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एक सार्वकालिक कथाकार का स्मरण

राहुल शर्मा
एक कथाकार सर्वकालिक कब होता है अथवा एक कथाकार को सर्वकालिक कब माना जाता है? सर्वकालिका की कसौटी पर कसने के मानक क्या होते हैं? इन तमाम प्रश्नों से जूझना और एक निष्कर्ष पर पहुँचना एक श्रमसाध्य कार्य है। ये प्रश्न विचारों को न केवल उद्वेलित करते हैं अपितु ’अतीत को वर्तमान‘ के संदर्भ में सोचने के लिए भी उकसाते हैं। नवल किशोर की पुस्तक ’प्रेमचन्द का कथा संसार और मानवीय अर्थवत्ता‘ एक ऐसी ही पुस्तक है, जो प्रेमचन्द को सर्वकालिकता की कसौटी पर कसने के साथ ’अतीत पर वर्तमान की दृष्टि‘ से दृष्टिपात करती है। आठ अध्यायों में बँटी यह पुस्तक हिन्दी उपन्यास - प्रेमचन्द का महत्त्व, साहित्य ः मानवीय अर्थवत्ता, प्रेमचन्द और यथार्थवाद के रूप, प्रेमचन्द का यथार्थवादी प्रस्थान और राष्ट्रवाद के अंतर्विरोध, प्रेमचन्द का कथा-साहित्य ः उत्तर-औपनिवेशिक पाठ, प्रेमचन्द की आवाज, गोदान ः दाम्पत्य की अपूर्व गाथा तथा प्रेमचन्द की प्रगतिशीलता - बजरिये नामवर सिंह के मार्फत उन तमाम बिन्दुओं को नए ढंग से सामने लाती है, जिन पर ’चर्चा हो चुकने के बाद भी चर्चा करना‘ बाकी रह गया है।

पुस्तक के आरम्भ में ’विपरीत समय में प्रेमचन्द- स्मरण‘ में लेखक ने पुस्तक के शीर्षक को लेकर अपनी जिस दुविधा का चित्रण किया है, वह लेखकीय ईमानदारी को तो प्रस्तुत करता ही है साथ ही एक ’पोस्ट ट्रुथ‘ गढने वाले प्रवक्ताओं के बीच सर्वकालिक कथाकार की उपस्थिति पर भी उसी ईमानदारी से प्रकाश डालता है। आज इस विपरीत समय में प्रेमचन्द को याद कर लेखक ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर किये जाने वाले हमलों का एक तरह से करारा जवाब दिया है। लेखक का यह उवाच साहित्य पर सत्ता की बढती पकड और एक लेखक के सामने खडी चुनौतियों से अवगत कराता है।

’पीठिका-हिन्दी उपन्यास ः प्रेमचन्द का महत्त्व‘ शीर्षक अध्याय में लेखक द्वारा रवीन्द्रनाथ टैगोर के गोरा और आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के हिन्दी साहित्य के इतिहास की पंक्तियों के जरिए गद्य में नवोत्थानवादी मानववादी चेतना से आरम्भ कर हिन्दी गद्य परम्परा की आरम्भिक विधाओं के साथ उपन्यास का विकास, प्रेमाश्रम, रंगभूमि, गोदान, महाजनी सभ्यता उपन्यासों एवं निबन्ध के माध्यम से प्रेमचन्द का आदर्श से यथार्थ की ओर प्रस्थान, प्रेमचन्दयुगीन एवं प्रेमचन्दोत्तर उपन्यासों में आ रहे बदलावों का तुलनात्मक अध्ययन, हिन्दी उपन्यासों पर पाश्चात्य उपन्यासों का प्रभाव के साथ-साथ साहित्य के मूल्यांकन और नए कथाकारों का अपने अतीत की ओर वापसी की सम्भावना को अभिव्यक्त किया गया।

’साहित्य ः मानवीय अर्थवत्ता‘ शीर्षक अध्याय में लेखक ने साहित्य और मानववाद के अन्तःसम्बन्ध को रेखांकित किया है। अध्याय में मानववादी लेखक के गुणों को मोटे अक्षरों में दर्शाया गया है। अध्याय को पढने के दौरान जो पहला प्रश्न सामने आता है कि आखिर मानववादी लेखक से तात्पर्य क्या है? और प्रश्न का उत्तर कुछ यूँ मिलता है कि ’मानवीय पक्षधरता और स्वतंत्रता के उत्तरदायित्व का वरण करने वाले को मानववादी लेखक की संज्ञा से अभिहित किया जाता है। अध्याय में इस बात के स्पष्टीकरण के लिए लेखक सार्त्र, अब्राहम कम्लान, रूपगत प्रयोगों के संदर्भ में ब्रेख्त आदि के विचारों को लिया है। साहित्य में विमानवीकरण की परिघटना, निरर्थकता के लेखन का सिद्धान्त, रॉबर्ट ग्रिये का सिद्धान्त और उसके खंडन, लेखक का संकट और साहित्य में लेखकों की ईमानदारी आदि पर भी विस्तृत चर्चा की गई है।

’यथार्थवाद कालगति में प्रवाहमान जीवन यथार्थ के चित्रों का एलबम होता है।‘ यथार्थवाद की इस परिभाषा से पाठक पुस्तक के तीसरे अध्याय ’प्रमचन्द और यथार्थवाद के रूप‘ से अवगत होता है। इस अध्याय में यथार्थवाद को लेखक ने आधुनिक पारिभाषिक शब्दावली का सबसे विवादास्पद शब्द माना है और इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के रूप में भक्ति साहित्य को लिया है। यथार्थवाद का सम्बन्ध लेखक के चिंतन से होता है, जो रचना में न केवल उसके चित्रण अपितु उसे चित्रित करने वाली भाषा से भी उजागर होता है। अध्याय का एक महत्त्वपूर्ण बिंदु है, जो यथार्थवाद की परिभाषा में एक नई कडी के रूप में जुडता है। लेखक ने इस अध्याय में यथार्थवाद की परिभाषा, यथार्थवादी साहित्य दृष्टि का आरम्भ, पश्चिमी और प्रेमचन्द के उपन्यासों के केन्द्रीय विषय एवं पात्रों, नाटक एवं कविता में यथार्थवाद, आदर्शवाद, प्रकृतवाद, मनोवैज्ञानिक यथार्थवाद, हिन्दी पर प्रकृतवादी यथार्थवाद पर प्रभाव, मनोवैज्ञानिक बनाम माक्र्सवादी यथार्थवाद, आलोचना पर पडने वाले उनके प्रभावों, जादुई यथार्थवाद, आँचलिक यथार्थवाद, कला और साहित्य पर उत्तर आधुनिकता का प्रभाव आदि का सूक्ष्मता से विश्लेषण किया है।

चौथे अध्याय ’प्रेमचन्द का यथार्थवादी प्रस्थान और राष्ट्रवाद के अंतर्विरोध‘ में प्रेमचन्द के उपन्यासों और कहानियों के माध्यम से उनका ’आदर्श से यथार्थ‘ की ओर प्रस्थान के साथ उन पर राष्ट्रवाद के प्रभाव को अलग-अलग बिंदुओं से प्रकाश डाला गया है। वे बिंंंदु हैं, गोदान में चित्रित यथार्थ, सामाजिक यथार्थवाद, मनोवैज्ञानिक यथार्थवाद और जादुई यथार्थवाद और गैर यथार्थवाद का द्वंद्व, माक्र्सवादी आलोचक के गुण, समाजवादी यथार्थवाद की कमियाँ, गोदान की समाजवादी नजरिये से की गई आलोचना, इस संदर्भ में मन्मथनाथ गुप्त और हंसराज रहबर की आलोचना का तुलनात्मक अध्ययन, सोजेवतन का रचनाकाल और प्रेमचन्द में राष्ट्रवाद का उत्थान, उनकी कहानियों में राष्ट्रवाद, प्रेमचन्द पर राष्ट्रीय राजनीति का प्रभाव आदि।

’प्रेमचन्द का कथा साहित्य ः उत्तर आधुनिक पाठ‘ शीर्षक अध्याय में उत्तर आधुनिक परिप्रेक्ष्य में प्रेमचन्द की रचनाओं पर चर्चा की गई है। जैसा कि हम जानते हैं कि प्रेमचन्द का साहित्य ’साम्राज्यवाद के साथ आंतरिक उपनिवेशवाद के विरोध‘ का साहित्य है। इस सत्य का लेखक ने पुस्तक के इस अंश में प्रेमचन्दयुगीन किसान और वर्तमान किसान की समस्याओं, स्त्री और दलित विमर्श के संदर्भ में प्रेमचन्द का साहित्य तथा उनकी प्रासंगिकता आदि का अध्ययन एक अतीत के लेखक की दौर की मोटी सच्चाइयों के रूप में किया है।

’प्रेमचन्द की आवाज‘ शीर्षक अध्याय के लिए यदि सूत्र वाक्य का प्रयोग किया जाए तो इस अध्याय को ’एक निनाद बाधित चीख को सुनाने वाला कथाकार‘ उपयुक्त होगा। आज का दौर एक ऐसा दौर है, जिसमें सबसे ज्यादा ’अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता‘ है, जो कलम पर मँडरा रहे खतरे की बगलगीर हो कलम को उस खतरे से लडने की शक्ति प्रदान कर रही है। लेखक ने इस अध्याय में प्रेमचन्द साहित्य की विशेषता, प्रगतिशीलता बनाम गाँधीवाद, प्रेमचन्द विरोधियों की आलोचना, युग प्रतिनिधि लेखक के गुण, प्रेमचन्द की भाषिक दृष्टि से सम्बन्धित आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के विचार, प्रेमचन्द का जनपक्षधर रूप, साहित्य की कसौटी और उसका लक्ष्य आदि महत्त्वपूर्ण बिंदुओं को केन्द्र में रखा है।

’गोदान ः दाम्पत्य की एक अपूर्व गाथा‘ अध्याय गोदान के सामाजिक उद्देश्य का विवेचन है। इसमें लेखक ने गोदान उपन्यास के अन्तर्गत प्रेमचन्द की प्रेम विषयक दृष्टि, उनकी मनोवैज्ञानिक दृष्टि, उपन्यास की कलागत उपलब्धि पर चर्चा की ही है, साथ ही एक आह्वान भी किया है कि गोदान की आत्मा में झाँकने के लिए इसमें चित्रित ग्रामीण कथा और शहरी कथा से बाहर निकलना होगा। इस अध्याय में लेखक द्वारा आलोच्य कृति पर नए ढंग से प्रकाश डालने के लिए कुछ प्रश्न ही उठाए गए हैं, जिनका उत्तर भी अध्याय में वह देता चलता है।

पुस्तक के अंतिम अध्याय ’प्रेमचन्द की प्रगतिशीलता बजरिये नामवर सिंह समारम्भ‘ में नामवर सिंह की पुस्तक ’प्रेमचन्द और भारतीय समाज‘ की समीक्षा के साथ इस पुस्तक के परिचय क्रम में पुस्तक में संकलित तीन आलेखों ’जीवन और विचारधारा‘, ’स्वाधीनता संघर्ष और समाजवादी चेतना‘ तथा ’विगत महत्ता और वर्तमान अर्थवत्ता‘ आदि पर समीक्षात्मक टिप्पणी करते हुए ’पाठक उवाच‘ शीर्षक से लेखक ने अपनी आलोचकीय टिप्पणी की है, जो कि बिल्कुल एक नया प्रयोग है। इस अध्याय में उपरोक्त आलेखों के समानान्तर ’प्रेमचन्द और भारतीय कथा-साहित्य में भारतीयता की समस्या‘, ’राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन और प्रेमचन्द‘, ’प्रेमचन्द के वैचारिक अन्तर्विरोध और गाँधीवाद‘, ’प्रेमचन्द ः दृष्टि और कला रचना‘ आदि लेख और उन पर पाठकीय उवाच भी शामिल हैं। गोदान पुनः पाठ, प्रेमचन्द और दलित विमर्श, कहानी लेखन, प्रेमचन्द ः साम्प्रदायिकता विरोध, प्रेमचन्द और टॉलस्टॉय, भारतीय संदर्भ में उपन्यास विधा शीर्षक के अन्तर्गत भारतीय उपन्यास और प्रेमचन्द, उपन्यास का जन्म देश के साथ, ’अंग्रेजी ढंग का नॉवेल‘ और भारतीय उपन्यास, उपन्यास और राजनीति शीर्षक लेखों की उपस्थिति और उन पर दिया गया पाठकीय उवाच पुस्तक की महत्ता में वृद्धि करते हैं। अंतिम आलेख ’उपन्यास और राजनीति‘ में ’बन्दमातरम‘ से जुडे विवाद पर विचार किया गया है।

भाषा की दृष्टि से भी पुस्तक सराहनीय है। आलोचना की भाषा की कसौटी पर यह पुस्तक खरी उतरती है, क्योंकि नवलकिशोर की अनुभव सम्पन्न दृष्टि और भाषा अपने लक्ष्य से कभी अडिग नहीं होती। उन्होंने जो कहना चाहा है, वह दो टूक साफ शब्दों में कहा है। कुल मिलाकर यही कि यह पुसतक एक सर्वकालिक कथाकार को विपरीत समय में स्मरण कर आलोचना की एक नई जमीन तैयार करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

पुस्तक ः प्रेमचन्द का कथा संसार और मानवीय अर्थवत्ता, लेखक ः नवल किशोर, प्रकाशक ः प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली-११०००२, वर्ष २०१९

युवा अध्येता राहुल गंभीर पाठक व समीक्षक हैं।