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महात्मा गाँधी : एक पुनरावलोकन

पवनकुमार गुप्त
हमारे देश की हालत ऐसी है कि हम पिछले इकहत्तर वर्षों में न तो गाँधीजी को पचा पाये और न ही नकार पाये। मजेदार बात है कि वामपंथियों, आधुनिक सेक्युलर-लिबरल से लेकर भाजपाइयों और मोदी जी तक सबको उनका नाम लेना पडता है। शायद ही पिछले ह*ाार वर्षों में कोई ऐसा मनुष्य पैदा हुआ है जिसके मरने के इतने कम समय में लोगों ने उसकी बातों को तो भुला दिया पर उनका नाम उन्हें भी लेना पडता है जो उनके (विचारों के) विरुद्ध खडे न*ार आते हैं। भले ही यह सब औपचारिकता और दिखावा हो पर ऐसी क्या मजबूरी है कि जो उनके विरोध में खडे न*ार आते हैं, उन्हें भी यह दिखावा करना पडता है? यह सवाल महत्त्वपूर्ण है।
पश्चिम में जन्मी, पनपी और पल्लवित हुई, जिस आधुनिकता को, हमने और हमारे (वामपंथियों से दक्षिणपंथियों तक) नेताओं, अफसरों, बुद्धिजीवियों एवं विकास की मिरीचिका की तरफ ते*ाी से दौडते मध्यम वर्ग ने बिना जांच किये, हृदय से लगा कर अपना लिया है, उस आधुनिकता और महात्मा गाँधी के बीच छतीस का आंकडा है। इसके बावजूद इन लोगों के लिए खासकर राजनीति से जुडे जमीनी नेताओं को लोगों के बीच जाने पर गाँधी याद आते ही रहेंगे। यह उनकी मजबूरी है।
ऐसा लगता है कि जब तक इस देश के लोग, गाँधीजी को पचा न लेंगे तब तक हमारी हालत दयनीय ही रहने वाली है। इसका एकमात्र उपाय है कि हम गाँधीजी को बिना किसी पूर्वग्रह के पढें और सही अर्थों में समझने का प्रयास करें। हो सकता है पीछे मुडकर देखने पर हमें उनके कुछ फैसले ठीक न लगे। पर गाँधी भगवान तो नहीं थे, मनुष्य ही थे। और हमारे महाकाव्यों को पढने से हमे तो ईश्वर के अवतार भी चाहे राम हों या कृष्ण, कई बार कुछ ऐसा करते न*ार आते हैं, जो हमें समझ नहीं आता। शंबुक का वध हो, सीता का परित्याग हो, महाभारत का युद्ध, कर्ण और भीष्म पितामाह का वध कुछ ऐसे उदाहरण हैं, जिसका सीधा-सीधा जवाब हमारे पास नहीं होता। तो गाँधी जी को पढते और समझते वक्त थोडी उदारता, थोडा समकालीन पृष्ठभूमि की समझ रखना भी *ारूरी है।
पिछले दो-ढाई सौ सालों से पश्चिमी सभ्यता, आधुनिक विज्ञान व तकनीकी और उनसे निकली व्यवस्थाओं से, पूरा विश्व संचालित हो रहा है। निर्भीक होकर मूल्याँकन करें तो ऐसा नहीं लगता- बावजूद बढती सुविधाओं के- कि इन दो-ढाई सौ वर्षों में, मनुष्य पहले से ज्यादा, सुकून में जी रहा है। मनुष्य की परेशानियाँ हर स्तर पर बढी हैं। व्यक्तिगत स्तर पर मनुष्य पहले से ज्यादा व्यथित, उलझा हुआ, संदेह से भरा, पर-संचालित और परावलंबी दिखता है। धरती बीमार दिखती है, उसका तापमान बढ रहा है, पानी घट रहा है, ऊपर ओजोन लेयर में छेद हो रहे हैं, बर्फ के अंबार कम होते जा रहे हैं- यह आशंका जताई जा रही है कि आने वाले बीस-तीस वर्षों में विभिन्न राष्ट्रों के बीच पानी को लेकर युद्ध हो सकते हैं, समुद्र का स्तर बढ सकता है जिसकी वजह से संसार का एक बडा हिस्सा डूब सकता है। युद्ध और आतंकवाद (व्यवस्थागत और राष्ट्रों द्वारा पोषित आतंकवाद को भी शामिल करने की *ारूरत है) बढता ही जा रहा है और भले ही बडे अमीर राष्ट्र इस पर घडियाली आँसू बहायें पर युद्ध का खौफ और आतंकवाद का गहरा संबंध हथियारों के उत्पादन और उसके व्यापार से है। सुविधाओं और भौतिक जीवन स्तर में बढोतरी के बावजूद, अमीरी-गरीबी के बीच बढता भयावह फासला, भुखमरी का बढना और इससे जुडा असंतोष और वैमनस्य एक बडी समस्या और है। स्व-रोजगार से विमुख हो कर हर व्यक्ति रोजगार की तलाश में भटकने को मजबूर है या लालायित है। बल्कि स्व-रोजगार की कोई सोच ही नहीं रहा, सभी को नौकरी चाहिये करोडों की हो या कुछ ह*ाार की। धर्म अपना असली अर्थ भूल कर संप्रदायों में सिमट कर वैमनस्य बढा रहा है। सब कुछ गुत्थम-गुत्था हो गया है। किसी के पास समाधान है नहीं। कुल मिलाकर स्थिति भयावह है, विरोधाभासों से भरी है, फिर भी आधुनिकता का मोह हमसे छूटता दिखाई नहीं पडता।
आधुनिकता ने एक भ्रमजाल में हमें बांध रखा है; मनुष्य को अपना सहज पर महत्त्वपूर्ण लक्ष्य आसानी से दिखाई नहीं पडता। वह ‘आधुनिक’ और ‘विकसित’ होने को ही अपना लक्ष्य मान बैठा है, जिसमे संतुष्टि, ठाठ, समय की उपलब्धि, संबंध, सौंदर्य दृष्टि, सयानापन, विवेक, धैर्य, संतोष, सहयोग, सरल और सहज जीवन इत्यादि, जिनकी वजह से मनुष्य सुखी होता है, की शायद ही कोई जगह रह गई है; बल्कि ये शब्द खोखले होते जा रहे हैं, अपना अर्थ खोते जा रहे हैं। पढे-लिखे के सपने उसे शोषित होने को मजबूर कर रहे हैं और विडम्बना यह कि उसे यह दिखाई नहीं दे रहा बल्कि वह शोषित होने को लालायित दिखता है। शोषण करने वाली शक्तियाँ अदृश्य हैं। आधुनिक व्यवस्था का एक रूप यह भी है। आम आदमी को संभवतः कुछ ऐसे सोचने की आदत पड गई है कि शरीर के दर्द को, किसी ऐसी दवा से, जो सुन्न करके दर्द का एहसास न होने दे, को विज्ञान की बडी उपलब्धि मान कर, स्वस्थ होने का भ्रम पाल बैठा है। हमारा पूरा तंत्र समाधान की खोज में न लगकर राहत में लगा हुआ है। छली आधुनिकता दिखावे और भुलावे पर टिकी है।
बीसवीं शताब्दी के बडे लोगों में गाँधीजी एकमात्र ऐसे व्यक्ति हैं जो आधुनिक विज्ञान, आधुनिक सभ्यता और आधुनिक व्यवस्थाओं के भ्रमजाल को शुरू में ही समझ गये और सरल भाषा में इसे समझाने का भरपूर प्रयास भी किया। असल में उनकी लडाई अंग्रेजों से नहीं है। वे तो मनुष्य को इस आधुनिक सभ्यता की व्यवस्थाओं और उसके भ्रम से मुक्त करना चाहते हैं, उनसे मोह भंग करना चाहते हैं। पर अपनी इस कोशिश में वे सफल नहीं हो पाये।
लेकिन आज आधुनिक सभ्यता के बहुत सारे भ्रमों से पर्दा उठता जा रहा है। जैविक खेती की बात बडे स्तर पर हो रही है। अंग्रेजी दवा और चिकित्सा पद्धति पर प्रश्न-चिह्न लगने लगे हैं। कुछ लोग आधुनिक तकनीकों पर, संचार माध्यमों पर और आज की आर्थिक नीतियों पर बुनियादी सवाल खडे करने लगे हैं। गाँधीजी के जमाने में विरले ही ऐसे होंगे जो आधुनिकता की चकाचौंध से अपने को बचा पाये हों। पर अब ऐसा नहीं है, इसलिए ऐसा लगता है कि समय आ गया है कि हम गाँधीजी को फिर से एक बार समझने का प्रयास करें।
जाने-अनजाने, महात्मा गाँधी के साथ इस देश में बडा अपराध हुआ है। गाँधीजी का या तो अवमूल्यन (जैसा है उससे कम आंकना) हुआ है या अमूल्यन (जैसा है उससे भिन्न आंकना)। जबकि सही मूल्याँकन का अर्थ होता है-जो जैसा है, वैसा देख पाना। यह लेख इसी आशय से लिखा जा रहा है। गाँधीवादी अपने को शायद अलग मानते हों कि उन्होंने गाँधी को सही समझा है पर ऐसा नहीं है। उन्होंने या तो गाँधी को एक रूढि बना दिया है या उनका इस्तेमाल अपने राजनीतिक पूर्वग्रहों को पुष्ट करने के लिए करते हैं।
1940 के दशक में एक बार सुशीला नैय्यर ने गाँधीजी से पूछा था, ‘आपने ऐसा क्या किया कि भारत के गिरे-पडे लोग उठ खडे हुए?’ गाँधीजी ने जवाब दिया था कि ‘ज्यादा कुछ नहीं, (उन्होंने) सिर्फ उस बात को कह डाला जो साधारण भारतीय के मन में थी, परन्तु वे बोल नहीं पाते थे।’ गौर करें तो यह साधारण-सी लगने वाली बात अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। गाँधीजी का भारत के साधारण जन के अन्दर बैठी धर्मपरायणता और परा-शक्ति पर उसकी अटूट आस्था पर गहरा विश्वास था। एक बार शुरू के दिनों में दक्षिण भारत के एक देशी राज्य, त्रावणकोरए में धुमते हुए एक साधारण किसान से वह यह पूछते हैं कि ‘तुम्हारा राजा कौन है?’ जवाब में किसान कुछ ऐसा कहता है कि राजा तो कोई होगा पर असली राजा तो ऊपर वाला है।’ हममें से कोई यह उत्तर सुनता तो किसान को पढाई-लिखाई करने का उपदेश देता; इस बात पर दुखी होता कि हमारे साधारण लोग कितने अनभिज्ञ हैं। पर गाँधी जी यह सुनकर प्रसन्न हो जाते हैं। उन्हें यह लगता है कि भारत का साधारण आदमी अपने राजा को भी ज्यादा महत्त्व नहीं देता। उसके लिए तो ईश्वर ही सबकुछ है, फिर ऐसे लोगों को निर्भीक क्यों नहीं बनाया जा सकता? हर अन्याय के खिलाफ उन्हें खडा क्यों नहीं किया जा सकता? साधारण किसान के उत्तर में उन्हें साधारण और सामान्य में, बुनियादी समझ, विवेक, शक्ति और संभावना वह सब दिखी, जो हम पढे-लिखों को आसानी से दिखाई नहीं देती। लगता है महात्मा गाँधी का प्रयास इस साधारण की शक्ति का सहारा लेकर एक ऐसी दुनिया का सपना था जहाँ मनुष्य सहज जीवन व्यतीत कर सके, जहाँ साधारण (व्यक्ति और कार्य-कलाप) के लिए पर्याप्त अवकाश हो। अच्छी दुनिया विशेष लोगों की नहीं हो सकती; अच्छी दुनिया अगर कभी होगी तो ऐसी ही होगी जहाँ साधारण आदमी सहजता से एक साधारण जीवन जी सके। वहाँ विशेषता का नहीं श्रेष्ठता का (स्वतः ही) सम्मान होगा। दिखावे की, पद, पदवी, पैसा, सत्ता की ताकत, कपडे लत्ते, रूप-रंग से प्रभावित करके दूसरे को छोटा और निरीह दिखा कर अपने को बडा बताने की वहाँ जगह नहीं होगी। संभवतः गाँधी जी मानते थे के अतीत का भारत कुछ ऐसा ही था और यहाँ के साधारण में उनको इसके प्रमाण मिलते रहते हैं।
अंग्रेजों के भारत आने से पहले तक ऐसा लगता है कि भारतवर्ष में राजा, नवाब और सत्ता पर बैठे लोगों को कोई खास महत्त्व नहीं दिया जाता रहा है। शायद उनकी भूमिका एक संरक्षक (ट्रस्टी) से ज्यादा की न रही हो। राजा अपना राज चलाता है और प्रजा अपने तरीके से अपना जीवन चलाती है, अपनी व्यवस्थाएं स्वयं तय करती है। राजा का प्रजा के जीवन में बहुत *यादा हस्तक्षेप नहीं है। वह अपने निर्णय स्वयं लेती है और अधिकांश झगडे और विवाद भी स्वयं ही, स्थानीय समाज में, सुलझाने की व्यवस्थाएं हैं। संभवतः यही कारण है कि अंग्रेज जब यहाँ अपना पैर जमाने लगे तो शुरू के दिनों में, यहाँ के साधारण आदमी को इस बात से ज्यादा फर्क नहीं पडा होगा कि देशी राजा के बदले अंग्रेज राज करने लगे हैं। वह तो बहुत बाद में जागा होगा जब अंग्रेजों और उनके नुमाइन्दों के अत्याचार और प्रताडना से वह व्यथित होने लगा और जब उसे लगा कि उसका रोज का जीवन प्रभावित होने लगा है, तब उसे तकलीफ हुई होगी। हमारे यहाँ जनता और राजा के बीच, कई क्षेत्रों में, एक समानता का रिश्ता रहा है। जैसे अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध के एक अंग्रेजी दस्तावेज से यह पता चलता है कि हैदराबाद में दरबार के लोगों की पोशाक और आम आदमी की पोशाक में कोई खास फर्क नहीं हैं। उस अंग्रेज के हिसाब से दरबार के लोगों की पोशाक थोडी ज्यादा साफ है, बस। इसी तरह जहाँगीर के जमाने का एक जिक्र है कि जहाँगीर भी खिचडी और घी खाता है और भारत का आम आदमी भी वही खाता है। उदयपुर के राजा अंग्रेजों के आने से पहले अपने निजी खर्च के लिए राजकीय खजाने से मात्र एक ह*ाार महीने के लेते हैं, जो अंग्रेजों के आने के बाद बढ कर ह*ाार रुपये दिन के कर दिये जाते हैं। अंग्रेजों के आने के पहले मुगलों के अलावा कहीं भी अय्याशी से भरे महल नहीं मिलते। राजा लोग किलों में ही रहते पाये जाते हैं। यह जितने भी महल जो आज पाँच सितारा होटलों में तब्दील हो गये हैं, 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध, बल्कि 20वीं शताब्दी के शुरुआती दौर में बने हैं। ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं जिससे अंदा*ाा लगाया जा सकता है कि आम आदमी और राजाओं में *यादा फासला नहीं था, आम आदमी की *ान्दगी में हस्तक्षेप तो बहुत ही कम था। ‘दैशिक शास्त्र’ नाम का एक ग्रंथ है जो 20वीं शताब्दी के शुरू में कुमाओं के ठुल्धारिया जी ने फिर से संकलित किया था। उनके मुताबिक कुछ एक सदियों पहले तक यह देश के अधिकांश इलाकों में इसे पढाया जाता रहा है। उसमें लिखा है कि राजा का धर्म प्रजा के रास्ते में आई रुकावटों को दूर करना है, बस। उन्हें कुछ मुहैया करवाना नहीं। क्योंकि देने वाले ने सब कुछ पहले से दे रखा है। और कुछ इसी तरह की बात महात्मा गाँधी 22 दिसंबर 1916 को म्योर कालेज (बाद में इलाहाबाद विश्वविद्यालय) में ‘क्या आर्थिक उन्नति वास्तविक उन्नति के विपरीत बैठती है?’ विषय पर बोलते हुए करते हैं। गाँधी जी बराबर इस बात को समझते रहे और समझाते रहे कि यहाँ के लोग अलग तबीयत, अलग स्वभाव के लोग रहे हैं और यह तबीयत एक अच्छे जीवन और अच्छे संसार के साथ तालमेल रखती है।
गाँधीजी इसका जिक्र करते हैं कि कई बार ऐसा होता रहा है कि राजा के किसी फैसले से किसी समुदाय के लोग नाराज हो गये तो उन्होंने विरोध में राज्य छोडने का ही फैसला ले लिया। तब राजा आकर उनसे मिन्नत करता है क्योंकि एक ऐसी मान्यता है कि प्रजा यदि राजा का राज्य ही छोड दे तो राजा को बडा पाप लगता है। इससे यह समझ आता है कि यह देश किस प्रकार की मान्यताओं को गहरे में संजोय हुए है। राजा होते हुए भी, राजा से बडी किसी अदृश्य सत्ता पर लोगो की आस्था है। गाँधीजी इस बात को गहराई से महसूस करते हैं और इस शक्ति को फिर उभारना चाहते हैं। संभवतः गाँधीजी के पहले (और शायद बाद में भी) कोई बडा नेता इस देश में नहीं हुआ जिसे भारत के साधारण व्यक्ति के स्वभाव और यहाँ की लोक परम्पराओं की इतनी गहरी समझ हो। गाँधीजी इस बात की ओर बार-बार संकेत करते हैं कि भारत के साधारण आदमी को धर्म और ईश्वर में गहरी आस्था है, इसलिए वे कहते हैं, ‘भारत धर्मबद्ध है इसलिए यदि यहाँ विचार उत्पन्न हो जाये कि इस समय देश-सेवा ही धर्म की अंतिम सीमा है तो धार्मिक वृत्ति वाले बडी संख्या मंल राजनीतिक कार्य में सम्मिलित हो सकते हैं।’ आज के आधुनिक तबके की तरह वे आस्था और मान्यताओं को तिरस्कार की नजरों से नहीं देखते। जहाँ आधुनिक पढाई से गुजरे लोग अपने को ‘साइंटिफिक’ और ‘नैशनल’ दिखाने या जताने में और आस्था और मान्यताओं को अंधविश्वास करार देने में अपनी शान समझते हैं वहीं गाँधी जी को भारत के साधारण मानस की मान्यताएँ और आस्था में शक्ति और विवेक दिखता है।
‘रोमोरोला का भारत’ (दो खंडों में, पूर्वोदय प्रकाशन) में रोमोरोला देश के लगभग सभी बडे नेताओं के संस्मरण लिखते हैं। रोमारोला भारत, महात्मा गाँधी के बडे प्रशंसक हैं; भारत के बडे शुभचिंतक और यहाँ की गहरी समझ रखते हैं। भारतवर्ष के बडे नेताओं और महात्मा गाँधी में कौन से बारीक, पर महत्त्वपूर्ण भेद हैं, इस किताब को पढने से पता चलता है। देश के सभी नेता, रवींद्रनाथ ठाकुर से लेकर जवाहरलाल नेहरू तक, योरोप प्रवास के दौरान उनसे मिले बिना नहीं रहते। पंडित नेहरू के बारे में रोमोरोलां लिखते हैं, ‘उनसे बडा योरोपियन तो मैंने योरोप में भी नहीं देखा,’ रविन्द्रनाथ टैगोर रोमारोलां से यह कहते पाये जाते हैं कि, ‘मेरी बात समझने वाले तो योरोप में ही बसते हैं। वहां (भारत में) तो मुझे बहुत अकेला लगता है।’ रोमारोलां की इस किताब से उस समय के भारत के बडे लोगों-पढे-लिखे वर्ग की मानसिकता का, बहुत बारीकी से अध्ययन होता है। यह पता चलता है कि किस प्रकार गाँधीजी एकमात्र भारत के ऐसे नेता हैं, जो अन्यों से भिन्न हैं। जिस प्रकार का अकेलापन पंडित नेहरू और रवि बाबू भारत में महसूस करते हैं ठीक उसके विपरीत गाँधीजी की मनोदशा लगती है। तभी तो गाँधीजी यह कहते हैं कि, ‘भारत योरोप नहीं है, जापान नहीं है, चीन नहीं है, भारत ही कर्मभूमि है, शेष सब भोग भूमियाँ हैं। और देशों से इस देश का काम भिन्न है। भारत में धार्मिक साम्राज्य भोगने की शक्ति है।’ (गोधरा, नवम्बर 3, 1917, गाँधीजी वाङ्मय खण्ड 14)।
गाँधीजी जब 1915 में भारत आये तो उस समय तक अंग्रेजों को यह पूरा विश्वास हो गया लगता है कि अब वे लंबे समय तक इस देश में राज करेंगे। 1857 की क्रांति और 1884-1893 का गोहत्या के विरुद्ध आंदोलन, जिसमें हिंदू, मुसलमान, सिख, और पारसी सभी कौमों ने बढ-चढकर हिस्सा लिया, तब तक पुरानी बातें हो गई हैं। अंग्रेजों को लगता है कि उन्होंने हिंदुस्तानियों को आतंकित कर बु*ादिल और कमजोर बना दिया है। तभी तो पीयरसन नाम का एक अंग्रेज जो 1907 में भारत आया और दोबारा 10 वर्ष बाद 1917 में यहाँ आया, गाँधी जी के संदर्भ में अपने अनुभव रोमारोलां को यह कहकर सुनाता है कि 1907 में जब वह यहाँ आया, तो आम भारतीय की हालत यह है कि वह अंग्रेजों से नीची आँख करके बडे सहमे हुए ढंग से बात करता है। पर जब वह 1917 में वापस आता है तो उसे एक चमत्कारिक परिवर्तन इस देश में दिखाई देता है। वह देखता है कि अब आम हिंदुस्तानी न सिर्फ अंग्रेजों से आँख मिलाकर बात करता है पर इससे भी बढकर, उसमें अंग्रेजों को अपमानित (insult) करने की हिम्मत भी आ गई है। पीयरसन का यह अनुभव 1917 का है। गौर करने की बात है कि महात्मा गाँधी 1915 में भारत आये और 6 फरवरी 1916 को बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में उन्होंने अपना पहला बडा सार्वजनिक धमाकेदार भाषण दे डाला। इस अवसर पर भारत के वाइसराय हार्डिंज भी हैं और गाँधी जी ने हिन्दी में बोलते हुए उन्हें भी नसीहत दे डाली। यह बडी हिम्मत का काम था, उस समय जब ब्रिटिश साम्राज्य अपनी चरम सीमा पर था। ऐसा लगता है कि पीयरसन को जो परिवर्तन भारतीयों में दिखता है, वह असल में सिर्फ एक-डेढ साल की बात है और इस परिवर्तन का सम्पूर्ण श्रेय महात्मा गाँधी को जाता है। गाँधीजी ने खरी-खरी बातें देशज मुहावरे में और भारतीय सभ्यता की बैठक पर, दो टूक ढंग से, जब सबके सामने रखी तो उसका चमत्कारिक असर हुआ। एक तरफ जनसाधारण को, जो अंग्रेजों से बुरी तरह आक्रांत हैं, यह लगा होगा कि अंग्रेजों के सामने एक साधारण भारतीय हिम्मत से बोलने के बाद भी, अगर खडा रह पाता है तो निश्चित ही यह व्यक्ति कोई देवपुरुष होगा। तभी तो एक वर्ष के अंदर-अंदर उत्तर से लेकर दक्षिण तक यह आदमी गाँधी से ‘महात्मा’ गाँधी हो जाता है। आखिर एक महात्मा में ही इतनी शक्ति हो सकती है कि वह अंग्रेजों के सामने निर्भय होकर खडा हो सके! उन्हें यह लगा होगा कि हमारे बीच एक देवपुरुष का आगमन हो गया है जो हमारा तारणहार होगा। उस समय देश के कई इलाकों में ऐसे गीत लिखे जाने लगे जिनमें गाँधीजी को कृष्ण और राम के समकक्ष देखा जाने लगा। उस जमाने का एक प्रचलित भोजपुरी गीत इस प्रकार है ः
धीरे बहु धीरे बहु पछुआ बयरिया।
घमवा से बदरी करहुं रखवरिया।
जुग-जुग जोहि जेहि जगत पुरातन।
धरती पर उतरेला पुरुस सनातन।
नाहीं बडुए संखचक्र, नाहीं गदाधारी।
नाहीं बडुए दशरथ-सुत धनुधारी।
कान्हे पटपीत नाहीं, मुरली अधर नाहीं।
साक्य-राजपूत नाहीं, बनल भिखारी।
अबकी अजब रूप धइले, धइले गिरधारी।।
(सरदार हरिहर सिंह)
योरोपीयन सभ्यता और पश्चिमी अवधारणाओं को मूलभूत रूप से चुनौती देने का और भारतीय सभ्यता और दर्शन को, बिना आडम्बर के, तर्कपूर्ण ढंग से गौरवान्वित करने का जो अभूतपूर्व काम महात्मा गाँधी ने किया, उसने जनसाधारण में गजब की शक्ति का संचार कर दिया।
गाँधीजी ने अपने भारत आगमन के कुछ ही समय में देश को और कांग्रेस को पूरी तरह से बदल दिया। पियरसन रोमारोला को कहता है- ‘कुछ ही समय में, भारत के गाँवों में हर तरफ गाँधी का नाम बडे सम्मान से लिया जाने लगा और उनकी बात एक नैतिक कर्तव्य और आदेश की तरह मानी जाने लगी।’ उसी जमाने का जिक्र लुई फिशर, एक अमेरिकन पत्रकार, जिसने गाँधीजी की जीवनी भी लिखी है, दूसरे ढंग से करता है, ‘भारतीय लोग आजाद हो गये थे। उनके शरीर पर जंजीरें जरूर पडी थी पर उनकी आत्मा मुक्त हो गई थी। गाँधीजी ने चाबी घुमा दी थी।’ गाँधीजी के भारत आगमन के पश्चात् बहुत जल्द ही कांग्रेस की चाल-ढाल भी बदलने लगी। गाँधीजी के आगमन के पहले कांग्रेस में इक्के-दुक्के ही नेता होंगे जो ठेठ भारतीय पोशाक पहनते हों परन्तु गाँधीजी के आने के बाद कांग्रेस की वेश-भूषा बदलने लगी। गाँधीजी जब देश में आये हैं तो कांग्रेस मात्र एक वाद-विवाद करने वाली, अंग्रेजी तर्ज पर बनी एक सोसायटी-जैसी दिखती है। उसका कुल सालाना बजट मात्र 30 हजार रुपये तक का हुआ करता था जिसमें से आधा बजट इंग्लैण्ड में प्रचार-प्रसार पर खर्च किया जाता था। गाँधीजी के आने के बाद 1921 तक कांग्रेस के सदस्यों की संख्या लगभग 50 लाख हो गई और सालाना बजट 30 लाख का हो गया। कांग्रेस की नागपुर अधिवेशन में 14,582 प्रतिनिधि पहुंचे। इससे पहले तो कांग्रेस के सामान्य सदस्यों की ही संख्या हजारों में थी। गाँधीजी ने कांग्रेस की शक्ल अन्य तरह से भी बदली। यह निर्णय लिया गया कि अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के कम-से-कम तीन चौथाई सदस्य देहात से होंगे।
गाँधीजी से पहले जो कांग्रेस के बडे नेता हैं उनमें से अधिकतर अंग्रेजों से प्रभावित दिखते हैं। उनके लेखों को अगर ध्यान से पढा जाये तो अगर कहीं उन्होंने अंग्रेजी राज की आलोचना भी की है या भारत के अतीत का गुणगान किया है तो साथ-साथ ‘अंग्रेजों की देन’ की प्रसंशा करना वे नहीं भूले हैं। गाँधीजी एकमात्र ऐसे नेता दिखते हैं जिन्होंने साफ-साफ शब्दों में पश्चिमी सभ्यता को शैतानी सभ्यता कहा। ऐसी हिम्मत और सोच इससे पहले नहीं दिखाई पडती। भारत के साधारण लोग शायद ऐसा सोचते हों, भले कह न पाते हों, पर भारत का पढा-लिखा वर्ग तो अधिकतर अंग्रेजों के प्रभाव में ही था भले ही उनका विरोध करता रहा हो। गाँधीजी को व्यवस्था परिवर्तन चाहिए। उन्हें भारत के साधारण आदमी के स्वभाव के अनुकूल व्यवस्थाएं बनानी हैं। जबकि भारत के पढे-लिखे वर्ग को अंग्रेजी व्यवस्थाओं से कोई आपत्ति नहीं है, अंग्रेजों से है। उन्हें तो सिर्फ सत्ता का हस्तांतरण चाहिए जबकि गाँधीजी को व्यवस्था परिवर्तन चाहिए। यह हमारा दुर्भाग्य ही है कि अंग्रेज, नेहरू, सरदार पटेल और जिन्ना साहब की तिगडी की सहायता से सत्ता हस्तांतरण में (व्यवस्था परिवर्तन से अलग) की अपनी नीति में सफल हुए और गाँधी दुखी।
भारत आने के बाद जल्दी ही गाँधीजी की ख्याति न सिर्फ देश में बल्कि विदेशों में भी फैलने लगी। 1920 में एक अमेरिकी पादरी, जे.एच.होम्स ने न्यूयार्क के एक चर्च में भाषण के दौरान गाँधीजी को-‘नया ईसामसीह’ (न्यू क्राइस्ट) के नाम से संबोधित किया और 1921 में कहा, ‘जब मैं गाँधीजी के बारे में सोचता हूं तो मुझे ईसामसीह की याद आती है।’
एक तरह से देखें तो दिखता है कि सन् 1919-20 से लेकर 1938-40 तक सही मायने में गाँधीजी का ही राज इस देश में चला। अंग्रेज बुरी तरह से घबराए हुए थे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि इस आदमी से कैसे निपटा जाये। गिलबर्ट मरे एक अंग्रेज, जो गाँधीजी को पहले से जानता था, ने अंग्रेज अफसरों को हिदायत देते हुए जनवरी 1918 में लिखा- ‘सत्ता में रहने वाले लोगों को ऐसे आदमी से बहुत सतर्क रहना चाहिए जो इंद्रिय सुख की परवाह नहीं करता, दौलत की परवाह नहीं करता, शारीरिक सुविधाओं की परवाह नहीं करता, तरक्की या प्रशंसा की परवाह नहीं करता वरन् सिर्फ उस पर दृढता से आगे चलता चला जाता है, जिसे वह सही मानता है। ऐसा आदमी खतरनाक होता है क्योंकि उसके शरीर को तो काबू में किया जा सकता है परन्तु आत्मा को नहीं।’
अंग्रेजों की घबराहट की झलक, 1940-42 से लेकर भारतवर्ष के आजाद होने तक अंग्रेजी दस्तावेजों को देखने से पता चलती है। उसमें पता चलता है कि चीन के राष्ट्रपति जनरल चांगकाई शेक का झुकाव भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की ओर था। फरवरी 1942 में वे अपनी पत्नी के साथ भारतवर्ष आते हैं और आने से पहले यह इच्छा जाहिर करते हैं कि वे वायसरॉय के महल में न रहकर गाँधीजी के यहाँ सेवाग्राम में रहना चाहेंगे। चांगकाई शेक का यह इरादा अंग्रेजों को बुरी तरह परेशान कर देता है क्योंकि किसी राष्ट्राध्यक्ष के वायसरॉय के पास न रहकर गाँधीजी के पास रहने से, गाँधीजी का दर्जा एक राष्ट्राध्यक्ष जैसा हो जाता है। यह बात अंग्रेजों के गले नहीं उतरती और वे तरह-तरह की अटकलें लगाते रहते हैं ताकि बिना किसी को नाराज किये वे चीन राष्ट्रपति को ऐसा करने से रोक सकें। यहाँ के वायसराय लिनलिथिलो और लंदन में बैठी अंग्रेज सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच उस समय हुआ पत्राचार देखने लायक है। चांगकाई शेक को तरह-तरह से इशारा किया जाता है कि अंग्रेज सरकार उनके इस निवेदन को अच्छा नहीं मानती लेकिन चीन के राष्ट्रपति अपनी बात पर अडे हैं। आखिर में अंग्रेजों ने यहाँ तक तैयारी कर ली है, जैसा कि वायसरॉय लिनलिथिलो, ऐमरी को बताते हैं कि अगर वे किसी तरह राष्ट्रपति को मनाने में कामयाब नहीं हुए तो अंत में उनकी ट्रेन या प्लेन में भी गडबडी की जा सकती है ताकि वे सेवाग्राम न पहुँच सकें। इस समय बहुत सारी अटकलें लगाई जा रही हैं और आखिर में अंग्रेज एक रास्ता निकाल ही लेते हैं। यह फैसला किया जाता है कि गाँधीजी एवं चांगकाई शेक की मुलाकात गाँधीजी के आश्रम ‘सेवाग्राम’ में न कराकर रविबाबू के शांति निकेतन में रखी जाये। क्योंकि जैसा ऐमरी, चर्चिल को कहते हैं कि शांति निकेतन और रवि बाबू को अंग्रेज ‘हमेशा ही अच्छी निगाह से देखते रहे हैं,अपना मानते रहे हैं।’
1942 में हालात बहुत तेजी से बदल रहे हैं- न सिर्फ भारत में परंतु पूरे विश्व में। अमेरिका दुनिया में एक बडी शक्ति के रूप में उभर चुका है। उसका पलडा भारी है और अंग्रेजी राज दुनियाभर में ढीला पडता जा रहा है। और अंग्रेजों को कमजोर करने में महात्मा गाँधी की एक बडी भूमिका है। 1942 में अमेरिकी राष्ट्रपति रूजवेल्ट ब्रिटिश राजदूत को व्हाइट हाउस में बुलाकर कहते हैं - ‘भारत को आजादी कब मिलेगी, इसका फैसला आपको करना है। परन्तु मेरी हिदायत है कि आजादी जब भी मिले, इससे पहले यह सुनिश्चित कर लें कि भारत (आजादी के बाद भी) पश्चिम की छत्रछाया (वेस्टर्न ओरबिट) में रहे।’ इस उद्देश्य के पूरा होने में सबसे बडे बाधक महात्मा गाँधी ही हैं। अंग्रेजों को एवं पश्चिम के बडे लोगों को इस बात का अनुमान लग चुका है।
06 अगस्त 1942 को जब ऐमरी की अध्यक्षता में ब्रिटिश सरकार की वार-कैबिनेट बैठी तो उन्होंने फैसला लिया कि भारत छोडो प्रस्ताव जब भी पारित हो, उसके तुरंत बाद ः
1. गाँधीजी और अन्य कांग्रेसी नेताओं को तुरंत पकड
लिया जाये।
2. गाँधीजी को तुरंत ही समुद्र के रास्ते भारत से दूर
किसी अन्य देश में ले जाया जाये (संभवतः सूडान)।
3. ताकि लोगों को यह न लगे कि महात्मा गाँधी के साथ
कोई अलग बर्ताव हो रहा है इसलिए आधे से एक
दर्जन नेताओं को भी पकड कर हवाई मार्ग से पूर्वी
अफ्रीका ले जाया जाये।

यह सब इसलिए सोचा गया क्योंकि जैसा ऐमरी कहते हैं- ‘जब ये लोग अपने देश से दूर होंगे तो धीरे-धीरे लोग उन्हें भूल ही जाएंगे।’ परन्तु अंग्रेजों की उम्मीद के विपरीत जब उन्होंने गाँधीजी को पकडा तो पूरे देश में ही नहीं पूरी दुनिया में उसकी तीव्र प्रतिक्रिया हुई जिससे अंग्रेज घबरा गये। चीन के राष्ट्रपति ने तो प्रतिक्रिया की ही, अमेरिका में यूनाइटेड आटोमोबाइल वर्कर्स, मजदूरों का एक महत्त्वपूर्ण और शक्तिशाली संगठन, ने भारत के पक्ष में प्रस्ताव पारित किया। संभवतः इस कारण अंग्रेजों को गाँधीजी को देश से बाहर ले जाने का अपना इरादा बदलना पडा। परन्तु ब्रिटेन की लेबर पार्टी ने अपनी सरकार का समर्थन किया और एक वक्तव्य जारी करके कांग्रेस के असहयोग आंदोलन की भर्त्सना की और यह भी कहा कि भारत सरकार का कांग्रेसी नेताओं को पकडना उनकी मजबूरी थी।
अप्रैल 1942 से जून 1943 तक चीन ने ही नहीं बल्कि कनाडा, अफगानिस्तान, अमरीका, आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैण्ड इत्यादि में भी भारत के समर्थन में एक हवा बनने लगी और ब्रिटेन की सरकार पर दबाब बढने लगा। इस बीच 31 अगस्त, 1943 को लिनलिथगो ने एक पत्र चर्चिल को लिखा जिससे पता चलता है कि वे दो अमेरिकन अतिथियों के भारत आने की सूचना से काफी परेशान हैं। यह दोनों अमेरिकन- वैन्डल मिकी और शेरवुड ऐडी- काफी प्रभावशाली और पैसे वाले लोग हैं, जिनकी अमेरिकन सरकार में चलती है। ये लोग मुख्यतः गाँधीजी से मिलने आ रहे हैं। अंग्रेज सरकार इसलिए परेशान हैं कि उन्हें लगता है कि ये अगर गाँधीजी से मिल लेंगे तो गाँधीजी इन्हें अपने पक्ष में कर लेंगे और इसका सीधा असर अमेरीकी सरकार के रवैये पर पडेगा। लेकिन परेशानी यह भी है कि इन दोनों को साफ.-साफ मना भी नहीं किया जा सकता। आखिर में यह फैसला होता है कि एक तो उनकी खातिरदारी में कोई कमी न रखी जाये ताकि वे अंग्रेज सरकार की मेहमाननवाजी से खुश हो जाएं। और सबसे महत्त्वपूर्ण यह कि गाँधीजी से मुलाकात के पहले उन्हें अम्बेडकर से मिला दिया जाये। गौरतलब है कि इन अमरीकनों को अम्बेडकर के बारे में कोई विशेष जानकारी नहीं है और न ही इन दोनों ने अम्बेडकर से मिलने की इच्छा जताई है। परन्तु अंग्रेज बहुत शातिर हैं और वे जानते हैं कि अम्बेडकर गाँधीजी के बारे में इन अमरीकनों के मन में एक पूर्वाग्रह तो बना ही देंगे जिससे गाँधीजी का प्रभाव थोडा कम हो जायेगा। इस तरह की तमाम बातों का पता उस समय के अंग्रेजी दस्तावेजों केा बारीकी से देखने पर पता चलता है। चाहे ये दस्तावेज हों या रोमारोलां के भारत के बारे में संस्मरण हों अथवा उस समय के भारतीय नेताओं के पत्राचार और भाषण हों, इन सब में कुछ बातें साफ होती हैं। मसलन महात्मा गाँधी और देश के अन्य नेताओं के बीच क्या बुनियादी फर्क है। और यह भी कि भारत को पश्चिमी छत्रछाया से दूर रखने का काम तथा अपने स्वभाव के अनुकूल देश को खडा करने का काम-इस तरह की सोच, सिवाय महात्मा गाँधी के अन्य किसी में नहीं दिखाई देती। अचंभे की बात यह है कि महात्मा गाँधी के अलावा अगर किसी को इन बातों का अहसास और इसका महत्त्व यदि पता है तो वह अंग्रेजी और अमरीकन सरकार के बडे लोगों को। गौरतलब है कि महात्मा गाँधी व्यवस्था-परिवर्तन चाहते हैं, न सिर्फ भारत के लिए परन्तु पूरे विश्व के सभी राष्ट्रों के लिए और अंग्रेज ज्यादा से ज्यादा सत्ता हस्तांतरण चाहते हैं। और इसीलिए अमेरिकी राष्ट्रपति अंग्रेजों को हिदायत देता है कि आजादी के बाद भी भारत पश्चिम की छत्रछाया (वेस्टर्न ओर्बिट) में रहे। इस बडी लडाई में गाँधीजी अकेले हैं। इस बुनियादी बात को संभवतः आज तक हमारे बडे लोग नहीं समझ पाये हैं। इसलिए अंग्रेजों द्वारा किये गये सत्ता हस्तांतरण को हमने आजादी मान लिया।
भारत के सांस्कृतिक हीरो, योरोपियन हीरो से हमेशा ही भिन्न रहे हैं। हमारे सांस्कृतिक हीरो त्यागी, तपस्वी, ज्ञानी रहे हैं चाहे वो दधीची हों, नचिकेता हों, मर्यादा पुरुषोत्तम राम हों, महात्मा बुद्ध हों, महावीर हों, गुरुगोविंद सिंह हों। इसके विपरीत योरोप में तब भी और आज भी, शरीर बल से, राज्य सत्ता से या आर्थिक रूप से जो महाबली रहे हैं, वे वहां के सांस्कृतिक हीरो रहे हैं- चाहे जूलियस सीजर हों, सिकंदर हो, मेकियावेली हो, स्टालिन हो या हिटलर हो या आज के जमाने में बिल गेट्स हों। इन दो कोटियों में महत्त्वपूर्ण भेद है। हमें प्रेरणा नैतिक आदर्शों से ही मिलती है। गाँधीजी ने अपने को इस श्रेणी में रखकर देश के जनसाधारण में एक नई आशा का संचार किया। भारत का जनमानस जिस बात को गहरे में महसूस करते रहा है और जिसका हल्का-सा आभास उसे यदा-कदा होते रहा है, उस एहसास को उन्होंने उद्वेलित किया। तभी वे सुशीला नैय्यर से कहते हैं कि मैंने ज्यादा कुछ नहीं किया, जो बात भारत के साधारण जन के मन में थी, उसे अभिव्यक्ति दी। इस अभिव्यक्ति का चमत्कारिक असर हुआ। भारत उठ खडा हुआ। ऐसा लगता है कि न सिर्फ महात्मा गाँधी ने भारत के लोगों का ‘भारत की आत्मा’ से परिचय करवाया वरन् उस भारत की ‘तार्किकता’( irrationality)के पीछे की शक्ति का अहसास हुआ।
महात्मा गाँधी पहले बडे नेता हैं जो प्रेरणा के लिए यूरोप की ओर देखना नहीं चाहते। वे भारत की छुपी ताकत, उसके स्वभाव को समझते हुए, यहाँ की बैठक पर देश को खडा करना चाहते हैं। उस समय के बडे नेताओं- बालगंगाधर तिलक और पं. मदन मोहन मालवीय, जो यहाँ की परम्पराओं को समझते भी हैं और उसका सम्मान भी करते हैं- जिनका गाँधीजी भी सम्मान करते हैं, का ध्यान भी इस ओर नहीं है। यह गौर करने की बात है कि आधुनिक सभ्यता से अभीभूत युवा नेता, जैसे सुभाष बोस और पंडित नेहरू, की ही यह हालत नहीं है पर तथाकथित देशज परम्पराओं से जुडे नेताओं का भी यही हाल है। 17 मार्च, 1918 को अहमदाबाद में आश्रम-प्रार्थना के बाद गाँधी जी कहते हैं, ‘तिलक महाराज ने भारत की प्राचीन भावना को, भारत की आत्मा को नहीं पहचाना और इसलिए इस समय देश की यह दशा बनी हुई है। उसके मन की गहराई में यही बात है कि हम यूरोपियों के जैसे बन जाएं। आजकल योरोप की जैसी शोभा हो रही है अर्थात् जिनके मन में योरोपीयन विचार घुस गये हैं, योरोप जितना शोभायमान लगता है- वैसा ही भारत को शोभायमान करना उनका उद्देश्य है। उन्होंने छह वर्ष तक का कारावास (मांडले जेल में) सहन किया, योरोप के ढंग की बहादुरी दिखाने के लिए और इस विचार से किया कि जो लोग इस समय हमें सता रहे है, वे यह देख लें कि हम दस-बीस वर्ष जेलो में कैसे रह सकते हैं। साइबेरिया की जेलो में रूस के बहुत-से बडे-बडे लोग उम्र भर सडे परन्तु वे कोई आत्मज्ञान के कारण जेल नहीं गये थे। इस तरह जीवन गंवा देना अपना परम धन गंवा देने जैसा है। तिलक महाराज ने कारावास का यह कष्ट आध्यात्मिक दृष्टि से भोगा होता तो आज हालत दूसरी ही होती। और उनकी जेलयात्रा के परिणाम दूसरे ही होते। यह बात ऐसी है कि कहकर या लिखकर नहीं समझाई जा सकती। उसका अनुभव कराने के लिए मुझे उन्हें प्रत्यक्ष उदाहरण देना चाहिए और यह ऐसा ही अवसर है।’ महात्मा गाँधी का भारत के लिए जो सपना है वह यूरोपीय अवधारणाओं (आज की भाषा में ‘विकास’ की अवधारणा) से बिलकुल अलग है। यह आज भी प्रासंगिक है। आज देश में कांग्रेस की सरकार बदल कर भाजपा की सरकार है। ऐसा आभास मिलता है की भाजपा वाले शायद देसी ढंग से सोचते होंगे। पर अगर आर्थिक (और विकास की) नीतियों को देखे ंतो भाजपा और कांग्रेस में कोई फर्क नजर नहीं आता।
गौर करने की बात है कि नेताजी ने कांग्रेस में रहते हुए जो अलग संगठन बनाया उसका नाम ‘फॉरवर्ड ब्लॉक’ दिया। इसमें कहीं यह छुपा है कि महात्मा गाँधी के नेतृत्व में कांग्रेस पीछे (बैक्वर्ड) जा रही है और नेताजी ‘फॉरवर्ड’ ले जाना चाहते हैं। कहने का तात्पर्य इतना ही है कि तिलक महाराज, मालवीय जी, जवाहरलाल नेहरू, नेताजी किसी को भी ले लें, बावजूद आपस के अनेकों मतभेदों के और बावजूद इसके कि सभी अँग्रेजी राज के विरोधी हैं, ऐसा लगता है यूरोप की ‘प्रगति’ से महात्मा गाँधी को छोड सभी अभिभूत हैं।
तत्कालीन नेताओं से उनके संबंध को लेकर अनेक भ्रांतियां हैं। जैसे गाँधीजी और पं. नेहरू के बीच कितने भयंकर मतभेद हैं, इस बात का खुलासा अभी तक नहीं हुआ है। 1927-28 में नेहरू जी और गाँधीजी के बीच महत्त्वपूर्ण पत्र-व्यवहार हुआ है। जनवरी, 1928 को जवाहरलाल नेहरू ने गाँधीजी को लिखा है जिसमें वे कहते हैं कि, ‘आपने किसी जगह कहा है कि भारत को पश्चिम से सीखने के लिए कुछ नहीं है और वह प्राचीन काल में ज्ञान के चरम शिखर पर पहुँच चुका है। मैं निश्चय ही इस दृष्टिकोण से असहमत हूं। और न तो मैं यह मानता हूं कि तथाकथित रामराज्य पुराने समय में अच्छा था और न ही मैं उसे पुनः स्थापित होते देखना चाहता हूं। मेरा विचार है कि पश्चिमी बल्कि और औद्योगिक सभ्यता भारत पर हावी होकर रहेगी।’ (गाँधी वांङ्मय, खण्ड 35, परिशिष्ट 10)। इसके जवाब में गाँधीजी ने 17 जनवरी, 1928 को नेहरू जी को एक पत्र लिखा जिसमें वे लिखते हैं, ‘मुझे बिल्कुल साफ दिखाई देता है कि तुम्हें मेरे और मेरे विचारों के बारे में खुली लडाई लडनी चाहिए। तुम्हारे और मेरे बीच मतभेद इतने बडे और उग्र हैं कि हमारे लिए सहमति का कोई आधार दिखाई नहीं देता।.... मुझे प्रकाशन के लिए पत्र लिखो जिसमें तुम्हारे मतभेद प्रगट किये गये हों। मैं उसे यंग इण्डिया में छाप दूंगा और उसका संक्षिप्त उत्तर लिख दूंगा।’ (गाँधी वाङ्मय, खण्ड 35, पृष्ठ 487-88-89)। पंडित नेहरू ने इसका कोई उत्तर गाँधीजी को नहीं दिया। गाँधीजी ने खफा होकर 26 जनवरी, 1928 को एक तार पंडित नेहरू को भेजा- ‘तुम्हारी कोई चीज प्रकाशित करने की इच्छा नहीं है’ (गाँधी वाङ्मय, खण्ड 35, पृष्ठ 514)। इसके बावजूद गाँधीजी व नेहरूजी के बारे में भ्रांतियां व्याप्त हैं। इसी तरह का पत्राचार बाद में भी उन दोनों के बीच हुआ है। ऐसा लगता है कि गाँधीजी सिर्फ अंग्रेजों से ही लडाई नहीं लड रहे हैं परन्तु अपने ही लोगों से भी उन्हें अनेक प्रकार की छोटी-मोटी जंग लडनी पड रही है।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस और पंडित नेहरू, दोनों ही पश्चिम से काफी प्रभावित थे, परंतु बावजूद इसके, दोनों में काफी मतभेद भी थे और इन दोनों के गाँधीजी से भी मतभेद थे। परंतु जहाँ आम जनता को गाँधीजी और नेताजी के मतभेदों के बारे में कुछ-कुछ पता है, वहीं नेहरू और गाँधीजी के मतभेदों के बारे में ज्यादा पता नहीं है। इसके विपरीत गाँधीजी और सुभाष चंद्र बोस रिश्ते में जो माधुर्य था, जनता उससे पूरी तरह अनभिज्ञ है। भारत छोडने के बाद अपने पहले रेडियो प्रसारण में नेताजी, गाँधीजी को पहली बार राष्ट्रपिता कहकर संबोधित करते हैं और उनसे माफी मांगते हैं। इससे पहले किसी ने भी गाँधीजी को राष्ट्रपिता कहकर संबोधित नहीं किया था। भाषण को पढते वक्त इन दोनों के रिश्ते का मर्म समझ में आता है। जर्मनी से पनडुब्बी में जापान पहुँचने पर जब नेताजी पनडुब्बी के कप्तान से विदा लेते हैं तो वे कहते हैं - ‘अब हम गाँधी के देश में मिलेंगे।’ यह नहीं कहते कि हम भारत में मिलेंगे। इसी तरह उन्होंने ‘आजाद हिंद फौज’ की पहली ब्रिगेड का नाम ‘गाँधी ब्रिगेड’ रखा है। ये बातें भारतीय जनसाधारण से दूर रही हैं, जिससे कई भ्रांतियां फैली हैं।
सन् 30 के दशक के उत्तरार्द्ध में गाँधीजी ने ग्रामोद्योग, भारत की कारीगिरी, पारंपरिक ज्ञान-विज्ञान पर जरा ज्यादा ध्यान देना शुरू किया। उद्देश्य भारत की ताकत को फिर से खडा करना, यहाँ के लोगों को स्वावलंबी बनाना ही था। इसी उद्देश्य से ‘गाँधी सेवा संघ’ की स्थापना की गई थी। पर तब तक हमारे देशप्रेमी लोगों पर भी अंग्रेजी रंग-ढंग चढ गया लगता है। कांग्रेस में आधुनिकता का प्रतिनिधित्व करने वाले दो बडे युवा नेता थे- जवाहर लाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस। गाँधीजी जहाँ देश को देशज परम्पराओं और स्वभाव के अनुकूल व्यवस्थाएं बनाकर खडा करना चाहते थे, वहीं कांग्रेस का एक वर्ग देश को ‘आधुनिक’ बनाने पर तुला था।
महात्मा गाँधी को समझने के लिए मनुष्य के दो जुडे हुए पर अलग अलग पक्षों को ध्यान में रखना *ारूरी है। यह पक्ष हैं - मनुष्य की ‘स्थिति’ (अंदर, जो है) और मनुष्य की ‘गति’ (बाहर, करने वाला, दिखाई देने वाला पक्ष)। सम्मान का (अपने अंदर) होना, स्थिति है और उसका प्रदर्शन (हाथ जोड कर, पाँव पकड कर, हाथ मिला कर या अन्य कोई प्रकार का अभिवादन) उसकी गति है। ‘स्थिति’ की स्वीकार्यता और ‘स्थिति-गति’ में सामंजस्य ही मनुष्य को सुखी बनाता है।
‘स्थिति’ में जब भी कोई विकार जैसे हिंसा, भय, ईर्ष्या, क्रोध, लोभ जागता है मनुष्य को स्वीकार नहीं होता। दूसरी बात कि अंदर, ‘स्थिति’ में एक तरह का भाव, विचार और ‘गति’ में, दिखावे में, अलग भाव यानी ‘स्थिति’ और ‘गति’ में विरोध भी मनुष्य को स्वीकार नहीं होता। भारत की परम्पराओं में ‘स्थिति’ को स्वस्थ रखने की बहुत सी बातें बहुत पहले से होती रही हैं। पर पश्चिम से आयातित आधुनिकता और शिक्षा ने हमें ‘स्थिति’ को नकारने और समस्त ध्यान ‘गति’ पर केन्द्रित करने को प्रेरित और मजबूर किया है। जैसे स्कूल, कालेज, विश्वविद्यालय में हमने क्या पढा-समझा (स्थिति) यह उतना महत्त्वपूर्ण नहीं रह गया जितना कि नंबर कैसे मिले (नकल करके भी मिले या तुक्के से मिले इसका कोई महत्त्व नहीं), डिग्री कौन सी है (गति) *यादा महत्त्व का बना दिया गया है। आपकी काबलियत (स्थिति) से ज्यादा आप की शोहरत, आपका पैसा अधिक महत्त्वपूर्ण हो गया है। अंदर से डर और बाहर से सत्ता की ताकत के बल पर आत्म-विश्वास यह आम बात हो गई है। और जब व्यक्ति ‘गति’ से संचालित होने लगता है तो वह पर-संचालित होता ही है।
जिस प्रकार ‘स्थिति’ की जगह ‘गति’ हावी हो गई है, उसी प्रकार ‘अर्थ’ की जगह ‘शब्द’ हावी हो गये हैं जिसका परिणाम अँग्रेजी के बढते प्रभाव में देखा जा सकता है। हम अपने शब्दों, मुहावरों, कहावतों, अपनी पारंपरिक कहानियों से दूर होते जा रहे हैं और इस वजह से अपनी ज्ञान परम्पराओं (भोजन, मौसम, स्वास्थ्य, उचित-अनुचित का एहसास, इत्यादि) से भी अछूते रह रहे हैं। हमें अपनी निज भाषाओं की गहराइयों से बहुत-सा ज्ञान सहज ही मिल जाता है। अँग्रेजी में सिर्फ निर्देश देना और लेना तथा हलकी फुलकी बात कर लेने से अँग्रेजी हमारी भाषा नहीं हो जायेगी। जब अपनी भाषा छोड कर हम बिना समझे अँग्रेजी को अपनाने लगते हैं, तो अपने सोचने की कोटियाँ भी खो देते हैं और अंजाने में ही पराई कोटियों में सोचने लगते हैं। जैसे हमने हमारे ‘धर्म’ शब्द के अर्थ की कोटी लगभग खो दी है और हमने ‘रेलीजन’ की कोटी अपना ली है। ‘रलीजन’ का अर्थ ‘धर्म’ के अर्थ पर हावी हो चला है। समता और समानता का भेद गायब सा हो गया है। बाहर से दिखने वाली समानता (‘गति’ वाली समानता) या ‘इक्वालिटी’ समता पर (‘स्थिति’ में समानता) पर हावी है। आज के जेंडर को लेकर जो संघर्ष चल रहा है, उसका अध्ययन कर के देखें। इसी प्रकार और भी बहुतेरे उदाहरण हो सकते हैं। इस प्रकार जब समस्त दृष्टि, समस्त निर्णय ‘गति’ आधारित होने लगते हैं तो पर-संचालित होने का रास्ता स्वतः ही खुल जाता है।
इसी प्रकार आज हम ‘प्रेरित’ होने की बजाय प्रभाव की दुनिया में रहने लगे हैं। प्रभावित व्यक्ति नकल (‘गति’ की ही नकल होती है; ‘स्थिति’ की नकल नहीं, उससे प्रेरणा मिल सकती है) ही कर सकता है। इस प्रकार के अनेकों बारीक भेदों की तरफ ध्यान देने की *ारूरत है; आधुनिकता और महात्मा गाँधी को समझने के लिए।
सापेक्ष और निरपेक्ष आत्म-विश्वास बिलकुल अलग-अलग होते हैं। सापेक्ष आत्मविश्वास का कोई ठोर नहीं होता, वह (दूसरे से) तुलना पर आधारित होता है जिसके मापदंड के आधार आज की आधुनिक दुनिया के कर्णधार तय करते हैं- मीडिया, फैशन डि*ााइनर और बा*ाार। इसका मापदंड ‘गति’ (दिखावे) से होता है। निरपेक्ष आत्म-विश्वास ‘स्थिति’ से अपनी समझ, अपने विवेक के आधार पर होता है। तुलना की यहाँ कोई जगह नहीं इसलिए स्थायी होता है। इसीलिए भारत में विविधता और विविध संस्कृतियाँ पनपी। आज की दुनिया, जिसके महात्मा गाँधी कडे आलोचक थे ‘गति’ आधारित हो गई है जिसमें तुलना और नकल अवश्वम्भावी हो गई है। ‘ग्लोबलाइ*ोशन’ का एक सूत्र यह भी है- विविधता को खत्म करके एक ही रास्ते पर सबको हांकना और प्रतिस्पर्धा बढाना।
महात्मा गाँधी आम आदमी में आत्मविश्वास पैदा करके उसे निर्भीक और स्वतंत्र बनाना चाहते थे। उसमें उसके अपने विवेक और सामर्थ्य की जगह बडी थी। वह स्वयं पर आश्रित हो, न कि दूसरे पर, चाहे वह सरकार ही क्यों न हो। जब व्यक्ति ‘गति’ आधारित हो जाता है, और ‘स्थिति’ पर से ध्यान भटक जाता है तो वह दूसरे के बनाए रास्ते पर चलने को, नकल करने को स्वयं ही प्रेरित हो जाता है भले ही इसमें उसका छुपे में शोषण ही क्यों न हो रहा हो। अपने से दूर, जो ‘है’, उससे दूर, ‘स्थिति’ से दूर- यह सब योजनाबद्ध तरीके से हो रहा है या आधुनिक व्यवस्थाएं ही इस प्रकार की हैं। ये तो बहस की बाते हैं, पर आधुनिक व्यवस्थाओं से इस वृत्ति का (‘स्थिति’ से हट कर ‘गति’ की ओर) संबंध, महात्मा गाँधी बहुत जल्द गहराई से समझ गये। जब व्यक्ति अपनी समझ से न जी कर, दूसरों की धुन पर नाच नाचने लगता है तो वह स्वतः ही परतंत्रता स्वीकार कर लेता है। महात्मा गाँधी इसी जाल को तोडने का काम करते रहे।
इस संदर्भ में उनका 1917 का चंपारण का आंदोलन याद करने और समझने की *ारूरत है। महात्मा को चंपारण में घुसने पर रोक लगा दी गई थी। धारा 144 (जो अब भी बरकरार है) लगा दी गई थी। गाँधी जी उसका उल्लंघन किया। जब कोर्ट में पेशी हुई और जज ने पूछा, ‘क्या आप दोषी हैं?’ (“do you plead guilty?) तो गाँधी का जवाब और बहस सुनने लायक है। उन्होंने आज के आंदोलनकारियों की तरह यह नहीं कह कि मैं दोषी नहीं हूँ। उन्होंने कहा, ‘हाँ, मैं दोषी हूँ।’ और थोडी देर रुक कर फिर आगे कहा, ‘पर आफ कानून के कटघरे में।’ ('But, according to your law) और इस प्रकार कानून की चारदीवारी से एक झटके में अपने को बाहर निकाल कर के, उन्होंने अपनी दलील पेश की। उनकी दलील का आधार कानून (संविधान) की चाहारदीवारी न हो कर ‘विधान’ पर आधारित थी। संविधान नहीं विधान। इस महत्त्वपूर्ण को समझने की जरूरत है। हम तो आज कानून और आधुनिक व्यवस्थाओं (और उसकी चेरी- बा*ाार) के बनाए हुए कठघरों में फंस गये हैं। महात्मा के अलावा शायद ही कोई इन कठघरों के मायाजाल को अच्छी तरह समझ पाया है। यह व्यवस्थाओं के कटघरे हमारे जीवन को ही नहीं, हमारी सोच और सोचने के तरीकों को भी बांध रहे हैं। ‘हिन्द स्वराज’ में गाँधी जी ने पाँच मुख्य व्यवस्थाओं के मायाजाल को उजागर करने की चेष्टा की है- आधुनिक शिक्षा व्यवस्था, स्वास्थ्य व्यवस्था, आधुनिक सरकारी व्यवस्था (गवर्नेंस), आधुनिक न्याय व्यवस्था और आधुनिक तकनीक। इसमें दो और को जोडा जा सकता है- अफसरशाही (वैसे गवर्नेंस में यह आ जाता है) और मीडिया एवं बा*ाार या आधुनिक आर्थिक व्यवस्था। यह सभी व्यवस्थाएं हमें पर-आश्रित बना रही हैं। इनकी बुनियाद में जा कर इनकी बुनियादी मान्यताओं को समझने की *ारूरत है।
गाँधी इसलिए भी प्रासंगिक बने रहेंगे क्योंकि वे सनातन (जो नित्य है) की बैठक पर सामयिक निर्णय लेते रहे और इस फर्क एवं संबंध (सनातन एवं सामयिक) को समझने-समझाने का काम करते रहे। वे सामयिक एवं सनातन के द्वंद्व में हमेशा सनातन को प्राथमिकता देने का प्रयास करते रहे। हम कितने ही आधुनिक हो जाएं, कितना ही ‘गति’ (दिखने-दिखावे की दुनिया) आधारित जीवन जीने लगें, ‘स्थिति’ में सनातन (मूल्यों) से छुटकारा नहीं। अनदेखी कर सकते हैं पर परेशानी से छुटकारा नहीं मिल सकता।
समय आ गया है कि हम इस आधुनिकता के भ्रमजाल से मुक्त हों। इस भ्रमजाल का आभास तो हममें से कइयों को है और इस व्यवस्था की जकडन का भी अहसास है। परन्तु इससे मुक्त होने की स्पष्ट समझ और योजना का अभाव हमें खटकता रहता है। ऐसा लगता है कि गाँधीजी एक ऐसे समाज की कल्पना कर रहे हैं जिसमें व्यक्ति स्वतंत्र होकर सुख-चैन से जी सके और इस सुख-चैन में सत्ता और व्यक्ति एक-दूसरे के रास्ते में बाधक न बनें। आधुनिक सभ्यता सुख-चैन को सिर्फ शरीर के अर्थ में देखती है और यह भ्रम फैलाती है कि शरीर का सुख ही असली सुख है। जबकि यह सभी जानते हैं कि हर मनुष्य शारीरिक जरूरतों को एक हद तक ही चाहता है, उसकी एक सीमा है। इस बात पर बार-बार ध्यान दिलवाया जाता है कि जमाना बदल गया है और इसलिए हमें समय के साथ चलना चाहिए। परन्तु हमें यह तो देखना ही होगा कि मानव की रचना में, मूलभूत आकांक्षाओं में, में कोई फर्क नहीं आया है। मानव पहले भी सुख-चैन से, सम्मान से, विश्वास से, प्रेम से मिलजुलकर रहना चाहता था और आज भी ऐसा ही चाहता है, भविष्य में भी ऐसा ही चाहेगा। उसकी ऐसी ही रचना है। ‘हिंद स्वराज’ में गाँधीजी कहते हैं- ‘सभ्यता व आचरण है जिससे आदमी अपना फ*ार् अदा करता है। फ*ार् अदा करने के मानी हैं नीति का पालन करना। नीति के पालन का मतलब है अपने मन और इंद्रियों को बस में रखना। ऐसा करते हुए हम अपने को (अपनी असलियत को) पहचानते हैं। यही सभ्यता है।’ आधुनिक सभ्यता और आधुनिक विज्ञान दोनों ही, हम पर बार-बार ऐसा दबाव बनाती हैं या प्रभाव छोडती हैं कि मनुष्य सिर्फ अपने शरीर और सुविधाओं पर ही ध्यान दें और अपने से दूर होता चला जाये। यानी अपनी मौलिकता को पहचान न पाये, अपने लक्ष्य को पहचान न पाये। आधुनिक सभ्यता में शरीरगत आवश्यकताओं यानी सुविधाओं का अधिमूल्यन किया गया है। पूरी बाजार-व्यवस्था इसी भ्रम और अधिमूल्यन पर टिकी है। और अंत में महाभारत की एक कहानी। गल्व नाम के एक ऋषि को एक बार बहुत दूर किसी अत्यंत आवश्यक काम से तुरंत जाना था। उनके लिए यह जीवन-मरण का प्रश्न था। उन्होंने अपने बचपन के मित्र गरुड को याद किया और मदद करने की विनती की। गरुड ही एक ऐसे थे जो इतनी दूर इतनी जल्द उन्हें ले जा सकते थे। गरुड मान गए और गल्व ऋषि को अपनी पीठ पर बैठा लिया और उडान भरी। बहुत ऊंचाई और तीव्र गति। वातावरण में सन्नाटा। गल्व घबरा गए। उनकी साँस फूलने लगी। उन्होंने गरुड से अपनी हालत बताई और कहीं बीच में थोडी देर रुकने का अनुरोध किया। गरुड कहीं किसी पहाडी पर रुके। गल्व पीठ पर से उतरे। थोडी देर में जब उनकी साँस में साँस वापस आई तो गरुड से बोले, ‘वापस चलो’। गरुड अचंभित! ‘अरे इतना *ारूरी काम था, जीने मरने की बात थी, वापस चलो?’ यह भी कोई बात हुई? गल्व बोले ‘नहीं समझ आ गया, ऐसी कोई बात नहीं। वापस चलते हैं।’ गरुड थोडा खीजे होंगे, बोले, तो इतनी दूर आए ही क्यों?’ गल्व का उत्तर गौर करने लायक है। हमारे ऊपर भी लागू होता है। वे बोले, ‘अरे इतनी दूर नहीं आता तो अभी तक यही सोचता रहता कि जाना कितना *ारूरी था। इतनी दूर आ कर ही तो समझ आया कि कोई *यादा *ारूरी नहीं है। इसलिए आना बेकार नहीं गया। चलो समझ आ गया, जाना व्यर्थ है।’ अब हमें भी महात्मा गाँधी की बात समझ आ जानी चाहिए और आधुनिकता से मुख मोडने का वक्त शायद आ गया है।