fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

तीन कविताएँ

नवनीत पाण्डे
(१) मुझे रात करता है
मेरी सहन शक्ति की
मत पूछ!

जो हर दिन
सुबह से शाम
दिन भर आग उगल
दुनिया चलाने का
खम भरता है

तुम्हारे लिए, दिन गढ
शाम ढलते ही रोज
मेरे आँचल
बाहों की छाँह में
आकर छिपता है

मेरी उजालों में
अँधेरे भर
मुझे रात करता है।

(२) प्रेम का बहुवचन
कितना अच्छा होता
हम अपरिचित ही रहते
न मैं तुम्हें कुछ कहता
न तुम मुझे कुछ कहते

कितना अच्छा होता
अपनी लाइन क्रॉस नहीं करते
न मैं तुम से भिडता
न तुम मुझ से भिडते

कितना अच्छा होता
अगर शब्दों के अर्थ न होते
न मैं सुन-लिख-पढ दुःखी होता
न तुम सुन-लिख-पढ दुःखी होते

कितना अच्छा होता
हम समझदार नहीं होते
न मैं तुम्हारी समझ पर हँसता
न तुम मेरी समझ पर सवाल उठाते

कितना अच्छा होता
हम बच्चे ही रहते
तुम मुझ से कट्टी करते
लेकिन थोडी देर में मनाने,
दोस्ती करने पहुँच जाते

कितना अच्छा होता
प्रेम के बहुवचन नहीं होते
न मैं राह भटकता
न तुम मुझे ढूँढते फिरते।

(३) नहीं! अब नहीं!
यह करूँ, यह नहीं
ऐसे करूँ, ऐसे नहीं

ऐसे कहूँ, ऐसे नहीं
यूँ कहूँ, यूँ नहीं

इसकी सुनूँ, इसकी नहीं
यह सुनूँ, यह नहीं

यहाँ होंठ खोलूँ, यहाँ नहीं
यहाँ चुप बैठूँ, यहाँ नहीं

यह खाऊँ, यह नहीं
ऐसे खाऊँ, ऐसे नहीं

यह पहनूँ, यह नहीं
ऐसे पहनूँ, ऐसे नहीं

यह दिखाऊँ, यह नहीं
यह छिपाऊँ, यह नहीं

यहाँ आऊँ, यहाँ नहीं
यहाँ जाऊँ, यहाँ नहीं

इससे मिलूँ, इससे नहीं
इससे बोलूँ, इससे नहीं

हे राम!
पति-प्रेमी हो या.....

जैसे ढालते
ढलती जाती
जैसे चलाते
चलती जाती

तुम बनाते जाते
मैं बनती जाती

नहीं! अब नहीं!
वही करूँगी
जो कहे - चाहेगा मन।
भाड में जाए...
तुम्हारा परिभाषित
यह सुख! सुखी जीवन!!
हिन्दी-राजस्थानी में समानाधिकार से लिखते हैं। नवनीत कवि, कथाकार के साथ समीक्षक और उपन्यासकार भी हैं।