। तो जो हुआ, वही कहते हैं।
;२द्ध
कुछ नहीं होने वाले दिन की बात चल रही थी। जिसे मैंने कुछ नहीं होने वाला दिन कहा, ऐसा मेरा दिन कई अपरोक्ष मंसूबों से दबा पडा था -
सेवानिवृा के बाद ”ी होने का एक सपना होता है। हालांकि कई लोग इसी फिर्‍ में परेशान होते हैं कि अब क्या करेंगे, वक्त कैसे कटेगा। पर मैंने तो सोचा था, ”ी रहेंगे, मस्त रहेंगे। घूमेंगे-फिरेंगे जो मरजी आएगा, वो करेंगे। जब मन होगा लिखेंगे, खूब पढेंगे। बेशक कई सारी लिखने-पढने से सम्बन्धित जो काम थे, वो बाकी थे। लेकिन ये पता न था कि बहुत सारे लोग इसी बात का इंतजार कर रहे थे कि कब हम रिटायर हो और वो हमें ये या वो काम बतावें।
तो ज्योंही लोगों को पता लगना शुरू हुआ कि हम रिटायर हो गए, वे ढढ-ढढ कर हमें काम बताने लगे। जो लोगों के लिहाज से हमारे रिटायरमेन्ट के इंतजार में रुके पडे थे।
कई लोग चाहते थे हम उनके संगठन-संस्था, पत्र-पत्रिका से जुड जाऐ ताकि वो हमारे कंधे पर जूडा रख सकें। कई लोगों का सद्भावी सुझाव था कि हम कोई ऐसी सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक संस्था बना लें, जिसमें सलाह-सुझाव देने वाले निर्देशक महोदय भी अपने अब तक के बकाया अरमानों के फफोले फोड सकें। जैसे कि हम सेवानिवृा प्रशासनिक अधिकारियों की ही एक संस्था बना लें, ताकि भापडे, बिचारे वो लोग जो जन्दगी भर अफसरी का कलफ लगे कडक कपडे पहने रहे, अब कहीं तो अपनी असम्पृक्त लुंगी और सिलवट भरी जन्दगी को लेकर आ जा सकें। कहीं तो, कोई तो उनकी सुनने वाला हो। कोई चारागर हो, कोई गम गुसार हो।
बहरहाल ये सब जन्दगी के मेले के झमेले हैं। जब तक ये मेला है, झमेला रहेगा ही रहेगा। खुशनसीब और बा कमाल फनकार वो है जो मेले में भी रहे और झमेले में भी न फेसे। जो भीड में भी हो और अकेला भी रहे। अकेला भी हो, मगर अलमस्त हो। मुझे एक बार अपनी ही कही हुई बात याद आती है। अपनी तो मैं इसलिए कहता ह कि अल्पज्ञों को सही पता नहीं होता कि वे जिसे अपनी मौलिक बात कह रहे होते हैं, उस बात को उससे पहले कई विज्ञ इससे बेहतर तरीके से कह चुके होते हैं। मैंने नन्द बाबू ;नन्द चतुर्वेदीद्ध के एक साक्षात्कार में पढा था, जिसमें उन्होंने कहा था, ’’मौलिक कुछ भी नहीं होता सिवा मूर्खता के।‘‘ तो वो जुमला जो मैं कहना चाह रहा था, जिसे सुनकर मेरे घर वाले खासकर मेरी पत्नी विचलित और नाराज हो गई थी, ’’ऐसा सम्भव हो सकेगा या नहीं, मैं नहीं जानता। मगर मेरी ख्वाहिश है, मैं अपने घर में मेहमान की तरह, दुनिया में मुसाफिर की तरह और शरीर में पंछी की तरह रहना चाहता ह।‘‘ एक खयाल है, जो विलक्षण और हिलाने वाला है।
मराठी के मशहूर लेखक हुए हैं, गो.नी. दांडेकर। उनकी चार सौ पृष्ठ की पुस्तक है, स्मरण गाथा ;हिन्दी में अनूदितद्ध उसका मुझे राजस्थानी में अनुवाद करना है। दिसम्बर १६ तक कितने पेज रोज करूे
’न्हाण‘ ;सांगोदद्ध लोकोत्सव पर एक पुस्तक रचने की तैयारी है, अगर एक दिन कुछ न होने में निकल जाएगा तो वो किस दिन और कितने दिनों में लिखी जाएगी
पिछले दिनों में कई सारे व्यंग्य लिखे जो यत्र-तत्र, पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए। लगभग एक किताब भर हो गए हैं, उनकी किताब तैयार करनी है। उसके लिए कितने दिन और दिन के कितने घंटे काम करना होगा
जीवन भर कविताऐ लिखीं। हिन्दी-राजस्थानी में। कवि के निकष की चुनौती महसूस हुई तो गद्य लिखने का अभ्यास चालू किया, हिन्दी में, राजस्थानी में। राजस्थानी में कुछ लिखा, जो जैसा मन में आया। वो भी लगभग इतना हो गया कि सेवार कर सम्पादित करें तो एक किताब हो जाए। ओम नागर का कहना है कि इस साल कम से कम ये दो किताबें - हिन्दी व्यंग्य और राजस्थानी गद्य की आ ही जाए।
मेरे कुछ न करने के दिन पर मेरे युवा लेखक मित्रों का भारी दबाव है, वे मुझे डपटते रहते हैं। प्रेरणा देते रहते हैं या य कह सद्भावी अपेक्षा रखते हैं। हरदम मुझे कहते रहते हैं, ’’भाई साहब आप लिखते कम हो, लिखते रहो। नाम गिनाे तो मोटे-मोटे तीन तो हैं ही, अतुल चतुर्वेदी, शरद उपाध्याय और ओम नागर। ये प्रतिभाशाली, मेहनती, स्वाध्यायी युवा लेखक हैं। दुआ करता ह ये सभी यशस्वी हों।
इसके अलावा पिछला जो कविता संग्रह आया है, ’कुछ भी स्थगित नहीं‘ उसके बाद एक संग्रह भर कविताऐ हो गई हैं, उनका कुछ करें।
समय-समय पर यत्र-तत्र, डायरी में लिखी कुछ कथाऐ- लघुकथाऐ हैं, फुटकर विचार हैं। आनन्दीलाल जी के किस्से हैं, दुबले काजी की बातें हैं। इनके अलावा अ”ीकी लोककथाओं के राजस्थानी अनुवाद करा काम आधी किताब होकर अधूरा पडा है, वो कौन करेगा, कब होगा
राजेन्ध् पांचाल जब सूर्यमल्ल पर नाटक तैयार कर रहे थे, मुझसे मिले। वे चाहते थे, सूर्यमल्ल पर कुछ लिख, जिसे नाटक में काम लिया जा सके। उनके संसर्ग सान्निध्य में सूर्यमल्ल जी के बारे में बहुत सारी जानकारी का सुयोग हुआ। हालोकि सूर्यमल्ल पर ’आवारा मसीहा‘ या ’मानस का हंस‘ जैसी किताब लिखने का मेरा बहुत पुराना सपना रहा। पर सपने भर नींद मिली कब, वो हो नहीं सका। राजेन्ध् जी के संसर्ग में कुछ अंट-शंट लिखने की कोशिश करता रहा और अंततः मैंने राजेन्ध् जी को मना कर दिया। इस तरह दबाव में और नियोजित अपेक्षा में, मैं कुछ नहीं लिख सकता। मैं आज तक सरस्वती वन्दना और पन्ध्ह अगस्त पर कविता नहीं लिख सका। कागजों पर, कुछ डायरी में जो कोशिश की थी, राजेन्ध् जी कुछ मूल कुछ फोटोकॉपी कराके ले गए। मेरे लिखे तो कुछ हुआ ही नहीं। बात आई-गई हो गई।
एक दिन जब सूर्यमल्ल की रिहर्सल चल रही थी और नाटक में कुछ संवाद सामग्री प्रकट हुई, उसकी भाषा और उसका प्रवाह मुझे रोचक, प्रभावी लगा। मैंने राजेन्ध् जी से पूछा, ’’ये आपने लिखा है? या, कहाँ से मिला?‘‘ उन्होंने बताया, ’’ये आपने ही तो लिखा है।‘‘ मैं आश्चर्यचकित। ये मैंने कब लिखा? उन्होंने बताया, ’’वो जो आपका लिखा मैं लाया था, उसी में से चुना है।‘‘ मैंने तुरन्त कहा, उसकी एक फोटोकॉपी कराकर मुझे भी देना, उन्होंने दे दी। ऐसा भी कभी होता है कि आपका लिखा, आपको पता ही न हो। कई बार मन में आता है, आवारा मसीहा या मानस का हंस जैसा ग्रंथ जो अब अपुन इस जनम में क्या लिख पाऐगे। सूर्यमल्ल जी से सम्बन्धित जो सामग्री है, उसी के साथ मन केन्ध्ति कर, कुछ रचनात्मक प्रयास करें तो एक पुस्तक नहीं तो पुस्तिका तो हो ही सकती है। पर वो सब एकाग्र होकर, न केवल एकाग्र होकर, एक रचनात्मक एकाग्रता के साथ हो तभी सम्भव है। ये क्या होती है, ’रचनात्मक एकाग्रता‘? गुणीजन जानें। बहरहाल, यह तभी सम्भव है जब लग कर किया जाए। पर क्या कुछ न करने वाले दिन के भरोसे कुछ हो सकता है, जैसे कल कुछ नहीं हुआ।
३० जून, रिटायरमेंट के बाद कागज के दो दस्ते स्पायरल बाइंड कराए हैं। एक में तो वो यादें, संस्मरण जो वक्त-बेवक्त लिखे, उन्हें चिपका दिया। साथ ही इरादा यह है कि, पिछली बीती, गुजरी जन्दगी का कुछ याद आये तो उसे इसमें लिखते रहेंगें। जो लिखे हैं, वो अपने मिलने वालों, यार-दोस्तों को सुनाए तो उन्हें ये रुचिकर लगे। बहुत सारी जगहें हैं, जहो अपुन रहे, बहुत सारे अच्छे-बुरे लोगों से मिलना-जुलना हुआ। तरह-तरह के लोगों से साबका पडा, उन अनुभवों को लिख सकें तो शायद एक लेखक होने का हक अदा हो सके। लेखक होने का क्या हक है और कैसे अदा होगा, कुछ न करने वाले दिन के चलते।
और हो, दूसरा दस्ता जो स्पाइरल कराया है, वो यह रोजनामचा है ही। जिसमें जब जो बनता है, लिखते हैं। लिख लेते हैं और वो जो पहले जिसका जिर्‍ किया, वो है ’याददाश्तों की बही‘।
इसके अलावा और भी कई छोटे-मोटे काम हैं, जो करने हैं। अभी याद नहीं आ रहे। अच्छा ही है वरना बिचारा कुछ न होने वाला तोहमतों के बोझ से और भी लद जाता।
और हो पढना, पढने का काम तो अभी रह ही गया। मैंने बताया या नहीं बताया कि जब आदमी रिटायरमेंट के मुहाने पर होता है, यानि वो जब रिटायर होने वाला होता है तो कई सारे शुभचिंतक ;संसार में या किसी भाषा में अशुभ-चिंतक जैसा शब्द है या नहीं, पता नहीं, कहने में संकोच होता हैद्ध जो कई बरसों से आपकी टोह लेते रहते हैं और पूछते रहते हैं - ’’अब कितने दिन रह गए?‘‘ जैस जन्दगी के दिनों की पूछ रहे हों। मानो हम अब नौकरी करते हुए और रिटायर होने में विलम्ब करते हुए, उन्हें निराश कर रहे हैं। वे कहना चाह रहे हों जैसे ’’जल्दी से हो क्यूं नहीं जाते।‘‘ वे मुहाने पर, किनारे से काफी दूरी पहले ही बैठे मिलते हैं। धीरे-धीरे उनमें और भी शामिल हो जाते हैं। इनकी कई श्रेणियो हो सकती हैं। मुय्त योगी, मुक्त भोगी, भुक्त भोगी वगैरह-वगैरह, वे आपसे अक्सर दो सवाल पूछते हैं। बगैर किसी शील - सौजन्य शर्म - संकोच संस्कार की परवाह के, ’’अब क्या करोगे?‘‘ और दूसरा सवाल, ’’कितने पैसे मिलेंगे?‘‘ अल्लाह रहम करे इन बंदूकों पर ;बंदों परद्ध मन तो होता है मरदूदों कह, पर जाने दीजिये। सवाल-जवाब की डांडा-मेडी अपनी जगह है। हो ये मरदूद एक सवाल और करते हैं पार्टी का, रिटायरमेंट की पार्टी का। अब इन तीनों सवालों के जवाब देने में सीधे-सरल, भले लोग कितनी दुविधा में पड जाते हैं, ये वो ही जानते हैं। आप जान सकते हैं, अगर आप पर गुजरी हो तो।
पर अपने जैसे हर्राफ-हर गुगली खेल लेते हैं। पैसे? पैसों का क्या है? हाथ का मैल है। आनी-जानी माया है। पैसे से क्या होता है, आदमी के मन में संतोष होना चाहिए। जरूरी नहीं कि पैसे से ही आदमी सुखी रह ले, वगैरह- वगैरह। हो, इतने पैसे मिल जाऐगे कि दाल-रोटी चल जाए।
रिटायरमेंट की पार्टी? किस बात की पार्टी? गम की या खुशी की? खुशी? किस बात की खुशी? एक तो तनखा आधी हो गई, पैसे कम मिलेंगे। उमर बढ रही है, थकेंगे। किसी काम के, किसी लायक नहीं रहे, यह समझ कर सरकार में घर बैठा दिया। कमतरी का यह अहसास कोई खुशी देता है। तो फिर किस बात की पार्टी? इसके अलावा, अब क्या करेंगे? वक्त कैसे कटेगा? ये सब सोच फिकर रहेगा। मन नहीं लगेगा। बोर होंगे। फिर खुशी? किस बात की खुशी
’’अरे आप सकुशल सेवानिवृा हो गए, ये कम खुशी की बात है?‘‘ अगला पार्टी लेने के दोव को इतनी आसानी से हाथ से जाने नहीं देता।
’’हो वो तो है। अपुन भी पूरे बल्ले से खेलते हैं। हो सकुशल तो हो गये तो आपको भी तो होगी खुशी, इस बात की। हमारे सकुशल रिटायर होने की। आपको नहीं है?‘‘ अब अगला क्या कहकर नटे। अपनी कही हुई बात को कैसे वापस ले। मजबूरन कहता है, ’’हो-हो क्य नहीं। हमें तो बहुत खुशी है।‘‘
’’तो फिर आप ही क्य नहीं दे देते इस खुशी में पार्टी। अपने मिलने वालों की लिस्ट में आपको दे देता ह या आप कहें तो मैं ही इन्फोर्म कर दगा। जगह और वक्त, तारीख आप बता दें।‘‘
बिचारा। किसी बिचारे को ऐसी उम्मीद नहीं हो सकती, दो मुहावरों जैसी - उल्टे बांस बरेली को, और नमाज पढने जाने पर रोजे गले पडना। पर हिम्मत नहीं हारता कभी लबार। ’’हो-हो क्य नहीं, हम दे देंगे पार्टी, ऐसी क्या बात है?‘‘
और अब तीसरा सवाल, अब क्या करोगे? उन्हें कौन बताए कि कितने लोग, कितने काम, हमारे रिटायर होने का इंतजार कर रहे हैं। उन्हें क्या गिनाते, पर फिर भी य कहते हैं, ’’एक तो सबसे पहला काम कि दय्तर नहीं जायेंगे। दूसरा जो अपनी मर्जी आएगी, वो करेंगे।‘‘ ’’हो-हो आप तो लेखक हैं न, लिखने का काम करने का खूब समय मिलेगा।‘‘
अब उन्हें कौन बताए कि खाली समय होने भर से लिखना नहीं होता। लिखना और मरना बराबर है। मरना पडता है ;मुझे मरना क्या बुरा था, अगर एक बार होताद्ध। पर उनसे ये कहने की बजाय ये कहते, ’’देखिए, अभी मेरे पास मेरे घर पर इतनी किताबें हैं और इतनी किताबों के नाम मुझे पता है, जिन्हें पढने की मुझे हसरत है कि मैं उन सबको पढगा। तो अगर मैं पढने के सिवा कुछ न करूे तो भी यह जन्दगी जो बची है, मुझे कम पडेगी और उन किताबों को पढते हुए मुझे जो और किताबों के बारे में पता चलेगा, उन्हें पढने के लिए मुझे कई जन्म और लेने पडेंगे। वो बिचारा नाटक बटेर ज्य फेसा।
चलिए रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले पैसों की बात छोड दे, पार्टी की बात छोड दे, लेकिन पढने की बात कैसे छोड दें। कैसी-कैसी कितनी-कितनी किताबें हैं जो अभी पढनी हैं। जो अधूरी-अधूरी है, चल रही है, वे पूरी हों, तभी तो। एक पूरी नहीं हो पाती, दूसरी शुरू हो जाती है।
इतने सारे काम, इतनी सारी हसरतें और इस पर कुछ न होने वाला दिन। सोचते हैं, इससे तो नौकरी कर रहे थे, वो ही अच्छा था। एक बहाना तो था। जो कुछ भी करने का इरादा या ख्वाहिश थी, वो रिटायरमेंट के बाद करेंगे, ये उम्मीद तो थी। उस समय जो भी कम का थैला होता था, उसे रिटायरमेंट की खटी पर टोग देते थे। रिटायरमेंट के बाद लगता है कि उस खटी पर इतने थैले लटक रहे हैं, जिन्हें उतार कर गिनना ही भारी लगता है। अब तो लगता है ये लडाई जैसे दीये और तूफान की है। इससे अच्छा तो यही था, रिटायर ही न होते।
और इस पर कुछ न होने वाला दिन।
दरअसल हकीकत में ऐसा नहीं है कि कल का दिन बिना कुछ हुए गुजरा हो। कल के दिन क्या-क्या हुआ, ये तो लिखना, बताना अभी बाकी है।