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चीन : कवि की नजरों से

असीम अग्रवाल
एक कवि का डायरी लिखना यों तो हिन्दी में कोई पहली घटना नहीं, लेकिन ऐसा आमतौर पर देखा नहीं जाता। अन्य विधाओं की अपेक्षा डायरी बहुत व्यक्तिगत होती है, जहाँ मनुष्य बेफिक्री के साथ अपने मन की बातें लिखता है। भावों की गहनता पर ध्यान देने वाला कवि यदि डायरी लिख रहा है, तो यह देखना दिलचस्प लगता है कि कविता में दुनिया को समेटने वाला लेखक, अपनी ’निजता‘ में दुनिया को कितना व कैसा स्थान देता है। यों, समय के साथ-साथ डायरी विधा में परिवर्तन देखने को मिलते हैं, जब लेखक उसमें वैयक्तिकता के साथ-साथ साहित्यिक- सामाजिक-राजनीतिक बिंदुओं को भी लिखता है। इस रूप में यह टिप्पणियाँ, विचारों के विवेचन के साथ-साथ लेखक की उनमें सहमति-असहमति के रूप में आती हैं। इस तरह डायरी विधा व्यक्तिगत होकर भी बीच-बीच में सामाजिकता में प्रवेश कर जाती है। ’चीन डायरी‘ इसलिए भी रोचक है कि यह यात्रा-संस्मरण का भी रस देती है। डायरी व यात्रा-संस्मरण का यह मेल इस पुस्तक को विधागत रूप से संग्रहणीय बनाता है।

रोज न लिखी गई यह डायरी लेखक की पेइचिंग प्रवास के दौरान लिखे गए अपने कुछ अनुभव हैं। ध्यान रहे, यह अनुभव १९९३-१९९४ के हैं, यानि कि आज से तकरीबन २५ साल पुरानी बात। इन अनुभवों में पेइचिंग की सुन्दरता, वहाँ के लोग तथा विविध देशों से आए विद्वानों के जिक्र के साथ चीनी लोगों की छोटी-छोटी आदतें व चीन की आर्थिक-राजनीतिक परिवर्तनों को नोट किया गया है। इस सबके बीच है - अपने देश और घर की याद।

पेइचिंग सुन्दर शहर है। लोग आत्मीय हैं। इस आत्मीयता के कारण लेखक को घर याद आता है। कठोर शीत और मृदु वसंत का उल्लेख लेखक ने किया है। गगनचुंबी इमारतें, गुलाब से लदे पौधे, स्वच्छता और बेहतर जीवन के कारण यह शहर आकर्षित करता है। इस शहर में रहकर ही चीन को देखना है व भारत को याद करना है।

प्रगतिशील विचारों से सम्पन्न एक लेखक सामाजिक प्रश्नों से हमेशा जूझता है। यही कारण है कि इस डायरी में चीन के सामाजिक ताने-बाने के विषय में महत्त्वपूर्ण बातें मिलती हैं, जिनके माध्यम से चीनी समाज-संरचना को समझा जा सकता है। किसी समाज में ’स्त्रियों की दशा‘ उस समाज की प्रगतिशीलता का सबसे बडा पैमाना है। चीन में स्त्रियों की दशा बहुत अच्छी है। वे ऐसे किसी भी श्रम में देखी जा सकती है, जो पुरुषों के लिए समझे जाते हैं। पति अपनी पत्नी का घर के कामों के बराबर साथ देता है। तलाक लेना मुश्किल नहीं और दहेज जैसी कोई प्रथा नहीं। प्रेमी जोडे रास्ते में उन्मुक्तता से मिलते हैं। जाहिर है, एक विकासशील देश में स्त्री-पुरुष के बीच असमानताओं का अंतराल बहुत कम है। यह बदलता हुआ चीनी समाज है, जहाँ वृद्ध पीढी इन बातों को बहुत पसन्द तो नहीं करती, फिर भी इनका स्वागत करती है। बदलाव के प्रति इस सहजता को लेखक बार-बार लिखता है। आज भी, जब भारत के श्रम बाजार में स्त्रियों की हिस्सेदारी कम हो रही है, उनके प्रति पुरुष व राज्य का व्यवहार पितृसत्ता से ग्रसित है, तब पच्चीस साल पुराने चीन का यह सामाजिक ढाँचा उस देश के मूल्यों की पहचान कराने के साथ-साथ हमारे देश के आगे कई सवाल भी छोड जाता है।

इसके साथ ही लेखक ने वहाँ की आर्थिक नीतियों पर भी बराबर अपनी नजर बनाए रखी। वहाँ रोजगार की समस्या नहीं। वेतन-भत्तों के साथ सामाजिक सुरक्षा की नीतियाँ नागरिकों को बेहतर जीवन दे रही हैं। मेट्रो आदि की व्यवस्था के साथ ही सार्वजनिक परिवहन व सफाई आदि की व्यवस्था ने लोगों का जीवन उन्नत बनाया है। समाजवादी मॉडल से चलते चीन की इन उपलब्धियों से यह डायरी हमें परिचित करवाती है। चीन के समाजवादी मॉडल के विकास ने पूँजीवादी नीतियों के विकासवादी एकाधिकार को ध्वस्त किया है। लोगों की सम्पन्नता कुछ कम हो, लेकिन सुख-चैन उनसे अधिक है। चीन महत्त्वाकांक्षाओं का देश है। ओलम्पिक मेजबानी के लिए बहुत प्रयासरत है। डायरी को पढते हुए बराबर महसूस होता है कि आज हम जहाँ हैं, चीन वहाँ पच्चीस साल पहले पहुँच गया था, बल्कि अब भी हम उस समय के चीन से कई मामलों में पीछे हैं।

पर एक लेखक ने केवल उन नीतियों को नहीं, वरन उनमें हो रहे नए बदलावों को भी देखा है। यह समय सोवियत रूस के विघटन के बाद उदारवादी नीतियों के फैलाव का समय था। यों, चीन ने इससे कई वर्षों पहले ही इन नीतियों को अपनाना शुरू कर दिया था, पर इस समय पर आकर बाजार में बाकायदा खुलापन आया। लेखक इन सभी चीजों को देख रहा है, साथ ही इनके परिणामों की चर्चा भी डायरी में मिलती है। विदेशी कम्पनियों के आगमन से अंग्रेजी के प्रति मोह बढ रहा है, क्योंकि सरकारी नौकरियों में उतनी सम्पन्नता नहीं है। फिर भी चीनियों को अपनी सरकार व समाजवादी मॉडल पर विश्वास है कि वे इन नीतियों को चीन के अनुरूप ही ढालेंगे। लेकिन आर्थिक खुलेपन के कारण बुर्जुआ-वर्ग बन रहा है, आर्थिक-अपराधों में बहुत वृद्धि हुई है। महँगाई भी बढ रही है। इस चीज से चीनी लोग व लेखक आशंकित हैं। आशंकित लेखक का चित्त भी है। पूँजीवादी विषमताओं से उपजी ये आशंकाएँ जिस तरह डायरी में बार-बार आई हैं, उससे यह लक्षित करना मुश्किल नहीं कि लेखक केवल प्रकृति के सौंदर्य में उलझकर नहीं रहता, बल्कि समाज को बदलने वाली शक्तियों की पहचान करना भी उसका कर्त्तव्य है।

ये सब बातें लेखक की स्त्री-पुरुष समानता, पूँजीवादी नीतियों पर अविश्वास व समाजवादी व्यवस्था के प्रति झुकाव स्पष्ट करती हैं। इस तरह लेखक का ’आत्म‘ चीन की व्यवस्था के माध्यम से स्वयं को स्पष्ट करता है।

यह डायरी इस मायने में भी जरूरी है कि इसमें नए चीन के उन पुराने नेताओं का भी जिक्र है, जिनका आधुनिक चीन के निर्माण में अविस्मरणीय योगदान है। सबसे बडे नेता है - माओ। चीन को माओ के नाम से पहचानने वाले भारत के लिए यह आश्चर्यजनक होगा कि वहाँ अब माओ की स्मृति घट रही है तथा उनको अब वहाँ अधिक पसन्द नहीं किया जाता। इस नापसंदगी के पीछे का सबसे बडा कारण है - माओ के समय में हुई ’सांस्कृतिक क्रांति‘। वहाँ के लोग उस क्रांति के समय हुए अत्याचारों को याद नहीं करना चाहते। अब उन्हें माओ का बंद गले का नीला कोट पहनना भी पसन्द नहीं। ’सांस्कृतिक क्रांति‘ की तरह चीनी ’थेयनानमन चौक‘ की घटना को भी याद नहीं रखना चाहते। ये घटनाएँ चीन के लिए हर वक्त दुखने वाला नासूर है। अपने ही विद्यार्थियों के विरुद्ध सेना का प्रयोग लोगों को व्यथित करता है। दरअसल, चाहे जो स्थान हो, लेकिन लोगों का दिल अपने लोगों पर हुए अत्याचारों से दुखता ही है। इस टीस में बडे-से-बडे नेता भी लोगों की स्मृति से बाहर हो जाते हैं। चीन के प्रति प्रेम होने के बाद भी लेखक इस टीस को अपनी कृति में दर्ज करता है। डायरी की यही खासियत है कि वह लोगों के मनोभावों को इस तरह बिल्कुल सामने से दर्ज करती है।

लेखक ने चीनी समाज की व्यथा तथा उदासी के विषय में गम्भीर बातें लिखी हैं। चीन में एक गहरी उदासी व अवसाद है। लेखक इसके कारण के रूप में धर्म का न होना व भौतिकवाद की परितृप्ति के रूप में देखता है। चीन में काम करने पर बहुत बल है तथा छुट्टियाँ बहुत कम होती हैं। धर्म, व्यक्ति को उसकी वैयक्तिकता में सामाजिकता से जोडकर उत्सवधर्मिता को रचता है। बौद्धधर्म का प्रभाव होने के बाद भी कम्युनिस्ट व कंफ्यूशियस विचारों के कारण धर्म का जीवन में दखल बहुत कम है। साथ ही, जीवन में संघर्ष भी कम है। परिणामतः एक उदासी व अवसाद वहाँ देखने को मिलता है। यों, इस उदासी को एक कवि ज्यादा बेहतर समझ सकता है, तभी यह डायरी का हिस्सा बनी। यह हमें सोचने पर मजबूर करता है कि जिस विकसित समाज की ओर दुनिया बढना चाहती है, क्या वह दशा मानवानुकूल है? क्या केवल भौतिक विकास सभ्यताओं के विकास का पैमाना है? जाहिर है, उत्तर ’नहीं‘ होगा। यह डायरी एक सबक मानव सभ्यता को देती है कि जीवन में उत्सवधर्मिता का होना बहुत आवश्यक है। लेखक को भले ही चीन का समाजवादी मॉडल भाता है, लेकिन उससे उत्पन्न होने वाली उदासी व अवसाद मनुष्य का लक्ष्य नहीं हो सकते।

लेखक का इसी प्रकार का सूक्ष्म लेखन इस डायरी का केन्द्र है। यही कारण भी कि लेखक अपनी कवि दृष्टि के साथ पूरी डायरी में बिखरा पडा है। कवि होना, लेखक का सबसे ’आत्मनिष्ठ‘ बिन्दु है। इसके सहारे लेखक ने चीन की कई विविधताओं को देखा है। सांस्कृतिक क्रांति की विफलता से ’मुंगलुंग कविता‘ आयी, जिसका अर्थ ’धुँध‘ है। इन कवियों ने उदासी की कविताएँ लिखीं। चीन में कवि ’शू यूएन‘ की बरसी पर लोग उन्हें याद करते हैं। ३४० ईसा पूर्व उन्होंने आत्महत्या कर ली थी। लेखक को ऐसे में भारत की याद आती है, जहाँ कवियों को याद नहीं रखा जाता।

चीन में दार्शनिक मीमांसा से अधिक व्यावहारिक विचारों को अधिक महत्ता मिलती है। वहाँ के लोग बहुत पढाकू हैं। हालाँकि वे समकालीन चीनी साहित्य पर पश्चिमी विचारों का प्रभाव मानकर ज्यादा मूल्यवान नहीं मानते। किताबों से बाजार पटे रहते हैं। पुस्तकों से दूर रहने वाले भारतीय के लिए यह आश्चर्य का विषय हो सकता है। चीन के अध्ययन-सम्बन्धी रुझानों का वर्णन लेखक की स्वयं की अध्ययनशीलता को भी दिखाता है।

इस बीच लेखक की निजता बार-बार उसे अपने देश व परिवार की याद दिलाती है। अपनी बेटी की याद में रोना और कविता लिखकर आत्म-धिक्कार का भाव। माँ, पत्नी की याद। चीन भले ही लेखक के मन को भाया हो, लेकिन उनका हृदय भारत को ही याद करता है। १७ जून को लेखक ने लिखा है, ’’इस सुंदर, गौरवर्ण, तिरछी आँखों वाले, नंगी टाँगों वाले, गुलाबी गालों और काले घुँघराले बालों वाले, लम्बी नुकीली हीलों पर सुनहरी पेटियाँ, झालरें बाँधे कटि-कटावों से थिरकने वाले देश में भी याद आता है अपना देश। मैं उसकी भोली, बदहाल, मटमैली, उनींदी, ठस्स और हर प्रगति के लिए निरपेक्ष, निश्चिंत जन्दगी को बेहद प्यार करता हूँ और रोता हूँ।‘‘ तमाम समस्याओं के बाद भी अपना देश तो अपना ही होता है, जिसके लिए विदेश में बैठकर एक कवि अकेले में आँसू बहाता है। ’जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी‘ की संवेदना वाले हमारे देश में एक कवि को विदेश की चमक से प्यारी अपने देश की धूल है, तो वहाँ रहते हुए उसके मन की पीडा को समझना मुश्किल नहीं रह जाता है।

विदेश में अपने देश की किसी भी चीज का उल्लेख अपने ’निज‘ का ही हिस्सा होता है। लेखक वहाँ ’चीनी‘ भाषा का सम्मान देख अपनी ’हिंदी‘ के लिए दुःखी होता है। जाहिर है, डायरी विधा की अंतरंगता के कारण लेखक के पूर्वाग्रह भी यहाँ छिपे नहीं रह पाते। लेखक चीन में मानवाधिकार उल्लंघन को पश्चिमी देशों का दुष्प्रचार समझता है, यहाँ तक कि यह ’थेयनानमन चौक‘ की घटना को भी संदेह की दृष्टि से देखता है। मानवता के मानस पर नासूर की तरह मानवाधिकार उल्लंघन को संदेह से देखना वाकई खटकता है। लेकिन लेखक यह जोखिम उठाता है, चाहे इसे जिस रूप में लिया जाए।

इस डायरी की खासियत यह भी कि इसके अंत में कुछ चीनी कविताओं का हिन्दी अनुवाद तथा कुछ लेख भी संकलित हैं। चीनी समाज को समझने की दृष्टि से ये कविताएँ व लेख बेहतरीन साधन का काम करते हैं। इनका अपना अलग से ही महत्त्व है तथा डायरी के साथ पढने पर भी।

डायरी की संरचना में एक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि विभिन्न घटनाओं/अनुभवों के संक्षिप्त अंकन के कारण विश्ाृंखलता आती है। ऐसे में, यह पाठक का कर्त्तव्य है कि वह इन बिखरी हुई कडयों को जोडता चले। डायरी विधा के आस्वादन में यह जरूरी भी है। ’चीन डायरी‘ में इसी तरह चीन का जिक्र चलते-चलते अचानक से घर की याद हस्तक्षेप कर देती है। अंतरराष्ट्रीय घटनाओं का जिक्र करते हुए अचानक से लेखक, खाली बोतलें इकट्ठी करते हुए एक बूढे को देखने लगता है। एकाएक किसी तिब्बती कविता को पढकर अपने ग्रंथ याद आ जाते हैं। इस बेतरतीबी में ही डायरी लिखी जाती है। डायरी ’अनुशासन‘ की विधा नहीं है। कई दिशाओं में उडे जा रहे मानव-मन को लिखने वाली डायरी का गुण अनगढ होना है, सुघडता नहीं। ’चीन डायरी‘ की ’अनगढता‘ इसके आस्वाद में बहुत सहायक है। इसी ’विश्ाृंखलन‘ में एक पूरी तस्वीर हमारे सामने उभरने लगती है।

हिन्दी साहित्य के लिए यह समय इस मायने में सुनहरा है कि अब कथा व कविता से इतर रचनाओं को भी महत्त्व मिल रहा है। डायरी व यात्रा-संस्मरण हमेशा से उपेक्षित रहे हैं, पर जब इस प्रकार की पुस्तकें आती हैं, तब इन विधाओं को पनपने का मार्ग मिलता है। डायरी लेखन, यों इस मायने में मुश्किल काम भी है कि यह नितांत व्यक्तिगत विधा है। ’आत्मकथा‘ उम्र के एक पडाव पर आकर समग्रता में लिखी जाती है; लेकिन डायरी, अनुभव को उसके तत्काल में दर्ज करती है। तत्काल का अनुभव, मनुष्य-मन की कई परतें खोलता है। साथ ही, यात्रा के अनुभव हमें न केवल उस समाज को समझने की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण होते हैं, बल्कि उसके माध्यम से हम इस संसार को समझने की नई दृष्टि प्राप्त करते हैं। डायरी जहाँ भीतर की यात्रा है, यात्रा भीतर से बाहर का संवाद है। ’चीन डायरी‘ में यात्रा-संस्मरण का यह सुयोग, अनदेखे चीन को चीन्हते हुए, लेखक-मन की संवेदना को उकेरते हुए चलता है। साथ ही, इस डायरी में आद्यंत एक झीना कथा-तत्त्व भी है, जिससे रोचकता व पठनीयता भी बराबर बनी रहती है। इन सभी मायनों में यह ’डायरी‘ हमारे लिए एक जरूरी किताब है।

पुस्तक ः चीन डायरी, लेखक ः ऋतुराज, प्रकाशक ः राजपाल एंड संस, मूल्य ः २५०/- (सजिल्द)

असीम ऊर्जावान समीक्षक है। वे दिल्ली विश्वविद्यालय में शोधरत हैं। सम्फ ः कमरा सं. ६६-बी, गवायर हॉल, दिल्ली विश्वविद्यालय, विश्वविद्यालय मार्ग, नई दिल्ली-११०००७