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संवाद निरन्तर

प्रशंसा से परहेज क्यों?
आदरणीय संपादक जी, सादर नमस्कार।
जून 2019 का मधुमती अंक पढा। अन्य पूर्ववत् अंकों की भाँति यह अंक भी सराहनीय एवं संग्रहणीय है, अलबत्ता पत्रिका की भाषा कठिन एवं उच्च कोटि की है इससे लगता है कि यह पत्रिका सिर्फ साहित्यकारों के लिए है आम जनता के लिए नहीं। फिलहाल प्रशंसा पर पाबंदी में आपका मंतव्य समझने में असमर्थ रहा, खासकर वर्तमान दौर में प्रशंसा में अपेक्षाकृत कमी आई है, हाँ चाटुकारिता और परनिन्दा खूब फल-फूल रहे हैं। दरअस्ल प्रशंसा का मानव जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान है, यह आत्मविश्वास तथा नई ऊर्जा का स्रोत है, किसी विशिष्ट कार्य या उपलब्धि की मान्यता (रिकग्निशन) तो है ही। यह अन्य के अलावा प्रेरणास्रोत एवं ‘रोल मॉडेल’ भी है। इसको हम और अच्छी तरह से यूँ समझ सकते हैं, किसी भी व्यक्ति को नेक कार्य के लिए सम्मानित किया गया, उसके कार्य को मान्यता मिली, वह अन्य लोगों के लिए आदर्श एवं प्रेरणास्रोत बना। और इससें भी बडी बात यह है कि उसके दिमाग में यह बात सदैव रहेगी कि उसे नेक कार्य के लिए सम्मानित किया गया, वह गलत काम से बचेगा। उसे इस बात का बराबर एहसास रहेगा कि मुझसे कुछ ऐसा न हो जाय कि कलंक का पात्र बन, सम्मान देने वाले को भी पछताना पडे। इस प्रकार प्रशंसा एक सकारात्मक प्रक्रिया है। हाँ यह अवश्य है कि सम्मानित व्यक्ति में अहंकार नहीं आना चाहिए। दूसरी बात चाटुकारिता की भी कडे शब्दो में निंदा की जानी चाहिए। प्रशंसा एवं चाटुकारिता के अंतर को भी समझना होगा। रचना सामग्री का विश्लेषण तो निश्चय ही होना चाहिए और यह एक अच्छी बात भी है। पर सच्चा विश्लेषण तो वही है जो दूध का दूध और पानी का पानी करे, ऐसे में प्रशंसा या निन्दा होना स्वाभाविक है। कवि सम्मेलन मुशायरा में वाह! वाह!, ताली न बजे, यह भला कैसे हो सकता है। यह वाह! वाह! ताली बजाना अच्छी प्रस्तुतिकरण के उत्साहवर्धन हेतु प्रशंसा ही तो है। आज क्रिकेट पूरी दूनिया में छाया हुआ है, यहाँ भी विराट कोहली एवं महेंद्र सिंह धोनी अपने-अपने कुछ खास प्रशंसकों को क्रिकेट का टिकट भिजवाते हैं, कोई मेधावी छात्र जब बोर्ड या विश्वविद्यालय टाप करता है, जज या आई.ए.एस. बनता है, ऊँचे दर्जे का कवि या लेखक बनता है तो उसकी प्रशंसा होती है। उपन्यास सम्राट प्रेमचंद आज नहीं हैं पर उनकी कृति की प्रशंसा जब तक पृथ्वी है होती रहेगी, कहाँ तक गिनाऊं। जीवन में पग-पग पर इसका महत्त्व है। मै स्वयं अपनी बात करूँ, मैं एम.ए., एलएल.बी हूँ। समाज सेवा एवं आपराधिक व्यक्तियों के सुधारात्मक कार्य से लम्बे अरसे से जुडा हूँ, नई दिल्ली में ज्यूनाइल जस्टिस एक्ट के तहत 6 वर्ष तक मजिस्ट्रेट भी रहा, कहने का आशय यह कि समाज सेवा सामाजिक चिंतन मेरे स्वभाव में है, मेरी प्राथमिकता है (उक्त बातें गर्वोक्ति नहीं सिर्फ सूचना मात्र हैं) 5-6 वर्ष पूर्व मधुमती पत्रिका किसी मित्र के माध्यम से मिली, इस पत्रिका से इतना प्रभावित हुआ कि एक तो इसका नियमित पाठक बना, दूसरे हिन्दी साहित्य में मेरी रुचि बढी। अब नियमित रूप से राष्ट्रीय स्तर के समाचार पत्र में हास्य व्यंग्य छपता है, कुछ कहानियाँ भी स्तरीय पत्रिकाओं में छपी हैं। (यद्यपि 1964-65 में जब एम.ए. का छात्र था तभी से सामाजिक विषयों पर मेरे लेख प्रकाशित होत रहे है पर साहित्यिक हिस्सेदारी शून्य रही) मैं इसका श्रेय सिर्फ और सिर्फ मधुमती पत्रिका को देता हूँ और यह बात मैं विभिन्न मंचों से लोगों को बताता भी रहता हूँ। जिस पत्रिका ने मेरे छिपे गुणों को समाज के सामने लाया उसकी प्रशंसा किये बिना मैं कैसे रह सकता हूँ। लब्बो-लुआब यह है कि अन्य कई लोगों की भाँति मेरा भी मानना है कि प्रशंसा एक सकारात्मक, प्रेरणाप्रद एवं उत्साहवर्धक प्रक्रिया है, जिसे जीवन से मिटाया नहीं जा सकता। और अंत में इसका निर्णय मैं आप पर ही छोडता हूँ।
महोदय! क्या नवम्बर का अंक ‘बाल साहित्य विशेषांक’ निकालने की कृपा करेंगे? दूसरी बात, क्या भारत की विभिन्न भाषाओं, खासकर मुख्य भाषाओं का विशेषांक निकलना सम्भव हो पायेगा।
सादर!
आर.बी. यादव, गोरखपुर