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पहाड और जंगल की जुगलबंदी से उपजा जीवन राग

डॉ. जगदीश गिरि

हम गद्य बहुल समय के नागरिक हैं। हिन्दी में इन दिनों रचनाकारों का ध्यान गद्य लेखन की ओर विशेषकर कथेतर गद्य की ओर गया है। सभी नये-पुराने लेखक इस क्षेत्र में हाथ आजमा रहे हैं। एक जमाना था, जब गद्य-लेखन के लिए बहुत विशेषज्ञता की आवश्यकता जताई जाती थी और गद्य को कवियों की कसौटी के रूप में प्रचारित किया गया था, लेकिन अब तमाम वर्जनाओं को तोडते हुए गद्य के नित्य-नवीन रूप और रंग सामने आ रहे हैं। पाठकों व आलोचकों द्वारा इन प्रयोगों का स्वागत किया जा रहा है। जिस प्रकार कथेतर गद्य की भंगिमा बदल रही है, वैसे-वैसे विधाओं की सीमाएँ भी टूटती जा रही हैं। अनेक विधाएँ एक-दूसरे के परिसर में आवाजाही कर रही है। पिछले कुछ वर्षों में काशीनाथ सिंह, असगर वजाहत, रवीन्द्र कालिया, राजेश जोशी जैसे ख्यातिप्राप्त कवियों, कथाकारों ने कथेतर गद्य में जो जान फूँकी है, उसी कडी में हाल ही में प्रकाशित प्रसिद्ध कवि लीलाधर मंडलोई की पुस्तक ’राग सतपुडा‘ को देखा जा सकता है।
मध्यभारत (मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र) में विस्तृत प्रसिद्ध पर्वतश्ाृंखला सतपुडा और उसके जंगलों के प्रति अद्भुत आत्मीयता और अनुराग से भरकर लिखी गई यह किताब अपने विधागत रूप में आत्मकथा, डायरी, संस्मरण, रेखाचित्र, यात्रा-वृत्तांत आदि अनेक विधाओं में आवाजाही करती नजर आती है। बकौल लेखक, ’कोई एक विधा नहीं अपितु विधाओं की जुगलबंदी। इसका कोई नाम नहीं। यह कोलाज है अटपटा और अबूझ। इस लेख में कोई कथा-संगति नहीं, सिवाय सतपुडा के, जो अनेक रूप लिये साथ है।‘ (पृ. ०७)
इस असंगति का कारण है कि लेखक ने इसे एक ही लय में नहीं लिखा है, बल्कि अलग-अलग समयों पर दर्ज किए गए कुछ नोट्स हैं जो स्मृति के कोमल तंतु से जुडे हुए हैं। लेकिन इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण है वह गहरी संवेदना और प्रेम, जो पाठक को अपने साथ बहाकर उस आदिम-राग से ले जाकर जोड देता है, जो उसे प्रकृति के प्रत्येक कण-कण के प्रति सम्मोहन से भर दे। उस अनंत सौंदर्य पर बलिहारी होने को जी चाहे, उसमें डूब जाने और उस सौंदर्य को अपने भीतर भर लेने को जी चाहे। यही आदिम-राग इस कृति को संगति देता है और कभी न भूलने वाली रचना बना देता है।
विकास के नाम पर दुनियाभर में प्रकृति का अंधाधुंध दोहन हो रहा है, जिससे मौसम का मिजाज बिगड गया है। अनेक दुर्लभ वनस्पतियाँ और जीव-जन्तु नष्ट हो गए हैं। जैव-विविधता को भारी नुकसान पहुँचा है। जलस्रोतों का निरन्तर क्षय हो रहा है। पवित्र नदियाँ, झीलें सब प्रदूषित हो रही हैं। जलीय जीव-जन्तुओं का साँस लेना भी मुश्किल हो गया है। ’सतपुडा‘ के बहाने लेखक ने पूँजी-केन्द्रित विकास पर चिन्ता जताते हुए पहाडों और जंगलों को बचाने की पैरवी की है। यद्यपि इस घोर बाजारवादी युग में जीव-जन्तुओं, नदी-नालों, पर्वतों, आदिवासियों, जडी-बूटियों, जंगली फलों की बात करना तथाकथित सम्भ्रांत वर्ग को अटपटा और हास्यास्पद लग सकता है पर लेखक को इसकी चिंता नहीं, ’’मेरा स्वभाव कुछ अलग है। मैं उस दिशा में नहीं भागता जिधर सब। मैं नर्मदा इलाके का हूँ। नर्मदा ’माई‘ भी ऐसी ही है। दूसरी नदियाँ पूर्व को बहती है तो यह पश्चिम की तरफ।‘‘ (पृ. ०९) लेखक के इसी स्वभाव का नतीजा है कि उसे बचपन में पढे गये पाठ ’अमर घर चल‘ से घोर असहमति है, क्योंकि ’जो प्रकृति के साथ सीखा जा सकता था, वह घर में नहीं।‘ (पृ. ११) इसी रोचक प्रसंग के द्वारा एक बहुत गहरी और जरूरी बात की तरफ वे संकेत कर देते हैं, जो आज के समाज की सबसे बडी चिन्ता है। असल में नई पीढी का जुडाव प्रकृति से इसलिए नहीं रह गया है कि उनके पास प्रकृति के साहचर्य में रहने का अनुभव ही नहीं है। मशीनों और इलेक्ट्रोनिक उपकरणों के बीच रहते-रहते नई पीढी यंत्र में तब्दील होती जा रही है। उसे न रंगों की पहचान है, न गंध की। उनकी अपनी कोई भाषा नहीं है। इसलिए उनका अपना कोई सौंदर्यबोध भी नहीं है। ऐसे में नई पीढी एक ऐेसे संसार से परिचित ही नहीं हो पा रही है, जो बेहद सुंदर, मादक और सुहावना है - ’’आज के बच्चों के पास सृष्टि की स्मृतियाँ इतनी कम। अपने जन्म की भाषा से इतनी दूरी और अंग्रेजी भी तो उनकी अपनी भाषा नहीं, न ही उसका साहित्य ऐसा कि स्थानीयता से मेल खा सके। सो विदेशी साहित्य के ऐसे अनुभव, जिनका इस जमीन से कोई राग नहीं, सो रटना शेष। अर्थ तो वही होगा जिसकी सीमा शिक्षक तय कर दें। ऐसा नहीं कि प्रौद्योगिकी से बच्चों को कुछ मिला न हो। वह मिला है और मिलता रहेगा। दुनिया की तमाम खिडकियाँ खुली हैं ज्ञान के साथ। (परन्तु) उनके यथार्थ और सौन्दर्य बोध की भी खिडकी खुली रहे ताकि ऐन्द्रीय व्यवस्था जीवन्त बनी रहे।‘‘ (पृ. १२) दरअसल लेखक का संकेत भारतीय शिक्षा-प्रणाली के औपनिवेशिक स्वरूप पर है। आजादी के इतने बरसों बाद भी हमारे बच्चों को इस औपनिवेशिक साजिश से मुक्ति नहीं मिल पाई है, जो उन्हें अपनी जडों से ही बेदखल कर रही है।
रोजगार की तलाश में आसपास के इलाकों तथा सुदूर दक्षिण के इलाकों से कामगार यहाँ आकर बस गए हैं, जो यहाँ के आदिवासियों से घुल-मिल गए हैं। ’एक अद्भुत मिश्रित संस्कृति‘। लेखक के माँ-बाप भी इसी तरह विस्थापित होकर होशंगाबाद से छिंदवाडा आए। वहीं जंगलों के बीच लेखक का बचपन बीता। लेकिन लगातार अवैध खनन से खोखले हो चुके सतपुडा में पर्याप्त रोजगार नहीं होने के कारण ’विस्थापित होकर यहाँ आए लोग इस धरती को छोडकर जा रहे हैं, बेहतर जीवन की तलाश में। एक बार और विस्थापन। सतपुडा भी उनके साथ अब दूर हो रहा है, शनैः शनैः विस्थापित।‘ यह अंतहीन प्रक्रिया है। लगातार विस्थापन और लगातार प्राकृतिक सम्पदा का क्षरण। इससे आदिवासियों पर भी भारी संकट है। जंगल नहीं रहने पर वे कहाँ जाएँगे? पर्यटन के नाम पर आने वाले तथाकथित सम्भ्रांत और सभ्य लोग भी आदिवासियों के लिए किसी आपदा से कम नहीं हैं। लेखक ने व्यंग्य शैली में इसे उजागर कर दिया है, ’’आओ बाबू साहब आओ। जितना चाहो लूटो खाओ। किस बैरी की ये कुचाल है। हमरौ जीबौ तक मुहाल है।‘‘ (पृ. १५७)
अनेकानेक स्मृति-खण्डों के सहारे लिखी गई इस किताब के विविध आयाम हैं। इसमें एक तरफ जंगल का सौंदर्य है, पशु-पक्षियों की क्रीडाओं का सम्मोहक वर्णन है। जंगल, पहाड व नदी में उतरते अलग-अलग मौसमों का दृश्यांकन है तो दूसरी ओर महानगरीय जीवन से उपजी पीडा, संत्रास और अकेलापन है, जिससे लेखक प्रतिदिन जूझता है और सुकून की तलाश में बार-बार सतपुडा की ओर लौटता है। अपने बचपन के मुश्किल हालातों का जिक्र करते हुए भी उस जीवन के आकर्षण से बेतरह खिंचाव महसूस करते हुए आत्मकथात्मक शैली में बचपन के किस्सों को रस ले-लेकर वर्णित किया गया है। लगे हाथ रिलायन्स, पेप्सी-कोक, लव-जेहाद, स्मार्ट-सिटी के नाम पर व्यंग्य करते हुए आदिम सहजता और विकास की राजनीति को एक-दूसरे के बरक्स खडा करके पूँजीवादी षड्यंत्रों का पर्दाफाश किया गया है।
बहरहाल, यह पुस्तक सतपुडा के सौंदर्य के साथ-साथ अपने कवित्वपूर्ण गद्य के लिए भी पढी जानी चाहिए। कुछ अध्याय तो अपनी आंतरिक लय और छंद के कारण शुद्ध कविता ही हो गए हैं। उन्हें बाकायदा लयात्मक ढंग से पढा जा सकता है। बानगी के तौर पर एक अंश देखा जा सकता है - ’’परो अकाल बिपत भई गहरी। उगलत-लीलत पीर घनेरी। मर-खट अपनों रक्त बहाओ। सूदखोर से उबर न पाओ। ऐसो बुरो समैया आओ। भटा-भात भी खा न पाओ।‘‘ (पृ. १५६)
पक्षियों, फूलों, तितलियों, पेडों, पादपों, मधुमक्खियों तक के न्यारे और अनूठे विवरण, गहरी आत्मीयता से वर्णित किए गए हैं, जो प्रकृति से दूर हो चुकी आधुनिक पीढी के लिए किसी जीवंत अहसास से कम नहीं है। आम, बेर, सीताफल, इमली, बरगद, अरंडी, गूलर, कल्पवृक्ष उर्फ गौरख इमली, चौसिंगा, बारहसिंगा, बाघ-बाघिन के प्रेम आदि पर एक-एक अध्याय लिखे गए हैं, जो पाठक को प्रकृति के प्रति आत्मीय-राग से भर देते हैं। पहाड और जंगल की जुगलबंदी से उपजा यह जीवन-राग पाठक के भीतर बहुत देर तक गजता रहता है, जो प्रकृति को रुककर-ठहरकर, आँख-भर देखने और साँस-भर पी लेने को प्रेरित करता है।
पुस्तक ः राग सतपुडा, लीलाधर मंडलोई, बोधि प्रकाशन, जयपुर, पृ. १८०, मूल्य १५०/-
पठन-पाठन से जुडे जगदीश गिरि जिम्मेदार टिप्पणीकार के साथ-साथ साहित्य अध्येता भी ह। सम्फ ः असिस्टेंट प्रोफेसर-हिन्दी, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर