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सपने में माँ और सुन्दरकांड (राजस्थानी ललित निबन्ध)

मालचन्द तिवाडी
एक रात की ब्रह्मवेला में मेरी दिवंगत माँ ने मुझे स्वप्न में दर्शन दिए। वही भोला, मुस्कुराता मुख और धवल वेश की लुका-छिपी में दमकता कोमल गात। सपनों का अपना उजाला, अपना अँधेरा हुआ करता है। कुछ दीखता है, कुछ नहीं दीखता। मानो किसी मंदिर के गर्भगृह में रखे नन्हे-से घी के दीपक का उजास, जिसमें देव-मूर्ति भी दिखलाई पडती है और उसके चतुर्दिक उमडता अँधियारा भी। इसी उजाले के दम पर अनुमान करता हूँ कि माँ कदाचित् किसी खटिया पर बैठी थी। खटिया की ईसें बाँस की बनी थीं। मुझे माँ की अर्थी के बाँसों का स्मरण होने लगा। अर्थी पर चढकर जाने के बाद माँ सपनों के सिवा लौटकर कभी नहीं आई। हनुमानजी के साथ मेरा नाता माँ ने ही जोडा था। माँ भगवान राम और हनुमानजी की अनन्य भक्त थी। घर पर प्रतिवर्ष भाद्रपद मास में मडली को बुलाकर सुंदरकांड का संगीतमय पाठ करवाती थी। स्वर्गीय पिता की छोडी हुई सम्पत्ति का किराया ही माँ और मेरे भरण-पोषण का आधार था। मेरे पिता का स्वर्गवास मेरी डेढ बरस की और उनकी बावन बरस की उम्र में ही हो गया था। मैं जब कभी अपना बचपन याद करता हूँ, केवल माँ ही माँ नजर आती है। माँ तेज-तेज कदमों से चल रही है, मैं पीछे-पीछे माँ का हाथ या पल्लू थामे लटकता-सा चल रहा हूँ। पर माँ जा कहाँ जा रही है? माँ का गंतव्य ही मेरा गंतव्य। लक्ष्मीनाथजी का मंदिर, नृसिंहगिरीजी महाराज की कथा अथवा लोकदेवता हरिरामजी का थान - माँ की अधिकतर यात्राओं की यही गिनी-चुनी मंजिलें हुआ करती थीं। भैरव का थान तब, जब म रात को नींद में बिस्तर गीला कर देता था। कभी रास्ते में साँप नजर आ जाता, तो माँ गोगाजी अथवा हरिरामजी के थान पर भी शीश नवा लाती। घर में बिच्छु निकल आता, तब भी वही बात। साँपों को माँ ’प्रलयकाल के जीव‘ कहा करती और बिच्छु, भिड, मधुमक्खी आदि को साँपों के साथ मिलाकर ’अहरू-काँटा‘। माँ का यह ’अहरू‘ संस्कृत के ’अहि‘ का ही देशज रूपान्तरण था। माँ की मेरे साथ व्यवहार की अपनी एक निजी और निराली भाषा थी। कह सकते हैं, माँ की वह भाषा मेरे लिए उनके हृदय से निसृत एक नदी थी; वह भाषा किसी नदी के समान ही मुझे दिखाई भी देती थी और सुनाई भी पडती थी। इसी भाषा में माँ ने एक दिन कहा, ’’जहाँ राम, वहीं अयोध्या‘।‘ और ऐसा लगा मानो राम और अयोध्या दोनों मुझे ये शब्द सुनने के साथ ही प्रत्यक्ष दिखाई भी पड गए।

अयोध्या शब्द का अर्थ होता है जिसे युद्ध में कोई जीत नहीं सकता; जिसके साथ युद्ध सम्भव नहीं। माँ स्वयं अयोध्या थी और मुझे अपना राम स्थापित कर रखा था। माँ की कोख से एक दर्जन ऊपर दो, पूरी चौदह संततियों ने जन्म लिया। पाँच बहिनें और हम तीन भाई जीवित रहे। मैंने अपनी माँ की चौदहवीं संतान के रूप में जन्म लिया था - अंत ही अंत में। विनोद के व्यसन का मारा मैं कहा ही करता हूँ कि मुझमें और गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर में भले ही कुछ और बराबरी की बात न हो, एक बात तो है ही; वह यह कि वे भी अपने माता-पिता की चौदहवीं संतान थे और मैं तो आफ सम्म्ुख उपस्थित ही हूँ। खैर, माँ मुझे बडा करने की राह में मुझे बिल्ली की तरह जगह-जगह लिये फिरी। मेरा अधिकांश बचपन माँ-माँ पुकारते ही बीता।

ठीक श्री रामकृष्ण परमहंस के शब्दों में, ’’व्याकुल होकर उन्हें पुकारना चाहिए। बिल्ली का बच्चा ’मिऊँ-मिऊँ‘ करके माँ को पुकारता भर है। उसकी माँ जहाँ उसे रखती, वहीं वह रहता है - कभी राख की ढेरी पर, कभी जमीन पर, तो कभी बिछौने पर। यदि उसे कष्ट होता है तो बस वह ’मिऊँ-मिऊँ‘ करता है और कुछ नहीं जानता। माँ चाहे जहाँ रहे ’मिऊँ-मिऊँ‘ सुनकर आ जाती है।‘‘ (श्रीरामकृष्ण वचनामृत, भाग-१, परिच्छेद-२, पृष्ठ-१०, मार्च १८८२)

माँ अपने स्वामी के खरीदे दो घर रहते भी अनेक बरस बेघर रही। माँ बेघर हुई, मगर मेरा तो वह स्वयं ही घर थी। माँ ने अपने द्वारा स्थापित इस पितृविहीन राम पर से भरोसा नहीं गँवाया। लोग कुछ-न-कुछ कहते रहते। जवाब में माँ इतना ही कहती थी, ’’मेरा तो भाई जहाँ राम, वहीं अयोध्या!‘‘

आज मैं माँ की बात को ही उलटकर कह रहा हूँ, जहाँ माँ, वहीं राम! माँ को हम संज्ञा मानते हैं, पर असल में ’माँ‘ शब्द सर्वनाम हुआ करता है। ईश्वर को हम ’वह‘ कहते हैं और माँ को भी ’वह‘। ’वह‘ कहे सो भी ठीक और ’वह‘ करे सो भी ठीक। माँ के निमित्त से बात आज सुन्दरकांड की करनी है। सुंदरकांड रामायण के पाँचवें कांड का नाम है। कोई पूछ सकता है, कौन-सी रामायण? वाल्मीकि की या तुलसीदास की? इन दो के नाम तो प्रायः सभी जानते हैं, किन्तु राम की कथा को ही यदि रामायण कहें तो उनकी गिनती का कोई अंत नहीं। ए.के. रामानुजन का एक प्रसिद्ध निबन्ध है - श्जीतमम भ्नदकतमक त्ंउंलंदें रू थ्पअम म्गंउचसमे ंदक जीतमम जीवनहीजे वद ज्तंदेसंजपवदश्। वे बताते हैं कि कई रामायणों के अंत में यह सवाल पूछा जाता है कि आज पर्यन्त कितनी रामायणें हो चुकीं? इसका उत्तर किसी के पास नहीं मिलता। रामानुजन इसके उत्तर में एक कहानी सुनाते हैं। कहानी इस प्रकार है -

एक दिन राम अपने दरबार में सिंहासन पर विराज रहे थे कि अँगुली से फिसलकर उनकी अँगूठी जमीन पर गिर गई। जैसे ही जमीन पर गिरी उसी जगह एक छिद्र हो गया और अंगूठी उसमें से पाताल तक चली गई। रामजी के विश्वस्त सेवक हनुमान उनके चरणों में बैठे थे। राम ने कहा, ’’हनुमान, जरा देखना, मेरी अँगूठी कहाँ चली गई?‘‘ राम के कहने के पश्चात् हनुमान को विलम्ब कहाँ! उनको तो अणिमा-महिमा आदि सभी सिद्धियाँ प्राप्त थीं। सो उन्होंने तत्काल सूक्ष्म रूप धरा और उस छिद्र में उतर गए। वे उतरते गए, उतरते गए, उतरते गए और अकस्मात् पाताल लोक में जा उतरे। वहाँ मौजूद स्त्रियों ने उन्हें देखा, ’’अरे! यह नन्हा-सा बंदर कहाँ से आया? शायद ऊपर से आ गिरा है।‘‘ इसके बाद उन्होंने हनुमान को पकडकर एक थाली में रख दिया। पाताललोक के राजा को नये-नये जानवर खाने का बडा शौक था। सो हनुमानजी को उसके रात्रिभोज में पेश किया गया। हनुमान थाली में बैठे सोचने लगे, अब क्या किया जाए

पाताललोक में यह सब हो रहा था और इधर मृत्युलोक में रामजी अपने सिंहासन पर विराजमान थे। वशिष्ठ मुनि और ब्रह्मा राम से मिलने आए। उन्होंने कहा, ’’राम, हम तुमसे एक विशेष वार्ता करने आए हैं। हम नहीं चाहते कि कोई अन्य व्यक्ति हमारी वार्ता को सुने अथवा बीच में बोले। क्या तुम हमारे साथ वार्ता को सहमत हो?‘‘

’’शत-प्रतिशत‘‘, राम ने कहा, ’’जैसे आप चाहें!‘‘

तब उन्होंने कहा, ’’पहले एक नियम स्थापित करो। हमारी वार्ता के बीच आने वाले का सिर काट दिया जाए!‘‘

’’ऐसा ही होगा।‘‘ राम ने कहा।

अब दरवाजे पर प्रहरी किसे बनाया जाए? हनुमान तो अँगूठी खोजने गए थे। राम को लक्ष्मण से अधिक भरोसा किसी पर न था। उन्हने लक्ष्मण को द्वारपाल बनाकर आज्ञा पारित की, ’’अपना सिर कंधों पर लिये किसी को भीतर मत आने देना।‘‘

लक्ष्मण द्वार पर खडे थे कि विश्वामित्र आ पहुँचे। कहा, ’’मुझे अभी इसी क्षण राम से मिलना है, बहुत जरूरी काम है।‘‘ लक्ष्मण ने कहा, ’’अभी आप अंदर नहीं जाएँ। वे वार्ता कर रहे हैं। जरूर कोई गंभीर विषय है।‘‘

’’ऐसा कौन-सा विषय हो सकता है, जिसे राम मुझसे छिपाएँ?‘‘ विश्वामित्र ने कहा, ’’फिर तो मुझे अवश्य वार्ता में शामिल होना चाहिए।‘‘

लक्ष्मण ने विनयपूर्वक कहा, ’’आपको भीतर भेजने से पूर्व मुझे उनकी अनुमति लेनी होगी।‘‘

’’तो जाओ, तुरन्त लेकर आओ।‘‘

’’राम के बाहर पधारने तक मैं भीतर नहीं जा सकता। आपको थोडी देर प्रतीक्षा करनी होगी।‘‘

’’तुम अनुमति लेने भीतर नहीं गए तो मैं इस समूचे अयोध्या राज्य को अपने शाप से भस्मीभूत कर डालूँगा।‘‘ विश्वामित्र बिफरते-से बोले।

लक्ष्मण ने सोचा - भीतर गया तो मेरी मृत्यु निश्चित है। पर न गया तो क्रोधित विश्वामित्र सचमुच अयोध्या को भस्म कर डालेंगे। सारी प्रजा, समस्त जीव-जंतु एक साथ मारे जाएँगे। भलाई इसी में है कि मैं अकेला ही प्राणोत्सर्ग कर दूँ। यह सोचकर लक्ष्मण भीतर चले गए।

राम ने कहा, ’’क्या हुआ?‘‘

’’विश्वामित्र पधारे हैं।‘‘

’’उन्हें भीतर क्यों नहीं ले आए?‘‘

विश्वामित्र भीतर आए। वार्ता समाप्त हो चुकी थी। ब्रह्मा और वशिष्ठ राम से यह कहने आए थे ंकि मृत्युलोक में उनकी कार्यावधि पूर्ण हो चुकी। अब उन्हें रामावतार का त्याग करते हुए यह शरीर छोडकर अपने मूल स्वरूप में लौट जाना चाहिए। वे यही संदेश देने आए थे।

लक्ष्मण ने राम से कहा, ’’भाई, आप मेरा सिर काट डालें।‘‘

राम ने पूछा, ’’क्यूँ भला? हमारी वार्ता तो तुम्हारे भीतर आने से पहले ही पूरी हो चुकी थी।‘‘

लक्ष्मण बोले, ’’आप यह भेदभाव नहीं कर सकते। आप मुझे अपना भाई समझकर छोड नहीं सकते। इससे तो राम का नाम कलंकित हो जाएगा। आपने तो अपनी पत्नी को भी क्षमा नहीं किया, उसे भी वनवास दे दिया था। मुझे भी दंड मिलना चाहिए, अन्यथा मैं अयोध्या छोडकर चला जाऊँगा।‘‘

लक्ष्मण भी शेषनाग के अवतार थे। उनका समय भी पूरा हो चुका था। वे सीधे सरयू-तीर पहुँचे और सरयू के बहते जल में ओझल हो गए। लक्ष्मण अपने मूल शरीर में जा पहुँचे तब राम ने अपने समस्त निकटस्थों को बुला भेजा। विभीषण, सुग्रीव आदि की उपस्थिति में लव-कुश का राजतिलक हुआ और स्वयं राम ने भी सरयू नदी में जल-समाधि ले ली।

इस पूरे घटनाक्रम के दौरान, हनुमान पाताललोक में थे। आखिरकार वे भूतराज के हाथों में जा पहुँचे। कुछ और न सूझा तब जप करने लगे - ’’राम...राम...राम...राम...‘‘

भूतराज ने पूछा, ’’कौन हो तुम?‘‘

’’मैं हनुमान।‘‘

’’हनुमान? तो यहाँ क्यों आए?‘‘

’’मेरे राम की अँगूठी छिद्र में जा गिरी, मैं उसे लेने के लिए आया हूँ।‘‘

भूतराज ने इधर-उधर देखकर एक बडे थाल की ओर इशारा किया। उस थाल में हजारों अँगूठियों का ढेर लगा था। वे सारी अँगूठियाँ राम की थीं। भूतराज ने थाल उठाकर हनुमान के सम्मुख रख दिया और कहा, ’’इनमें से अपने राम की अँगूठी पहचान ले और ले जा!‘‘

वे तमाम अँगूठियाँ एक सरीखी थीं। ’’मैं तो नहीं पहचान सकता कि इनमें मेरे राम की अँगूठी कौन-सी है?‘‘ हनुमान ने गर्दन हिलाते हुए कहा।

भूतराज ने बताया, ’’जितनी इस थाल में अँगूठियाँ पडी हैं, उतने राम तो अब तक हो चुके। तुम धरती पर पहुँचोगे, तो तुम्हें तुम्हारा राम भी नहीं मिलेगा। राम के इस अवतार का समय भी पूरा हो चुका है। जब कभी राम के अवतार का समय पूरा होता है, उसकी अँगूठी फिसलकर यहाँ आ जाती है। मैं उन अँगूठियों को सम्भालकर रखता हूँ। अब तुम जा सकते हो।‘‘

सो हनुमान ने वहाँ से विदाई ली।

इस कहानी का अभिप्राय यह है कि ऐसे प्रत्येक राम की अपनी एक रामायण हुआ करती है।

इस हिसाब से माँ की भाषा को दोहराऊँ तो कहना होगा कि जहाँ राम, वहाँ रामायण। पर यह राम होता क्या है? महर्षि वाल्मीकि ने अपनी रामायण में राम की एक शानदार पहचान अंकित की है - रामो विग्रहवान धर्मः। अर्थात् राम धर्म के मूर्तिमंत रूप हैं। वाल्मीकि ने इसे सिरजा कैसे!

इस प्रश्न का उत्तर हमें उनकी रामायण के आरम्भ में ही मिल जाता है। वाल्मीकि अपनी कथा का आरम्भ करने से पूर्व एक प्रश्न खडा करते हैं -

’चारित्र्येण च को युक्तः?‘

इस मनुष्यलोक में चरित्र से सम्पन्न कौन हैं? वाल्मीकि की रामायण का उद्भव इसी उदात्त जिज्ञासा की कोख से होता है। जितने प्रकार के अन्यान्य गुण मनुष्य में हो सकते हैं, वे सब-के-सब इस एक शब्द-चरित्र में समा जाते हैं।

यदि ध्यान दें, तो मालूम होता है कि गोस्वामी तुलसीदासजी का भी सर्वाधिक बल इसी चरित्र पर ही रहा है। उन्होंने लोकभाषा अवधी में अपने काव्य की रचना की, किन्तु उसका नामकरण संस्कृत में किया - रामचरितमानस। राम के चरित्र का मानसरोवर। उन्होंने अपने समूचे कथा-प्रबन्ध में भी इसी रूपक का आद्यंत निर्वाह किया है -

सुमति भूमि थल हृदय अगाधू।

बेद पुरान उदधि घन साधू।।

बरषहिं राम सुजस बर बारी।

मधुर मनोहर मंगलकारी।।

लीला सगुन जो कहहिं बखानी।

सोई स्वच्छता करइ मल हानी।।

प्रेम भगति जो बरनि न जाई।

सोइ मधुरता सुसीतलताई।।

सो जल सुकृत सालि हित होई।

राम भगत जन जीवन सोई।।

मेधा महि गत सो जल पावन।

सकिलि श्रवन मग चलेउ सुहावन।।

भरेउ सुमानस सुथल थिराना।

सुखद सीत रुचि चारु चिराना।।

दोहा

सुठि सुंदर संबाद बर बिरचे बुद्धि बिचारि।

तेइ एहि पावन सुभग सर घाट मनोहर चारि।।३६

(रामचरितमानस, बालकांड)

अर्थात् सुंदर (सात्विक) बुद्धि भूमि है और हृदय ही उसका गहरा स्थान है। वेद-पुराण समुद्र हैं और साधु-संत मेघ हैं। वे (साधुरूपी मेघ) श्रीराम के सुयश-स्वरूप सुंदर, मधुर, मनोहर और मंगलकारी जल की वृष्टि कर रहे हैं। सगुण लीलाओं का जो विस्तारपूर्वक वर्णन किया जाता है वही राम-सुयशरूपी जल की निर्मलता है, जो मल का नाश करती है; और जिस प्रेमाभक्ति का वर्णन नहीं किया जा सकता वही इस जल की मधुरता और सुंदर शीतलता है। वह (राम-सुयशरूपी) जल सुकृत रूपी धान के लिए हितकर है और श्रीराम के भक्तों का तो जीवन ही है। वह पवित्र जल बुद्धिरूपी पृथ्वी पर पडा और इकट्ठा होकर सुहाने श्रवणरूपी मार्ग से चला और मानस (हृदय) रूपी शीर्ष स्थान पर संचित होकर वहीं स्थिर हो गया। वहीं पुरातन होकर सुंदर, रुचिकर, शीतल और सुखदायी हो रहा।

इस कथा में बुद्धि से विचार कर जो चार अत्यन्त मनोहर और उत्तम संवाद (भुशुण्डि-गरुड, शिव-पार्वती, याज्ञवल्क्य-भरद्वाज और तुलसीदास व संत) रचे गए हैं, वहीं इस पवित्र और सुंदर सरोवर के चार मनोहारी घाट हैं।

यह सरोवर प्रत्येक मनुष्य के हृदय में विद्यमान होता है, परन्तु इसमें स्नान का संयोग सदा नहीं सधता। गीता में भी इसकी ओर इंगित किया गया है -

ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।

भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।।

(गीता, १८/६१)

अर्थात् हे अर्जुन, देह-स्वरूप यंत्र पर आरूढ समस्त जीवों को अंतर्यामी परमेश्वर अपनी माया से उनके कर्मानुसार भ्रमण करवाता हुआ समस्त जीवों के हृदय में विराजमान है।

परन्तु होता कुछ और है! राजस्थानी प्रेमाख्यान ’जेठवा-ऊजळी‘ की नायिका ऊजळी का कथन स्मरण हो आता है।

मानसरोवर, पेठ, हंसा भेळा न हुया।

बुगलां रै ढिग बैठ, जूण गमाई जेठवा।।

(हे जेठवा, मानसरोवर तक जाकर भी हंसों का संग नहीं किया और बगुलों के पास बैठ-बैठकर जीवन व्यर्थ कर दिया।)

अस्तु, रामायण के आरम्भ में तपस्वी वाल्मीकि नारद के सम्मुख अपनी यह जिज्ञासा रखते हैं कि इस संसार में आज के दिन चरित्र से सम्पन्न मनुष्य कौन है? चरित्र से सम्पन्न का अर्थ हुआ गुणवान, वीर्यवान, धर्मज्ञ, कृतज्ञ, सत्यभाषी, दृढव्रती, सर्वभूतहितरत, विद्वान, सुंदर, जितेंद्रीय और क्रोध को जीतने लेने वाला। इस जिज्ञासा के उत्तर में नारद राम का नाम लेते हैं और उनके गुणों की एक पूरी फेहरिश्त पेश कर देते हैं। इस फेहरिश्त म वे राम की देहयष्ठी के सौंदर्य का व्याख्यान करना भी नहीं भूलते। राम की दैहिक सुंदरता के इस संदर्भ से हम भी आज के प्रसंग ’सुंदरकांड की सुंदरता‘ की चर्चा का श्रीगणेश कर सकते हैं।

सुंदरकांड वाल्मीकि की रामायण और तुलसीदास की रामचरितमानस, दोनों के ही पाँचवें कांड का नाम है। इस शब्द ’पाँचवें‘ में अवश्य ही कोई-न-कोई रहस्य अंतनिर्हित होना चाहिए। क्या कारण है कि गोस्वामी तुलसीदास ने मात्र एक लंकाकांड को छोडकर शेष छह के छह कांडों के नाम वाल्मीकिजी के नामकरण के यथारूप ही रखे हैं - बालकांड, अयोध्याकांड, अरण्यकांड, किष्किंधाकांड, सुंदरकांड और उत्तरकांड! उन्होंने सुंदरकांड से अगले कांड का नाम वाल्मीकि के युद्धकांड से बदलकर लंकाकांड करने के सिवाय सोपानों के नामकरण में कोई परिवर्तन नहीं किया। प्रतीत ऐसा होता है कि आदि-कवि जहाँ राम-रावण के युद्ध से अत्यधिक विमोहित हुए वहीं गोस्वामीजी लंका नगरी के सौंदर्य से। वाल्मीकि राम-रावण के युद्ध का वर्णन करते हुए इतनी रीझे जान पडते हैं कि उन्हें उसके लिए कोई पर्याप्त उपमा तक नहीं सूझती। उन्होंने अनन्वय अलंकार का सहारा लेकर एक प्रकार से यही प्रदर्शित किया कि जिस प्रकार आकाश की अनंतता और समुद्र के अथाहपन की कोई उपमा नहीं हो सकती, उसी प्रकार राम-रावण का युद्ध भी उपमा की सीमा से बाहर है। उन्होंने लिखा है -

गगनं गगनाकारं सागरः सागरोपमः।

रामरावणयोर्युद्धम रामरावणयोरिव।।

(वाल्मीकि रामायण, युद्धकांड)

अर्थात् आकाश, आकाश जैसा ही होता है तथा समुद्र, समुद्र जैसा ही होता है। इसी प्रकार राम-रावण का युद्ध भी राम-रावण के युद्ध जैसा ही था।

यह युद्ध लंका में लडा गया, सम्भव है केवल इसी आधार पर गोस्वामीजी ने इस कांड का नामकरण लंकाकांड किया हो, किन्तु लंका नगरी के सौंदर्य पर से उनकी निगाहें हटती भी तो नहीं। लंकाकांड से पहले कांड सुंदरकांड में ही वे लंका नगरी का प्रथम दर्शन हनुमान की आँखों से करते हैं -

गिरि पर चढी लंका तेहिं देखी।

कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी।।

अति उतंग जलनिधि चहुं पासा।

कनक कोट कर परम प्रकासा।।

अर्थात् पर्वत पर चढकर हनुमानजी ने लंका को देखा। विशाल किला है, जिसका वर्णन किया ही नहीं जा सकता। वह बहुत ऊँचा है, उसके चतुर्दिक समुद्र है। सोने के परकोटे का परम प्रकाश फैल रहा है।

इसके अनन्तर वे बेहद सुंदर छंद में लंका के सौंदर्य का वर्णन करने लगते हैं -

कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना।

चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना।।

गज बाजि खच्चर निकर

पदचर रथ बरूथन्हि को गनै।

बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल

सेन बरनत नहिं बनै।।

बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापिं सोहहीं।

नर नाग सुर गधर्व कन्या रूप मुनि मन मोहहीं।।

कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं।

नाना अखारेन्ह भिरहिं बहुबिधि एक एकन्ह तर्जहीं।।

करि जतन भट कोटिन्ह बिकट

तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं।

कहुँ महिष मानुष धेनु खर

अज खल निसाचर भच्छहीं।।

एहि लागि तुलसीदास इन्ह की

कथा कछु एक है कही।

रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि

त्यागि गति पैहहिं सही।।

(रामचरितमानस, सुंदरकांड)

अर्थात् विचित्र मणियों से जटित सोने का सुंदर परकोटा है। उसके भीतर बहुत सारे सुंदर-सुंदर घर हैं। चौराहे, बाजार, सुंदर रास्ते और गलियाँ हैं। यह सुंदर नगरी भाँति-भाँति से सजाई गई है। हाथी, घोडों, खच्चरों के झुंडों और पैदल चलने वालों तथा रथों की कतारों को कौन गिन सकता है! नाना रूपों में राक्षसों के दल हैं, उनकी शक्तिशाली सेना का वर्णन करने में नहीं आता। वन, उपवन, फुलवारियाँ, तालाब, कुओं और बावडयों की शोभा अपरम्पार है। मनुष्यों, नागों, देवताओं और गंधर्वों की कन्याएँ अपने रूप-लावण्य से मुनियों के मनों को मोह रही हैं। कहीं पर्वत के समान विशाल देह वाले बेहद ताकतवर मल्ल (पहलवान) गर्जना कर रहे हैं। वे अलग-अलग अखाडों में तरह-तरह से दाँव-पेंच लगा रहे हैं और परस्पर ललकार रहे हैं। भयावह शरीरों वाले करोडों योद्धा प्रयत्न करते हुए नगर की चारों दिशाओं में रक्षा कर रहे हैं। कहीं दुष्ट राक्षस भैंसों, मनुष्यों, गायों, गधों और बकरों को खा रहे हैं। तुलसीदास इस कारण से इनकी कथा कुछ कम करके कह रहे हैं, क्योंकि ये सब-के-सब श्री रामचन्द्र के शररूपी तीर्थ में अपने शरीरों को त्याग कर मोक्ष को प्राप्त कर लेंगे।

लंका की इस भव्यता ने तुलसीदासजी के चित्त पर ऐसी छाप छोडी कि उन्होंने अगले कांड का नाम वाल्मीकि के युद्धकांड से बदलकर लंकाकांड रख दिया। सुंदरकांड के बाद लंकाकांड। अपने जाने मानो उन्होंने सुंदर का विस्तार कर दिया। यह ’सुंदर‘ अत्यन्त भ्रामक शब्द है। इसके सटीक अभिप्राय की खोज करते हुए पंडितों ने एक समूचा शास्त्र ही रच डाला है। इसको हिन्दी में सौंदर्यशास्त्र तथा अंग्रेजी में एस्थेटिक्स कहते हैं। इसकी विवेचना का क्षेत्र बडा जटिल है। किसी पश्चिमी सौंदयशास्त्री द्वारा उद्धृत एक दृष्टांत इस शास्त्र की पेचीदगी का मुँहबोलता प्रमाण है। किसी समय योरप में यौन-संसर्ग जनित जानलेवा बीमारी सिफलिश के रोगियों की अलग बस्तियाँ बसाई गई थीं। ऐसी एक बस्ती के लिए अलग चर्च का निर्माण किया गया। चर्च की भीतरी सज्जा का कार्य कतिपय चित्रकार रोगियों को ही सौंपा गया। निर्माण-कार्य पूरा होने पर सामने आया कि चित्रकारों ने अधिक करुणा उपजाने के उद्देश्य से एक चित्र ऐसा बना डाला जिसमें स्वयं ईसा मसीह को सिफलिश रोगी के रूप में चित्रित किया गया। त्राता को इस रूप में चित्रित करना पीडतों तक को स्वीकार न हुआ, यद्यपि उस चित्र का कलात्मक उत्कर्ष काफी सराहनीय था। मुख्यतः इस शास्त्र में यही विचार किया जाता है कि सौंदर्य आत्मनिष्ठ होता है अथवा वस्तुनिष्ठ? सरल रीति से कहें तो यह कि यह मनुष्य के अंतःकरण में होता है अथवा उसके बाह्यजगत में? उर्दू के एक पुराने शायद ख्वाजा मीर ने इस उलझन को बडी खूबसूरती से सुलझाया है। कहते हैं -

कासिद नहीं ये काम तेरा अपनी राह ले

उसका पयाम दिल के सिवा कौन ला सके

बहरहाल, विचारणीय यह है कि हमारे दोनों ही महाकवियों - वाल्मीकि और तुलसीदास - ने अपने-अपने काव्यों के पंचम सोपान को ’सुंदर‘ विशेषण दिया, इसके पीछे उनकी अपनी प्रतीति अथवा अभीष्ट क्या रहा होगा? शेष सोपानों के नामों के अर्थ तो प्रायः स्पष्ट ही हैं। बालकांड में भाइयों सहित श्री रामचन्द्र की जन्मकथा और उनकी बाल-लीलाओं का वर्णन है; अयोध्याकांड में राजधानी अयोध्या में घटित घटनाओं का, अरण्यकांड में सीता, राम और लक्ष्मण के वनवास का, किष्किंधा में वानरराज बाली की राजधानी में उसके वध और राम-सुग्रीव की मैत्री का तथा उत्तरकांड में राम के उत्तर-जीवन और राजकाज आदि का वर्णन है। भवभूति ने इसी उत्तरकांड को आधार बनाकर अपने काव्य ’उत्तररामचरित‘ की रचना की है। मध्य में केवल यह पाँचवाँ सोपान - सुंदरकांड - कुछ समस्या उपस्थित करता है कि इसके लिए प्रयुक्त विशेषण ’सुंदर‘ का अंतर्निहित अभिप्राय किस बात को माना जाए

अनेक पंडितजन इस पहेली को खोलने के लिए सन्नद्ध हुए हैं। उन दृष्टिसम्पन्न विद्वानों की चेष्टाएँ ही आज की इस चर्चा का मुख्य उपजीव्य है। ’कल्याण‘ मासिक के सौर वैशाख, विक्रम संवत् २०७४, ईसवी, अप्रैल २०१७ के अंक में एक आलेख डॉ. श्री कैलाशप्रसाद सिंह जी का ’सुंदरकांड सुंदर क्यों?‘ शीर्षक से छपा हुआ है। मेरी आगे की चर्चा में अनेक संदर्भ इसी आलेख से लिए गए हैं। मैं डॉ. सिंह का आभार स्वीकार करता हूँ कि वे इस ’सुंदर‘ नामक रहस्य में पैंठने की अनेक सरणियाँ मुझे सौंपते हैं। वे सबसे पहले रामायण के एक निष्णात टीकाकार त्र्यम्बकराज मखानी के संदर्भ में बात शुरू करते हैं। श्री मखानी की व्याख्या को देखने पर लगता है कि उनका सारा निरूपण केवल कविता के सौंदर्य पर ही निर्भर है। उन्होंने छंदों, अलंकारों और रसादि की विवेचना करते हुए ही सुंदरकांड में ’सुंदर‘ स्थापित करने की चेष्टा की है। वे वाल्मीकि के सुंदरकांड के प्रायः सभी श्लोकों में छंद, अलंकार और रस का पंडिताऊ विवेचन करते हुए ’सुंदर‘ को प्रमाणित कर दिखाना चाहते हैं। उनके इस द्रविड-प्राणायाम से एक दूसरा प्रश्न उठ खडा होता है कि क्या दूसरे कांडों में आए हुए राम और सीता के प्रसंग सौंदर्य में कुछ कमतर हैं? ये तो सभी कांडों में एक समान, सौंदर्य की सीमाओं से परे, वर्णन की सीमाओं से भी बाहर हैं। कहा भी गया है कि ’सर्वलक्षण सम्पन्ना सीता राम सर्वगुणोपेतः‘। तब इस सर्व सामान्य अभिलक्षण को सुंदरकांड के संदर्भ में अति विशिष्ट कैसे मान लिया जाए

इघर रामचरितमानस की विख्यात टीका ’विजया‘ के टीकाकार पं. विजयानंद त्रिपाठी इस सुंदर विषयक प्रश्न का अपना एक नया समाधान प्रस्तुत करते हैं। वे कहते हैं -

मनभावन कांचीपुर हनुमत चरित ललाम।

सुंदर सानू कथा तथा ताते सुंदर नाम।।

त्रिपाठीजी बताते हैं कि लंका के त्रिकूट पर्वत के तीन विशिष्ट शिखर हैं - नील, सुबेल और सुंदर। सुबेल वह चट्टानी इलाका है, जहाँ राम समुद्र पार करने के उपरान्त सबसे पहले सेना सहित पहुँचे थे। लंकाकांड के दसवें दोहे के बाद पहली चौपाई में गोस्वामीजी सुबेल का नामोल्लेख करते हैं - ’इहां सुबेल सेल रघुबीरा। उतरे सेन सहित अति भीरा।।‘ अर्थात् रघुबीर सुबेल पर्वत पर सेना की भारी भीड लिए उतरे। इसी त्रिकूट पर्वत के तीसरे शिखर सुंदर पर अशोक-वाटिका निर्मित है। रावण ने सीता को इसी अशोक-वाटिका में रख रखा है। त्रिपाठीजी का कहना है कि इस सुंदर शिखर पर हनुमान को पहली बार सीता-दर्शन होता है। इसी आधार पर इस कांड का नाम सुंदर रखा गया है। किन्तु आज कोई इन शिखरों की तलाश करे, तो उसे कुछ भी नहीं मिलेगा। कह सकते हैं कि इन शिखरों की विद्यमानता का कोई प्रमाण आज दिया जाना प्रायः असम्भव है। कहा तो यह भी जाता है कि संसार में खोई हुई वस्तु के पुनः प्राप्त होने से अधिक सुंदर कुछ नहीं होता - ’नष्ट द्रव्यस्य लाभो हि सुंदरः‘। इस सोपान में तो भगवान श्रीराम की खोई हुई ’श्री‘ अर्थात् सीता ही पुनः प्राप्त हो जाती है, फिर इसका नाम ’सुंदर‘ क्यों न रखा जाए

यहाँ एक दूसरी दिलचस्प बात की ओर ध्यान जाना स्वाभाविक है। सुंदरकांड के नायक हनुमान हैं। उनकी अलग-अलग विरुदावलियों में उनके नाम के पर्यायवाची के रूप में भी ’सुंदर‘ नाम बार-बार आता है। उदाहरण के लिए ’हनुमत्सहस्रनाम‘ का ९२५वाँ मंत्र है - ’स्वर सुंदराय नमः‘। इसी प्रकरा ’श्रीहनुमानसहस्रनाम स्तोत्र‘ के ११४वें श्लोक में भी हनुमान का नाम ’स्वर सुंदर‘ गिनवाया गया है -

सर्ववश्य करः शक्तिरनन्तोऽनन्त मंगलः।

अष्टमूर्तिधरो नेता विरूपः स्वर सुन्दरः।।

यह समाधान भी सोलह आने खरा नहीं उतरता। इन दोनों नाम जप और स्तोत्रों में तो हनुमान को राम, कृष्ण, शिव, वराह आदि अनगिनत नाम दिए गए हैं। इन सभी नामों को हनुमान के मान लेना कैसे सम्भव हो सकता है! कहा तो यहाँ तक जाता है कि सुंदर अक्षरों में राम का नाम अंकित की हुई दस मासा सोने की अँगठी सुंदरवर्ण श्री हनुमान ने सीता तक पहुँचाई। इसलिए इस सोपान का नाम सुंदर रखा गया है। वाल्मीकि ने कहा भी है -

सुवर्णस्य सुवर्णस्य सुवर्णस्य च मैथिलीम।

प्रेषितं रामचन्द्रेण सुवर्णस्याङगुलीयम्।।

(वाल्मीकि रामायण, सुंदरकांड)

इस प्रसंग में गोस्वामीजी का वर्णन तो उनके सुंदरकांड का नियमित पाठ करने वालों के कंठाग्र ही रहता है - ’तब देखी मुद्रिका मनोहर। राम नाम अंकित अति सुंदर।।‘ परन्तु ये सारे ही समाधान कुलाबे मिलाने सरीखा उद्यम-भर हैं। दोनों महाकवियों के हृदय में कोई अन्य और अथाह सूत्र रहा होगा और आवश्यक नहीं कि वह एक ही हो; दोनों का अपना-अपना भी हो सकता है, जिसे थामकर उन्होंने काव्यों के पंचम सोपान का नाम ’सुंदर‘ रखा होगा। इस रहस्य को उन्होंने अपनी कृतियों में प्रकट न होने दिया वरन् अवगुंठन में छिपा छोडा। कहते हैं, अवगुंठन से रूप की शोभा द्विगुणित हो जाती है। अब रामकाव्य के प्रेमीजन इस रूप पर चाहे जितना रीझें अथवा खीझें।

मैंने आरम्भ में ही संकेत किया था कि सुंदरकांड दोनों रामकाव्यों का पंचम सोपान है; असल सूत्र इस पाँच की संख्या में भी छिपा हो सकता है। संस्कृत भाषा के प्रख्यात शब्दकोश ’अमरकोश‘ की भानुजिदीक्षित कृत रामाश्रयी टीका में स्पष्ट उदाहरण दृष्टव्य है - ’पंचमो रुचिरे दक्षे‘ (१/७/१) अर्थात् पंचम शब्द का प्रयोग रुचिर और दक्ष के अर्थ में होता है। रुचिर और सुंदर में कोई अंतर भी नहीं। दोनों एक-दूसरे के पर्यायवाची। अमरकोश ही बताता है -

सुन्दरं रुचिरं चारु सुषमं साधु शोभनम्।

कान्तं मनोरमं रुच्यं मनोज्ञं मंजु मंजुलम्।।

(३/१/५२)

संस्कृत के दूसरे प्रामाणिक शब्दकोश ’शब्दार्थकौस्तुभ‘ में भी पंचम का अर्थ रुचिर और सुंदर दिया गया है। सात सुरों में कोयल के मीठे पंचम सुर से तो हम सभी भलीभाँति परिचित हैं। तब अनुमान कर सकते हैं कि पंचम के अर्थ में सुंदर शब्द के प्रयोग का चलन वाल्मीकि के युग में खूब रहा हो सकता है। सम्भव है, इसीलिए उन्होंने सहज भाव से अपने काव्य के पंचम सोपान का नाम सुंदर रख दिया। ऐसा करते हुए उन्होंने किसी व्याख्या की आवश्यकता ही न समझी हो। ऐसा हुआ भी करता है।

कविजन ऐसा कौतुक करते समय अधिक सोच-विचार नहीं करते। उनकी दुनिया बडी निराली होती है। उनका काम अभिधा अर्थात् सीधे-सटीक शाब्दिक अर्थ से नहीं चलता। वे तो शब्दों की लक्षणा और व्यंजना के लिए हमेशा जान हथेली पर लिए खडे मिलते हैं। लोग उनकी इसी अदा पर मरा करते हैं। कविता को ’वैदग्ध्यभंगी भणिति‘ कोई यूँ ही तो कहा नहीं जाता। कवि तो वही जो ’सूखी लकडी‘ को ’नीरस तरु‘ कहकर पुकार सके। ’शुष्क काष्ठं‘ कहने पर लोग कवियों की लानत-मलामत पर उतारू हो सकते हैं। महाकवि बाणभट्ट का ही दृष्टांत है; सुना है, अपनी कालजयी कृति ’कादम्बरी‘ के पूर्ण होने से पहले वे गंभीर रूप से बीमार हो गए। अब ’कादंबरी‘ को पूर्ण कौन करेगा? उन्हें अपने प्राणों से भी अधिक अपनी रचना के पूरा होने की चिंता सता रही थी। महाकवि बाणभट्ट के दो पुत्र थे। बडा बेटा ज्योतिष किया करता था। पहले उन्होंने उसी को बुलाया। कहा, ’’आगे सूखी लकडी पडी है‘, इस वाक्य का संस्कृत में अनुवाद करो!‘‘ वह गणित का आदमी था, शीघ्र बोल पडा, ’’शुष्कं काष्ठं तिष्ठत्यग्रे।‘‘ अर्थ में कोई दोष नहीं, किन्तु बाणभट्ट ने अपना माथा ठोक लिया। फिर छोटे बेटे को बुलाया। वही वाक्य सुनकर उसने कहा, ’’नीरस तिरुरिह विलसति पुरतः।‘ निश्चय ही इस लडके पर कवियों के कुसंग का प्रभाव था। अन्यथा ’सूखी लकडी‘ को ’नीरस तरु‘ कदापि न कहता। जो हो, यह अनुवाद सुनकर महाकवि आश्वस्त हो गए। उनको धीरज हो गया कि वे न रहेंगे, तो भी उनकी ’कादंबरी‘ अधूरी नहीं रहेगी। ऐसा ही हुआ लगता है। वाल्मीकि ने गणित के रूखे-सूखे ’पंचम‘ के स्थान पर इसका सटीक और सलोना पर्यायवाची ’सुंदर‘ चुन लिया होगा।

पंडितजन इस समाधार से संतुष्ट हो जाएँ, यह भी विश्वासपूर्वक नहीं कहा जा सकता। वे प्रश्न उठा सकते हैं कि संख्यावाचक ’पंचम‘ के स्थान पर ही यदि ’सुंदर‘ रखा गया है, तो शेष कांडों के नाम संख्यावाचक शब्दों पर क्यों नहीं रखे गए? फिर तो बालकांड को प्रथम और अयोध्याकांड को द्वितीय ही लिखना चाहिए। अलबत्ता पंडितों की इस आपत्ति का एक निराकरण हो सकता है। वह यह कि भारतीय वाङ्मय की परम्परा में इस प्रकार की परिपाटी सदा से चली आ रही है। उदाहरणार्थ चार अवस्थाएँ - जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय। यहाँ पहली तीन अवस्थाओं के तो बाकायदा नामकरण किए गए हैं, किन्तु चौथी को केवल चौथी कहकर ही काम चला लिया गया है। तुरीय शब्द का अर्थ चतुर्थ ही तो होता है। यह का यह व्यवहार सुरों के नामकरण में भी देखने को मिलता है। छः सुरों के नाम हैं - षडज्, ऋषभ, गांधार, मध्यम, धैवत और निषाद - किन्तु पाँचवें बेचारे को कोई नाम नहीं मिला; कह दिया - पंचम। सच तो यह है कि चौथे सुर को भी नाम नहीं मिला। तीन पहले, तीन बाद में, इसलिए वह हो गया - मध्यम। हाथ की अँगुलियों के मामले में भी वही बात। चार के नाम हैं, पर बीच वाली की पोजिशन ही उसका नाम हो गया - मध्यमा। यह परिपाटी इस देश में बडी पुरानी है। चार पुत्रों के चुनिंदा नाम और पाँचवाँ बेचारा पाँचूमल। इस प्रकार के कितने ही उदाहरण हो सकते हैं। हो सकता है, रामायण के पंचम सोपान के साथ भी ऐसा ही हुआ हो, पर लुत्फ यह है कि उसको एक खूबसूरत पर्यायवाची तो बख्शा गया - सुंदर! ’सुंदरकांड की सुंदरता‘ विषयक इस उलझे हुए प्रश्न का सर्वाधिक सुलझा हुआ समाधान मुझे डॉ. पांडुरंग राव के यहाँ मिलता है। वे लिखते हैं, ’’यह ’अस्ति-शोध‘ किष्किंधा से आरम्भ होता है और इसमें करोडों वानर-वीर-राम-कार्य में लगे रहते हैं। अंत में अतिबल और अनन्य विक्रम से सम्पन्न हनुमान को इस शोध में ’स्वस्तिबोध‘ होता है। सीता माता का पता लगाने में मारुतनंदन को सफलता मिलती है। ’दिख गईं सीता जी‘ (दृष्टा सीतेति तत्त्वतः) कहकर वह अपने प्रभु राम के श्रीचरणों में अमृततुल्य समाचार निवेदित करते हैं। रामदूत हनुमान द्वारा घोषित यह स्वस्ति-बोध वास्तव में रामकाव्य का प्रणव-नाद है, जिसमें इस मधुर कथा का मधुराक्षर रम्य रागिनी बनकर रामायण की रमणीयता को सुन्दरता की संज्ञा प्रदान करता है। सीता माता के आंतरिक और बाह्य सौंदर्य का चरम उत्कर्ष सुंदरकांड के इसी स्वस्ति-बोध में होता है। तीनों लोकों में दुर्लभ पार्थिव वैभव के प्रलोभन के बीच में रहकर भी राज्यभ्रष्ट वनवासी, पर तेजस्वी पति के प्रति परिनिष्ठित परम प्रेम और पराभक्ति को अचंचल धैर्य के साथ निभाने में ही रामपत्नी का सदुर्लभ सौंदर्य है, जो कि रामायण का सच्चा सौंदर्य है। रामायण का यह पंचम (सुंदर) कांड वास्तव में कवि-कोकिल वाल्मीकि का पंचम स्वर है।‘‘ (रामकथा नवनीत, पांडुरंग राव, भूमिका, पृ. गपप.गपपप प्रकाशक ः भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, नई दिल्ली)

बहरहाल, मेरी माँ सुंदरकांड तो सुना ही करती थी, हर मंगलवार को माँजे हुए तवे पर गोबर के कंडे सुलगाकर घी से हनुमानजी की जोत भी लिवाती थी। जोत की सुनहली नृत्यरत लपटों के प्रकाश में माँ का मुख देदीप्यमान हो उठता था। माँ जोत में हनुमानजी को प्रत्यक्ष देखा करती थी। मैं होता, तो माँ मुझे हाथ से इशारा कर जोत को धोक देने के लिए कहती। मैं घुटनों के बल बैठ भूमि पर शीश टिकाकर हनुमानजी को प्रणाम निवेदित करता। सच तो यह था कि मैं हनुमानजी नहीं वरन् माँ की आज्ञा के आगे ही शीश नवाया करता था। मेरा यह रवैया कदाचित् हनुमानजी को बडा पसन्द आ गया। उनकी और माँ की कृपा से ही मैं ’सुंदर‘ के इस अवगाहन में निमग्न हो सका। अपने बारे में तो मैं क्या कहूँ? मैं तो सादा पानी रखने का पात्र भी नहीं, पर माँ की मरजी कि इस प्रसंग के निमित्त से मुझे गंगाजली बनाकर आपसे मुखातिब कर दिया। श्री रामकृष्ण परमहंस कहा ही करते थे, ’’माँ, तू तो पचास वर्ण-रूपिणी है; तेरे जिन वर्णों को लेकर वेद-वेदांत बने हैं, वे ही तो अश्लील वाक्यों में प्रयुक्त हुए हैं! तेरे वेद-वेदांत के ’क‘ ’ख‘ तथा अश्लील वाक्यों के ’क‘ ’ख‘ पृथक तो नहीं हैं! वेद-वेदांत भी तू है और अश्लील वाक्य भी तू ही है!‘‘ (श्रीरामकृष्णलीलाप्रसंग-२, द्वितीय अध्याय, पृष्ठ ५९२, प्रकाशक ः रामकृष्ण मठ, नागपुर, संस्करण-२००२)

माँएँ भी अलग-अलग नहीं होतीं, एक ही होती हैं। मैं सृष्टि की समस्त माताओं को एक साथ नमन करता हुआ अब यहीं विश्राम लेता हूँ। चुप रहूँ अथवा बोलूँ, माँ का निरन्तर स्मरण ही मेरा विश्राम है।

कवि, कथाकार, अनुवादक और समीक्षक मालचंद तिवाडी राजस्थानी भाषा में अपने लेखन के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित है।