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देहदान

चंद्रकांता आसनानी
आज उसका ५०वां जन्मदिन है। सामने सूरज की धूप खिडकिय से अन्दर झोक रही है। रोज ४ बजे उठने वाली नन्दिनी को सोते-सोते पता ही नहीं चला है कि ७ बजे हैं। मुझे भी बडा आश्चर्य हुआ कि अलसुबह सबसे पहले राट्टो कृष्ण कहने वाली नन्दिनी काकी अब तक क्यों नहीं आयीं। कल रात को १२ बजे तक अपनी बातें बताती रहीं। इससे पहले कभी इतनी बातें नहीं की थीं उन्होंने। मुझे भी सोने में देर हो गई थी। इसलिए जल्दी उठकर योगा क्लास में नहीं जा पाई। शायद ऑफिस में मुझे न पाकर वापस वो अपने कमरे में चली गई होंगी। यह सोचकर मैं भी अपने काम में लग गयी, पर आज मेरा मन नहीं लग रहा था।
तभी अचानक पुष्पा दौडती हुई आई और बोली, ’’मैडम जल्दी चलो, आज नन्दिनी काकी अपने कमरे का दरवाजा नहीं खोल रही है।‘‘ मैंने कहा, ’’पुष्पा! उन्हें झपकी आ गई होगी, तू दरवाजा थोडा जोर से खटखटा दे।‘‘ पुष्पा ने कहा, ’’नहीं मेमसाहब, बहुत देर हो गई है और उन्हें सुबह से किसी ने देखा भी नहीं है।‘‘ उसकी ये बात सुनकर मैं भी घबरा गई और जल्दी से उसके साथ हो गई। जैसे ही नन्दिनी काकी के दरवाजे पर पहची, वहो लोगों की भीड जमा थी, सभी लोग दरवाजा पीट रहे थे, पर अन्दर सन्नाटा छाया था। वहो से कोई आवाज ही नहीं आ रही थी। अब तो मुझे भी घुटन सी महसूस होने लगी थी। आखिर शम्भू को दरवाजा तोडने के लिए बुलाना पडा। दरवाजा तोडने में आधा घण्टे का समय लग गया।
फिर हमने कमरे के अन्दर देखा कि जमीन पर शांत मुध में श्वेत वस्त्र में लिपटी नन्दिनी काकी जैसे चिर निध में सो रही थीं। ना चेहरे पर कोई हावभाव, ना हलचल, उनका शांत-प्रशांत मुखमंडल, चमकता ललाट व बोलती ओखें मानो कुछ कह रहे हों। जैसे अभी ये उठकर कुछ बोलने लगेगी। पर ऐसा नहीं हुआ, डॉक्टर को बुलाया गया। चैक करने के बाद डॉक्टर ने मृत्यु १-२ घण्टे पूर्व होना बताया और उसकी स्थिति को देखकर कहा कि इनका देहान्त क्तदयाघात से हुआ है।
हमें विचार आया कि काकी की सहनशक्ति और धैर्य इतना प्रबल था कि किसी को परेशानी ना हो इसलिए अटैक आने पर उस दर्द को सहन करती हुई जमीन पर चड्ढर ओढ कर सो गई और स्वर्गारोहण कब हुआ, उन्हें आभास ही नहीं हुआ। ऐसे लोग विरले ही होते हैं। आज मेरा मन फूट-फूट कर रोना चाहता था। मृत्यु के बाद ही औरत की सहनशक्ति का मूल्यांकन होकर उसे ग्रेड मिलती है या फिर जीवनभर परीक्षा देते हुए प्राणांत की ग्रेड ही उसका मूल्यांकन या नियति बन कर रह जाती है। कल रात को अपने धैर्य का बोट्टा तोडते हुए वो मेरे पास आकर बैठी और बातों ही बातों में बोली, ’’मैडम जी! कल मैं रह ना रह, छाती पर बोझ बहुत है। जीवनभर उसे संभालना मेरे बस की बात नहीं रही, अब मैं सब कुछ उतार कर यहीं छोडना चाहती ह। सो आप से थोडी देर बातें करना चाहती ह।‘‘ मैंने उन्हें बडे प्यार से पूछा, ’’क्या बात है नन्दिनी काकी! किसी की याद आ रही है क्या?‘‘ पर बिना हावभाव बदले वे बोलीं, ’’मैंने आपसे झूठ बोला था कि मेरे पति और बाल-बच्चे नहीं हैं।‘‘
यह सुनकर मुझे बडा आश्चर्य हुआ पर अपने मन को काबू में रखकर उनकी बातें सुनने लगीं। वे बोली, ’’मैडम जी! मैं अनपढ नहीं, बारहवीं पढी ह, लेकिन किसी ने मेरी पढाई की कदर नहीं की इसलिए मैं भी उसे भूलती चली गई। सत्रह साल की उम्र में बारहवीं पढते ही मेरे मो-बाप को मेरे ब्याह की चिंता सताने लगी और मेरा रिश्ता ढढने लगे। रिश्ते तो बहुत आये पर गरीब घर की बेटी से कौन रिश्ता करे, यही सोच कर सब चले जाते। कुछ दिनों बाद जाति-बिरादरी का एक लडका मिला। संयोग से कुनबा बहुत बडा था पर लडके के मो-बाप बहुत लालची थे। सब कुछ जानकारी होने के बावजूद मेरे मो-बाप को तो अपना बोझ हल्का करना था। अतः ओखें मदकर मेरा ब्याह तय कर दिया। मैं भी लाल चुनरी ओढकर मोग को सजाकर हाथों में मेहन्दी लगाकर ढेर सारे सपने बुनती हुई ब्याह करने को राजी हो गई। बारात आई और मण्डप में फेरे हुए, ब्याह कर ससुराल आ गई। घर की चौखट पर पैर भी नहीं रखा कि मेरे सास-ससुर व अन्य सब लोग दहेज का सामान देखकर एक दूसरे पर चिल्ला रहे थे। कहाँ गरीब के घर में छोरे का ब्याह कर दिया, एक भी सामान ढंग का नहीं लायी। चौखट पर औरतों ने मंगल गीत गाने शुरू किये, तो सास बाहर आयी और बोली, ’’बंद करो ये गीत गान, कुछ ना लाई है तो लक्ष्मी कैसी, क्या आरती उतारूे और क्या नेग बोट, मेरे तो छोरे की जिन्दगी खराब हो गई। कितने सालों से मोटर साइकिल की आस में बैठा था, रोजाना बोलता अम्मा थने मोटरसाइकिल पर घुमाेगा।‘‘
ओखों में ओसू लिये दुल्हनिया घर में आ गयी। मेरा पति तो मो की बात सुनते ही मेरा पल्लू छुडा रफूचक्कर हो गया और मैं ऐसी दिसम्बर की सर्दी की रात खुले चौक में बैठकर इंतजार करती रही कि कोई मुझे भी कमरे में ले जाएगा। चौक में ऐसी सर्दी में ही मुझे नींद आ गई। आधी रात गुजरी तो दरवाजा पीटने की आवाज आई, दरवाजा खोलने कोई न उठा तो मैंने ट्टाीरे से दरवाजा खोला तो देखा कि शराब के नशे में धुा मेरा पति बाहर खडा है। मैंने उसे अन्दर लाकर चौक में बिठाया तो नशे में बोलने लगा, ’’खुद तो रेशम की चड्ढर में लिपटी है और मुझे यहो सुला रही है।‘‘ ऐसे बोलते-बोलते खुद ही अपने कमरे की तरफ चल दिया।
मैं भी पति के पीछे-पीछे चली, आगे देखा कि कमरा फूलों से सजा रखा था, पर उसमें मेरे सास-ससुर रजाई ओढ कर सो रहे थे। बेटा भी उनके पास जाकर सो गया। मैं फिर से चौक में सीढयों की ओट में आकर बैठ गई। उस रात से जो सपने चकनाचूर होना शुरू हुए तो फिर आगे कभी बुनने का वक्त ही भगवान ने नहीं दिया। ओख लगी ही थी कि सास ने ठण्डा पानी डालकर उठा दिया बोली, ’’सोने के लिए लाये हैं क्या? चल उठ, ये गहने खोल दे और लग जा काम पे।‘‘ सारा बदन ठण्डे पानी से सिहर गया, कपडे बदलने कमरे में गई तो ससुर गीले बदन पर नजर गडा कर बैठ गया। बाहर सास बार-बार बुला रही थी, इधर ससुर बाहर जाए तो कपडे बदल।
तभी पतिदेव की नींद खुली, बोले - ’’क्या बात है बाबा? या तो सो जाओ या बाहर जाओ, आज मेरी सुहागरात है।‘‘ ससुर जी बाहर गये तो गिरगिट की तरह रंग बदलते हुए पतिदेव ने आकर मुझे अपनी बाहों में भर लिया और प्यार करने लगे। सत्रह साल में पहली बार का मिलन, वो भी इस तरह से, सोचकर आज भी वो दिन भूल नहीं पाती। दरवाजा खुला था, सासू मो अन्दर चली आयीं और चिल्लाने लगीं, ’’शर्म ना आयी, मैं बाहर काम के लिए बुला रही ह और तू यहो रंगरेलियो मना रही है।‘‘ उसी हालत में खींच कर बाहर ले गई और काम पर लगा दिया।
काम करते-करते दिन, महीने, बरस निकल गये। एक-एक करके चार बच्चे गोद में आ गये। घर के काम और बच्चों की परवरिश ने समझ से पहले ही मुझे बूढी बना दिया। पर सास को चैन न आया, रोज के ताने व मारपीट जीवन का अंग बन गये। एक दिन फिर एक तूफान आया। साथ में सरिता बुआ को लाया। दोनों ननद-भाभी की बहुत बनती थी। अब अत्याचार दुगुना हो गया। रोज-रोज की किट-किट से भी अब उन्हें चैन नहीं मिलता था। आखिर उन्होंने मुझे घर से बाहर निकालने का फैसला कर लिया। किसी बहाने से मेरे भाई को बुलाया और चारों बच्चे छीनकर मुझे घर से बाहर निकाल दिया।
मैं रोती-बिलखती रही पर घर के किसी सदस्य ने मेरी बात न सुनी और धक्के देकर बाहर निकाल दिया। भाई ने रास्ते में छोड दिया और अपने घर चला गया। मो-बाप दुनिया में रहे नहीं, अब मैं कहाँ जाती? उम्र २५ की, किन्तु शरीर कमजोर, काम करने की शक्ति भी नहीं। फिर भी पेट तो भरना ही था, सो एक जगह मजदूरी की, पर वहो पर काम ज्यादा लम्बा नहीं चला। दुनिया की गंदी नजरें मेरे ओचल को हर जगह तार-तार करने लगी। तब इस संभ्रान्त परिवार की आसरा मिला और २५ साल से यहो रोटियो बना रही ह। अब इस बूढी काया में ताकत नहीं रही।
कुछ दिन पहले मण्डी में सब्जियो ले रही थी। तो मेरा पति मिला, पहचान कर भी अनजान बनी रही। पता चला, दूसरी शादी कर ली थी। दहेज तो बहुत मिला, पर पत्नी ऐसी मिली कि आते ही सब पर हुकुम चलाया और सबसे काम करवाया। सबका जीना हराम करके रख दिया उसने। मेरे चारों बच्चे एक-एक करके बीमारियों से घिरते गये, आज एक भी धरती पर नहीं है। पति के पैर में लकवा हो गया, कोई सेवा करने वाला नहीं है। अब तो मेरी भी उम्र हो चली है, मुझसे मेरे स्वयं के कार्य ही नहीं होते, मैं किसी की सेवा क्या करूेगी। पानी देने वाला तो कोई बचा नहीं, तो आग कौन दे और र्‍याकर्म कौन करेगा।‘‘
अन्त में काकी ने कहा, ’’ऐसे में मैडम! आप मेरा एक काम कर देना, आज ही अखबार में पढा था, देहदान कर रहे हैं लोग, मैं भी देहदान करना चाहती ह। अस्पताल में कल मेरा नाम लिखा देना। औरत का तो कोई घर ना होवे है। पहला घर मो-बाप का था, जह बोझ समझ करके उतार दिया। पति पहली रात से ही भोगने की वस्तु समझ बैठा। बच्चों का सुख नसीब में होकर भी भगवान ने मुझे बेऔलाद बनाकर इस मो की ममता को रौंद डाला। अब बताओ क्या देह के र्‍याकर्म को छोडकर आत्मा को यहीं शान्त कर द? बाकी आगे उस प्रभु की महिमा वो ही जाने।‘‘
अचानक एम्बुलेन्स की आवाज सुनकर मैं खयालों से बाहर आयी और वहो खडे डॉक्टर को मृत नन्दिनी काकी के देहदान विषयक विचारों से अवगत कराया। डॉक्टर ने भी काकी की अंतिम इच्छापूर्ति के लिये उसी के आदेश के अनुसार पूरी कार्यवाही कर उनकी देह को मेडिकल कॉलेज को सौंप कर उस दिव्य जीवन को अंतिम विदाई दी। मैं बार-बार इसी बात को सोचने को मजबूर थी कि बेटी के रूप में जन्म लेने वाली, लक्ष्मी-सरस्वती व काली के रूप में पूजी जाने वाली, जन-जन के जीवन को खुशियों से भरने वाली, नई जिंदगी को जन्म देकर उसका पालन करने वाली नारी के जीवन का अंतिम उड्ढेश्य देहदान ही है क्या? वस्तुतः विषय की वृहद्ता नारी जीवन को समेट पाने में असमर्थ है।