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तीन गीत

प्रभात गुप्त
(1)
थोडी बहुत जरूरत में भी
हमसे नहीं मिले
बिन मौसम खिलने वाले भी
मौसम नहीं खिले।
क्या था जाने उन गलियों में
बसती थीं यादें
हर छोटी सी बात कसम की
और बहुत वादे।
सबसे मिले गले वे लेकिन
हमसे नहीं मिले।
क्या हो जाता पास तुम्हारे
बैठे बतियाते
उम्र निकल ही जाती य ही
कुछ हेसते गाते।
अपने घाव घाव हैं जिंदा
अब तक नहीं सिले।
औरों को दोहरायें क्यों कर
अपनी बात करें
अपने गम हों अपनी खुशियो
खुद बरसात करें।
खुद से ही परिचय पा जाते
बरगद बैठ तले।
(2)
लिखते तो अच्छा ही होता
लिखा नहीं लेकिन
बिना लिखे ही तुम पढ लेते
पढा नहीं लेकिन।
कुछ कहने से तो अच्छा था
चुप रह समझाते
बिन बोले ही मन की बातें
समझ अगर पाते।
बीते हैं चौमासे कितने
बीते हैं पल छिन।
दूर बहुत है अपने मन का
मंदिर किसे कहें
हेसकर ही जीना है पीडा
अपनी किसे कहें।
और बीत जाऐगे ये दिन
कौन रहा है गिन !
(3)
मैंने कागज पर लिख डाला नाम तुम्हारा
अब चाहे जो सजा मुझे दो अपराधी मैं।
मैंने रंग भरे हैं ऐसे चित्र बनाए अभी बोलते
कानाफूसी करते मन की परत खोलते
षिा की लाली कोयल की कूक निराली
मन के बादल कभी यहो कुछ उधर डोलते।
एक घरौंदे पर लिख डाला नाम तुम्हारा
अब चाहे जो सजा मुझे दो अपराधी मैं।
कभी सैकडों तूफानों से ली है टक्कर
झंझावातों में भी पकडी हैं पतवारें
कभी अमावस की रातों में दिए जलाए
रही न ग्लानि कभी जीत कर भी हैं हारे।
मौलिक पुस्तक पर लिख डाला नाम तुम्हारा
अब चाहे जो सजा मुझे दो अपराधी मैं।