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साँस लेने के लिए संघर्षं

गिरधर राठी
कविता की एक अनूठी और शायद अकाट्य परिभाषा यही हो सकती है ः
समकालीन कविता का अर्थ है
साँस ल के लिए संघर्ष
पौलेंड के कवि तादेऊष सृजेविच (१९२१-२०१४) ने बोझ हल्का करते वे शीर्षक कविता में ये शब्द उन के अपने कठोर-कठोर जीवन से पाए होगें। पहले विश्वयुद्ध की विभीषिका से वह जीवन अभी उबरा भी नहीं था कि दूसरा विश्वयुद्ध एक और बडा महाविनाश ले आया। और उसके बाद ’’मुक्त‘‘ होने के बाद भी साम्यवाद के अत्यंत विकृत रूप वाली शासन-प्रणाली में उन्हें जीना पडा। लगभग यही हाल ज्बीग्निए हेर्बेर्त, सिम्बोस्का और चेस्वाव मीवोश का भी था। हेर्वेर्त की काव्यकला- जैसा कि कुँअर नारायण ने रेखांकित किया है- जटिल या संश्लिष्ट है, हालांकि उनके यहाँ भी रुजेविच या सिम्बोस्र्का की तरह अत्यंत सरल दीखने वाली कविताएँ मौजूद हैं। अनुवाद करते समय कुँअर नारायण ने पाया कि यह प्रतीयमान सरलता बहुत भ्रामक है, और जिन गहराइयों एवं द्वद्वों से छनकर यह ’सरलता‘ ऊपर आती है, उन्हें खुद महसूस किए बगैर दिया जाने वाला अनुवाद भ्रामक होगा।
हम अपने देश में उस उन्माद की, और उसके परिणामों की कल्पना तक नहीं कर सकते जिसे खास तौर पर यूरोप और कुछ अफ्रीकी-अरब देशों ने बीसवीं सदी में भोगा था; न ही उस यातना, विस्थापन और नरसंहार की, जो आज भी दुनिया के कई देशों में जारी है। पहले और दूसरे विश्वयुद्ध में हमारे देशवासियों ने लाखों की संख्या में अंग्रेज सरकार की गुलामी करते हुए अनेक मोर्चों पर जान दी थी- और अपने शौर्य का लोहा भी मनवाया था। लेकिन उसने कहा था (गुलेरीजी) जैसी एक-दो कहानियाँ के अलावा शायद ही जनजीवन में उन बीहड, विकट दौरों की कोई छप पडी हो- न आपसी चर्चाओं से निकली किंवदंतियों में, न साहित्य-कला की अभिव्यक्तियों में।
इसलिए सरल-सादी दीखती अंग्रेजी कवि गैविन एवार्ट (१९१६-९५) की इन पंक्तियों का मर्म हम किसी विशिष्ट कल्पना शक्ति की परकाया-प्रवेश एवं पर-पीडा को आत्मसात करने की दुलर्भ आंतरिकता के बल पर ही शायद ग्रहण कर पाएँगे;
तत्काल नफरत बहुत आसान है।
तुम्हारी जात-पाँत को लेकर
या बोली अटपटी लगे
तुम जिसे शिष्ट समझो
किसी को चिकनी-चुपडी लगे
मगर याद रखो, हत्यारे तक अपने को
बुरा नहीं समझते।
हिटलर का ख्याल था कि वो जर्मनी की मदद कर रहा है।
कुत्सित यहूदियों और दगाबाज वापंथियों को मारकर।
उसने कभी नहीं सोचा होगा कि वह भयानक है।
इसे हम अपना सौभाग्य ही समझें कि भारत विभाजन और उसके बाद हुई तीन-चार भीषण रक्तपात की वारदातों के बावजूद हम किसी कदर भाईचारे के माहौल में साँस ले पा रहे हैं। वरना हिटलर, उसकी जर्मनी और नफरत फैलाने वाली उसकी कारगर मुहिम की जो छाया यहाँ-वहाँ अपने देश में मँडराती दीखती है, वह किसी भी अर्थ में चैन देने वाली नहीं कही जा सकती।
न सीमाएँ न दूरियाँ ः विश्व कविता से कुछ अनुवाद में कुँवरनारायण ने देश और काल के परिमाण में एक बहुत ही व्यापक फलक हमें दिया। निधन से कुछ ही पहले २०१७ में प्रकाशित इस संग्रह में एक तरह से कुँवर नारायण ने अपने जीवन के ६०-७० साल के अनुवाद-कर्म की कुछ झलक दी है। बहुत कुछ अब भी अप्रकाशित रह गया, क्योंकि जरूरी संदर्भ (मूल शीर्षक इत्यादि) इस अंतराल में कहीं खो गए हैं।
सारे अनुवाद कविता के ही नहीं हैं, कुछ छिटपुट अवोंतर प्रसंग भी है, जिन से कुछ कवियों पर, या उनकी कुछेक कविताओं पर या उनके काव्यों के कुछ पन्नों पर ख्ाास रौशनी पडती है। (जैसे हेर्लन, क्लिआपैट्रा, विअट्रिस) होमर, सैफो, दान्ते से लेकर कवाफी, रिल्के, ब्रेख्त, बोर्हेस, अत्तिलॉ, योजेफ, गुंटरग्रास, वॉलकॉट, टेड ह्यूज आदि, आदिम कवि से अधुनातन नोबेल-विजेताओं तक किस्म-किस्म की बानगी यहाँ है।
सभी अनूदित रचनाओं में एक तत्त्व निरपवाद ढंग से मिलता है ः चाहे क्लासिकी शिल्प हो या रूमानी शैली हो- लगता है कवि स्वयं या अपने पात्रों के माध्यम से जो कह रहा है उसमें ’’सच्चाई‘‘ है। ’’कविता का सत्य‘‘ एक ऐसा प्रत्यय है जिस की नाप-जोख काफी दुष्कर है। फिर भी श्रोता या पाठक शायद अपने सहज-बोध से यह तत्त्व पकड लेता है ः कोरे मनोरंजन या स्वांग के तहत लिखा गया कवित्त, और मर्म से निकली कविता का भेद बहुत देर नहीं छिपता। बेशक, हमें इस की पहचान कराने में काव्येतर कई उपकरण भी मदद करते हैंः कविता का देशकाल, कवि की जीवनी और जीवनानुभव, इतिहास-भूगोल के प्रासंगिक ब्योरे- इत्यादि। मगर फिर भी कसौटी का कोई अंश कुछ उसी तरह गोपनीय रहा आता है, जिस तरह कविता-लेखन की अंतः प्रक्रिया।
न सीमाएँ न दूरियाँ अनेक भाषाओं के रचना-वितान कुछ अंशों का भी परिचय हमें देती है। खुद कुँवरनारायण हिन्दी, उर्दू, अंग्रेजी के अलावा फ्रांसीसी और संभवतः पोलिय आदि कुछ अन्य भाषाओं के भी अध्येता रहे हैं। उनके प्राक्कथन और रेवाता चेकाल्सका के साथ भेंटवार्ता से पाठकों को कविता तथा अनुवाद के अलावा इतिहास पुराण, मिथक, समकालीनता इत्यादि
के बारे में भी कई बहुमूल्य सूत्र मिलेंगे। कवि- कथाकार गीत चतुर्वेदी ने अनुवाद के अनेक आयामों पर बहुत आकर्षक तथा विद्वत्तापूर्ण विचार किया है, जो अपने आप में पठनीय है।
इस संग्रह के माध्यम से विश्व के कवियों की रचनात्मकता के कुछ चौंकाने वाले संदर्भों को भी कुँवरनारायण की दृष्टि से देखा जा सकता है।
समीक्षा पुस्तक ः न सीमाएँ न दूरियाँ ः विश्व कविता से कुछ अनुवाद
लेखक ः कुँवर नारायण
प्रकाशक ः वाणी प्रकाशन, २०१७
पृष्ठ ः २८५
मूल्य ः ३९५/- (पेपर बैक)

विश्व साहित्य के गहन अध्येता कवि, आलोचक, विचारक, सम्पादक और अनुवादक गिरधर राठी अपने अनुवादों के लिए पहचाने जात हैं।