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उम्मीदों के पंख

काव्य-सर्जना लहरी राम मीना
उम्मीदों के पंख
उम्मीद लिये निकलता ह घर से
और उसी उम्मीद के साथ लौटता ह
रात को घर
नहीं मिलता फिर भी कुछ
रहती है उम्मीद, केवल उम्मीद
उम्मीद तो है जो देती है
सुबह से शाम तक इट्टार से उट्टार
दौडने की जिार्
इसी उम्मीद के सहारे ह
अब तक जिंदा
इसी से बसर करता ह
रात-दिन
ईमानदारी से अपना काम
उम्मीद ही है जो कराती रहती है
मुझे मनुष्य होने का असहास
इसी उम्मीद ;जिार्द्ध के बल पर
देता ह
मैं अपनी उम्मीदों को पंख।