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हिन्द स्वराज : विचार का व्यवहार

ब्रजरतन जोशी
महात्मा गाँधी की सात पुस्तकों में सबसे पहली पुस्तक है हिन्द स्वराज। बीसवीं सदी की सर्वप्रमुख पुस्तकों में अग्रगण्य। ऐसी पुस्तक जिसका असर सभ्यता पर कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो से कुछ ज्यादा ही पडा है। कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो का असर तो लगभग चार-पाँच दशक तक ही रह पाया, पर हिन्दी स्वराज एक ऐसी विलक्षण कृति है जो एक करुणाशील लेखक के द्वारा सभ्यता की ऐसी मर्मस्पर्शी व्याख्या/समीक्षा हमारे सामने रखती है कि वह न केवल हमें झकझोरती है वरन् इस विचलन की घडी में एक नया पथ भी दिखती है। यह कृति स्वराज, स्वदेशी और सत्याग्रह के *ारीय अपने समय के सबसे बडे साम्राज्य के •ुराज, अन्याय और शोषण के साथ उपनिवेशवाद, रंग-भेद, पर्यावरणीय आन्दोलनों को एकसाथ प्रेरणा और गति देने का महत्त्वपूर्ण साधन बनी। हम कह सकते हैं कि यह कृति बरतानिया हुकूमत और आधुनिकता के साथ-साथ कुराज का सुचिन्तित, वैचारिक, तार्किक और दार्शनिक धरातल पर जोरदार विरोध ही नहीं करती वरन् सभ्यता को आगे की राह भी सुझाती है। हिन्द स्वराज वस्तुतः मनुष्य की चेतना पर पड रहे प्रभावों, दबावों को हमारे सामने रखती है। यह कृति बताती है कि हम कैसे और किस तरह अपनी जडों से कटकर पतन की राह पर अग्रसर हैं। क्या इसे हम इस तरह नहीं देख सकते कि यह पुस्तक स्वयं गाँधी ने अपने को समर्पित की है? अक्सर इसे साम्राज्यवाद की आलोचना बताया जाता है, जो कि पूरी तरह ठीक भी है लेकिन, क्या गाँधी केवल साम्राज्यवाद के विरुद्ध ही चिंतनरत थे? क्या यह कृति आधुनिकता की सुचिन्तित निंदा का उत्कृष्ट पाठ नहीं है? क्या इसे तकनीक के प्रचण्ड आवेग के तले दबे मनुष्य की पतन गाथा का कारुणिक आख्यान नहीं कहा जा सकता? क्या यह उत्तर उपनिवेशवाद या जिसे हम उत्तरआधुनिकता के रूप में जान या पहचान पा रहे हैं और जिसने संस्कृति के परिसर में हमारी अपनी विचार परम्परा को अपदस्थ किया हुआ है, के खिलाफ एक वैचारिक सत्याग्रह नहीं है? हिन्द स्वराज काल्पनिक संवाद भर नहीं है और न ही अतीत-वर्तमान की स्मृतियों का संचयन भर है। यह जीवन पद्धति के साथ विचार के व्यवहार का शास्त्र रचने वाली उल्लेखनीय कृति है। हर विचार के विविध आयाम होते हैं। समय की नब्*ा पहचानने वाला गंभीर अन्वेषी उन आयामों की विविधता को सम्पूर्णतः आत्मसात् करते हुए यह जानता है कि इनका कौनसा आयाम समाज और संस्कृति के लिए ज्यादा अनुकूल है। इन्हीं अर्थों में गाँधी किसी भी विचार और संस्कृति के विरोधी नहीं हैं, हाँ उनसे उनकी असहतियाँ अवश्य ही हैं। इसलिए वह कहते हैं कि मैं नहीं चाहता कि मेरे घर के चारों ओर दीवारें खडी कर दी जायँ और खिडकियाँ बन्द कर दी जायँ। मैं चाहता हूँ, दुनिया के तमाम देशों की संस्कृतियों की हवाएँ पूरी उन्मुक्तता के साथ मेरी खिडकी से बहें। मेरे घर में कोई कैदखाने का धर्म नहीं चलता। लेकिन, कोई हमें अपने धरातल से उखाड फेंके, इसे मैं अस्वीकार करता हूँ।

यह किताब केवल अपनी परम्पराओं, जडों की तर्कसम्मत वैज्ञानिक दृष्टि सम्पन्न व्याख्या भर नहीं है वरन् अपने समय के समाज का जीवन्त दस्तावे*ा भी है, जिसमें बाल-विवाह, बाल वैधव्य और वेश्यावृत्ति के साथ धर्म के नाम पर हो रहे आडम्बरों की तस्वीर हमारे सामने रखती है। यानी गाँधी की दृष्टि सम्यक है। उस में कुछ भी छूटता नहीं है। एक विशेष बात, जिस पर गौर किया जाना लाजिमी होगा कि गाँधी की यह सभ्यता समीक्षा सभी प्रकार के पूर्वग्रहों से सिक्त होकर नहीं की गई है वरन् मुक्त अस्तित्व के विविध आयामों पर सात्त्विक चिन्तन किया गया। गाँधी की दृष्टि समावेशी है और शैली सामासिक है। इसी से अभिभूत होकर विश्व के विभिन्न क्षेत्रों के गण्यमान्य विद्वानों ने मुक्तकंठ से इसकी प्रशंसा की है। ह्यूफासेट ने लिखा है- हिन्द स्वराज उस वास्तविक क्रांति का श्रेष्ठतम आधुनिक गुटका है, जो हम सब में घटित होनी चाहिए- यदि हम जीवन के सृजनात्मक प्रयोजन को सिद्ध करना चाहते हैं। इसे हम यूं भी समझ सकते है कि यह किताब स्वयं का, स्वयं के द्वारा, स्वयं के रोगों का उपचार भी है। शायद ह्यूफासेट के सृजनात्मक जीवन का अर्थ भी यही है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि गाँधी की सच्ची सभ्यता यानी सद्व्यवहार को जीवन के प्रांगण में अपने पूरे वैभव के साथ खिलने और विकसित होने के लिए पर्याप्त प्रयास किए जाएं, परिवेश तैयार किया जाए। गाँधी इस पुस्तक में केवल भारत के प्रति ही चिन्तनरत नहीं हैं। वे तो मानवमात्र के प्रति जागरूक और संवेदनशील हैं। चाहे उनमें हम पर अत्याचार और अन्याय करने वाले अंग्रे*ा ही क्यों न हों। गाँधी ने लिखा है कि मशीनें यूरोप को बर्बाद करने लगी हैं। बर्बादी अब अंग्रे*ाों के दरवा*ाो पर दस्तक दे रही है। मशीनें आधुनिक सभ्यता की निशानी हैं, वह पाप की प्रतिनिधि हैं।
सच में क्या मशीनें मनुष्य के अस्तित्व विभाजन में अग्रणी भूमिका नहीं निभा रहीं? बहुत सामान्य-सी बात है कि जब समाज में आज की सी भारी यांत्रिकता नहीं थी तो, समाज अपनी आवश्यकता और संरचना के अनुसार लघु कुटीर उद्योगों को विकसित करता था। आज हालात ये हैं कि हमें मशीनों के अनुसार स्वयं को ढालना पड रहा है। एक छोटा सा उदाहरण है कि पहले दर्जी आपकी माप का कमीज-पेन्ट आपका माप लेकर सिलता था या आपका पहनावा बनाता था। आज बा*ाार में पहले से ही तैयार पहनावा जोर-शोर से बिक रहा है। आपको बा*ाार द्वारा उपलब्ध मापों में स्वयं को फिट करना पड रहा है। यानी समाज को मशीन के अनुकूल होना पड रहा है। हमारी जीवन शैली मशीन के अनुसार ढल रही है। हम मशीन के गुलाम होकर रह गए हैं। गाँधी इस खतरे को भाँप रहे थे। इसलिए वह स्वदेशी तकनीक की वकालत कर रहे थे। क्योंकि वह जानते थे कि तकनीक के बदलते ही जीवनशैली और जीवन के विविध आयामों पर गहरा असर पडता है। उन्हें अच्छी तरह समझ में आ गया था कि आधुनिक सभ्यता में छोटी तकनीक का कोई विशेष महत्त्व नहीं है। आज मं*ार यह है कि नगरों के आकार के कारखानें हमारी जीवनशैली तय कर रहे हैं, जिसमें हम सब को फिट होना है। अगर हम उसमें फिट नहीं हैं तो दोष हमारा ही है, उनका नहीं। अब हमारी माँग, जरूरतें कृत्रिम रूप से इजाद की जा रही हैं। हमारी वास्तविक आवश्यकताएँ ताक पर हैं। नये विचार द्वारा नये ढंग से हमें समझाया जा रहा है कि आपका जीवन स्तर और शैली कैसी और किस तरह की होनी चाहिए। अर्थात् समाज, जिसका मूल अर्थ ही सम्बन्ध, साहचर्य और विवेक की त्रिवेणी है, को इच्छा के द्वारा अपदस्थ किया जा रहा है। ज्ञान मण्डी के थोक माल की तरह बिकने की वस्तु में परिवर्तित होता जा रहा है।
इस मशीनी सभ्यता में भण्डारण केन्द्र में आ गया है। जरूरतें गौण हो रही हैं। इसीलिए गाँधी चरखे को उत्पादन का वह साधन मानते हुए उसके इस्तेमाल पर जोर देते हैं कि वह केवल आपकी वास्तविक जरूरतों को पूरा करता है। आपको सजग और सक्रिय भी बनाता है। उसे भण्डारण की रणनीति का ज्ञान नहीं है, उसमें कोई लोलुपता नहीं है, इसलिए वह जीवन का श्ाृंगार करता है।
गाँधी की हिन्द स्वराज दो पायों पर खडी है, एक पश्चिमी सभ्यता के प्रकोप एवं प्रभाव विस्तार का दुर्भाग्य झेलते हिन्दुस्तान की दुर्दशा का वर्णन, दूसरा प्रेम ही संसार का नियम है अन्य कोई नहीं। यहाँ बात का साफ होना *ारूरी है कि यह जो पश्चिमी सभ्यता की मानसिक और शारीरिक गुलामी का वर्णन है वह केवल भौगोलिक, राजनीतिक स्तर तक सीमित नहीं है, वरन् उसकी पहुँच आत्म तक भी है। इसीलिए गाँधी स्वतन्त्रता को मानसिक स्वराज मानते हैं और मानसिक स्वराज की प्राप्ति ही उनका असली ध्येय है। उसकी राह में आ रही सबसे बडी बाधा अन्याय और अनीति है जिसका विरोध गाँधी जीवन भर करते रहे। इसी विद्रोह की निरन्तरता ने ही उन्हें विद्रोही के साथ विजयी महात्मा बनाया। जब वे कहते हैं कि मेरा जीवन ही मेरा संदेश है। तो इसका तात्पर्य केवल जीवनशैली से ही नहीं है वरन् आजीवन उन्होंने अन्याय, असमानता और अनीति के विरुद्ध जो जीवन जिया है उससे है।
गाँधी का जीवन केवल एक व्यक्तिवाचक संज्ञा का जीवन नहीं है वरन् वे तो अनेक क्रियाओं का समुच्चय अपने विराट् व्यक्तित्व में समेटे हैं। ईमान पर अडिग, अटल और अविचलित जीवन इसकी दास्तां है। वे जीवन से जूझ रहे जीवन की रक्षा में तत्पर ऐसे अध्यात्म पुरुष हैं जो सबकुछ को स्वयं से अभिन्न मानते हैं। इसीलिए उनकी दृष्टि समावेशी हैं। वे हमारी सभ्यता के ऐसे चिकित्सक हैं, जो एक साथ हमारी मन, बुद्धि और आत्मा की रुग्णता का उपचार करने के लिए निरन्तर प्रयत्नरत है।
हिन्द स्वराज की पर्याप्त आलोचना भी हुई। उन पर कईं आरोप लगे। एक प्रमुख आरोप उन पर मशीन को लेकर है। जो यह मानता है कि मशीन संबंधी उनके विचार पूर्णतः तार्किक और अवैज्ञानिक हैं। इस सम्बन्ध में यह भी कहा गया कि वे जिस चरखे को चलाते हैं वह चरखा और नाक पर चढी ऐनक यानी चश्मा भी तो यन्त्र ही है।
महादेव भाई देसाई ने इस सम्बन्ध में एक वार्तालाप का वर्णन किया है जो 1924 में हुआ- क्या आप तमाम यंत्रों के खिलाफ हैं? रामचन्द्र ने सरल भाव से पूछा। गाँधी जी ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया- वैसा मैं कैसे हो सकता हूँ, जब मैं जानता हूँ कि यह शरीर भी नाजुक यन्त्र ही है? खुद चरखा भी यन्त्र ही है, छोटी दाँत कुरेदनी भी यन्त्र है। मेरा विरोध यन्त्रों के पीछे जो पागलपन चल रहा है, उसके लिए है। आज तो जिन्हें मेहनत बचाने वाले यन्त्र कहते हैं, उनके पीछे लोग पागल हो गए हैं। उनसे मेहनत जरूर बचती है लेकिन, लाखों लोग बेकार होकर भूखों मरते हुए रास्तों पर भटकते हैं। समय और श्रम की बचत तो मैं भी चाहता हूँ परन्तु, वह किसी खास वर्ग की नहीं, बल्कि सारी मानवजाति की होनी चाहिए। कुछ गिने-गिनाये लोगों के पास सम्पत्ति जमा हो, ऐसा नहीं, बल्कि सब के पास जमा हो, ऐसा मैं चाहता हूँ। आज तो करोडों की गरदन पर कुछ लोगों के सवार हो जाने पर यन्त्र मददगार हो रहे हैं। यन्त्रों के उपयोग के पीछे जो प्रेरक कारण है वह श्रम की बचत नहीं है, बल्कि धन का लोभ है।
रामचन्द्र ने आतुरता से पूछा - तब तो बापूजी आपका झगडा यन्त्रों के खिलाफ नहीं, बल्कि आज यन्त्रों का जो बुरा उपयोग हो रहा है उसके खिलाफ है?
*ारा भी आनाकानी किए बिना मैं कहता हूँ कि हाँ। लेकिन मैं इतना जोडना चाहता हूँ कि सब से पहले यन्त्रों की खोज और विज्ञान लोभ के साधन नहीं रहने चाहिए। फिर म*ादूरों से उनकी ताकत से ज्यादा काम नहीं लिया जाएगा और यन्त्र रुकावट बनने की बजाय मददगार हो जाएँगे। मेरा उद्देश्य तमाम यन्त्रों को नाश करने का नहीं है, बल्कि उनकी हद बाँधने का है।
गाँधी मशीन का विरोध इसलिए भी करते थे क्योंकि मशीन होमोजेनिक कल्चर के प्रसार में प्रमुख भूमिका निभाती है। क्योंकि कारखाने सब को समान मानकर ही कार्य कर रहे हैं। जबकि जमीनी स्तर पर विविधता और विभिन्नता का संसार पसरा पडा है। उनकी जरूरतें और माँग भी विविध हैं। उनकी सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और स्थापत्य संरचनाएँ भी भिन्न-भिन्न हैं। इसलिए गाँधी स्वदेशी का नारा देते हैं। गाँधी के स्वदेशी का तात्पर्य स्थानीय भूगोल और लघु-कुटीर उद्योगों की विविधता को सुरक्षित और संरक्षित करने के लिए था। वे जानते थे कि हर भौगोलिक क्षेत्र का व्यापार के साथ एक गहरा और संवेदनशील रिश्ता होता है। वे उस सम्बन्ध को बचाना चाहते हैं। इसलिए वे बार-बार उस प्रवृत्ति का विरोध करते हैं जो इसे नष्ट करना चाहती है।
एक और अहम आरोप गाँधी पर यह भी लगाया जाता है कि वे पश्चिमी सभ्यता या कह लें आधुनिकता के खिलाफ थे। वे पश्चिमी सभ्यता या आधुनिकता के खिलाफ नहीं थे, वरन् दोषों से आच्छादित सभ्यता की प्रवृत्तियों के अवश्य ही खिलाफ थे। वे आधुनिकता और पश्चिम की चपेट में आ रहे भारतीय चित्त को लेकर विशेष चिन्तित थे। इसलिए उनका मूल ध्येय था अहिंसक समाज के *ारीये व्यवस्था की प्रक्रिया में परिवर्तन लाया जाए। गाँधी का अहिंसक समाज अहिंसक प्रौद्योगिकी एवं स्वदेशी प्रौद्योगिकी के बिना संभव नहीं है। जब तक हम अपने मानव श्रम और स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों के प्रति लोलुप वृत्ति को त्याग कर अपनी वास्तविक आवश्यकता के अनुसार-तेन त्येक्तेन भुंजिथा यानी त्यागपूर्वक भोग की प्रवृत्ति के अनुसार उपयोग नहीं करेंगे तब तक हमारी दशा, दिशा और गति के सुधरने की संभावना अत्यन्त क्षीण है।
गाँधी जिस अहिंसक समाज की परिकल्पना करते हैं उसमें पश्चिम की परछाईं युक्त बुद्धि की दासता से उबरने के लिए प्रयास है, क्योंकि यही परछाईं युक्त बुद्धि ही हमारे स्वायत्त मानस के निर्माण में सबसे बडी बाधा है। इसके प्रभाव का विस्तार आत्म तक जाता है। दरअस्ल गाँधी इस तथ्य से भली-भाँति परिचित थे कि जब कभी भी एक संस्कृति दूसरी संस्कृति पर प्रभुत्व स्थापित करती है तब पराजित मानसिकता पर प्रभुवर्ग के विचार, मूल्य और मान्यताएँ हावी होने लगते हैं। इन्हीं संदर्भों में हिन्द स्वराज विचार के स्वराज की राहें आसान बनाती है। हमारी अपनी परम्परा, प्रज्ञा और मनीषा की निजता का वैभव नष्ट होता जाता है और दूसरी ची*ांे हमारे स्वदेशी ज्ञान पर एक अनावश्यक बोझ बनकर उसे अपने तले दबा देती हैं। गाँधी इस खतरे को जान चुके थे इसलिए वे आत्म का नाश करने वाली किसी भी ची*ा से समझौता करने के लिए तैयार नहीं थे। ये जो अपने आत्म के प्रति सजगता, संवेदनशीलता और समर्पण है, ये ही उन्हें एक अनूठा महात्मा बनाती है।

कई बार मन में यह जिज्ञासा गहरे उठती है कि आखिर गाँधी का परम्परा से यह अत्यन्त गहरा जुडाव इतना परिपक्व और पूर्ण कैसे है? इसके उत्तर में हम कह सकते हैं कि पूरब की संस्कृति और ज्ञान के प्रेरक प्रभाव के कारण वे अपने विवेक को इतना सम्पन्न बना पाते हैं जिसे हम पूर्ण परिपक्वता कहते हैं। ऐसा नहीं है कि वे पश्चिम की तरफ पीठ कर के बैठे हैं। पश्चिम के साथ बातचीत, व्यवहार और सीखने की प्रक्रिया में वे अपने विवेक को पूर्ण सजगता के साथ उपयोग में लाते हैं। इसी कारण गाँधी की आध्यात्मिकता एक भिन्न प्रकार से स्व-परिवर्तन के *ारीये समाज और देश-दुनिया से जुडने की प्रक्रिया में परिणत होती है। जबकि कुछ लोग दुनिया से दूरी बना कर इसी ऊँचाई को हासिल करने की अपनी तरह की कोशिशों के लिए भी इतिहास में दर्ज हैं। उनके स्वराज में अपनी *ामीन पर खडे होने के प्रति अटल, अविचलित श्रद्धा है। तभी तो वे कहते हैं कि आप शेर को नहीं शेर की प्रकृति को पंसद करते हैं, कहने का मतलब आप भारत को अंग्रे*ाी छाप में ढालना चाहते हैं। यह मुझे जो स्वराज चाहिए, वो नहीं है।
गाँधी का स्वराज व्यक्तिगत मुक्ति के लिए नहीं है वरन् वे सभ्यता की मुक्ति के लिए इसका प्रयोग करते हैं। उनके स्वराज की प्राप्ति का साधन सत्याग्रह है। इन्हीं अर्थों में हिन्द स्वराज साध्य-साधन पर विवेकपूर्ण, परिपक्व विचार की प्रतिनिधि रचना है। गाँधी साधन को बीज और साध्य को वृक्ष मानते हैं। इसलिए वे कहते हैं कि जितना सम्बन्ध बीज और पेड के बीच है, उतना ही साधन और साध्य के बीच। यानी उनके अनुसार साधन-साध्य अभिन्न है। दोनों के लिए पवित्रता प्रथम और अनिवार्य शर्त है।

वे आधुनिक सभ्यता के कारण बढते जा रहे स्मृतिलोप को रेखांकित करते हुए कहते हैं - आधुनिक सभ्यता स्मृतिलोप के रोग से ग्रसित है। यह स्मृतिलोप हमारे स्वराज की प्राप्ति में बाधा है। सत्याग्रह इसका विनम्र प्रतिकार है। सत्याग्रही के लिए वे मानते हैं कि एक सत्याग्रही को सदैव आत्मनिरीक्षण और आत्म शुद्धीकरण की प्रक्रिया में निरत रहना चाहिए। यह एक प्रेमपूर्ण व्यवहार की प्रकृति है। दरअस्ल उनके लिए सत्याग्रह मनुष्य का मनुष्यता के साथ एक आत्मीय संवाद है। क्योंकि उनकी आधारभूत मान्यता है कि मनुष्य जाति में कुछ तो अच्छाई है ही।
वे जीवन के प्रांगण में पसर रही अनावश्यक ते*ाी के भी खिलाफ थे। इसलिए वे कहते थे कि सभ्यता का समय और दूरी को जीतने का प्रयत्न एक पागलपन है। और सच में उनका यह अनुभव आज हम सब के लिए एक सोचनीय यक्ष प्रश्ा* बन गया है।
गाँधी के जीवन पर उठ रहे प्रश्ा*चिह्नों और सतही तौर पर लगने वाले आरोपों, अन्तर्विरोधों को गहराई से समझने व जानने की जिज्ञासा रखने वालों के लिए हिन्द स्वराज एक कुंजी है। यह पुस्तक हर अध्येता को दार्शनिक धरातल पर पूर्ण वैज्ञानिक दृष्टि के साथ अपनी जडों से जोडती है। इसमें दूसरों के प्रति प्रेम का भाव है। अन्य के -से परायेपन का बोध नहीं है।
आज के युवा और जिज्ञासु अध्येताओं को कबीर का समझाया एक तथ्यात्मक अनुभव समझ लेना ठीक जान पडता है। कबीरदास अपने एक दोहे में कहते है - जो दर्पण में लग गई काई, तो दरस कहाँ से होई। तात्पर्य स्पष्ट है कि दर्शन के लिए दर्पण को मांझना होगा। और निरन्तर मांझना होगा। नहीं तो निरन्तर जमती काई किसी भी तरह का दरस नहीं करवा पाएगी। गाँधी दृष्टि और विचार के पास हमें इसी भाव से जाना होगा तभी हम हिन्द स्वराज के गर्भ से निकले विचार के व्यवहार के शास्त्र को भली-भाँति जान, समझ और जीवन में उसका उपयोग कर पाएँगे।
अब समय की माँग है कि हम अपने बने-बनाए पूर्वग्रहों से मुक्त होकर गाँधी विचार और दृष्टि को सामयिक संदर्भों में समझें तो निश्चिय ही हिन्द स्वराज सभ्यता को सबसे विश्वसनीय राह दिखाने वाली प्रामाणिक कृति के रूप में जानी-मानी और समझी जाएगी।
प्रशासनिक एवं तकनीकी कारणों से यह संयुक्तांक अब आपकी न*ार है। इस अंक में हिन्दी के मूर्धन्य रचनाकारों में अग्रणी सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, विजयदेव नारायण साही के साथ राजस्थानी और हिन्दी के यशस्वी लेखक पद्मश्री कन्हैयालाल सेठिया पर एक विशेष लेख है। इसके अतिरिक्त इस अंक में गाँधी विचार एवं दृष्टि को जानने-समझने और निरन्तर उस पर चिन्तनरत रहने वाले नन्दकिशोर आचार्य, कुमार प्रशान्त, पवनकुमार गुप्त और रामचन्द्र गहा के आलेख विशेष रूप से हमारे आग्रह पर लिखे गए हैं। सभी विद्वानों का हृदय से आभार कि उन्होंने अत्यन्त अल्प समय में हमारे लिए सुचिन्तित, प्रामाणिक, विश्लेषणात्मक और दृष्टिबोधक आलेख समय पर उपलब्ध कराये।
इस अंक से लम्बे समय से चली आ रही फोण्ट परिवर्तन की जायज माँग को भी पूरा किया जा रहा है। साज-सज्जा और अन्य परिवर्तन भी आफ न*ार है। आफ रचनात्मक सुझावों का हमेशा इंतिजार रहता है। मधुमती की यह जययात्रा आफ विचारों, सुझावों और सहयोग से ही जारी है। दीप उत्सव की शुभ कामनाओं के साथ आपका-