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भिन्नता

लहरी राम मीना
मैं नहीं हो पाया
तुम्हारी नजर में
जो ह।
तुम जो हो नहीं हो पायी
मेरी नजर में
तुम जैसी।
तुम्हारी नजर में, मैं
तुम जैसा होना चाहता ह
एक दूसरे की भिन्नता का
कितना फर्क है।
भिन्नता को समझना होगा
एक दूसरे के लिये
भिन्नता ही तो आज की नियति है
एक दूजे के होकर भी
न होकर रह जाना।