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पाँच कविताएँ

इन्दुशेखर तत्पुरुष
एक

ओ, अंधेरे से उजाले की ओर
जाने वालो!
जाओ! रोशनी में नहाओ
ऊभ-चूभ
पर आँखों को बचाना
चौंध से।
बहुत अधिक प्रकाश
आदमी को
अंधा बना देता है।
अपनी-अपनी पुस्तक

ईश्वर ने एक पाण्डुलिपि तैयार की
पर प्रकाशक अनेक हो गये
सब के सब बेसब्र
सब के सब लालची
सो छीना-झपटी में जिल्द फाडकर
बटोर लिये सभी ने
फटे-अधफटे थोडे-थोडे पन्ने
और छाप दी अपनी पुस्तक
अलग-अलग शीर्षकों से।



न वह जानता

जितनी डूबती आकाश में
धरती से उतनी दूर
होती जाती पतंग
नहीं जानती कब तक
गगन में मगन
रहेगी अनाघात, अवध्य।
न वह जानता
जो उतारता उसको
आहिस्ता-आहिस्ता
आकाश में।
बजते हैं कानों में

बच्चे वयस्क हो गये हैं-
इसलिए बहुत व्यस्त हो गये हैं
उसी तरह जैसे
जब वे बिल्कुल बच्चे थे
और हम बहुत व्यस्त।

नहीं होती अब रोजाना फोन पर बातें
कभी-कभी पूरे सप्ताह भर।
पडोस के घरों से छोटे बच्चों की आवाजें
आती हैं- पापा....पापा....
तो लगता है यह मेरे ही बच्चों की आवाजें हैं
दो दशक पहले पुकारे गये शब्द
जो कहीं अटके पडे थे - अनसुने
अपनी ही *ाद और जरूरतों के चलते
नहीं सुन पाया तब,
अब बजते हैं कानों में
और एक कसक-सी
मरोड-सी उठती है सीने में।

तुम ही कुछ बतलाओ!

यह ढलान पर उतरती उम्र का ही
असर रहा होगा शायद
कि पीछे छूट गई घटनाएं, मुँह उठाये
नए दृश्यों में घुसती नजर आती- इन दिनों।
जैसे कि अब यही
कि यहां चार सौ किलोमीटर दूर
एक भव्य समारोह में मुझको
उढाया जा रहा दुशाला
वही क्यों दिख रहा है
जिसको पिछले वर्ष मैंने फूलमालाओं से सज्जित
एक श्रद्धेय के शव पर चढाया था- श्मशान में।
और मंच पर रखी यह नामीब्रांड की
पानी की सीलबंद बोतल
वही क्यों लग रही है
जिसको पिछले महीने
रेल डिब्बे के शौचालय में पानी न होने के कारण
प्रक्षालनार्थ इस्तेमाल किया था मैंने
और फेंक दिया पटरी पर।
कोई और भी गैर चिकित्सकीय कारण
हो सकता है क्या जी?
अथवा तुम ही कुछ बतलाओ
हे पाठक!

परिचय ः
कवि हैं, साथ में अपने विचारपरक लेखन के लिए जाने जाते हैं।