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चार कविताएँ

त्रिभुवन
हड्डियों के बिटोरे

दिल्ली में गोल गुंबद वाली इमारत
आज भी वैसी दिखती है
जैसी थी किताबों में।

जब भी देखते थे यह चित्र
मन में उडने लगती थीं
लोकतंत्र की तितलियां।

अब हूँ इसके सामने खडा
तो इस स्वाधीनपतिका इमारत की
बारगाह में दिखते हैं सिर्फ हड्डियों के बिटोरे।

**

मैं एक कविता लिखना चाहता हूँ
जिसका शीर्षक हो-
डर।

वही डर, जिसे मैंने
राष्ट्रीय पार्टियों के
कार्यालयों में प्रवेश करते देखा।
जो शास्त्री भवन के मैटल डिटेक्टरों पर
घोंसले बनाकर हंस रहा है।
मंत्रियों, अफसरों और वीवीआईपी घरों के बाहर
गुमटियों में हर समय
बंदूक थामे सन्नद्ध डर।

विदेशी दूतावासों, फाइव स्टार होटलों,
अतिथि गृहों और कला दीर्घाओं की
खिडकियों से झांकता हुआ डर।

मेरी कविता उस डर के बारे में होगी
जो गफ्फार मार्केट, कनॉट पैलेस
या इंडिया गेट की शामों से मुनसलिक है।

रेसकोर्स रोड, गोल्फ मैदान, क्रिकेट स्टेडियम,
गार्डन, पार्टियों, शहीद स्मारकों और
बडे लोगों की कब्रों के आसपास फैला डर।

कैमरे, किताब, लैपटॉप, हैंडबैग
और खिलौनों की तलाशी लेते
सिपाही की उंगलियों से चिपका डर।

यह वह डर है, जो सुरक्षा प्रहरियों में
पासपोर्ट, एटीएम कार्ड, गै*ोट्,
सेल्फोन्स और पेन ड्राइव ही नहीं
तरुण चिबुक पर नन्ही दाढी देखकर अंकुरित होता है।

डर, जो गुरुद्वारों, मंदिरों और मस्जिदों में
डर, जो सुबह, दोपहर और शाम में
डर, जो आदमी से आदमी में।

डर, जो संसद के गोल गुंबद में।

यह एक अमानुषिक पॉलिटिकल थि*लर है बेबी
वे कहते हैं ः

यहां डार्क है, वहां स्पार्क है
जहां लाइट है, वहां स्काईलार्क है!

यहां मेरा और तुम्हारा पेन है, बेबी
और हम मिलकर आंसू बहा रहे हैं
वहां उनका प्ले*ार है बेबी

एक कोर्स चल हरा है
हर कोई हर किसी को आनंदातिरेक में मसल रहा है बेबी।

मैं जब कुछ भी प्रश्ा* करता हूं बेबी
वे कहते हैं
यह फीयर्स का समय नहीं है
यह टीयर्स का समय है
आपको अपना रक्त देते रहना है
वरना तो यह ऐसे ही बहना है।

लेकिन मुझे लगता है बेबी
यह जो उनका पैराडाइज है
मेरा और तुम्हारा वार *ाोन है।

वे जो ईवरीबॉडी की बातें करते हैं बेबी
अब या तो नोबॉडी हैं
या फिर उनके लिए कुछ खास बॉडी हैं बेबी।

कुछ प्योर और बाकी सब डर्टी हैं बेबी।

बीटी कॉटन बीनने गई बहनें बेबी
सुदूर किसी कुएं से खारा पानी लाने गई मां बेबी
बिजली के तार से फंदा बनाने की सोच रहा पिता बेबी
और फूस की झोपडियों में जीवित जलते हुए बच्चे हैं बेबी।

यह कोई लोकतंत्र-वोकतंत्र नहीं है
यह अमानुषिक पॉलटिकल थ्रिलर है बेबी।
तुम जिसे लाइट रूम कह रही हो
वह डार्क रूम है बेबी
वह वार *ाोन है बेबी!

**
हड्डियों के बिटोरे

दिल्ली में गोल गुंबद वाली इमारत
आज भी वैसी दिखती है
जैसी थी किताबों में।

जब भी देखते थे यह चित्र
मन में उडने लगती थीं
लोकतंत्र की तितलियां।

अब हूँ इसके सामने खडा
तो इस स्वाधीनपतिका इमारत की
बारगाह में दिखते हैं सिर्फ हड्डियों के बिटोरे।

**


वे कहते हैं ः

यहां डार्क है, वहां स्पार्क है
जहां लाइट है, वहां स्काईलार्क है!

यहां मेरा और तुम्हारा पेन है, बेबी
और हम मिलकर आंसू बहा रहे हैं
वहां उनका प्ले*ार है बेबी

एक कोर्स चल हरा है
हर कोई हर किसी को आनंदातिरेक में मसल रहा है बेबी।

मैं जब कुछ भी प्रश्ा* करता हूं बेबी
वे कहते हैं
यह फीयर्स का समय नहीं है
यह टीयर्स का समय है
आपको अपना रक्त देते रहना है
वरना तो यह ऐसे ही बहना है।

लेकिन मुझे लगता है बेबी
यह जो उनका पैराडाइज है
मेरा और तुम्हारा वार *ाोन है।

वे जो ईवरीबॉडी की बातें करते हैं बेबी
अब या तो नोबॉडी हैं
या फिर उनके लिए कुछ खास बॉडी हैं बेबी।

कुछ प्योर और बाकी सब डर्टी हैं बेबी।


बीटी कॉटन बीनने गई बहनें बेबी
सुदूर किसी कुएं से खारा पानी लाने गई मां बेबी
बिजली के तार से फंदा बनाने की सोच रहा पिता बेबी
और फूस की झोपडियों में जीवित जलते हुए बच्चे हैं बेबी।

यह कोई लोकतंत्र-वोकतंत्र नहीं है
यह अमानुषिक पॉलटिकल थ्रिलर है बेबी।
तुम जिसे लाइट रूम कह रही हो
वह डार्क रूम है बेबी
वह वार *ाोन है बेबी!

**

सन् 3031

बात ऐसी है कि एक दिन
इस धरती पर एक लहर चली
बहाते हुए सारे जाफरानी *ाहर।

करोडों आवा*ों गूंजीं,
अरबों कदम उठे।
लांघो, लांघो सरहद लांघो।

तोडो-तोडो, तोडो राष्ट्रों के कैदखाने तोडो
द्वीपों के द्वारों की अर्गलाएं भग्न करो
सागर तटों को खींचकर धरती से मिलाओ।

आओ-आओ दहकती धरती की चितवन बदल दें।

हां, हां, इस धरती पर सरहदें थीं
थे अलग-अलग देश
अलग-अलग संप्रभुताएं
हां, हां, यह धरती एक ऐसी इमारत थी
जहां एक घर के बच्चे दूसरे घर में वी*ाा लेकर जाया करते थे!

वे कैसे लोग थे?
कैसे नागरिक,
कैसी सभ्यता और कैसी थीं उनकी आदिम बस्तियां?

वह जीवन कितना जालिम था
वह आदमी कितना आदिम था
जब चांदनी मैली होने लगी
और सूरज की धूप काली पडने लगी
जरा जीर्ण सोच और समाज को कुछ लोगों ने
माचिस लगा दी!
क्योंकि विकसित होती उस सभ्यता में कुछ लोगों ने माचिस का
सही उपयोग करना सीख लिया था!

वह पशुवत् समाज था
इनसान पशुवत् आवा*ाों के इर्दगिर्द एकत्र होते
सुनते, सिर हिलाते, चरते और
अपने-अपने मालिकों की आवा*ों सुनकर
अपने-अपने बाडों में स्वतः वापस चले जाते थे,
जिन्हें उन दिनों बडे गर्व से राष्ट्र कहा जाता था!

वह संप्रभु बाडा युग था
विकसित संप्रभु बाडों ने प्रगति कर ली थी
हर सदस्य की एक यूनीक आईडी थी
और किसी एक बाडे से कोई दूसरे बाडे में
जाता था तो वह आईडी नंबर काम आता था

नाम मिटते गए थे और हर आदमी की आईडी रह गई थी
आईडी के साथ कुछ वर्ण लगे रहते थे
जो धर्म, जाति, गोत्र और कबीले को दर्शाते थे
ये संकेताक्षर सबको भाते थे।

आईडी नंबर से हर पशुवत इनसान
बडी-बडी आँखों से
विश्व विजेता बाडे वालों को देख
विस्मित होते हुए आभार जताया करता था

सींग उस सभ्यता में इनसान के सिर से लुप्त हो चुके थे
वह इनसान बिना सींग वाले सिर झुकाया करता था
और अपने बाडे से निकलकर पश्चिमी बाडों में आने के लिए
कार्टर, बुश, ओबामा नामक देवताओं के भजन गाया करता था।



समस्त बाडों के अपने-अपने गान थे
अपनी-अपनी पताकाएं, अपने-अपने सैनिक थे।
अपने-अपने अहंकार, अपने-अपने मिथ्याभिमान थे।
अपने अपने झूठ, अपनी-अपनी हताशाएँ थीं।
वह बाडा सभ्यता इतनी पतित थी कि
एक बाडे के लोग दूसरे बाडे को अशांत करने लगे रहते थे।
इस बाडा सभ्यता के लोग यह भी नहीं जानते थे कि
कितना समय बचा है सही समय आने और बुरा समय जाने में।

बाडा सभ्यता की समस्या यह थी कि
उसमें हर बाडा अपनी बुरी सभ्यता पर खूबियों के खोल चढाने में माहिर था।

वह बुरी सभ्यता आखिरी दौर में इतनी बुरी हो चली थी कि
सांप नष्ट होने लगे थे, बाघ मिटने लगे थे, घोडे हिनहिनाना भूलने लगे थे।

गगन की आभा फीकी पडने लगी थी और धरती का चेहरा पीला पड गया था
पर्वतों को बाडा सभ्यता ने पानी में गलाकर अपने घरों में खपा दिया था
और नदियों में पानी दिखाई देना बंद होने लगा था।

पक्षियों को उन आदिम लोगों ने नष्ट कर दिया था और
कुत्ते पालने वाली उस सभ्यता के लोगों ने पक्षियों की चहचहाट,
हरे वृक्षों की छाया, बारिश की बूंदों की अनुभूतियां खो दी थीं!

हर बाडे का अपना बाजार था,
जिससे सभी बाडे धीरे-धीरे जुड गए थे
और इस बाजार में एक बडे बाडे वालों की धमक थी

इस बा*ाार में मुद्रा का प्रवाह बडे बाडे की तरफ रहता था
और जब कभी कुछ बूंदें
किसी छोटे बाडे पर टपक पडती थीं
तो वह सबसे बडे बाडे से अपने आपको छोटा नहीं मानता था।
बाडा युग का यह बाजार इतना सम्मोहक था
कि इसमें जो कोई इनसान माल बनकर आ जाया करता था
उसकी कीमत बाडा बाजार में सबसे ज्यादा लगा करती थी।

और अगर यह इनसान कोई युवा स्त्री होती तो
उसका मूल्य कई गुणा ज्यादा हुआ करता था।

उस युग में दासप्रथा ने काफी उदार रूप ले लिया था
और बाजार के नियंत्रणकर्ताओं के दास
एक गेंद और दो बल्लों से एक मैदान में खेलते थे
और बाजार इस एक गेंद के *ारिए
अखबारों, राजनीति, टेलीविजन चैनलों, साहित्य, संस्कृति
और आम सामाजिक जीवन को नियंत्रित किया करता था।

वह बाडा सभ्यता विकसित होते हुए भी इतनी आदिम थी कि
गर्भ में ही मादा शिशुओं को नष्ट करने में आनंदित होती थी
उस सभ्यता में सबसे सभ्य डॉक्टर माने जाते थे
और जो मादा भू*णों को नष्ट करने का सबसे असभ्य काम किया करते थे।

बाडा युग में बाजार ने बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक को,
यहां तक कि महिलाओं और बच्चियों तक को ग्लेडियेटर में बदल दिया था।
ऐसे ग्लेडिएटरों में, जिनके हाथों तलवार की अगह आत्मसम्मान था।

सचमुच वह धरती बाडों में बंटी थी
लाल, नीले, हरे, सफेद, बैंगनी, पीले, गुलाबी रंग वाले बाडों में
वह एक आदिम सभ्यता थी,
जिसे याद करने पर आज भी नाक में दुर्गंध आती है
वह आदिम सभ्यता, जिसने एवरेस्ट नष्ट कर दिया,
जिसने इस नीले गगन को छलनी कर दिया
जिसने इनसान को बाडों में बांटकर छोड दिया,
जिन बाडों की कब्रों से आज भी आती हैं आदिम आवा*ों,
जो खतरा हैं हमारे विश्व समाज के लिए।
इस प्रार्थनारत पृथिवी समाज के लिए।