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स्वच्छता का मानवाधिकार एवं गाँधीदृष्टि

वरुण कुमार
मानवाधिकार का संबंध उस आधारभूत अधिकार और स्वतंत्रता से है जो व्यक्ति विशेष के लिए अनिवार्य है। किसी भी समाज की निर्मित नागरिकों की सभ्यता और संस्कृति से होती है और नागरिकों के अधिकार एवं कर्तव्य उस देश के संविधान से निर्मित होते हैं। मनुष्य को अपने जीवन यापन के लिए भोजन, वस्त्र एवं आवास की मूलभूत आवश्यकता होती है। एक सभ्य समाज की यह पहचान होती है कि वह अपने नागरिकों को उनकी अपनी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ गरिमापूर्ण ढंग से जीवन जीने के अवसर प्रदान करे, परन्तु हमारे देश में सदियों से चली आ रही स्केवेंजिंग यानी सिर पर मैला ढोने की प्रथा आज भी भारत के कई इलाकों में बदस्तूर जारी है। गाँधीजी ने अपने बचपन में भारतीयों में स्वच्छता के प्रति उदासीनता की कमी को महसूस कर लिया था। उन्होंने किसी भी सभ्य और विकसित समाज के लिए स्वच्छता के उच्च मापदंड की आवश्यकता को समझाया। उनमें यह समझ पश्चिमी समाज में उनके पारंपरिक मेलजोल और अनुभव से विकसित हुई। अपने दक्षिण अफ्रीका के दिनों से लेकर भारत तक वह अपने पूरे जीवनकाल में निरंतर बिना थके स्वच्छता के प्रति लोगों को जागरूक करते रहे। गाँधीजी के लिए स्वच्छता एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण सामाजिक मुद्दा था। 1895 में जब ब्रिटिश सरकार ने दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों और एशियाई व्यापारियों से उनके स्थानों को गंदा रखने के आधार पर भेदभाव किया था, तब से लेकर अपनी हत्या के एक दिन पहले 20 जनवरी, 1948 तक गाँधीजी लगातार सफाई बनाए रखने पर जोर देते रहे।1 लोक सेवक संघ के संविधान मसौदे में उन्होंने कार्यकर्ताओं के संबंध में जो लिखा था वह इस प्रकार है- कार्यकर्ता को गांव की स्वच्छता और सफाई के बारे में जागरूक करना चाहिए और गांव में फैलने वाली बीमारियों को रोकने के लिए सभी जरूरी कदम उठाने चाहिए।’(गाँधी वाङ्मय, भाग 90, पृष्ठ 528) इस लेख में स्वच्छता पर गाँधीजी के विचारों को संक्षेप में देने और वर्तमान स्थिति में इसकी समीक्षा की कोशिश की गई है।
हम आधुनिक तकनीक और विज्ञान की तरक्की की चाहे जितनी मिसालें पेश कर लें लेकिन जब हकीकत में हम आज भी मानव जीवन की बुनियादी आवश्यकताओं को उपलब्ध करा पाने के मामले में बहुत पीछे हैं। 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति से अब तक हमने कई क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की है। हमारी प्रति व्यक्ति आय बढ रही है, और औसत जीवन अवधि (आयु) अब बढकर 66 वर्ष हो गई है। शिशु मृत्यु दर भी 150 प्रति 1000 की अपेक्षा 2013 में घटकर 42 प्रति 1000 रह गई है। 2011 की जनगणना के अनुसार, सकल साक्षरता दर 74 प्रतिशत हो गई है। परन्तु दुर्भाग्यवश, आ*ाादी के 71 वर्ष के उपरांत भी हम स्वच्छता जैसी मूलभूत समस्या का सामना रोजमर्रे की *ांदगी में कर रहे हैं। भारतीय संदर्भ में मानवाधिकारों का प्रश्न स्वच्छता एवं पेयजल से जुडा हुआ प्रश्न है। यह मनुष्य का नैसर्गिक अधिकार है। 10 दिसम्बर, 1948 को संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा की गई, बावजूद इसके 2010 तक स्वच्छ वातावरण एवं स्वच्छ पेयजल को लेकर हम सजग नहीं हुए। सितंबर, 2010 में मानवाधिकार परिषद् ने आम सहमति से यह प्रस्ताव पारित कर इस बात की पुष्टि की कि जल एवं स्वच्छता व्यक्तियों के लिये मौलिक अधिकार है और इनका सुनिश्चित कराया जाना सबकी जिम्मेवारी है।2 संयुक्त राष्ट्र महासभा के मानवाधिकार परिषद् के इस प्रस्ताव में कहा गया ः ‘पेयजल एवं स्वच्छता का मानवाधिकार जीवन के समुचित स्तर के अधिकार का ही एक अंग है और यह जीवन एवं मानव गरिमा के अधिकार के साथ अभिन्न रूप से जुडा है।’
भारत में स्वतंत्रता परिदृश्य अभी भी निराशाजनक है। हमने गाँधी जी को एक बार फिर विफल कर दिया है। गाँधीजी ने समाजशास्त्र को समझा और स्वच्छता के महत्त्व को समझा। पारंपरिक तौर पर सदियों से सफाई के काम में लगे लोगों को गरिमा प्रदान करने की कोशिश की। आजादी के बाद से हमने उनके अभियान को योजनाओं में बदल दिया। योजना को लक्ष्यों, ढांचों और संख्याओं तक सीमित कर दिया गया। हमने मौलिक ढांचे और प्रणाली से ‘तंत्र’ पर जो ध्यान दिया और उसे मजबूत भी किया लेकिन हम ‘तत्व’ को भूल गए जो कि व्यक्ति में मूल्य स्थापित करता है। भारत में गाँधी जी ने गांव की स्वच्छता के संदर्भ में सार्वजनिक रूप से पहला भाषण 14 फरवरी, 1916 में मिशनरी सम्मेलन के दौरान दिया था। उन्होंने वहां कहा था ‘देशी भाषाओं के माध्यम से शिक्षा की सभी शाखाओं में जो निर्देश दिए गए हैं, मैं स्पष्ट कहूंगा कि उन्हें आश्चर्यजनक रूप से समूह कहा जा सकता है। गांव की स्वच्छता के सवाल को बहुत पहले हल कर लिया जाना चाहिए था।’ (गाँधी वाङ्मय, भाग-13, पृष्ठ 222)
गाँधी जी ने स्कूली और उच्च शिक्षा के पाठ्यऋमों में स्वच्छता को तुरंत शामिल करने की आवश्यकता पर जोर दिया था। 20 मार्च, 1916 को गुरुकुल कांगडी में उन्होंने कहा था, ‘गुरुकुल के बच्चों के लिए स्वच्छता और सफाई के नियमों के ज्ञान के साथ ही उनका पालन करना भी प्रशिक्षण का एक अभिन्न हिस्सा होना चाहिए। इन अदम्य स्वच्छता निरीक्षकों ने हमें लगातार चेतावनी दी कि स्वच्छता के संबंध में सब कुछ ठीक नहीं है। मुझे लग रहा है कि स्वच्छता पर आगंतुकों के लिए वार्षिक व्यावहारिक सबक देने के सुनहरे मौके को हमने खो दिया (गाँधी वाङ्मय, भाग-13, पृष्ठ 264)। गाँधीजी के लिए स्वच्छता सिर्फ एक जैविक आवश्यकता भर नहीं बल्कि जीवनशैली, सत्य की अनुभूति का अभिन्न अंग थी। साफ -सफाई की उनकी समझ सत्य की सार्वभौमिक एकात्मकता के एहसास से उपजी थी। गाँधीजी, जिन्होंने सत्य की ईश्वर के समान स्तुति की, उन्होंने पूर्ण सर्वव्यापी सत्य को ऐसा शुद्ध पाया और इसलिए ‘स्वच्छता की बराबरी ईश्वर’ से कर डाली। उन्होंने ‘स्वच्छता’ को रचनात्मक कार्यक्रम की सूची में शामिल करते हुए उसे स्वाधीनता के अनिवार्य कदम का दर्जा दिया।
भारत में स्वच्छता को हमेशा प्रधानता दी गई है। सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई से पता चलता है कि उस समय भी अपशिष्ट जल के प्रबंधन के लिए भूमिगत नालों की व्यवस्था थी । भारत में स्वच्छता संबंधी अभियांत्रिकी आज से लगभग 5000 वर्ष पूर्व ही विकसित हो चुकी थी तथा समय के साथ-साथ उसमें और सुधार होता गया। पतंजलि दर्शन से लेकर विवेकानंद तथा महात्मा गाँधी ने स्वच्छता के महत्त्व को सर्वाधिक प्रतिपादित किया है। जो लोग गाँधी जी के साथ रहने की इच्छा जाहिर करते तो इस बारे में उनकी पहली शर्त होती कि आश्रम में रहने वालों को आश्रम की सफाई का काम करना होगा जिसमें शौच का वैज्ञानिक निस्तारण करना भी शामिल है। गाँधी जी ने रेलवे की तीसरी श्रेणी के डिब्बे में बैठकर देशभर में व्यापक दौरे किए थे। वह भारतीय रेलवे के तीसरे श्रेणी के डिब्बे की गंदगी से स्तब्ध और भयभीत थे। उन्होंने समाचार पत्रों को लिखे पत्र के माध्यम से इस ओर सबका ध्यान आकृष्ट किया था। 25 सितंबर, 1917 को लिखे अपने पत्र में उन्होंने लिखा, ‘इस तरह की संकट की स्थिति में है तो यात्री परिवहन को बंद कर देना चाहिए लेकिन जिस तरह की गंदगी और स्थिति इन डिब्बों में है उसे जारी नहीं रहने दिया जा सकता क्योंकि वह हमारे स्वास्थ्य और नैतिकता को प्रभावित करती है। निश्चित तौर पर तीसरी श्रेणी के यात्री को जीवन की बुनियादी जरूरतें हासिल करने का अधिकार तो है ही। तीसरे दर्जे के यात्री की उपेक्षा कर लाखों लोगों को व्यवस्था, स्वच्छता, शालीन जीवन की शिक्षा देने, सादगी और स्वच्छता की आदतें विकसित करने का बेहतरीन मौका गवां रहे हैं। (गाँधी वाङ्मय, भाग-13, पृष्ठ 264, 550) 19 नवंबर, 1944 को महात्मा जी ने सेवाग्राम में हिंदुस्तानी तालीमी संघ द्वारा आयोजित प्रशिक्षण शिविर में भाग लेने वाले सदस्यों को संबोधित करते हुए कहा था, ‘शिक्षा में मन और शरीर की सफाई शिक्षा का पहला कदम है। आफ आसपास की जगह की सफाई किस प्रकार झाडू और बाल्टी की मदद से होती है, उसी प्रकार मन की शुद्धि प्रार्थना से होती है। इसलिए हम अपने काम की शुरुआत प्रार्थना से करते हैं। विनोबा भावे, ठक्कर बापा, जे.सी. कुमारप्पा और बेहद प्रतिभाशाली असंख्य नौजवान स्वाधीनता संग्राम में कूद पडे और उन्होंने सफाई एवं स्वच्छता को स्वाधीनता की बुनियाद मान लिया। आचार्य विनोबा भावे ने महाराष्ट्र में घर-घर जाकर मल साफ कर आदर्श प्रस्तुत किया, जिसमें उन्होंने खुद भी शामिल होकर स्वच्छता का संकल्प लिया था।**
आजाद भारत में 1986 में पहली बार सरकार द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर (ष्टद्गठ्ठह्लह्म्ड्डद्य ह्म्ह्वह्म्ड्डद्य ह्यड्डठ्ठद्बह्लड्डह्लद्बश्ाठ्ठ श्चह्म्श्ाद्दह्म्ड्डद्व (ष्टऋस्क्क) की घोषणा की गई इसके बाद एक-एक करके निर्मल भारत अभियान,(हृक्च*) संपूर्ण स्वच्छता अभियान (ञ्जस्ष्ट) स्वच्छ भारत मिशन (स्क्चरू )जैसे कई सारे कार्यक्रम चलाए गए, परंतु उसका कोई खास प्रभाव नहीं पडा। आज भी लगभग 48 प्रतिशत लोग खुले में शौच करने जाते हैं। एक अनुमान के मुताबिक महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों में से 70 प्रतिशत अपराध तब घटित हुए जब वो शौच के लिए खुले में गई थी। जुलाई 2012 में पूरे हुए संपूर्ण स्वच्छता अभियान (टीएससी) के अध्ययन से भी यह पता चलता है कि बेहतर स्वच्छता मिलने से शिशु मृत्यु दर में भी और ग्रामीण क्षेत्र में शौचालय सुविधा से युक्त घरों में जन्म लेने वाले बच्चे ऐसी सुविधा से रहित घरों में पैदा होने वाले बच्चों से कहीं अधिक लंबे होते हैं। सुसाइन ई चैपलिन ने 2011 में भारत में स्वच्छता की स्थिति का अध्ययन करने के लिए किए गए अपने शोध में इस बात की चर्चा की है कि-
‘स्वतंत्रता प्राप्ति से लेकर अब तक राज्य सरकार ने इस मामले में उपेक्षापूर्ण रवैया अपनाया है। औपनिवेशिक काल में जब भारत अंग्रेजों का गुलाम था और अंग्रेज भारत में नए नए शहरों का निर्माण कर रहे थे तब उन्होंने स्वच्छता को नजरअंदाज किया। भारत के कई शहर आज भी पर्यावरण में पर्यावरणीय समस्याओं की मार झेल रहे हैं। लाखों लोग दुर्दशापूर्ण जीवन जीने को मजबूर हैं। सरकारी प्रयास में इच्छाशक्ति की कमी का अभाव तथा जागरूकता ही कमी की वजह से सरकार आज भी लोगों को बेहतर स्वास्थ्य एवं स्वच्छता का माहौल देने में पूर्णतः असफल रही है। आ*ााद भारत में आ*ाादी के 65 वर्षों के बाद भी मात्र 40 प्रतिशत लगों के पास ही स्वच्छता की सुविधा है। राजनीति में सीधी दखल होने के बावजूद भी स्वास्थ्य संबंधी एवं स्वच्छता संबंधी सुविधाओं पर केवल मध्य वर्ग का ही आधिपत्य है।’ एशियन डेवलपमेंट बैंक के अनुसार यदि भारत अपने यहां अधिक शौचालयों का निर्माण कर पाता है तो शौचालय, ड्रेन पाइप, साबुन एवं ऐसे ही अन्य उत्पादों की बाजार में भी वृद्धि होगी। अभी बाजार 6.6 बिलियन डॉलर का है सन् 2020 तक यह 15 बिलियन डॉलर तक पहुंचाया जा सकता है यदि सरकार स्वच्छता के मापदंडों को बढावा देती है। स्वच्छता से मृत्यु दर में अथवा बीमारी की दर में कमी आएगी।
मानवाधिकारों की सुरक्षा के शुरुआती कदम के रूप में स्वच्छ भारत अभियान
महात्मा गाँधी ने अपने आसपास स्वच्छता बनाए रखने संबंधी शिक्षा प्रदान कर राष्ट्र को एक उत्कृष्ट संदेश दिया था। उन्होंने स्वच्छ भारत का सपना देखा था, जिसके लिए वह चाहते थे कि भारत के सभी नागरिक एक साथ मिलकर देश को स्वच्छ बनाने के लिए कार्य करें। महात्मा गाँधी के स्वच्छ भारत के स्वप्न को पूरा करने के लिए प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने 2 अक्टूबर, 2014 को स्वच्छ भारत अभियान शुरू किया और सफल कार्यान्वयन हेतु भारत के सभी नागरिकों से इस अभियान से जुडने की अपील की। भारत की 1.21 अरब जनसंख्या अधिकांश ग्रामीण क्षेत्र में और शहरी बस्तियों में निवास करती है। 2011 की जनगणना के अनुसार 7935 नगर (शहर) और कस्बे तथा 6.4 लाख गांव हैं। लगभग एक तिहाई (31 प्रतिशत ) आबादी नगरीय क्षेत्र में और तीन चौथाई आबादी ग्रामीण क्षेत्र में रहती है। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों की विविधता को ध्यान में रखते हुए ग्रामीण और नगरीय स्वच्छता को अलग-अलग करके देखना चाहिए। ऐसा पाया गया कि स्वच्छ तथा स्वस्थ मलिन बस्तियों का लक्ष्य हासिल करने के लिए बहुत बडे वित्तीय निवेश की जरूरत बिल्कुल नहीं है। इससे ज्यादा जरूरी है समस्याओं से निजात पाने के लिए संबंधित समस्याओं के हल के लिए नियुक्त अधिकारी, समुदाय तथा गैर सरकारी संगठनों के कार्य और उनका समर्पण भाव। जागोरी एवं वीमेन इन सिटी*ा इंटरनेशनल द्वारा आयोजित महिला अधिकार तथा एशियाई शहरों में पानी तथा सफाई की पहुंच पर किया गया एक अंतरराष्ट्रीय विकास तथा शोध केंद्र (आईडीआरसी) के अध्ययन (2009 से 2011) में यह पाया गया कि 2011- 12 में दिल्ली सरकार प्रति कॉलोनी जलापूर्ति पर मह*ा 30 रुपये (0.66 अमेरिकी डॉलर) तथा सफाई पर 80 रुपये (1.78 अमेरिकी डॉलर) खर्च करती है। (आईआरसी, 2011 ) चूंकि दिल्ली में पानी और सफाई की व्यवस्था में कई एजेंसियां लगी हुई हैं, यही कारण है कि स्वामित्व का कोई मतलब नहीं था और इसलिए कोई जवाबदेही भी नहीं थी।
शहरी पानी तथा सफाई की व्यवस्था को उन्नत बनाने के लिए इस क्षेत्र में वित्त का मामूली आवंटन भी राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी को प्रतिबिंबित करता है। इन उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है कि देश भर में शहरी सफाई को लेकर अलग अलग अनुभव हैं और इसकी कामयाबी कई कारकों पर निर्भर करती है। मलिन बस्तियों की जनसंख्या के लगातार बढते जाने से पानी और सफाई जैसी बुनियादी सुविधाओं पर ज्यादा बल दिए जाने की आवश्यकता है । शौचालय की साफ-सफाई समाधान का केवल एक हिस्सा है। मलजल, अपशिष्ट जल और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन अच्छी तरह से संचालित किए जाने चाहिए और शहर के अधिकारियों को भी एक निर्णायक भूमिका निभानी चाहिए। मलिन बस्तियों में सुरक्षित तथा टिकाऊ सफाई से शहरी स्वच्छता पर नीतियों एवं योजनाओं का सीमित प्रभाव होगा। जब तक कि इन योजनाओं के लिए पर्याप्त बजट मुहैया नहीं कराया जाए तथा असरदार तरीके से उन्हें लागू नहीं किया जाए। राज्य तथा नगरपालिका प्रशासन की ओर से मजबूत इच्छाशक्ति ही शहरी स्वच्छता के क्षेत्र में एक ठोस अंतर ला सकती है।
बहुत बडे पैमाने पर अधिक स्थाई और मजबूत अभियान ‘स्वच्छता का अधिकार’ की दिशा में शुरू किया जाना चाहिए और वह मुख्य रूप से मैला ढोने के उन्मूलन पर ध्यान केंद्रित करने वाला होना चाहिए। शौचालय के लिए नई और अभिनव प्रौद्योगिकी को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, जबकि साथ ही साथ सुरक्षित स्वच्छता प्रथाओं पर अधिक से अधिक जागरूकता को बढाना देने की भी जरूरत है। मलिन बस्तियों में भूमि स्वामित्व का अधिकार, आजीविका के विकल्प तथा शिक्षा एवं स्वास्थ्य सुविधाएं जैसे महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर भी ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है। इसके लिए केंद्र सरकार द्वारा वित्तीय स्तर पर लगातार बढोतरी की जा रही है। स्वच्छता राज्य का मामला है परंतु इसके लिए केंद्र सरकार द्वारा लगातार अपनी भूमिका निभाते हुए साल दर साल बजट में वृद्धि करते हुए सरकारों की भरपूर मदद की जा रही है।
और इसका परिणाम यह निकला कि मात्र 4 सालों में ग्रामीण भारत में स्वच्छता तक लोगों की पहुंच दोगुना से भी अधिक हो गई। 2 अक्टूबर 2010 तक केवल 38.7 प्रतिशत लोगों तक स्वच्छता की पहुंच थी जो 24 मई 2018 में 84.13 प्रतिशत हो गई। नीचे दिए गए ग्राफ में हम देख सकते हैं कि कैसे ग्रामीण स्वच्छता अपने लक्ष्य प्राप्ति की तरफ अग्रसर है। स्वच्छ भारत अभियान के तहत पुरजोर ढंग से कार्य किया गया है जिसका नतीजा यह निकला कि शहरी क्षेत्रों में भी लोगों तक स्वच्छता एवं स्वच्छ पेयजल की पहुंच बढी है और लोगों का जीवन स्तर ऊंचा हुआ है। इस कार्य नीति का मुख्य प्रयोजन निर्मल भारत की संकल्पना को साकार करने की रूपरेखा प्रदान करना और एक ऐसा परिवेश बनाना है जो स्वच्छ तथा स्वास्थ्यकर है। निर्मल भारत एक स्वच्छ और स्वस्थ राष्ट्र का सपना है जो हमारे नागरिकों के कल्याण का प्रयास करता है और इसमें योगदान देता है। इस संकल्पना में एक ऐसे राष्ट्र की कल्पना की गई है जहां खुले स्थान पर मल त्याग की पारंपरिक प्रथा को पूरी तरह समाप्त कर दिया जाए, प्रत्येक मानव को सम्मान दिया जाए और जीवन की गुणवत्ता में सुधार लाया जाए।
वर्तमान परिदृश्य एवं चुनौतियां
1. विगत वर्षों में ग्रामीण भारत में 50 मिलियन शौचालय बनाए गए हैं, शहरों और कस्बों में 3.8 मिलियन शौचालयों का निर्माण हुआ है और वर्तमान में 1.4 मिलियन निर्माणाधीन हैं शौचालयों की संख्या 39 प्रतिशत से बढकर 69 प्रतिशत हो गई है। 248000 गांवों और पांच राज्यों सिक्किम, हिमाचल प्रदेश, केरल, उत्तराखंड, और हरियाणा को ओपन डिफेकेशन फ्री (खुले में शौच से मुक्त) घोषित कर दिया गया है। आंकडों के मुताबिक स्वच्छ भारत अभियान के तहत बनाए गए शौचालयों में से 85 प्रतिशत का इस्तेमाल लोगों द्वारा किया जा रहा है।
2. सभी के लिए आवास अभियान के तहत बनाए गए सभी घरों में शौचालय का निर्माण हो रहा है। खुले में शौच से मुक्ति से महिला सशक्तिकरण को बल मिल रहा है तथा उन्हें घरेलू अधीनता और अपमान से मुक्ति मिल रही है।
3. दिसंबर 2015 में किए गए एक अध्ययन में सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च ने बताया कि इस अभियान में डुप्लीकेट प्रविष्टियाँ की गई हैं। ऐसे लाभार्थियों का नाम लिखा गया है जो वास्तव में है ही नहीं। साथ ही इस अभियान में जवाबदेही का भी अभाव है। यही कारण है कि विश्व बैंक ने इस परियोजना को डाउनग्रेड किया और 1.5 अरब डॉलर के ऋण की पहली किस्त जारी करने से इनकार कर दिया। सरकार ने स्वच्छ भारत अभियान (ग्रामीण) की तुलना में स्वच्छ भारत अभियान (शहरी) के लिए कुछ ज्यादा ही कम फंड जारी किया है। जिस तेजी से शहरों की जनसंख्या बढ रही है उसको देखते हुए दिए जा रहे फंड में समुचित अंतर होना चाहिए। शहरी क्षेत्रों की समस्याएं ग्रामीण क्षेत्रों की समस्याओं से काफी भिन्न हैं, जबकि स्वच्छ भारत अभियान में इस बार अलग-अलग विचार करने के बजाय दोनों ही प्रकार की समस्याओं को लेकर एक ही दृष्टिकोण अपनाया जा रहा है।
निष्कर्ष एवं सुझाव
आलोचकों द्वारा इस अभियान को नाना प्रकार के कारणों से जोडते हुए इसकी सफलता को लेकर कयास लगाए जा सकते हैं, लेकिन वे स्वच्छ भारत की आवश्यकता पर सवाल नहीं उठा सकते हैं। स्वच्छ भारत अभियान की सफलता परोक्ष रूप से भारत में निवेश को बढाने, जीडीपी विकास दर बढाने, दुनिया भर से पर्यटकों का ध्यान खींचने, स्वास्थ्य लागत को कम करने, मृत्यु दर को कम करने, घातक बीमारियों की दर कम करने तथा और भी कई ची*ाों में सहायक होगी। लेकिन, अहम सवाल यह है कि हमने अब तक कितनी प्रगति की है, हमारी कमियां क्या हैं और उनका निदान क्या होना चाहिए? यह सही है कि स्वच्छ भारत अभियान के तहत बडी संख्या में शौचालय बनाए गए हैं, फिर भी भारत में इतनी बडी संख्या में लोग घर में शौचालय होते हुए भी खुले में शौच जाने को प्राथमिकता क्यों देते हैं? यह सवाल नीति निर्माताओं और वैज्ञानिकों के लिए काफी पेचीदा है। इसके समाधान के लिए लोगों के व्यावहारिक परिवर्तन पर भी उतना ही जोर देना होगा जितना कि शौचालय निर्माण पर है अन्यथा हम अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में पीछे रह सकते हैं। दरअस्ल, भारत में स्वच्छता से जुडे मसलों पर बातचीत बेहद कम हुई है जबकि शौचालयों का निर्माण बहुत बडे स्तर पर किया जा रहा है। अनेक सामाजिक शोध के उपरांत यह निष्कर्ष निकाला गया है कि सामाजिक विज्ञान और व्यवहार परिवर्तन में गहरा संबंध है, खासतौर पर शौचालयों के उपयोग के मामले में। शौचालय से संबंधित प्रयास समुदाय को ध्यान में रखकर किए जाने चाहिए ना कि एक व्यक्ति के। शौचालय की संख्या से अधिक, उसके डिजाइन का सामाजिक और भू-वैज्ञानिक लिहा*ा से सभी वर्गों के अनुकूल होना आवश्यक है। शौचालयों के निर्माण में निर्माण की गुणवत्ता, रख-रखाव सीवेज प्रबंधन प्रणाली और पानी की उपलब्धता का ध्यान रखना आवश्यक है। सीवेज की सफाई का काम करने वाले मजदूरों को विभिन्न प्रकार के सुरक्षा उपकरण उपलब्ध कराए जाने चाहिये। स्वच्छता से संबंधित हस्तक्षेप करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि शौचालय निर्माण सामाजिक मानदंडों पर हों ना कि लक्ष्य-उन्मुख रणनीतियों पर। प्रायः ऐसा देखा गया है कि सामाजिक मापदंडों की अनदेखी करने वाली नीतियां अपने वास्तविक उद्देश्य को प्राप्त करने में असफल रहती हैं। पूर्व के अनुभवों से ज्ञात होता है कि समुदाय आधारित प्रयास, जिसमें समाज के सभी वर्गों को साथ में लेकर कार्य किया गया, उससे धीरे-धीरे लोगों के स्वास्थ्य व्यवहार में परिवर्तन आया। मैला ढोने की समस्या से निपटने के लिए सरकार को शौचालयों के निर्माण के दौरान दो गड्ढों का निर्माण करना चाहिये। यदि एक गड्ढा भर गया तो दूसरे गड्ढे की सहायता से शौचालय बंद नहीं होगा। पहले गड्ढे में अपशिष्ट आसानी से अपघटित हो जाएगा, जिसे आसानी से साफ किया जा सकता है। ग्रामीण इलाकों में यह युक्ति कारगर साबित हो सकती है। यह एक प्रमाणित सत्य है कि व्यक्ति अपने सामाजिक संपर्कों से ही शौचालय बनाने के लिए प्रेरित होता है। यदि समान जाति, शिक्षा या अच्छे सामाजिक संबंध हो तो व्यक्ति बिना किसी सरकारी मदद के अपने घर में शौचालय का निर्माण करा लेता है। सरकार द्वारा शौचालय का निर्माण के लिए सब्सिडी दिए जाने के बावजूद यह असफल रही, क्योंकि इस बारे में जाति आधारित सामाजिक विभाजन को ध्यान में नहीं रखा गया है। इसके लिए समुदाय में पहले से प्रमाणित अव्यावहारिक मानदंडों को स्वास्थ्य, शिक्षा और संचार के माध्यम से दूर करके उनकी जगह नए मानदंडों को स्थापित करना चाहिए। हालांकि यह एक क्रमिक प्रक्रिया है। जब नए मानदंडों को कोई समुदाय अपनाने लगता है और वे उन्हें अपने व्यवहार में समाहित कर लेता है तो वह प्रगतिशील समाज कहा जाता है। स्वच्छ भारत अभियान तब तक कामयाब नहीं हो सकता, जब तक कि समस्त भारतवासी इसे अपने मानवाधिकार के रूप में आत्मसात् नहीं कर लेते।