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नवजागरण और प्रेमचंद का सेवासदन

जीवन सिंह
प्रेमचंद को भारतीय ...खासकर हिंदी इलाकों के किसान-जीवन के संघर्ष और उनकी मुक्ति चेतना के कथाकार होने का गौरव हासिल है। यह सच है कि वे किसान-जीवन के यथार्थ और उसकी शक्ति तथा जीवन-मूल्यों की सहजता-साधारणता को सामने लाने का बेहद महत्त्वपूर्ण और मौलिक काम पहली बार करते हैं । इतना ही नहीं वे पहली बार उस वर्ग के जीवन की ताजी हवा के झोंके से शिक्षित वर्ग को परिचित कराते हैं जो किसान-श्रमिकों को हेय भाव से देखता रहकर उनकी जिन्दगी से फासला बनाकर रखता है । प्रेमचंद ही पहली बार यह बतलाते हैं कि जिसे तुम हेय भाव से देखते हो, वही वर्ग है जो तुम्हारे जीवन का आधार है और उसी के पास वह जीने का तरीका भी है जिसमें मानवता के सच्चे दुःख-दर्द निवास करते हैं । प्रेमचंद ही हैं जिन्होंने हिंदी इलाकों के निवासियों को किसी भी तरह के साम्प्रदायिक भाव और न*ारिए से न देखकर सामासिक दृष्टि और सेक्युलर भाव से देखा और उसकी विशेषताओं का चित्रण किया। इसीलिये उनके किसानों में बलराज और मनोहर हैं तो उसी किसान-पीडा से गु*ारते हुए कादिरखां भी हैं। दोनों के जीवन-संघर्ष साथ हैं तो दोनों की मुक्ति का रास्ता भी एक है। दोनों साथ-साथ जीते हैं तो दोनों अपने आत्मगौरव के लिए साथ साथ लडते हैं। प्रेमचंद ही हैं जो अपने कथा-साहित्य का नायक दलितों को बनाते हैं और स्त्रियों को केंद्र में लाते हैं। लेकिन यह भी सच है कि प्रेमचंद एक ही वर्ग के चितेरे नहीं हैं। सच यह भी है कि बीसवीं सदी के आरम्भ में औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलन की जो राजनीतिक चेतना मध्य वर्ग में उभर रही थी, उस चेतना का सामाजिक-साहित्यिक-सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व प्रेमचंद अपने कथा-साहित्य के माध्यम से कर रहे थे । इसी मुक्ति आन्दोलन के तहत उन्होंने जाना था कि भारतीय समाजों को न केवल बाहरी विदेशी शासन के चंगुल से मुक्त होने की जरूरत है वरन् इससे भी ज्यादा जरूरत इसके भीतर की अनेकायामी पराधीनताओं और रूढियों की ह*ाारों सालों से चली आती हुई जकडन से मुक्ति की है । यही कारण है कि वे इस आंतरिक मोर्चे पर पूरी शिद्दत और विवेक के साथ उतरते ही नहीं, लडते भी हैं। इसमें स्त्री और पुरुष के बीच प्रचलित पितृ-सत्ता की रीति से बने शोषण-उत्पीडनकारी सम्बन्धों से मुक्ति का सवाल सबसे पहले उनके सामने प्रस्तुत हुआ था । वे जानते थे कि स्त्री जीवन को पराधीनताओं से मुक्त किये बिना कोई समाज सही अर्थों में प्रगति नहीं कर सकता। यह स्त्री ही है जो परिवार में शिक्षा और स्वाधीनता का वातावरण बनाती है। यदि वह स्वयं ही बेडियों और बंधनों में जकडी हुई है तो परिवार में मुक्ति का विवेक आना संभव नहीं है। स्त्री परिवार की ही नहीं, समाज की धुरी होती है। प्रेमचंद यहीं से अपने लेखन की शुरुआत करते हैं और सेवा सदन जैसा उपन्यास लिखकर एक उपन्यासकार के रूप में प्रतिष्ठा हासिल करते हैं । उनकी खासियत यह है कि वे ऊपर से नीचे तक सभी को जानने और पहचानने की कोशिशों में संलग्न रहने वाले रचनाकार हैं । वे सच में तो वर्ग-सम्बन्धों को चित्रित करने वाले रचनाकार हैं। उनके उपन्यासों की कथा-संरचना एकायामी न होकर बहुआयामी है । वर्ग-सम्बन्धों की दृष्टि से वे विभिन्न वर्गीय चरित्रों की आपसी द्वंद्वात्मकता और संश्लिष्टता को अभिव्यक्ति देते हैं। इस हिसाब से देखा जाय तो वे भारत के निम्न मेहनतकश वर्ग के जीवन-यथार्थ को कथा-साहित्य के केंद्र में लाने वाले पहले हिंदी कथाकार तो हैं ही, उसकी सम्बन्धगत बहुआयामिता को प्रस्तुत करने वाले भी पहले कथाकार हैं। वे स्वयं मध्य वर्ग से आते हैं किन्तु अपने वर्ग की सीमाओं का अतिऋमण कर भारतीय जीवन की समग्रता को उद्घाटित करने वाले भी वे पहले रचनाकार हैं। उनका महत्त्व समग्रता में है खंड-विखंडनपरक एकांगी चित्रण मंक नहीं। औद्योगिक क्रान्ति के बाद यूरोप में कथा साहित्य को जन्म देने वाला मध्य वर्ग ही था। वहां टालस्टाय का एक बडा उदाहरण उनके सामने था। उस समय तक अकेले महान रूसी उपन्यासकार टालस्टाय थे, जो अपनी वर्गीय सीमाओं का अतिऋमण कर एक विराट् फलक पर जीवन की समग्रता को चित्रित करते दिखाई देते हैं। यद्यपि कथालोचक विजयमोहन सिंह मानते हैं कि उनके आदर्श टालस्टाय न होकर हेनरी फिल्डिंग और गोर्की जैसे उपन्यासकार थे, जिनके उपन्यासों की संरचना अपेक्षाकृत सरलीकृत तथा इकहरी थी। (बीसवीं शताब्दी का हिंदी साहित्य, पृष्ठ 87, संस्करण 2005, राजकमल प्रकाशन) वैसे किसी एक उपन्यास की संरचना को देखकर किसी लेखक की संरचना के बारे में कुछ भी कहना ठीक नहीं होगा क्योंकि लेखक की विकास यात्रा के साथ उसकी संरचना में भी विकास व परिवर्तन होता है । प्रेमचन्द के आरम्भिक उपन्यासों की संरचना इकहरी लग सकती है किन्तु गोदान तक आते-आते वह बहुआयामी स्वरूप धारण कर लेती है और अपने वस्तुगत अर्थ में भी जटिल हो जाती है। बहरहाल।
यह सभी जानते हैं कि यूरोप का मध्य वर्ग ही पहली बार आधुनिकबोध की रचनाशीलता का प्रणेता बना इसलिए उसी के जीवनानुभव और दृष्टि से साहित्य-रचना की वहाँ शुरुआत हुई। इसीलिये वहाँ उपन्यास को मध्य वर्ग का महाकाव्य कहा जाता है। हमारे यहाँ भी रचनाशील वर्ग तो आधुनिक मध्यवर्ग ही रहा किन्तु हमारे यहाँ अठारहवीं सदी के उत्तरार्द्ध से अंगरेजी औपनिवेशिक शासन स्थापित हो जाने की वजह से आधारभूत स्तर पर निम्न-वर्ग की हैसियत में किसान और खेतिहर श्रमिक आता गया। कहना न होगा कि इसी वर्ग के शोषण-उत्पीडन से ऊपर के दोनों वर्ग अपने वैभव को कायम रख सके, जिसे वे आज तक रखे हुए हैं । उसके और अंगरेजी शासक वर्ग के बीच में शासन संचालन के लिए अठारहवीं सदी से उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध तक औपनिवेशिक शासक वर्ग ने अपनी जरूरत के अनुसार मध्य वर्ग की जरूरत को महसूस करते हुए उसे पैदा भी किया। लार्ड मेकाले ने 1835 ई. में इस जरूरत को समझते हुए प्रस्ताव किया कि हमको अब यहाँ एक ऐसा वर्ग पैदा करने की जरूरत है जो हमारे और भारतीय जनता के बीच में संवाद और समझदारी पैदा करने का काम करे, जो खून और रंग में भले ही भारतीय हो किन्तु विचार, बुद्धि, भाषा और दृष्टिकोण में पूरी तरह से अंगरेजी हो। इसके बाद कुल 18 साल ही लगे जबकि एक अंग्रेज इतिहासकार ने 1853 में लिखा कि हमने यहाँ भारतीय विद्वानों की अलग एक ऐसी जाति निर्मित कर दी है जिसकी *ारा-सी भी सहानुभूति अपने देशवासियों से नहीं है। किसी में है भी तो वह बहुत कम है। यही वर्ग उस समय का मध्य वर्ग था जो शासक और शासित वर्ग के बीच में बिचौलिए का काम करता था और खुद भी शासक वर्ग से मिलकर किसान-श्रमिक की शोषण प्रत्रि*या में शामिल होकर उसका अनुचित लाभ उठाता था । इसी वर्ग में से अंग्रेजों ने अपने सहायक वर्ग के रूप में यहाँ अनेक ताल्लुकेदार और जमींदार बनाए और शोषण की प्रत्रि*या से स्वयं एक कदम दूर रहकर संचालित किया। यही नया आधुनिक भारतीय मध्य वर्ग था, जिसने दुतरफा भूमिका का निर्वाह किया। इस वर्ग के ज्यादातर लोग अंगरेजी शासक वर्ग का सहयोग करते थे, उसकी चापलूसी, नकल और शासित वर्ग की मुखबिरी करते हुए शासक वर्ग के कृपापात्र बने रहकर तरह-तरह की उपाधियाँ, सहूलियतें, सत्ताधिकार, इनाम-इकरार और जागीरें प्राप्त करते थे। लेकिन नवजागरण के चलते इसी वर्ग के भीतर वह वर्ग भी खडा हुआ, जो अंग्रेजों की शोषण-उत्पीडनकारी चालों को समझता था। जो शोषण को मानवता के खिलाफ मानता था । जिसने आधुनिक शिक्षा हासिल करते हुए मानवता की सचाई को जान लिया था और जो देश के लिए अपने स्वार्थों को छोड सकता था। जो लड सकता था और उनकी बनायी जेलों में स्वाधीनता संग्राम के सेनानी की तरह से कैद भी रह सकता था। वह भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव की तरह से फांसी के तख्ते को चूम सकता था। जिनके हृदय में अँधेरे से ज्यादा प्रकाश था। प्रसिद्ध इतिहासकार रजनी पाम दत्त ने अपनी पुस्तक आज का भारत में आ*ाादी की लडाई की पहली मंजिल 1905-1910 के संदर्भ में लिखा है- उस जमाने के कांग्रेसी नेताओं ने हिन्दुस्तान के अंधविश्वास और पिछडेपन के खिलाफ नयी रोशनी का प्रचार किया । उन्होंने सामाजिक सुधार किये और शिक्षा का प्रचार किया । उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि उद्योग-धंधों और कौशल की दृष्टि से हिन्दुस्तान का आर्थिक विकास होना चाहिए। कहना न होगा कि नवजागरण के इसी माहौल में प्रेमचंद अपने लेखन की शुरुआत करते हैं। प्रेमचंद स्वयं इसी प्रगतिशील मध्यवर्ग के ही थे। यद्यपि यह तादाद में अधिक नहीं था किन्तु इसकी भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण थी, जो किसी भी पराधीन राष्ट्र की स्वाधीनता के लिए जरूरी होती है। जैसा कि कहा जा चुका है कि प्रेमचंद स्वयं इसी छोटे से मध्य वर्ग के थे, जिन्होंने साहित्य-रचना और अपने जीवन व्यवहार के उदाहरण से स्वाधीनता, समता और भाईचारे जैसे आधुनिक जीवन-मूल्यों की वकालत की और उस समय गांधी-नेहरू और समाजवादी नेतृत्व में चलने वाले स्वाधीनता आन्दोलन का न केवल सहयोग किया वरन् अपने रचना-विवेक से आपसी वर्ग-सम्बन्धों की सचाई को भी उद्घाटित किया ।
यह समाज का आर्थिक-राजनीतिक पक्ष था लेकिन इसके अलावा यहाँ के जीवन के सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक पहलू भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं थे, जो अंग्रेजों के आने से पहले से मौजूद थे। सामाजिक संरचना की दृष्टि से भारतीय समाज ह*ाारों साल पहले से जाति और वर्ण-समूहों में विभाजित रहा है, जिसके ऊपर पितृ सत्ता का कब्जा रहा है और इसका संयोजन वह धार्मिक-सांस्कृतिक व्यवस्था ही करती रही है, जो वर्ण, जाति, लिंग यानी पितृ सत्ता के अन्तर्निहित सम्बन्धों में विश्वास ही नहीं, उनका निरंतर पोषण भी करती है । वह लोगों की सामूहिक मानसिकता का निर्माण और उसका रक्षण करती है, जिससे जाति, वर्ण और पितृ सत्ता का कब्जा बना रहे और उच्च वर्ण और उच्च जातियां निम्न और कमेरी शूद्र जातियों तथा स्त्रियों का अबाध शोषण करती रह सकें। इसी व्यवस्था से भारत में सामन्ती सत्ता का गठन एवं निर्माण हुआ था, जो लोकतंत्र की विभिन्न प्रत्रि*याओं के चलते आज तक अपना प्रभाव कायम किये हुए है। कहना न होगा कि स्वाधीनता और लोकतंत्र के लिए चली लडाई में हमारे यहाँ जितना संघर्ष औपनिवेशिक तंत्र से स्वाधीनता पाने के लिए हुआ उतना देशी आंतरिक विभाजन को दूर करने के लिए नहीं। इसी का परिणाम है कि देश का मध्यवर्ग पितृ-सत्ता, पूंजी, धर्म और वर्ण-जाति के विभाजनों में आज भी लिप्त ही नहीं है बल्कि पढ-लिखकर भी वह उनको संरक्षित और पोषित करता है और आज तक करता चला आ रहा है। प्रेमचंद का उपन्यास और कहानी साहित्य इस तथ्य को बडी दमदारी के साथ उद्घाटित करता है । वह सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक और पुरुष सत्ता से पैदा किये हुए शोषण-उत्पीडनकारी विभेदों और क्रूरताओं का जैसा सटीक चित्र खींचता है वैसा साहित्य में मिलना दुर्लभ होता है। हमको मालूम है कि सत्ता और धर्म दोनों से इस विभाजनकारी निजाम को भरपूर पोषण और रक्षण मिलता रहा है। इसी का परिणाम हुआ कि भारतीय समाज की शक्ति तरह तरह से विभाजित और विश्ाृंखलित होती रही, जिसमें बहुत पहले से कई जातियां ही बिचौलिए वर्ग का काम करती थी, जिनको राज्य सत्ता से भरण-पोषण और सुख-सुविधाओं के साथ प्रतिष्ठा भी मिलती थी। इस वजह से अंग्रेजों की सत्ता कायम होने के बाद भी यहाँ के वर्ग-सम्बन्ध विशुद्ध रूप से आर्थिक नहीं थे बल्कि यह कहा जा सकता है कि वे आर्थिक से ज्यादा सामाजिक-सांस्कृतिक और पितृ-सत्तात्मक थे । अंग्रेजों के आने के समय यहाँ एक अलग तरह का सामाजिक-सांस्कृतिक विभाजन और था, जिसे हिन्दू और मुसलमान के रूप में देखा जाता है। इस तरह से अंग्रेजों को एक ऐसा हिन्दुस्तान मिला था, जो शोषण-उत्पीडन के लिए उनको एक उर्वर जमीन प्रदान करता था और ऐसा लगता था कि जैसे वह स्वयं ही उसके लिए तैयार है। वे अपनी भेद नीति से इसको जैसे चाहें वैसे आपस में लडा-भिडा सकते थे । इस वजह से अंगरेजी आधुनिक शिक्षा पाने के बावजूद यहाँ का सामाजिक अलगाव कभी खत्म नहीं हुआ। इससे जो मध्य वर्ग यहाँ पैदा हुआ, वह भी दुनिया के मध्य वर्ग से अलग एक अलग किस्म का ज्यादा जटिल और अतीतप्रेमी मध्य वर्ग बना और उन संस्कारों को ही भारतीय संस्कृति मानता रहा, जो उसे आगे ले जाने के बजाय पीछे की तरफ खींचते थे। वह मध्य वर्ग अपनी पुरानी रूढ मान्यताओं और धारणाओं के साथ अपना जीवनयापन करता है। आधुनिक शिक्षा से वैज्ञानिक और परिवर्तनकारी संस्कार बनाने में उसके पुराने संस्कार न केवल आडे आते रहे हैं वरन् उसे फिर से वही बना देते हैं, जो वह पहले से था। आधुनिक शिक्षा पा लेने के बावजूद उच्चवर्ण के ज्यादातर सामाजिक समूह अपना उच्चताबोध छोडने को आज भी तैयार नहीं हैं। इसी तरह से अन्य जातियां भी अपनी तरह से अपनी जाति-गरिमा, श्रेष्ठताबोध और आत्मगौरव से परिचालित रही हैं। आज भी उसके पुराने संस्कार उसके प्रेरक और संचालक हैं।
प्रेमचंद जब हिंदी-उपन्यास लेखन की दुनिया में आये, तब उनकी आँखों के सामने भारतीय समाज का यही बेहद जटिल और क्रूर वर्गीय यथार्थ था। कहना न होगा कि यह उपन्यास जैसी महाकाव्यात्मक फलक वाली विधा ही थी, जिसमें इन जटिलताओं की अभिव्यक्ति संभव थी लेकिन इनके लिए उतने ही अनुभवी, सम्बन्ध-वेत्ता, यथार्थ के प्रति समावेशी दृष्टि रखने वाले तथा विश्व-दृष्टि से संपन्न कद्दावर लेखक की जरूरत थी, जो प्रेमचंद के रूप में हिंदी को मिला। कहना न होगा कि हिंदी उपन्यास की शुरुआत वे एक मध्यवर्गीय लेखक की तरह मध्यवर्ग के जीवन-द्वंद्वों, संघर्षों और समझौतों की प्रवृत्तियों को *ााहिर करने के उद्देश्य से करते हैं और मध्यवर्गीय जीवन-स्थितियों में सदियों से फंसी हुई छटपटाती स्त्री की पराधीनता पर उनकी न*ार सबसे पहले जाती है। इसी स्त्री-पराधीनता की समस्या को वे अपने पहले उपन्यास सेवा सदन का विषय बनाते हैं। जिसका परिणाम होता है इस उपन्यास की नायिका सुमन द्वारा न चाहते हुए भी सामाजिक प्रतिरोध के रूप में वेश्या जैसे धंधे का वरण करना। क्योंकि अपने अनुभव से वह इस रहस्य को भलीभांति जान गयी थी कि हमारा यह पिछडा हुआ पितृसत्ता प्रधान समाज गृहस्थ स्त्री की अपेक्षा वेश्या स्त्री की ज्यादा कद्र करता है। वेश्या के यहाँ संभ्रांत पुरुषों के जाने में उसकी प्रतिष्ठा बढती है इसलिए गृहस्थ स्त्री होने से ज्यादा अच्छा है वेश्या की *ान्दगी का वरण कर लेना । सेवा सदन की सुमन ने अपनी आँखों से देखा कि वेश्या के दरवाजे पर समाज के सभी प्रतिष्ठित समझे जाने वाले लोग अपनी न*ारें झुकाकर इज्जत के साथ जाते हैं । और वे ही लोग अपने घर में अपनी गृहिणी को पैरों की जूती समझते हैं । तत्कालीन सामंत-नवाब इसे अपनी इज्जत के रूप में देखते थे, जिससे दूसरे मध्यवर्गीय लोग उनकी नकल करते थे । इसलिए वेश्या जीवन का रास्ता अपनाना भी सुमन के सामाजिक प्रतिरोध का ही हिस्सा है और यह उस समाज से प्रतिरोध ही नहीं है, प्रतिशोध भी है, जो स्त्री को नाजायज तरीके से सताता रहा है। दहेज के हथियार से उसका गला घोंटता है। प्रेमचंद यह दिखलाना चाहते हैं कि स्त्रियाँ वेश्या बनती नहीं या कोई भी स्त्री वेश्या जैसा नारकीय जीवन जीना नहीं चाहती वरन् यह समाज-व्यवस्था और उसके जीने के तौर-तरीके ही हैं जिनकी वजह से वह इस नरक में धकेल दी जाती है। यहाँ कोई स्त्री वेश्या का जीवन जीना नहीं चाहती वरन् उसे वेश्या बना दिया जाता है । सच तो यह है कि यह व्यक्ति के नैतिकता का सवाल न होकर समाज की उस व्यवस्था और रीति-नीतियों का सवाल है जो सुमन जैसी तेजस्वी नारी को इस तरह की दलदल में धकेल देती है। यहाँ पर उसका चरित्र जरूर वेश्या जीवन की कहानी कहता दिखाई देता है किन्तु उसका संघर्ष उसके चरित्र की उदात्तता को जिस तरह से रखता है, वह पाठकों के हृदय में आदर की पात्र बन जाती है। यही प्रेमचंद की कला की सबसे बडी खूबी है। सच में यह समस्या उस भारतीय नारी की सामाजिक-सांस्कृतिक दुर्दशा और पितृ-सत्ता के वर्चस्व से सम्बन्धित है जो स्वाभिमान के साथ जीवित रहना चाहती है लेकिन उसकी निर्मम और अमानवीय परिस्थितियाँ उसे इसकी इजाजत नहीं देती । जो चारों तरफ से सामाजिक-धार्मिक और पितृ-सत्तात्मक धारणाओं के चक्रव्यूह में बुरी तरह से घिरी हुई ही नहीं है, पिसी हुई भी है और उसमें से बाहर निकलने का कोई रास्ता अभी तक उसे मालूम नहीं है। यहाँ यह बतलाना आवश्यक है कि उस समय तक स्वाधीनता आन्दोलन के नए जाग्रत् माहौल में एक ऐसी स्त्री पैदा हो चुकी थी, जो स्वाभिमान की रक्षा करते हुए अपना रास्ता निकालने का प्रयास करती है और जो समाज के बनाए ढाँचे को भी तोड देने का हौसला रखती है । प्रेमचन्द एक ऐसे कलाकार हैं जो चरित्र-चित्रण ही नहीं करते वरन् चरित्र सर्जना भी करते हैं और किसी समस्या के इस तरह के समाधान की तरफ इशारा भी करते हैं कि सुमन, जालपा जैसी अपने समय की प्रखर चेतना रखने वाली स्त्रियाँ ही इन परिस्थितियों में बदलाव कर सकती हैं। जैसाकि पहले बतलाया जा चुका है कि प्रेमचंद की न*ार ऐसी स्त्री पर है जो मध्यवर्ग से एक चेतना-संपन्न युवती सुमन के रूप में सामने आती है। ऐसे समय में प्रेमचंद उसके जटिल यथार्थ की उन गुत्थियों को भी खोलते चलते हैं, जिनको उसके असली रूप में दिखाने का साहस और समझ लेखक में होनी चाहिए थी। कहना न होगा कि यह साहस और समझ प्रेमचंद में थी। यह आकस्मिक नहीं है कि सेवा सदन में कई प्रभावशाली पुरुष चरित्र होने के बावजूद इस उपन्यास की नायिका सुमन नाम की एक मध्यवर्गीय वेश्या स्त्री है । यह वह काल था जब स्त्री-स्वाधीनता के सवाल को लेकर साहित्य रचना होने लगी थी लेकिन उन स्त्रियों में ज्यादातर सामाजिक तौर पर पूर्व-प्रतिष्ठा प्राप्त स्त्रियाँ ही अधिक होती थी। मैथिलीशरण गुप्त के यहाँ राम काव्य परम्परा के लक्ष्मण जैसे महाचरित्र की उपेक्षिता पत्नी उर्मिला थी तो अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध के यहाँ कृष्णकाव्य परम्परा की राधा । जयशंकर प्रसाद के यहाँ प्राचीन स्वर्णयुगीन भारत की राजमहिषी जैसी स्त्रियाँ थी या फिर ब्राह्मण ग्रंथों की श्रद्धा, इडा जैसी नारियाँ, जिनके चरित्र पर पौराणिकता का एक पिष्टपेषित धार्मिक आवरण चढा हुआ था । उर्दू में जरूर ऐसी परम्परा थी जिसमें उमराव जान जैसी कलाकार स्त्रियाँ थी लेकिन प्रेमचंद ने पहली बार महसूस किया कि समाज में ऐसी स्त्रियाँ भी होती हैं जो संघर्ष करते हुए पुरुष सत्ता के मनुष्य विरोधी नियमों को बदलने, उनसे लडने और समाज को आईना दिखाने का काम कर सकती हैं। क्योंकि वे लगातार लडती हैं और समाज में व्याप्त पाखंडों से उनकी ही भाषा में टकराती हैं। यहाँ पर यह जानना भी जरूरी है कि सुमन और जालपा जैसी स्त्रियाँ अचानक और आकस्मिक रूप से पैदा नहीं हो गयी हैं वरन् उसने एक ऐसे पिता (सुमान के पिता) कृष्णचन्द्र के घर में जन्म लिया है जिसने समाज की रीतियों के विरुद्ध एक संघर्षधर्मी मूल्यपरक जीवन जीने की कोशिश की थी यद्यपि समाज की गलत धारणाओं और मान्यताओं और रीति-रिवाजों ने उसे ईमानदारी और नैतिकता का जीवन जीने नहीं दिया। ऐसे संस्कारों के वातावरण में बडी हुई सुमन भी मध्यवर्गीय वातावरण में एक अलग तरह का मूल्य-निर्धारित जीवन जीने की कोशिश करती है। यह अलग बात है कि वह भी अपने पिता की तरह अकेली पड जाती है। सुमन के पिता कृष्णचन्द्र ने यद्यपि दरोगा जैसी नौकरी की थी जिसमें दूसरे दरोगाओं की तरह रिश्वत लेकर वे भी मालामाल हो सकते थे लेकिन वे मानवता के कुछ उसूलों पर चलने वाले दरोगा हैं इसलिए किसी को अनावश्यक तौर पर सताते नहीं और घूस से अपना घर नहीं भरते । वे भी इस उपन्यास के एक मध्यवर्गीय चरित्र हैं किन्तु उस पतित मध्यवर्ग के नहीं जो अपनी सम्पन्नता और झूठी प्रतिष्ठा के लिए अपने स्वाभिमान को गिरवी रखकर स्वामी वर्ग की चाकरी और चापलूसी करने में ही अपनी भलाई समझता है। यह अलग बात है कि वे सचाई पर ज्यादा समय तक टिके नहीं रह सके और बीच में ही अपना रास्ता बदल लेते हैं। बेटी के विवाह में दहे*ा देने के लिए घूस लेने लगे और चालाक न होने की वजह से पकडे गए। सच को कबूल कर लिया और सजायाफ्ता हो गए।
इस तरह से प्रेमचन्द के यहाँ दूसरी कोटि के मध्यवर्गीय चरित्र वे हैं जो ईमानदारी से अपना जीवन-निर्वाह करना चाहते हैं लेकिन सामाजिक व्यवस्था उनको ईमानदार रहने नहीं देती। तीसरे किस्म के मध्यवर्गीय चरित्र वे हैं, जिनकी संख्या सर्वाधिक होती है, जो समाज की रूढियों और मानव-विरोधी मान्यताओं को न केवल ढोते हैं बल्कि उनके पक्ष में खडे होकर समाज की गतिशीलता को अवरुद्ध करने का काम भी करते हैं। इनमें बाबू, वकील, डाक्टर, अध्यापक, इंजीनीयर, बैंककर्मी आदि सभी तरह के शिक्षित रूढिवादी-दकियानूसी मध्यवर्गीय चरित्र आते हैं । यह एक बडा लोभी, दकियानूसी और डरपोक वर्ग है जो उच्च वर्ग की चापलूसी करते हुए उसका हुकम बजाते हुए *ान्दगी के छोटे छोटे लाभ प्राप्त करता है। भारत जैसे देशों में एक चौथे किस्म का मध्यवर्ग उसे भी कहा जा सकता है जो अंगरेजी औपनिवेशिक सत्ता की छत्र-छाया में रहते हुए राजसी वैभव और विलासिता में मग्न रहा और अंग्रेजों के काम आता रहा। सच तो यह है कि यहाँ के राजे-महाराजे और नवाब भी अंगरेजी शासक वर्ग और आम जनता के बीच में एक तरह से उच्चमध्यवर्गीय भूमिका अदा करते थे। यद्यपि वे भी स्वाधीन नहीं थे ।
प्रेमचंद के अन्य उपन्यासों में भी मध्यवर्गीय जीवन-सम्बन्धों में पले हुए व्यक्ति अपनी मध्यवर्गीय भूमिका में आये हैं जिनमें कुछ ऐसे भी हैं जो समाज में पहले से चली आती हुई रूढियों का विरोध करते हैं और निम्न-किसान वर्ग तथा स्त्री समुदाय से सहानुभूति रखते हैं । ऐसे लोग ही हैं जिन्होंने देश के मुक्ति आन्दोलनों में भाग लिया। ऐसे लोग ही सिर्फ सत्ता परिवर्तन में नहीं वरन् समाज की व्यवस्था को बदलने में विश्वास रखते हैं। ऐसे चरित्र यद्यपि अधिक तादाद में नहीं हैं क्योंकि मध्यवर्ग में विचारहीन अवसरवादी, सुविधाजीवी ढुलमुलपना ज्यादा रहता है। प्रेमचंद ने ऐसे वर्ग को अधिकतर स्वार्थ-लोलुप, प्रदर्शनप्रिय, पाखंडी, रूढिपोषक की श्रेणी में रखा है। असलियत भी यही है कि यह वर्ग हमेशा शासक-शोषक वर्ग के साथ ही रहता है । इस तरह से प्रेमचंद ने समाज के भीतर से मध्यवर्ग के कई रूप अपने उपन्यासों में दिखलाये हैं जो उनकी वेधक यथार्थ-दृष्टि के परिचायक हैं । जब तक प्रेमचंद सेवा सदन और प्रेमाश्रम जैसे आदर्शवादी समाधान दिखाते रहे, तब तक वे उस समय के पतित मध्यवर्ग का हृदय परिवर्तन कराकर उसे आदर्शवाद के खाते में डालते रहे । अपने आदर्शवादी समाधान वे मध्यवर्ग के माध्यम से कराते हैं लेकिन निर्मला उपन्यास तक आते-आते उनका आदर्शवादी स्वप्न भंग हो चुका था। इसी वजह से निर्मला उपन्यास की नायिका निर्मला तिलतिल करके मृत्यु को प्राप्त हुई लेकिन वह सुमन की तरह से किसी सेवा सदन की शरण में नहीं गयी। कहना न होगा कि इस समय तक प्रेमचंद का इन सेवा सदनों से मोहभंग हो चुका था। सेवा सदन का मध्यवर्गीय चरित्र पद्मसिंह आदर्शवादी भी है और जैसाकि मध्यवर्ग होता है, व्यवहारवादी भी है जिससे वह सुमन जैसी पितृ-सत्ता विरोधी स्त्री का पूरा साथ नहीं दे पाता। वह एक ऐसा सुधारक है जो आगे की ओर देखने की बजाय पीछे की ओर ही ज्यादा देख पाता है जबकि सुमन भविष्य की स्त्री है लेकिन सुधारकों ने उसको भी अपने विचारों से प्रभावित कर सुधारवादी रास्ते पर चलाकर पश्चगामी बना दिया है । प्रेमचंद भी उस समय तक उस भविष्य को नहीं समझ पाए थे जो समाज व्यवस्था को नयी दिशा में ले जाने का काम करता है। कहना न होगा कि प्रेमचंद अपने समय की गति और समझ के अनुसार खुद को निरंतर बदलते चलते हैं। इस प्रत्रि*या में वे जीवन-सम्बन्धों के नए निष्कर्ष ही नहीं निकालते वरन् पुराने विकल्पों को छोडते चले जाते हैं।