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विलुप्ति के विरोध को स्वर देने वाले कवि

यादवेन्द्र
कविता के लिए दो बार सम्मानित पुलित्*ार पुरस्कार जीतने वाले अमेरिकी कवि विलियम स्टेनली (डब्ल्यू एस) मेरविन 1927 में न्यूयॉर्क में एक पादरी के बेटे के तौर पर पैदा हुए। बचपन से चर्च में अपने पिता के ओजस्वी धार्मिक भाषण सुन कर भाषा की जादुई शक्ति से चमत्कृत थे और तभी उन्होंने बडे होकर भाषा की संपदा के साथ जीवन बिताने का संकल्प ले लिया था।
दिलचस्प बात यह है कि 1952 में प्रकाशित अपने पहले कविता संकलन के लिए अंग्रेजी के ख्यातनाम कवि डब्ल्यू एच ऑडेन की भरपूर तारीफ पाने वाले मेरविन 1971 में उनके कोपभाजन बने जब उन्होंने अपने पुरस्कार की राशि युद्ध विरोधी आंदोलन को दान कर दी। 2010 में वे अमेरिका के पोएट लॉरिएट भी नियुक्त किये गए।
प्रकृति की अनिवार्य सत्ता और उसमें मामूली इंसान और छोटी से छोटी वस्तु के अस्तित्व को पूरी शिद्दत से रेखांकित करना मेरविन की कविताओं का केन्द्रीय विषय रहा है। उनकी दृढ मान्यता थी कि धरती के अन्य प्राणियों और वस्तुओं की तरह ही इंसान भी उनका सहवासी है न कि कोई उच्चतर, नियंत्रणकारी और शोषक शक्ति।
अनेक समालोचक मेरविन को विलुप्ति के विरोध का प्रतिनिधि स्वर मानते हैं। यह विलुप्ति मनुष्य की हो सकती है, प्रकृति की हो सकती और... भाषा की भी। 2019 में मेरविन ने अंतिम साँसें लीं।
भूली बिसरी भाषा
वाक्यों को पीछे छोड साँस आगे बढ जाती है
जो अब नहीं लौटेगी कभी दुबारा
फिर भी बडे बूढे उन बातों को याद करते ही हैं
जो उनकी *ाुबान पर आते आते रह गईं
वे अब यह जान गए हैं कि
लोग उनकी बातों पर शायद ही यकीन करें
नौजवानों के पास बचे ही नहीं हैं ज्यादा शब्द
और उन बचे खुचे शब्दों से जुडी तमाम ची*ों
गुम भी तो हो गईं एक एक कर

जैसे, कोहरे में किसी भुतहे पेड से
सट कर खडे होने की संज्ञा
या कि मैं के लिए क्रिया पद
बच्चे उन मुहावरों को अब कभी नहीं दुहरायेंगे
जिन्हें घडी घडी बोलते बोलते गु*ार गए
उनके माँ बाप

जाने किसने उन्हें घुट्टी पिला दी
कि हर बात को नए ढंग से कहना ही चलन है
आज का

और इसी तरह उन्हें मिलेगी प्रशंसा
सुदूर देशों में
जहाँ किसी को कुछ पता ही नहीं कुछ
हमारी ची*ाों के बारे में
आपस में भला कह-सुन क्या पाएंगे हम ऐसे में
दरअस्ल हमें जाहिल और काला कलूटा समझते हैं
नए आका
कुछ समझ नहीं आता
क्या क्या बकता रहता है उनका रेडियो।
जब कभी काँच के दरवा*ो पर होती है कोई आहट
सामने खडा मिलता है कोई न कोई अचीन्हा
सब जगह तैरते रहते हैं झूठ
हजारों हजार ची*ाों के नाम के बदले
कोई नहीं है यहाँ
जिसने अपनी आँखों देखा हो
यह सब बदलते हुए
न ही आता है याद किसी को कोई खास वाकया
शब्द आखिर इन्हीं कामों के लिए तो बने थे
कि बता सकें हमें संभावित परिवर्तनों के बारे में...

यहीं किसी कोने में पडे होंगे गुम हो गए पंख
और यहीं कहीं होगी बचपन की वो
मूसलाधार बारिश...

शुक्रिया

सुनो
रात उतर रही है और हम कहते हैं शुक्रिया
हम पुलों पर ठहरते हैं, झुकते हैं इसके रेलिंग पर

शीशे के घरों से निकलते हैं हम बाहर
मुँह में ठूँसे हुए खाना और निहारने लगते हैं आकाश
फिर बोलते हैं ः शुक्रिया!
पानी के बगल में खडे होकर
हम शुक्राना अदा करते हैं पानी का
खिडकियों पर खडे होकर निहारते हैं बाहर का न*ाारा
अपनी ही दिशा में
अस्पतालों के चक्कर लगा कर
लूट खसोट कर के लौटने के बाद
या अंत्येष्टियों से लौट कर आते हैं
तो बोलते हैं ः शुक्रिया !
जो इंसान मर गया
चाहे उसे चीन्हते हों या नहीं
बोलते ही हैं ः शुक्रिया!

टेलीफोन पर हम बार बार दुहराते रहते हैं ः
शुक्रिया !
चौखटों पर हों, कार में बैठे हों पिछली सीट पर
या एलीवेटर में ऊपर नीचे कर रहे हों
हर जगह हम बोलते रहते हैं ः शुक्रिया !
युद्ध को याद करें तो शुक्रिया !
या दरवा*ो पर आ खडे हों पुलिस वाले
तो कहते हैं ः शुक्रिया !
कोई सीढियों पर पैर पटक पटक कर चल रहा है

अपने आसपास दम तोडते जानवरों को देखते हुए
भावविह्वल हो जाते हैं हम
तब बोल पडते हैं ः शुक्रिया !
घडी की सुई से तेज रफ्तार में
देखते हैं कि कैसे कटते जा रहे हैं जंगल
तब भी हम अदा करते हैं शुक्रिया
दिमाग से जैसे पट पट मरते जा रहे हैं सेल
वैसे ही गुम होते जा रहे शब्दों को देख कर भी
हम यही कहते हैं ः शुक्रिया !
शुक्रिया!

दैत्य की मानिंद जैसे जैसे हमें
निगलते जा रहे हैं शहर
वैसे वैसे बदहवासी में हम रटते जा रहे हैं ः
शुक्रिया !
शुक्रिया !

कहीं कोई सुने न सुने बस हम बोलते जा रहे हैं ः
शुक्रिया !
शुक्रिया !
शुक्रिया ... शुक्रिया का जाप करते जा रहे हैं हम
हाथ हिलाते जा रहे हैं बावलों जैसे
आसपास तेजी से घिरते जाते अंधेरे में ...
जैसे कोई तितली

खुशी की बडी मुश्किल होती है उसका मौका
कुछ बताये बगैर ये अपने घेरे में ले सकती है मुझे
और जब तक चेतूँ ये अंतर्धान भी हो जा सकती है...
ये भी हो सकता है बिलकुल मेरे सामने ही खडी हो
और मुझे इसके पहचान न आये
मैं सोचता रह जाऊं किसी और बात की बाबत
यह दूसरा युग हो सकता है या कोई ऐसा इंसान
जिसे न तो बरसों बरस से मैंने देखा हो
और न ही देखने का सबब बने इस जीवन में...
ऐसा लगता है मुझे आह्लादित करने लगी है
ऐसी खुशियाँ जो मंडरा तो मेरे आसपास रही थीं
पर मैं उनसे वाकिफ नहीं था
हालाँकि इर्द-गिर्द होते हुए भी
मेरी पहुँच से बाहर हो सकती थीं वे
फिर इन्हें न तो पकडा जा सकता
न ही नाम ले कर पुकारा जा सकता
और न ही वापस बुलाया जा सकता गुहार लगा कर।

मैं अपनी दिली ख्वाहिशों की सुनने लगूँ
और रोक के बिठा लूँ अपने पास
तो मुमकिन है..यह खुशी
हाँ...यही खुशी
रूप बदल कर
बन जाए पीडा।