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आनन्द

अंजना अनिल

अजब अनूठी... मीठी
सिहरन सा... वो दिन
निराला होता है
जब पंछी के कलरव सी
विरल अभिव्यक्ति
कलम की नोक पर
आ बैठती है...
सूरज के उगते प्रकाश संग
रंग-बिरंगी आस्थाओं की अल्पना
घर द्वार
सजा देती है!
लगता है... ग्राम परिवेश
मानस के आकाश को
अपनी सुरम्यता से
आच्छादित कर देता है...
शनैः शनैः
असमानताऐ!
असहजताऐ!
आहत भावनाऐ
कहीं गुम होने लगती हैं।
शब्दों के भीतर की
स्पर्श गाथा
एक आनन्द बन जाती है...
देखते ही देखते
कागज पर
कविता उतर आती है।