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विजयदेव नारायण साही : कुछ यादें

गिरधर राठी
राम कृपा करि चितवा जाही।

विजय देव नारायण साही।।

अक्सर यह चौपाई- साही जी के नाम की पुख्ता अर्धाली के साथ-हर किसी नये आगंतुक को सुनने को मिल जाती थी। एक दूसरी प्रचलित अर्धाली थी- ‘सर्वेश्वर दयाल सक्सेना।’ इसकी पूर्ति वाली अर्धाली अब याद नहीं आ रही। साहीजी संक्षेप में उनके साथियों के लिये ‘वी.डी एन. थे। यह लिखते हुए अचानक याद आया कि साहीजी ने अमरीका जाने वाले अपने बेटे को, रेलवे स्टेशन पर एक किताब दी थी। वह थी - रामचरित मानस। अब मैं साहीजी के तुलसी-प्रेम या रामचरित-प्रेम का तालमेल, उनके पूरे बौद्धिक मि*ााज से नहीं मिला पा रहा हूँ। एकमात्र तर्क वही जान पडता है जो उन्होंने नीत्शे के बारे में दिया था।

कुछ यह उन्होंने कहा था विचारों की दृष्टि से मैं इसे जला देना चाहूँगा- दस स्पोक *ारथुस को- लेकिन इस की कविता (कवित्व) के लिए मैं इसे बार-बार पढूँगा। इसका आशय यह कतई नहीं कि तुलसी के सारे विचार त्याज्य हैं। साहीजी का स्वभाव और चरित्र उन्हें कबीर का भक्त बना सकता था। कबीर के नाम फरियाद वाली उनकी कविता इसी बात की पोषक है।

क्या पढें और किसे सराहें- जब अभी यह प्रसंग आ ही गया है तो उस वाक्य को भी याद कर लें जो उन्होंने पंत जी के महाकाव्य पर कहा था ः मैंने लोकायतन न तो पढा है, न ही पढूँगा। शायद विवेचना संस्था की गोष्ठी थी, जिसे बालकृष्ण राव और उमा राव संचालित करते थे, स्वयं सुमित्रानंदन पंत वहाँ उपस्थित थे।

और अज्ञेय के अपने-अपने अजनबी उपन्यास को उन्होंने ‘कूडा’ कहा था- या ऐसा की कोई तगमा। यही वही साहीजी हैं जिन्होंने अपने पहले कविता संग्रह कविता संग्रह मछली घर को समर्पित किया था अज्ञेय को। ‘अज्ञेय को, जिन्होंने हिन्दी कविता को संभव किया’ (कुछ ऐसा ही वाक्य था-अभी मेरे पास मछली घर नहीं है)। और मैंने इस पर आपत्ति की थी- ‘आपने यह कैसे लिखा कि अज्ञेय ने हिन्दी कविता को संभव (या पुनः संभव?) किया। साहीजी ने कुछ कुतूहल और कुछ विस्मय से मुझे देखा। अब याद नहीं पडता जो उन्होंने उस संबंध में कहा। अज्ञेय एक कवि के रूप में मेरे ‘प्रिय कवि’ नहीं थे, हालांकि उनकी कविता खींचती थी।

मैं साहीजी का शिष्य था। जहाँ तक याद पडता है, साहीजी, और कॉफी हाउस के अन्य स्थायी सदस्यों से- लक्ष्मीकांत वर्मा, श्याम किशोर सेठ, विपिन कुमार अग्रवाल तथा अन्य कुछ रथियों-महारथियों से- श्रीराम वर्मा ने मुझे मिलवाया था। उस वक्त, 1964 या 1965 में हमारी एक छाम टोली (सागर विश्वविद्यालय से) इलाहाबाद, लखनऊ, दिल्ली, आगरा और शायद जयपुर के भ्रमण पर निकली थी।

दुबारा साहीजी से मैं मिला, सेठ गोविन्द दास का एक पत्र लेकर। सागर विश्वविद्यालय में बी.ए. का रि*ाल्ट देर से निकला था। मैं पहले स्थान पर था- गोल्ड मेडल का हकदार, लेकिन आगे पढना चाहता था दिल्ली या इलाहाबाद में। प्रवेश वहाँ बन्द हो चुके थे। अतः सिफारिशी खत इलाहाबाद के वाइस चांसलर रतन कुमार नेहरू के नाम लेकर पहुँचा। साहीजी से मिलने के बाद नेहरू जी से मिला, उन्होंने अंगे*जी विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर महरोत्रा को वह खत अग्रसर करते हुए मुझे उनके पास भेजा। मैं साहीजी के पास गया, और वह मुझे साहब के पास ले गये। इलाहाबाद से परिचित सभी को याद होगा, मेहरोत्रा साहब व्हील चेयर पर रहते थे और कक्षा को माइक के *ारिये संबोधित करते थे। आज उन्हें याद करते हुए वैज्ञानिक स्टीफेन हॉकिंग की तस्वीर न*ारों में घूम जाती है, हालांकि उन दिनों एक क्रूर भाव जागा था- ऐसे जीवन का क्या करना है!

संक्षिप्त दरख्वास्त में मैं ने ‘सीकिंग फॉर एडमीशन’ या ऐसा ही कुछ लिख दिया था- ‘फॅार’ लगाना व्याकरण के विरुद्ध माना जाता था, और इस गलती पर एक विश्वविद्यालय के ‘टॉपर’ की ग्लानि का अंदा*ा बखूबी लगाया जा सकता है। हालांकि बाद में मुझे पक्के सबूत मिले कि मैं गलत नहीं था। यह प्रयोग बारहा देखा जा सकता है पर उस समय साहीजी ने मुझे कुछ अचरज से देखा था ......

अंग्रेजी व्याकरण या शब्दावलि की गलती का एक और प्रसंग दुःखदायी है। डॉ. लोहिया की मृत्यु से हम बहुत सारे युवा शोक-संतप्त थे। याद पडता है कि उस दिन मैं रिक्शा लेकर शहर में यों ही बहुत देर घूमता रहा था- अकेला। तो साहीजी ने - लोक भारती प्रकाशन के कार्यालय में, जो कि कॉफी हाउस से सटा हुआ था- मुझे यह कार्य सौंपा कि मैं एक विज्ञप्ति बनाऊँ अखबारों के लिये। मैंने लिख दिया- ‘डॉ. लोहिया*ा सरमाइ*ा...।’ शब्द होना चाहिए था ‘डिमाइ*ा’।

साहीजी ने कहा, तो तुम भी सरमाइ*ा और डिमाइ*ा की भूल-भूलैया में हो! साहीजी के साथ एक और घटना याद आती है जो अब मुझे संकुचित कर देती हैः एम.ए. प्रीवियस में (पहले साल में) मैंने ‘ड्राॅप’ कर दिया था, लिहा*ाा दुबारा मुझे प्रीवियस की कक्षा में बैठना पडा- अगले साल। प्रीवियस में अपने दूसरे बरस में भी मेरा वक्त साहित्य-चर्चा और कॉफी हाउस तथा कुछ आवारागर्दी में जाया होता रहा। हाँ, एक काम *ारूर करने लगा था, उसी वर्ष या शायद फाइनल में - संगम प्रेस एजेन्सी, जिसे एक प्रखर कम्युनिस्ट बुद्धिजीवी *ाया उल हक साहब चलाते थे (और जो अब शतायु होने वाले हैं)। वहां मैं हिन्दी-अंग्रे*ाी में कुछ आलेख वगैरह तमाम अखबारों के लिये लिखने का तथा संपादन जैसा कुछ करने लगा था। वहीं मैंने स्तालिन, माओ और उनके धुर विरोधी हो चुके मिलोवान जिलास (द न्यू क्लास उनकी प्रसिद्ध पुस्तक थी) को भी पढा। कम्युनि*म, सोशलि*म, लोकतंत्र उदारवाद ...... इन तमाम राजनीतिक-रंगतों को समझने-सीखने का यह मेरा दौर था।

बहरहाल, प्रीवियस में शायद हरीश त्रिवेदी ने टॉप किया था। आलोक राय और मृणाल पांडे हम से एक बरस आगे थे, और हम उनके व्यक्तित्वों से अभिभूत थे। प्रीवियस में दूसरे वर्ष की परीक्षा की तैयारी मेरे मित्र नरेश सहगल ने करायी थी, अंतिम महीने में। वह मुझे डायमंड जुबिली हॉस्टल से हटा कर अपने घर ले गई। तब प्रीवियस में मुझे सेकंड डिवी*ान के नंबर मिले। एक दिन साहीजी ने कहा कि देखो हरीश फर्स्ट क्लास आया है.... और मेरे मुँह से निकला- उसमें क्या है! फर्स्ट आने में क्या है..... शायद साहीजी को यह अंदा*ाा नहीं था कि परीक्षा-आधारित, क्लास रूम-केन्द्रित शिक्षा प्रणाली से मेरा पूरी तरह मोह भंग हो चुका था। आवारागर्दी के बीच आखिरी दिनों की पढाई से ही यह सफलता! मुझे सागर में अव्वल आना कोई बडी उपलब्धि नहीं लगी- जबकि उन दिनों सागर विश्वविद्यालय का फैलाव बहुत बडा था। कुछ उसी रुझान के कारण मैं गोल्ड मेडल लेने दीक्षांत समारोह में भी नहीं गया, जबकि सागर के एक असिस्टेंट रजिस्ट्रार वहीं इलाहाबाद आये थे और मुझे साथ लेकर तमाम गोल्ड मेडल बनवाने गये थे।

लेकिन साहीजी की कक्षाओं में मुझे बहुत आनंद आता था जबकि मेरे अधिकांश सहपाठी उनके अध्यापन से खुश नहीं रहते थे। मुझे अच्छा यह लगता था कि साहीजी किसी तरह के नोट्स लेकर नहीं बैठते थे-जैसा कि प्रकाशचन्द्र गुप्त करते थे- बल्कि उनका व्याख्यान किसी एक पाठ या लेखक से शुरू होकर, उसी तक सीमित नहीं रहता था। साहित्य, कला, संस्कृति, समाज ...... कितने सारे परस्पर-संबद्ध विषय एवं कृतियाँ आँखों के आगे नाचने लगती थीं। ज्ञान के कितने ही झरोखे और दरवा*ो खुलते जान पडते थे। कुछ ऐसा ही आनंद एस. सहाय की कक्षा में आता था, वह फिराक साहब (यदुपति सहाय) के छोटे भाई थे। (फिराक साहब के टयूटोरिटाज भी याद आते हैं। उनकी बडी-बडी आँखें और घूम-घूम कर व्याख्यान देना!)

साहीजी के साथा एक दूसरी तरह की बैठक बहुत दूसरी तरह से ज्ञान-वर्धक थी। अक्सर मैं इंडियन कॉफी हाउस जाता था शाम के वक्त, सिविल लाइंस में, जहाँ साहित्य और राजनीति के धुरंधर अड्डा जमाये हुए मिलते थे। साहीजी, केशवचन्द्र वर्मा, लक्ष्मीकांत वर्मा, रघुवंश, रामस्वरूप चतुर्वेदी, श्याम किशोर सेठ, विपिन कुमार अग्रवाल, नरेश मेहता और श्रीराम वर्मा, दूधनाथ सिंह, प्रभात रंजन जैसे तमाम पुरानी और नयी पीढियों का सत्संग वहाँ सुलभ था। चुरूट या पाइप पीते हुए, अच्छे खासे डील डौल वाले, मोटे चश्मे से तीखी मगर सदय दृष्टि से लोगों को तौलते हुए, अट्टहास और मुस्कान लिए हुए साहीजी तर्क-वितर्क में भिड जाते थे। किसी भी बात को, किसी भी युक्ति या तर्क को अपने अनोखे अंदा*ा में वे मटियामेट करने में समर्थ थे। किसी भी पक्ष का प्रतिपक्ष दिखाते हुए उन्हें मन ही मन हँसते हुए भी देखा जा सकता था। उसी तर्क-वितर्क की लीला देखने के बाद, कोरे तार्किक प्रस्तावों और मंतव्यों पर मेरी भी आस्था हो गई।

इन महारथियों के बीच मेरे जैसे अधकचरे युवजन भी बराबरी से बैठते थे- इलाहाबाद की यह सीख और रिवायत अनोखी थी। लक्ष्मीकांत जी हों या श्रीराम जी या दूधनाथ जी- बडे, उम्रदरा*ा और प्रतिष्ठित होते हुए भी, इन का सहचर्य ऐसा था जो हमें छोटेपन का एहसास कभी नहीं कराता था। वह विवेचना की गोष्ठी हो या परिमल की या प्रगतिशील लेखक संघ की ...... लगभग सभी जगह नवोदित या उगते हुए रचनाकारों को प्रोत्साहित करने वाला यही अद्भुत व्यवहार मिलता था। एक खास तरह का आत्म-विश्वास वहीं की देन है।

बल्कि परिमल की अनेक में से दो गोष्ठियाँ मुझे अपनी ही वजह से याद आती हैं। पर शायद दर्शनशास्त्र-मनोविज्ञान के प्रोफसर सेठ साहब के यहाँ (या विपिन जी के यहाँ) हुई थी, जहाँ मुझे अध्यक्ष बना दिया गया। लक्ष्मीकांत जी ने एक बडी लंबी कविता पढी- और बतौर अध्यक्ष मैंने जो कहा, उसमें यह वाक्य भी था-आप की कविता में ‘पैराफ्रे*ा’ *यादा है। लक्ष्मीकांत जी ने अचरज के साथ कहा- ‘हैं?’ या ऐसा ही कुछ। लेकिन साहीजी समेत किसी भी बु*ाुर्ग ने मुझे झिडका या डपटा नहीं।

और एक दूसरी गोष्ठी मेरे लिए चरम उपलब्धि तथा साथ ही साथ चरम खालीपन के एहसास वाली साबित हुई ः याद नहीं किसके घर- लेकिन मैंने कविताएं पढी और उपस्थित सभी परिमल-सदस्यों ने तारीफ की झडी लगा दी। पराकाष्ठा तब हुई जब साहीजी बोले कि मुझे लगता है मानो ये कविताएं मेरी ही हैं। सिर्फ केशव जी (केशवचन्द्र वर्मा) थे जिन्होंने एक शंका प्रकट की। उन्होंने कुछ यों कहा कि फॉर्म तो ठीक है (या कि अच्छा है।) मगर कहना क्या चाहते हो?

मुझे याद है मेरा उल्लसित मन यह भी महसूस कर रहा था मानो मैं अब बिल्कुल रीत गया, खाली हो गया। इस तरह के एहसास की एक बानगी बहुत बाद में मुझे स्डयार्ड किपलिंग की एक जीवनी में देखने को मिली। नोबेल पुरस्कार पाने की उसकी खुशी एक विराट् सूनेपन की प्रतीति में तब्दील हो गयी थी। उसने कहा है कि उसे ऐसा ही महसूस हुआ। और इधर उन्नीस-बीस साल के लडके के लिए परिमल संस्था की वह स्वीकृति या सराहना नोबेल से कम नहीं थी। वह शायद 1967 का ही वाक्या है।

साहीजी भदोही-मि*ाार्पुर-वाराणसी क्षेत्र के कालीन बुनकरों की यूनियन के अध्यक्ष थे और उन म*ादूरों के मन में साहीजी के लिए कितना सम्मान और प्रेम था- यह देखने का मौका मुझे मिला 1967 के आम चुनाव में। साहीजी मि*ाार्पुर-भदोही क्षेत्र से लोकसभा का चुनाव लड रहे थे। संयुक्त समाजवादी दल की ओर से। मैंने सागर से अपने मित्र अरुण द्विवेदी और बनारस से विनय दुबे को बुलाया, और हम तीनों नरेश सहगल के साथ, सहगल की बुआ के घर मि*ाार्पुर में जा डटे। साइकिल पर बैठकर हम शहर में और बहुत-सारे गाँवों में प्रचार के लिए घूमते रहे। एक गाँव में, अरुण द्विवेदी और मुझको एक परिवार ने बडी ममता से भोजन कराया। बु*ाुर्ग महिला को हम लोगों पर तरस-सा आया कि हम कैसी मशक्कत किये जा रहे हैं। ये वे दिन थे जब चुनाव में खर्च लाखों करोडों क्या कुछ ह*ाारों में ही पूरा हो जाता था।

एक मतदान केन्द्र में (अब ठीक से याद नहीं, पर शायद, भदोही में) मुझे पोलिंग एजेन्ट बनाया गया था, साहीजी की तरफ से। जब मतदान चल रहा था, तब मैंने किसी एक मतदाता की शिनाख्त पर सवाल उठा दिया, और *ााहिर हुआ कि वह फ*ाीर् वोटर था। शाम होते-होते मैंने देखा कि मतदान केन्द्र के बाहर खुले मैदान में, धीरे-धीरे लोग आ-आकर बैठते जा रहे हैं। उनके चेहरों से लगता था कि उस मतदाता के पकडे जाने का बदला वे मुझसे लेकर रहेंगे।

मैंने मतदान अधिकारी का ध्यान इस ओर खींचा, और उन्होंने सहमत होते हुए मुझे अपने उसी वाहन में बैठा लिया जिसमें मतदान की पेटियाँ लदी थीं। इस तरह सुरक्षित मुझे उन्होंने मि*ाार्पुर पहुँचा दिया! चुनाव में शायद एक जनसंघ के उम्मीदवार से हारे हुए साहीजी ने इलाहाबाद में मुझसे कहा-‘लेट अस एक्सचेन्ज नोट्स’-चुनाव के अनुभव हम साझा करें....

उस चुनाव की एक खासियत यह थी कि हम लोगों ने कुछ चंदा करके एक परचा छपवाया जिसमें इलाहाबाद के लगभग सभी साहित्यकारों के दस्तखत थे। यही नहीं, लक्ष्मीकांत जी, राजेन्द्र कुमार जी और कई अन्य लेखक मि*ाार्पुर भी पहुँचे। अपने लडकपन में हमारा विश्वास था कि साहित्य जगत के सिद्ध पुरुषों के समर्थन का मतदाताओं पर *ाबर्दस्त असर पडेगा। धुरंधर लेखकों द्वारा चुनाव-प्रचार का शायद यह अद्वितीय प्रसंग रहा होगा, और राजनीति की तरा*ाू पर इस तरह साहित्य शायद ही कभी तौला गया होगा.......

आपातकाल समाप्त होने के बाद साहीजी और लक्ष्मीकांत जी हमारे हौ*ा खास वाले घर आये थे। उस बार, और उससे पहल जब मैं हंगरी से पत्रकारिता का प्रशिक्षण लेकर लौटा था और उनसे इलाहाबाद जाकर मिला था- साहीजी ने सलाह दी थी कि मैं अपना एम.ए. पूरा कर लूँ। मैं फाइनल वाले वर्ष में दिसंबर 1967 में पढाई छोड कर बुदॉपैश्त एक फेलोशिप पा कर चला गया था। उनका यह मशविरा सही था क्योंकि एम. ए. करने पर रो*ागार के कुछ दूसरे दरवाजे खुल सकते थे।

लेकिन साहीजी को मैंने खुल कर कभी नहीं बताया कि मैं एम. ए. क्यों नहीं करना चाहता। अव्वल तो कक्षा में बैठना ही बेहद उबाऊ लगने लगा था। इस लिए भी फौरन वह फेलोशिप अंगीकार कर ली थी। और सच तो यह था कि मैं शिक्षक, अफसर, और व्यापारी नहीं बनना चाहता था। इर तीनों पेशों से बचना था ......इसी लिए प्रतियोगिता के फॉर्म खरीदने के बाद उन्हें कभी भरा नहीं..... प्रतियोगिता शब्द से ही कुछ चिढ हो गई थी.....

यदा-कदा मुझे यह सुन कर - अनेक बु*ाुर्गों से सुन कर- अच्छा लगता था कि मलयज और नित्यानंद तिवारी के साथ-साथ मैं भी साहीजी का एक प्रिय शिष्य था। आगे चल कर समीक्षा-आलोचना के नाम पर अनेकों बार लिखने के बावजूद, यह इच्छा अब भी शेष है कि साहीजी की कविता पर कुछ विस्तार से लिख सकूँ। मगर अब भी लगता है कि उसके लिए तैयारी पूरी नहीं हो पायी है!