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छह कविताएँ

राकेश मूथा

(१) शुरू प्रेम के दिनों के बाद
प्रेम में क्यों दीखता है
उसके कुछ न होने का दर्द
वो जो भी है मेरा है
कुछ हो न हो
मुझे इससे क्या
मेरा प्रेम है
इतना काफी क्यों नहीं
शुरू प्रेम के दिनों के बाद
प्रेम जितना नहीं छाता
ये दर्द उससे ज्यादा मुझे सालता
प्रेम में ये कैसी दरार...

(२) कब से खडा हूँ
कब से खडा हूँ
भीड भरे इस चौराहे
किसी ने देखा नहीं मुझे
कोई मुझे देख रुका नहीं
कोई नहीं जो मुझे पहचाने
मैं क्यों खडा हूँ यहाँ
किसके इंतजार में
सोचते-सोचते
करता हूँ कुछ ऐसा
कि कोई मुझे देख रुके
और पूछे मुझसे
बात करे कुछ देर
मेरा सुख पूछे अपना दुःख दे मुझे
लगे कुछ देर मुझे कि मैं जीवित हूँ...
(३) सपने फिर आने लगे हैं मेरी नींद में
दुःख भीतर ही भीतर
खाता गया
भावनाओं को पहुँचाता रहा ठेस
सपने बचपन के जल गए
वास्तविकता की अग्नि में भस्म हो गए
नाते रिश्ते खिलौनों की तरह
विवश हुए पडे हैं फर्श पर
जब खिलौने टूटते हैं बच्चा रुआँसा होता है
कोई आता है... जो उसे मनाता है
प्यार करता है
मगर मैं बरसों से
इन्हीं टूटे खिलौनों के बीच
आँसुओं के संग बैठी हूँ
कभी कोई नहीं आया
आया भी तो टूटे खिलौनों को
लात मार चला गया
अब रोती नहीं
इंतजार नहीं करती
अपने पैरों पे खडी
करती हूँ मुकाबला
तब सब एक-एक कर आते हैं
मेरे साथ खडे हो
मेरे खिलौनों को जोडते हैं

(४) दोपहर और गोरी का दर्द
शाम आते-आते
थकी-माँदी दोपहर
तेजी से बिखरे हुए सपने
अपने मन में यूँ डालती है
जैसे कोइ्र गोरी अपने बिखरे बालों को
सुंदर से जूडे में बाँधती है
सुंदर जूडे में सिसकते और दम घुटते बाल
और मन में कुलबुलाते सपने
शाम, रात और सुबह
माँ-बाऊजी, साजन और बच्चे
कभी नहीं जान पाते
दोपहर और गोरी का दर्द
हमेशा एक राज है... धकडता हुआ प्यार

(५) शायद ये पत्तियाँ और हरी होती
नहीं कोई तकलीफ कहाँ...
कुछ भी नहीं ऐसा
मगर फिर भी वो होती तो
तो शायद बात कुछ और होती
शायद ये पत्तियाँ और हरी होतीं
फूल की खिलन में रंग और होते
तितलियों की उडान कुछ और कहती
भँवरे ये यूँ शायद भटकते नहीं
नदियों की चाल इतनी धीमी नहीं होती
पहाड शायद थोडा और झुकते
रेगिस्तान में इतनी आँधियाँ नहीं चलती
समुद्र की मछलियाँ शायद और ऊँची छलाँग लगाती
गाँवों की चौपालों में,
शहर के बाजारों की रौनक ही कुछ और होती
मेरे घर में रुनझुन होती, दीवारों में सिहरन होती
छतें उमंग से मुझे ढँकती
चूल्हे की आग से सुवासित होता घर
बस इतना ही फर्क है
तुम नहीं हो
मुझे पता है... मैं ठीक हूँ
इन सब के बिना
बस... थोडा सा ये फर्क
है जो है

(६) क्योंकि कुएँ म अब भी पानी है
कुएँ के भीतर उनींदे जल को
लोरी सुनाता सन्नाटा
कबूतर की गूँ गूँ संग
ध्यानमग्न हैं
कुएँ की दरकती सीढयों पर
समय की बींटें
अपना निशान छोडती
कभी-कभी लौट आई
चमगादड के पंखों की हवा के साथ
अपनी जगह छोड
जल समाधि ले लेती है
बाहर की हवा तूफान उठा रही है
छूटते फिसलते समय को देखता वर्तमान
वीतरागी हुआ आसपास की रेत को उडा रहा है
मुँडेर खंडहर हुए वीराने में
प्रेम राग छेड रही है
जिसमें जीवन धडक रहा है
क्योंकि कुएँ में अब भी पानी है...
हिन्दी काव्य परिदृश्य के स्थापित कवि राकेश मूथा रंगकर्म में भी गहरी रुचि और विशेषता रखते हैं।