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तीन कविताएँ

लता खत्री
एक

आज-कल
अक्सर तुमको
ढूँढती हूँ अपनी बातों में!
आस-पास!
उम्र के इस पडाव पर,
और सोचती हूं..
तुम्हारे अंदर
क्या चलता था मां?

ये उम्र!
जो ना बूढी है ना जवान
ना आ*ाादी मान्य है इसे
ना बंधन को स्वीकार कर पा रही!
मन क्या जाले बुनता था ?

क्या होता है,
जब कोमलता पिघलने लगती है
उम्र की खुरदुरी सतह पर..
और धीरे धीरे वहाँ
उग आती है
कोंपलें कीलों सी कठोर!
क्या तुमको भी ये अखरता था ?

तुम अपने सारे सवाल
कहाँ दफनाती थी मां?


दो

तुम्हारे घाट पर
रुके पानी से
किचकिचाते कुंड में
हिचकियां लेती हैं मृतक आत्माएं
पुनः मुक्ति को तरसती

किसी फूलों की क्यारी में
करना तर्पण
किसी से नहीं
घुलने-मिलने वाली
उस लडकी का..

‘एडजस्ट’ शब्द का अर्थ
बताने वाला
शब्दकोश यहीं
जला देना साथ चिता में

वहां तलाशेंगे
हवा, खुशबू, हंसी के
नये मानी
वहां नहीं चाहिए
रुके घाट का पानी

तीन

दिन उगता है अभी तक
दोपहर-शाम-रात यथावत् आती जाती है
यूँ ही चिडिया ले आ रही तिनके
हवा पर अभी तक नहीं लगी रोकटोक
गली का टॉमी खुश होता है
कचरा बीनते हुए बच्चों को देखकर वैसे ही

मेरी दिनचर्चा छोटे होते जाते
शरद के दिनों की तरह
हडबडाहट में
लगभग वैसी ही है

‘कुछ भी तो नहीं बदला’
कहना था तुमसे बसंत!
मगर,
मोहल्ले का लेटर बॉक्स
नदारद है इन दिनों
और नये डाकियों की भर्ती पर
सरकारी रोक लग गई है

फिर तुम्हारा स्थाई पता भी तो नहीं!