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बीतता हुआ आज-’’आज है तो बीते हुए वक्त के होने की याद है, और याद आज है।‘‘

शर्मिला बोहरा जालान
आज उनतीस फरवरी है। मृणाल बाबू साठ के हो गए। हल्के भूरे रंग का पेंट-शर्ट पहने आँखों पर चश्मा लगाए अपनी गाडी में बालीगंज से शाम को निकले और ड्राइवर तपन से कहा, ’’कहीं और जाने का मन नहीं है, इसी इलाके में दो-तीन चक्कर धीरे-धीरे लगाना।‘‘
आगे बढते हुए मृणाल बाबू ने रिची मोड पर एक छोटा हनुमान मंदिर फिर से देखा, जिसकी दूसरी तरफ शनि मंदिर है और मंदिर के पीछे एक छोटी पारम्परिक डेयरी। बालीगंज फाडी की तरफ जाते हुए हाजरा रोड के दोनों ओर की दुकानों पर नजर डालते हुए एक युवा लडकी पर नजर गई, जो एक बहुमंजिला इमारत से निकल ट्रेक सूट पहने हाथ में बैडमिंटन लिए सडक पार करने खडी थी। उसके चेहरे पर हवा से बाल उड-उड कर आ रहे थे, जिन्हें वह हटा रही थी। बालों के पीछे छुपा उसका चेहरा पंछी की तरह उडान भरने को उत्सुक था। आगे एक के बाद एक पुराने सामान की दुकानें थीं। मरम्मत करने के लिए रखी फ्रिज, अलमारियाँ, काठ के फर्नीचर वगैरह। एक दो कसाई खाने। छोटी-मोटी स्टेशनरी की दुकानें, चनाचूर, समोसा और मिठाई की छोटी दुकानें। हाजरा रोड के दोनों तरफ खडी इन दुकानों के बीच नौकरानियों, ड्राइवरों, धोबी के भी छोटे कमरे दिखाई पडते। ये लोग शाम को बाहर बैठ जाते।
तपन ने गाडी बालीगंज फाडी से फिर हाजरा मोड की तरफ घुमा ली। गरचा, पंदित्या, लाल बगान पार कर देशबंधु मिठाई की दुकान के सामने गोलगप्पे वाले को देखा। वर्षों से एक गोलगप्पे वाला वहाँ खडा ही रहता है। वहीं कुछ सालों से एक आधा-अधूरा स्कूल खडा है। इंटरनेशनल स्कूल। मोतीलाल नेहरू रोड, पंदित्या में उनके कई परिचित नए बहुमंजिला मकानों में फ्लेट खरीद कर बस गए। दक्षिण कलकत्ता छोड कर सालों से इस इलाके में कई परिवार आ गए और आते जा रहे। रिची रोड में कई पुराने वकीलों की बडी बाडी (मकान) हैं।
मृणाल बाबू लोहे के व्यापारी हैं। रियल एस्टेट का भी काम करते। गाडयों का खूब शौक। ग्रिगेरियन कैलेण्डर में उनका जन्मदिन चार साल में एक बार आता। जन्मदिन पर उनका मन पीछे की तरफ भाग रहा। तीस साल पहले इस इलाके में कौन-कौन सी दुकानें थीं, कैसी बसावट उन्हें सब याद आ रहा। आज वह अपने मित्रों के साथ कैनिलवर्थ रेस्त्रां में शराब न पीकर अपने इलाके में ही घूमना चाह रहे।
अपने इलाके के बारे में सोचते हुए उन्होंने दायें कान में हवा का झोंका महसूस किया। खिडकी खुली हुई थी। दायीं तरफ से हवा आ रही तो बायीं तरफ संगीत चल रहा। कोई पुराना गाना। मीना कुमारी और गुरुदत्त का। जिसके बोल थे*- ’’यही है वो साँझ और सबेरा...‘‘
गाने से उन्हें माँ और पिताजी की खूब याद आई। माँ को याद करते हुए विचलित हेा गए। वह उत्तर कोलकाता बडतल्ला में रहते। माँ बताती कि वह सावित्री पाठशाला में कक्षा पाँच तक पढीं फिर आगे की पढाई राम मंदिर स्कूल में हुई। पढी-लिखी सुतवाँ नाक वाली माँ का ब्याह जब पिताजी से हुआ पूरे परिवार में ऐसा सुन्दर जोडा किसी ने नहीं देखा। पिताजी लम्बे गौरवर्ण और चेहरे पर क्या तेज। पिताजी की चाय पत्ती की छोटी दुकान थी, साथ ही शेयर की खरीद बेच का काम भी करते।
पिताजी की याद आते ही कोई चीख सुनाई दी। माँ की चीख। बुआ की चीख। पिताजी की लाश। मृणाल बाबू वह सब याद कर व्याकुल हो गए। पिता दस वर्ष की शादीशुदा जिंदगी जी कर चले गए। क्या हुआ और कैसे यह सब जानना अँधेरे गलियारों से गुजरना है। दूसरा विवाह कहाँ किया माँ ने। माँ सालों उनके मरने का कारण खोजती रहीं। मृणाल बाबू के अंदर बवण्डर उठा। ऐसा तूफान कि उखाड दे। माँ ने एक दिन मरने के पहले बताया कि उन्होंने आत्महत्या की। माँ के भीतर वर्षों का विषाद जमा था। वह कहीं दूसरे ग्रह की तरफ देखते हुए बोलीं -
’’पिताजी के बारहवें के दिन मालूम नहीं कोई शम्पा बनर्जी बाग बाजार से आयीं, उनका मन अस्थिर था, बोलीं कि वह तेरे बाबा से ही चायपत्ती खरीदती। यह कहकर टुकुर-टुकुर मुझे देखती रहीं और चली गयीं। आज तक यह पता नहीं चला कि वह उस दिन रोने क्यों लगीं। वैसी सुंदर औरत मैंने कम ही देखी।‘‘
ऐसा कहते हुए माँ के आधे चेहरे पर पीली रोशनी पड रही थी और आधा चेहरा अँधेरे में था। पिताजी के नहीं रहने पर माँ ने उन्हें पढाया। उनके लिए जीती रही।
उन्होंने महसूस किया कि हवा बहुत जोर से चल रही है। हवा के साथ हूक उठी। उन्नीस साल की उम्र थी। कॉलेज के दिनों की बात है। वह इस हवा में कथा लिखना चाहते हैं। वह कहानी जो हुई थी। हवा के सहारे वे आसमान के अंदर जाना चाहते। चिलकती चमकती कहानी के बरक हटाना चाहते। कोलकाता शहर के पार्क स्ट्रीट के मकबरों की चादर हटा वहाँ उसके अंदर सोई कोई कहानी पढना चाहते। सुना है आकाश में कोई गंगा बहा करती है, देखा नहीं पर वह आकाश गंगा उनके मन में फैल रही है।
ऐना एक क्रिश्चयन लडकी। उसकी आँखें सलोने हिरन के छौने सी। इस कहानी का वह चरित्र जो इस हवा के साथ ही आया और चला गया। वे कहानी में कहानी देख रहे। उनके जीवन की कुछ-कुछ घटनाएँ उन्हें कभी-कभी घेर लेतीं और वह बहते जाते।
वह यह सब सोचने लगे तभी तपन लगातार बोलने लगा। वह बातूनी है। गाडी के सिग्नल पर रुकते ही कलकत्ते की उस दिन की जरूरी खबरें तफसील से सुनाने लगा। बोला - ’’बाबू आज बंद होने से बहुत लोग काम पर नहीं आये। सभी टैक्सी ड्राइवर गाडी बंद कर बैठे हुए। यादवपुर इलाका पूरा लाल है। वहाँ जुलूस निकल रहे।‘‘
उन्हें याद आया, दो दिन से स्ट्राइक है। कई लोग काम पर नहीं गये। कलकत्ता हडतालों का भी शहर है।
उनके चेहरे पर स्मृति की पुरानी छाया उतर आई। वे बडतल्ला की गलियों में चल रहे। उनका घर उस मकान में था, जहाँ राधा कृष्ण की मूर्तियों की पोशाकों की दुकान थी। अँधेरी सीढयाँ चढ कर छोटे कमरे में जाते तो वहाँ रुक्मणी बुआ बैठी दिखाई देती। यह कहानी हवा पर लिखी कहानी नहीं है। बडतल्ला गली में सुनाई पडने वाली कहानी भी नहीं है। यह सिर्फ उस कमरे में घटी कहानी है। एक असम्भव जीवन का नक्शा। रुक्मणी बुआ असम्भव सुन्दर। धूप और झाग सा पवित्र चेहरा तब बदल जाता, जब वह जोर-जोर से चिल्लातीं। उम्र बढती जा रही थी और मन बच्चा।
बुआ ने हवा में कथा लिखनी चाही। खुले आकाश में दिखाई न पडने वाली बारिश की बूँदों को पकडना। बुआ को याद करते हुए आज मृणाल बाबू जिन्दगी के किसी और सिरे पर आ गए।
हवा और तेज चल रही और उसमें ठंडक भी है। उनकी नाक ठंडी हो रही। कान के लवें लाल हो रही। हड्डी के कोटर और बालों के छिद्रों में हवा भर रही। यह हवा उन सभी की कथा से भारी हवा है। बुआ की कथा, पिताजी की कथा, क्षणभंगुर कथा। छोटे-छोटे ताल-पोखर में फेंके गए पत्थर की आवाज सी जो विलीन हो जाती।
बुआ का रोना चिल्लाना। पढाई न कर पाना। कक्षा चार के बाद घर में ही रहना। घरेलू काम न करना। कल्पना। प्रतीक्षा करना। एक असम्भव कहानी को हवा में लिखने की। माँ के साथ बांसतल्ला की दुकान पर जाना और जाना राम मंदिर। वहाँ माँ का फल खरीदना और बुआ का चुपचाप खडे रहना। फलवाले को देखते जाना। घर जाकर बुआ हँसती जाती। जब वह हँसती उनकी नाक हँसती थी। आँखें छोटी हो जाती थीं। मन की निर्मलता चेहरे पर चिलकती। वह घर में हकला कर बोलतीं, रुक-रुक कर। कुछ दिनों से साफ-साफ शब्द निकलने लगे थे। एक बार वे भी बुआ के साथ फल लेने गए। न्यू मार्केट में उस फल वाले की बडी दुकान थी। साफ रंग था फारूक भाई का। चेहरा खुले आसमान सा खुला। वह बुआ को बोलने देता। फलों के नाम पूछता, उनके सामने बुआ लगातार बोलती जाती। बोलते-बोलते उनकी जुबान खुल जाती और साफ-साफ बोलने लगती। उनको आश्चर्य होता कि बुआ को घर में क्या हो जाता है। उन्हें लगता फारूक भाई के सामने वह बहती नदी है। अनंत सम्भावनाओं से भरी। घर सम्भावनाहीन था। माँ को बुआ को मनोचिकित्सक के पास ले जाना पडता। उन दिनों उनकी अनर्गल बातें, कल्पनाएँ, चाहनायें माँ समझ नहीं पाई। बुआ सिजोफ्रेनिक थी।
मृणाल बाबू सोच रहे कुछ भी नहीं बीतता। वह कहीं डूबे हुए हैं पर तपन की आवाज से लौट आये। तपन चुपचाप गाडी नहीं चला सकता। बोलता है बाबू, ’’मैंने तो नक्सल आंदोलन देखा है। ट्रामें जलाई गई थी। जुलूस निकलते थे। कैसा समय था।‘‘ ऐसा कहते हुए तपन के चेहरे पर अँधेरा छा गया।
’’बाबू यह सब तो एक तरफ चल ही रहा था, साथ ही हमारा दो पैसा कमाने का संघर्ष भी। ऐसा कौन सा काम है, जो मैंने नहीं किया। दस वर्ष की उम्र से लेकर आज उनसठ साल की उम्र तक दो पैसे जोडने के लिए तरह-तरह के काम करता रहा। सिंगूर में मेरे दादा रहा करते। हम चक्रवर्ती हैं। दादा पूजा-पाठ का धार्मिक काम करते। ना जाने मंत्र पूजा कर्म में क्या हुआ कि दादू एक दिन घर छोडकर चले गए तो आये ही नहीं। मेरे बाबा ने छोटी नौकरी की। मैंने ज्यादा पढाई नहीं की सो एक नेलपॉलिश बनाने के कारखाने में काम करना शुरू किया। फिर कलम बनाने के कारखाने में और उसके बाद कुदाल बनाने के कारखाने में। काम पर काम बदलता रहा। स्टेशन पर रसगुल्ला बेचा। ऑटो चलाया। हर वह काम किया जो कर सकता था।‘‘
यह सब कहते-कहते तपन की आँखें कुछ ढूँढती दिखाई पडी। वह अपनी कहानी में पिछले कुछ सालों की कहानी देख रहा। वह कहानी जो उससे दूर चली गई। अल्पा से उसने प्रेम विवाह किया पर अल्पा को न जाने क्या हुआ, वह चली गई। जो जलतरंग जीवन में आई वह झूठ नहीं। लेकिन मौसम बदल गया। अल्पा दस साल बाद दस साल छोटे युवक के साथ किवाड खोल निकल गई। तपन अचानक जोर से बोलने लगा, ’’बाबू मैंने जो देखा और जिया है उससे कई कहानियाँ और उपन्यास तैयार हो सकते। आप तो कई लेखक को जानते हैं। मेरी भी कहानी लिखवाना। अल्पा आलता लगाती। लाल पाड की साडी पहनती। उन दिनों जब मैं उसे नहीं जानता था। मेरी दीदी के पास उसकी दीदी आती। पच्चीस मार्च का दिन था। वह बुखार में तप रही थी। मैं उसे दवाखाने ले गया और डॉक्टर को दिखाया।‘‘
तपन आँखें पोछने लगा। उस क्षण लगा उसके वाक्य में कोई मात्रा गडबडा गई है। अल्पा के साथ क्या हुआ, क्यों चली गई? वह तपन की बात बदलते हुए बोले, ’’यह तो बताओ कि तुम्हें क्या लगता है हडताल का असर किस पर ज्यादा हुआ?‘‘
वह बोला, ’’कुछ होता हवाता नहीं इस सबसे।‘‘
चौराहे पर गाडी रुकी। सामने से शम्भु आता दिखाई दिया। वह बालीगंज धोबी घाट में रहता और उस इलाके के कई घरों के कपडे धोता।
फरवरी की शाम का कोलकाता। लौटती सर्दियों के दिन। यह मौसम पीछे ले जाता। तपन के ऊपर भी शायद बदलते मौसम का असर है। वह भी न जाने किन अँधेरी गलियों में भटक रहा।
सिग्नल खुलने से हॉर्न बजने लगे। मृणाल बाबू के कानों में तपन की आवाज गूँज उठी। सुबह से शाम तक दो पैसे के लिए एक मोड से दूसरे तक दौड लगाता उसका ऑटो। कुछ ढूँढती हुई उसकी आँखें। अल्पा का कुछ दिनों का साथ। रुक्मणी बुआ का पूरे घर में घूमना, देहरी पर बैठ अस्त होते सूरज को देखना और फारूक भाई को आवाज देना। महालय के दिन उन्होंने अपनी देह का त्याग कर दिया। दूर पोखर में कोई पत्थर गिरा। निःशब्द। बाबा क्या उन बंगाली महिला को मन में बसाये अनंत की ओर चल पडे। माँ ने उन दिनों साँझ बत्ती करते हुए कुछ नहीं बताया। माँ क्या कुछ बता पाती! माँ को ही कितना पता था। वे गाडी के काँच से बाहर खिडकी से आकाश देखते हैं। सोचते हैं, क्या माघ पूर्णिमा आने वाली है? रात आकाश में कुछ चमकेगा। बुआ बाबा एक दूसरे से बात करने निकलेंगे। बाबा ऊपर से नीचे हम सबको देखेंगे। उनके सामने ऐना, फारूक भाई, अल्पा, शम्पा बनर्जी सब गडमड हो जाते हैं।
तपन फिर से बंद की बात करने लगा। वे उसकी बात सुन सोचते कि कैसे हजार रुपये कमाने के लिए ये लोग जी तोड मेहनत करते। हडताल से होने वाली परेशानी वह नुकीली चीज है, जिससे पूरा दिन चुभता रहता।
मृणाल बाबू ने अपना संसार खडा किया। सम्पन्नता, पत्नी, विदेश बसा बेटा और बहू। कोलकाता शहर में मिली प्रतिष्ठा अपना हस्ताक्षर। तपन कहता, ’’बाबू आफ पास सब कुछ है।‘‘
यह सुन उनका मन भटकने लगा। कभी लगा वह किसी अरण्य में है तो कभी लगा गंगा में, जहाँ वे आधे डूबे हुए और आधे ऊपर हैं।
कभी लगा वह इस समय पूरी तरह से तपन के साथ हो रहे संवाद में हैं तो वे उस हवा में भी हैं, जहाँ वे लिख रहे हैं एक कहानी। यह कहानी हवा में लिखी कहानी है। जो आई तो सराबोर कर गई और चली गई तो उद्विग्न हो गए। मुँह उठा कर देखा, लगा कहीं तोता उडा है। दूर कहीं शव जलने की गंध आई। रात के हट-मेले सब उठ रहे।
वे घर लौट आये। फरवरी महीने की रात उन्हें रहस्यमय लगी। पूर्णिमा की तरफ जाता चाँद सम्मोहित कर रहा था। पूरी रात चाँद तारों आकाश को देखते हुए निकल गई।
दूसरे दिन वे सब चीजें जो रात में जादुई और मायावी लग रही थीं, सुबह के आलोक में साफ और सीधी दिखाई देने लगीं। दफ्तर में बैठे अपने पंखों को समेटे किसी फाइल पर झुके हुए हैं। सुबह की धूप में वे सिनेमा के नायक लग रहे, गौर वर्ण, लम्बे। टेबल की धूल और बासीपन हटा जग्गू तफसील से उन्हें बंद की बता रहा।
’’बाबू मैं अपने घर दक्षिणेश्वर चला गया था। स्कूल देखने और माँ काली के दर्शन करने। वहाँ हमारा छोटा स्कूल है, उसे मेरा छोटा भाई चलता है। आफ लिए प्रसाद लाया हूँ।‘‘
हाथ में प्रसाद देते हुए बोला, ’’आपसे एक बात पूछनी है। आफ बाथरूम का पानी निकल रहा है, उसका क्या किया जाये। प्लम्बर तो बीमार है।‘‘
मृणाल बाबू बोले, ’’तपन को बोलो, किसी को बुलाएगा।‘‘
उनके कई फोन आने लगे। सक्सेना साहब एक होटल खोल रहे हैं। बहुत बडी रकम उधार ली, उसी सिलसिले में बात कर रहे। वे रोज के जीवन में लौटने की कोशिश कर रहे। जिस तरह यात्रियों के उतर जाने के बाद खाली नौका कुछ देर तक तट के पानी में हिलती-डुलती रहती, उसी तरह कल की बातें मन पर छाई हुई। सुबह के जरूरी काम सलटा कर वह अपनी कॉपी में तपन, माँ, बाबा, बुआ की बात लिखने लगें। लिखने में कहानी मन में कुनमुनाती नहीं रहेगी। लिख-लिख कर ही उन्होंने अपने अंदर की नदी को अनहद बहने दिया है। अंदर गिरह न बने।
तपन अपनी कहानी में अपने दुःख के साथ उपस्थित है, अपनी विडम्बना और अपनी कलह के साथ। तपन ने बताया, ’’अल्पा किफायत से घर चलाती। ढिबरी जलाती, एक-एक पैसे जोडती। दो-तीन तरह की खिचडी बनाती, चुप रहती। मुझसे कम बात करने लगी थी। जिस व्यक्ति के साथ घर छोड कर गई वह हमारे मोहल्ले का ही चित्रकार। एक दिन अल्पा को जब उसके साथ बात करते हुए देखा। साधारण बात को खुलते भीगते देखा। बात को साँस लेते देखा। बात को हँसते देखा, अंदर से फूटते देखा। आवाज को बढते असीम होते सुना। अल्पा को अल्पा में नया होते गालों को सुरमई होते देखा। मेरे सामने जब वह ढिबरी लेकर आती, टूटी ध्वस्त रहती। मैं रोज पैसों का हिसाब गिनता। अपनी थकान बताता। काम रोजगार की आदिम व्यथा। दिनभर की भागदौड की कहानी। वह दूर होती जा रही थी। देशों में बढती है जैसे दूरियाँ। फंदा पड रहा और मैं उलझ रहा। अल्पा अमृत चाह रही थी और मेरे आसपास उन दिनों विष ही विष था। मेरे दादू घर छोड कर चले गए। हमारा छोटा राधा कृष्ण का मंदिर बिक गया। बाबा बीमार रहे। ऐसे दिन भी देखे हैं, जब कलम में रोशनाई भी नहीं रहती। घर का काठ का दरवाजा चरमरा रहा, यह चिंता सताती। स्याही खरीदनी है, बढई को बुलाना है, हाँडी में अनाज रहे, कभी जीवन में अपना पक्का मकान बनाना है, यह बडबडाते हुए सो जाता। गुड का दही वह खूब अच्छा जमाती। गुड की मिठाई भी खूब बनाती। पर गुड और दूध घर में ला सकूँ, उन दिनों हर रात नींद में यही सोचते हुए आँख लगती। मैं तीस साल का था और वह बीस साल की। खोपा बनाती और आलता लगाती। एक दिन ताख पर रखा आइना टूट गया तो नया लेने मुझसे कहा। अब वह आइना मुझसे दस साल छोटे तरुण के घर में रखा है।‘‘
तपन आँखें पोंछने लगा, बोला - ’’बाबू जीवन का एक डरावना जादू है।‘‘
तपन फिर बोला, ’’मैंने यह सोचकर मन को समझाया कि अल्पा के दूध के दाँत नहीं टूटे। बच्चे की अंजुलियों से जीवन को चख रही, उसका जाना ही लिखा था।‘‘
तपन वर्षों से काम बदल रहा। काम बदलते-बदलते एक दिन ऐसा भी आया कि उसने मृणाल बाबू का ड्राइवर बनना ही तय कर लिया। मृणाल बाबू के साथ बात करते-करते कभी-कभी उसकी आँखों की पुतलियों के नीचे छुपा अँधेरा बहने लगता।
उनके अक्षर पन्ने पर चलते जा रहे। पाँच साल पहले माँ को मुखाग्नि दी। बनारस के जिस घाट पर माँ का शव रखा था, उस श्मशान घाट पर अघोरी प्रेमी को देखा।
प्रेम क्या होता है
क्या होती है मृत्यु
क्या प्रेम कभी मरता है
प्रेम चिता में जलाया जा सकता है
प्रेम आते ही जीवन हरा हो जाता और जाने पर उजाड।
माँ ने अपनी दोनों भौहों के बीच सब कुछ समेट कर रखा। माथे की शिकन और तनाव को साडी के उघडे फौल को सिलते हुए बराबर करती रही। सलवटें निकलती रही। पेड पर से एक-एक पत्ता गिर रहा था। मौसम बदल रहा था। माँ का जीवन भी। माँ कभी भी पिघल कर नहीं बही। दीवार से सटकर बैठती। मजबूत। माँ की आँखों में न जाने क्या-क्या था। सदियों की विडम्बना जो करुणा बन रोशनी सी छाई रहती। माँ उदास थी पर दिखती नहीं। बाबा और बुआ की असमय हुई मौत ने माँ को अंदर की तरफ मोड दिया था। माँ भूल से भी कभी कुछ नहीं भूलती थी। विधवा जीवन जिया। माँ ने रिश्तेदारों से कह दिया कि दूसरे ब्याह की बात न करें। वे साल उनके लिए बहुत कठिन रहे। वह चट्टान थी। सख्त तन और सख्त मन। मजबूती से धरती पर पाँव रखती हुई। गडती हुई कील उखाड कर फेंकती हुई। सम्भल-सम्भल कर चलती हुई। चट्टान ही बनी रही। मृणाल बाबू को सम्भालती। जीवन में जो राजनीति है उसको पढती। हर चीज पर सोचती। पिताजी ने आत्महत्या क्यों की? क्यों वे बाग बाजार जाते? इतना अकेलापन पिताजी को कैसे लगा! क्या हुआ था? उस दिन उनका मन कैसा था? माँ कहाँ थी? माँ ने बताया था कि उनका मानसिक संतुलन बिगडता रहता और इलाज भी चल रहा था। उन्होंने दवा लेनी छोड दी थी और फिर वह घटना घटी।
परिवार में पिताजी को मिली उपेक्षा के बारे में दादी से पूछती। वह हर चीज के पीछे की रेखाओं को पढती। उसकी तह में जाती। वह जैसी थी वैसी न होती तो वह नहीं होते। मृणाल बाबू जो कि पाँचवी पीढी के थे, उन्हें राजस्थान में बसे उनके पुरखों की कहानी सुनाती। पुरखों को याद करती। उनका श्राद्ध करती। उनकी गलतियों से सीखती। माँ के जीवन का अर्थ निकाला जाये तो वह सारथी की भूमिका निभा रहे कृष्ण की हर बात सुनने वाले अर्जुन की बात को दोहराती हुई माँ थी। अर्जुन कहते - मेरा मोह नष्ट हुआ। मेरी स्मृति मुझे मिल गई। वह मोह से मुक्ति की बात कहती। हजार सूरज एक साथ प्रकट हो जाएँ ऐसी चकाचौंध के साथ कृष्ण ने अर्जुन को कहा, कर्म ही सत्य है और सब कुछ छल। वह कर्म थी। जीवन में रची-बसी। घट-घट में व्याप्त। मृणाल बाबू ने एक दिन उससे पूछा, ’’बाबा के बिना कैसे रह पाई?‘‘ वह चुप ही रही। उसने कभी किसी की शिकायत नहीं की। बाबा के जाने के बाद यह समझ में आ गया था कि अब उसके दूसरे तरह के दिन शुरू हो गए हैं। बचपन तो मायके में छूट गया, युवावस्था के राग रंग उल्लास भी गए। पिताजी के जाते ही वह पहली और आखरी गैर-जिम्मेदारी का दिन भी खतम हो गया। वह गीता पढती और अपने जीवन में गीता उतारते हुए कर्म करती रही। उसके सारे सम्बन्ध सारी सुरक्षा और प्रतिष्ठा सब कुछ धार्मिक किताब पर टिका रहता। रोजमर्रा की हाडतोड मेहनत उसे सारे भटकाव से बचाए रही। माँ की रसोई गेहूँ की रोटी और ताजा सब्जी की छौंक से गमकती रहती। माँ संस्कृत के श्लोक दोहराती निर्जला एकादशी करती।
मृणाल बाबू की कहानी ऐना की कहानी नहीं है। दिखी तो थी ऐना एक दिन सैटरडे क्लब में मिस्टर एहमद के साथ। वह ऐना कोई और थी, जिसके साथ पार्क स्ट्रीट पर चलते हुए वे हँसे थे। वह दूसरी ऐना थी, पहले में से निकली हुई। राख से उठती एक नयी ऐना। दूसरा जन्म। पहले की चिता पर खडा।
वह यह सब सोच रहे कि फोन की घंटी बजी। उनके बेटे अंकित का फोन आया है। पूछ रहा कि उन्नतीस फरवरी को क्या किया? वह कई साल से लंदन में है। उसकी पत्नी और वह दोनों एम.बी.ए. कर बडी नौकरी कर रहे। इस साल विदेश में उसने अपना एक घर भी खरीदा है। मृणाल बाबू अंकित से अपने पोते के बारे में दो-चार बात कर फिर वही सब लिखने लगे। अपने लिखे को पढा, पाया गलतियाँ ही गलतियाँ लिखे में। वह लिखे को काट-कूट रहे। अर्थ का अनर्थ करने वाली भूलें। एकदम उलटी हो सकती है बाबा, बुआ, ऐना, शम्पा बनर्जी और माँ की कहानी। वह पूरे दिन लिखते और काटते रहे और थक कर सो गए।
ब्रह्ममुहूर्त के समय जब आँख खुली, योग और अध्यात्म के आलोक में चीजें अपना रूप बदलने लगी। माँ पिताजी की मौत के बाद मानसिक दुश्चिंता के लम्बे दौर से निकल मृणाल बाबू के कॉलेज में सेक्रेटरी के लिए हाथ से बना गौंद का लड्डू भेज रही। मृणाल बाबू का दाखिला बडे प्रतिष्ठित कान्वेंट कॉलेज में हो गया। क्रिकेट खेलने का उनका खूब मन रहता। क्रिकेट क्लब के कोच से अंतिम बार माँ को बात करते देखा। माँ के मन में कोई भटकाव नहीं। मृणाल को जीवन में मान-प्रतिष्ठा, शिक्षा सब मिले, यही वह चाहती। माँ कॉलेज के फादर के लिए निरंजन बाबू के साथ घर का बनाया नाश्ता भेजती।
बुआ का हकलाना लाइलाज नहीं था। वह उन्हें स्पीच थेरेपिस्ट के पास ले जाने लगी थी। एक दिन बुआ गायब हो गई। अडोस-पडोस वालों को धीरे-धीरे पता चल गया। निरंजन बाबू न होते तो माँ बुआ को खोज वापस नहीं ला पाती। वह उस फलवाले के साथ दो दिन रहीं। फल पट्टी में बात फैल गई। पुलिस पूछताछ करने चक्कर लगाने लगी। भय का माहौल था। बवाल मचा था। किसी तरह निरंजन बाबू ने मामला दबाया। घर लौटने के बाद बुआ ने खाना-पीना छोड दिया। रोज की कलह। महालय के दिन बुआ ने आत्महत्या कर ली।
मृणाल बाबू इतने सख्त और कन्फेशनल नहीं हो पाते। वह कभी किसी के घट में पैठते हैं कभी किसी के। उनकी पीठ अकड गई है। पाँव ऐसे जम गए जैसे बर्फ। वह यात्रा में है, पर यात्रा में रहना नहीं चाहते। उनकी लय खो गई है। वह कई-कई जीवन में गडमड हो गए हैं। वह घोर दुःख में है। वह अपनी चेतना चाहते हैं। वह सो नहीं पा रहे। वह देख रहे हैं माँ को। रौनक को ढक लेते अंधकार को। यह जीवन का कैसा विन्यास है? रस्साकशी, उलटफेर, ऊहापोह।
मृणाल बाबू किसी के बेटे, किसी के पिता, पति, मित्र और पडोसी हैं। उनके लिखे में वह जगह आ रही जहाँ रीढ में झुरझुरी दौड रही है। वह छटपटा रहे हैं। वह अपने लिखे के गिरफ्त में हैं। युवा दिनों का अँधेरा। पिताजी की मृत्यु के बाद परिवार वालों ने माँ को समझा-बुझा कर उनका ब्याह दक्षिण कोलकाता के एक पैसे वाले दूजवर से कर दिया। माँ साल भर वहाँ रह कर लौट आई। वह व्यक्ति मानसिक रोगी था। माँ के बिना मृणाल बाबू जिद्दी और अडयल हो गए। आठवें दर्जे की पढाई करते हुए फेल हो गए। माँ जीवन सम्भालने की फिर से कोशिश कर रही। इस बार माँ पहले वाली माँ नहीं रही, वह बदल गई। घर आये बाबा के सामने जन्मकुण्डली खोल कर बैठी। संन्यासी पर माँ को अगाध विश्वास था।
बाबा ने कहा, ’’तुम्हारा बेटा बहुत धन कमाएगा।‘‘
विधवा माँ ने फुसफुसा कर कहा, ’’पर बाबा, इसकी संगति खराब हो गई है। सबके सामने मेरी आँखें झुकी रहती। छज्जे में खडी नहीं हो सकती।‘‘
बाबा चुप थे और चुपचाप चले गए। माँ ने अघोडी पर विश्वास किया। मृणाल बाबू पास होते रहे। आगे बढते रहे।
रिची रोड पार कर हाजरा रोड पर जिस लडकी को देखा, उसका चेहरा निरंजन बाबू से मिलता लगा। बांसतल्ला में निरंजन बाबू की छोटी सी दुकान है। आजकल उनका बडा बेटा उनका सर्राफा का काम सम्भालता है। माँ अपने गहने उनके पास ही गिरवी रखा करती। उनकी पहचान बडे लोगों में रही।
मृणाल बाबू ने लिखना बंद कर दिया। मार्च का महीना है। फागुन के दिन। वह सारी बातों को बिसरा कर फागुन महीने के कलकत्ते को देखने लगे। कितनी यादें लेकर आते ये दिन।
कॉलेज में पढते हुए सदर स्ट्रीट से आने वाली ऐना से कलम बदल लिया करते। ऐना को उनकी कलम बहुत अच्छी लगती थी। वह कहती, ’’मृणाल तुम्हारी कलम से लिखकर परीक्षा में पास हो जाती हूँ।‘‘
ऐना बडतल्ला जैसे सघन इलाके से अपने मन को जोड नहीं पाई। मंदिर, ट्राम लाइन, शोभा बाजार का शोर। वह पार्क स्ट्रीट के एक ऑफिस में रिसेप्शनिस्ट थी। पार्क स्ट्रीट की सिमेट्री की उदासी उसके चेहरे पर छाई रहती। मृणाल बाबू के घर व किचन का जीवन उस इलाके के बाजार उसे पसन्द नहीं आये। सब कुछ ढह गया। ऐना और मृणाल बाबू की हँसी जो एक साथ पार्क स्ट्रीट पर सुनाई पडी थी, वह इतिहास बन गई। कुछ दिन पहले सुना ऐना को कोई गम्भीर बीमारी थी, वह नहीं रही।
मृणाल बाबू ने अपनी आँखें बंद कर ली, मौसम का असर न जाने क्या-क्या गठरी खोलने वाला है। वह अब सोना चाहते। उनतीस फरवरी बीत गई और गुजर गया एक मार्च भी।