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सिद्ध चितेरा : राजा रवि वर्मा

भगवती प्रसाद गौतम
बीते दिनों एक पुस्तक से गुजरना हुआ - ’जो खुद कसौटी बन गए‘, लेखक - प्रकाश मनु, प्रकाशक - राष्ट्रीय पुस्तक न्यास। पहला ही अध्याय था, ’स्वामी विवेकानन्द ः योद्धा संन्यासी जो दुनिया जीतने आया था‘। अध्याय का सार-संदेश यह कि ’’जब मूर्ति-पूजक कहे जाने वाले लोगों में मैं ऐसे मनुष्यों को पाता हूँ जिनकी नैतिकता, आध्यात्मिकता और प्रेम अपना सानी नहीं रखते, तब मैं रुक जाता हूँ और अपने से यही पूछता हूँ - क्या पाप से भी पवित्रता की सृष्टि हो सकती है? ...भारतवर्ष में मूर्ति-पूजा कोई जघन्य बात नहीं है। वह व्यभिचार की जननी नहीं है वरन् वह अविकसित मन के लिए उच्च आध्यात्मिक भाव को एकाग्रता से ग्रहण करने का उपाय है।‘‘
शिकागो की विश्व धर्मसभा (१८९३) में उस अप्रतिम संन्यासी ने जब यह सिद्ध कर दिखाया कि ’शुद्धता, पवित्रता और दयाशीलता किसी सम्प्रदाय विशेष की एकांतिक सम्पत्ति नहीं है‘ तो अगले ही दिन अमेरिकी अखबारों में लिखा - ’’उन्हें सुनने के बाद हम अनुभव करते हैं कि भारत जैसे ज्ञानी राष्ट्र को मिशनरी भेजना कितनी बडी मूर्खता है।‘‘
उल्लेखनीय यह भी है कि भारत-भूमि के इस महान सांस्कृतिक अग्रदूत विवेकानन्द की दूरदृष्टि का ही प्रतिफल था कि शिकागो धर्म सम्मेलन के अवसर पर ही अपने समय के एक ऐसे सशक्त कलाकार के अद्भुत संदेशपरक चित्रों की प्रदर्शनी भी सम्पन्न हुई जो बरबस ही विश्व-कला के पटल पर स्थापित हेा गया। तूलिका का वह महारथी था भारतीय संस्कृति का सिद्ध चितेरा राजा रवि वर्मा।
चाणक्य नीति के अनुसार उपयुक्त कर्म को ही धर्म माना गया है, साथ ही यह भी कि मानवता से बढकर कोई धर्म संसार में नहीं है। मेरे श्रद्धेय कलागुरु एवं प्रखर चिंतक रत्नाकर विनायक साखलकर (जिनकी प्रेरणास्पद जीवनी राजस्थान ग्रंथ अकादमी से प्रकाशित हुई) के मुताबिक - ’’कला का मूल अर्थ है कर्म तथा कला एवं धर्म जीवन के अंतर्निहित आधारभूत सर्जनशील तत्त्व हैं। धर्म धारक तत्त्व है तो कला कारक तत्त्व है। पूर्व पाषाण काल से लेकर आधुनिक काल के आरम्भ तक जो भी महान कला निर्मिति हुई, उसका प्रेरणास्रोत धर्म ही रहा। धर्म अनुशासन है तो कला प्रत्यक्ष कर्म।‘‘ (र.वि.साखलकर/ लेखिका डॉ. स्निग्धा दत्ता)
ध्यातव्य है कि महान वैज्ञानिकों ने भी धर्म एवं नैतिक जीवन मूल्यों की उपेक्षा नहीं की। अल्बर्ट आइंस्टीन ने तो स्पष्ट शब्दों में कहा था, ’’धर्म के बिना विज्ञान पंगु है और विज्ञान के बिना धर्म अंधा।‘‘
संयोग ही रहा कि उन्नीसवीं सदी के शुरुआती दौर में राजस्थान के जयपुर, किशनगढ, नाथद्वारा, बूंदी आदि नगरों म जब कलाकार अपने ही ढंग से धार्मिक, पौराणिक एवं सामाजिक विषयों को चित्रित कर रहे थे, उसी कालखण्ड में कुछ चित्रकार जीवनयापन के लिए सुदूर दक्षिण के हिन्दू-शासित राज्यों में जा बसे। समय के साथ उन्हें राज्याश्रय भी प्राप्त हुआ किन्तु उसी अवधि में कुछ ऐसे ब्रिटिश कलाकार भी भारत की धरती पर आ जमे जिन्हें कला के क्षेत्र में व्यावसायिक दक्षता प्राप्त थी। वे तैल रंगों (ऑयल कलर) के माध्यम से राजा-रईसों के धड (बस्ट) और आदमकद व्यक्ति चित्र (लाइफ साइज पोर्ट्रेट) बनाने लगे। फलस्वरूप लोगों का रुझान विक्टोरियन काल की यथार्थवादी (रियलस्टिक) चित्रण शैली के प्रति बढा और शनैः-शनैः लगभग पूरे कला-परिवेश पर इसका प्रभाव दिखाई देने लगा।
ऐसे में राजा रवि वर्मा के भीतर भी एक खास तरह का द्वंद्व था, एक वैचारिक हलचल थी। आखिर उन्हीं के द्वारा एक ऐसी समकालीन कला-शैली का सूत्रपात हुआ, जिसमें भारतीय संस्कृति और पाश्चात्य यथार्थवादी चित्रण तकनीक का अद्भुत समन्वय व्याप्त रहा। यही वे राजा रवि वर्मा थे जो बीसवीं सदी के आरम्भिक दौर में १०७ दिन की अवधि के लिए उदयपुर (मेवाड) स्टेट के ’रॉयल गेस्ट‘ बने और उन्होंने ही पहली बार अपने यशस्वी हाथों से पराक्रम-पुरुष महाराणा प्रताप के भव्य व्यक्तित्व को चित्रात्मक स्वरूप प्रदान किया।
त्रिवेंद्रम (केरल) के किलिमानूर में २९ अप्रैल १८४८ को जन्मे राजा रवि वर्मा के पिता एजुमविल नीलकंठन भट्टातिरिपद अपने समय के जाने-माने विद्वान थे और त्रावणकौर नरेश अयील्लम तिरुनाल के निकट सम्बन्धी भी, जबकि उनकी माता उमायाम्बा थंबुरति विदुषी रचनाकार थी। उनके तीन भाई-बहन थे - गोदा वर्मा, राजा वर्मा और मंगला बाई। राज परिवार में कलाओं के प्रति अभिरुचि थी। ’रवि‘ के चाचा राजा राज वर्मा स्वयं भी अच्छे कलाकार थे। उन्होंने ही सर्वप्रथम १३-१४ वर्षीय भतीजे की प्रतिभा को पहचाना और महाराजा तिरुनाल से परामर्श कर राजचित्रकार रामास्वामी नायडू के मार्गदर्शन में रवि को जल-चित्रण सीखने के लिए प्रोत्साहित किया।
इसी बीच एक डच चित्रकार थियोडोर जेंसन का राज्य में आगमन हुआ। वह मँजा हुआ ’पोर्ट्रेट पैंटर‘ था। उससे भी चाचा ने रवि वर्मा को तैल रंग तकनीक सिखाने हेतु आग्रह किया लेकिन उसकी सम्भावित प्रतिभा को ताडकर उसने इस विषय में कोई रुचि नहीं दिखाई। उधर रामास्वामी ने भी मन-ही-मन रवि को भावी प्रतिद्वंद्वी मानकर अपने हाथ खींच लिए। मगर वह भी ठान चुका था। कभी प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से बडे कलाकारों को चित्र-सृजन करते हुए देखता, कभी ’विष्णुधर्मोत्तर पुराण‘ के चित्रसूत्र अथवा मूर्तिशास्त्र जैसी पुस्तकों का अध्ययन करता और निरन्तर अभ्यास में जुटा रहता। आखिर उसने अपना एक खास मुकाम बना ही लिया।
अब तो स्थिति यह थी कि मद्रास (तत्कालीन) के अंग्रेज गवर्नर ने उन्हें स्वर्णपदक से विभूषित किया। पूना, मद्रास, बंबई, विएना, बकिंघम, शिकागो जैसे बडे-बडे नगरों में उनके चित्र प्रदर्शित हुए। फलस्वरूप प्रशंसा, पदक, पुरस्कार और सम्मान उन पर बरसने लगे। यद्यपि जाने-माने दर्शनशास्त्री एवं कला मर्मज्ञ आनंद कुमारास्वामी ने उनके चित्रों पर नाटकीयता का दोष मढते हुए आलोचना भी की, फिर भी उनकी प्रतिष्ठा को कोई आँच नहीं आया। वे खुद स्वीकार करते थे कि उन्होंने चित्रों में वास्तविकता का प्रभाव लाने के लिए भारत-भ्रमण किया, तीर्थों-धामों की यात्राएँ कीं, प्राचीन एवं पारम्परिक पोशाकों का अध्ययन किया और तत्कालीन नाटक मंडलियों व थिएटरों से भी बहुत-कुछ ग्रहण किया।
अंततः राजा रवि वर्मा की लोकप्रियता इतनी बढ गई कि उनकी मौलिक कृतियाँ व प्रतिकृतियाँ (कैलेण्डर रूप में) कुलीन घर-घरानों और संग्रहालयों की शोभा बढने लगीं। ऐसी महत्त्वपूर्ण एवं अविस्मरणीय कलाकृतियों में ’हंस-दमयंती संभाषण‘, ’वीणावादिनी‘, ’दुष्यंत की खोज में शकुंतला‘, ’गंगा और भीष्म‘, ’लक्ष्मी‘, ’हरिश्चन्द्र- तारामती‘, ’विचारमग्न युवती‘, ’संगीत सभा‘, ’अर्जुन एवं सुभद्रा‘, ’फल वाली स्त्री‘, ’विरहाकुल नायिका‘, ’रावण द्वारा जटायु का वध‘, ’इन्द्रजीत विजय‘, ’राम की वरुण-विजय‘ जैसे अनेक चित्रों का उल्लेख सम्पूर्ण गौरव के साथ किया जा सकता है।
राजा रवि वर्मा की गणना विश्व के एक महान् पोर्ट्रेट पेंटर के रूप में भी होती रही है। उन्होंने भारत के कई राजा-महाराजाओं और उनके परिजनों के मुँह बोलते व्यक्ति-चित्र रचे। छोटे भाई राजा वर्मा के साथ उन्होंने विभिन्न राज्यों की यात्राएँ कीं और मैसूर, बडौदा, ग्वालियर जैसी समृद्ध रियासतों में अपनी सृजन दक्षता का अभूतपूर्व परिचय दिया। यहाँ इतिहास का वह रोमांचक अध्याय बरबस ही याद हो आता है जब वर्ष १९०१ में इस महान कलाकार के पाँव राजस्थान की धरती पर पडे और उदयपुर के पूर्व दीवान राय पन्नालाल मेहता के सुपुत्र फतेहलाल मेहता के आमंत्रण पर वे मेवाड रियासत के विशिष्ट अतिथि बने।
राजा रवि वर्मा अपने छोटे भाई और भतीजे के साथ १६ मार्च को उदयपुर पहुँचे। राज-परम्परा के अनुसार तीनों का आत्मिक स्वागत हुआ और ऐतिहासिक झील पिछोला के तट पर स्थित ’आमेट की हवेली‘ में उनकी आवास-व्यवस्था की गई। उधर ही ’बाडी महल‘ में स्टुडियो बना और वहीं प्रतापी प्रताप के उस कालजयी चित्र की सर्जना हुई, जिसके आधार पर कालांतर में अनगिनत चित्रों एवं मूर्तियों का सृजन हुआ।
यों ऐसे ऐतिहासिक नायक की छवि को कैनवास (फलक) पर उतारना जिसका साक्ष्य या प्रामाणिक आधार न हो... और वह भी आदमकद स्वरूप में आरेखित करना, कम चुनौतीपूर्ण कार्य नहीं था। फिर भी राजा रवि वर्मा की व्यापक योजना, काल्पनिक रूप-स्वरूप का निर्धारण, लोक कथाओं-गीतों में उनके व्यक्तित्व की खोज, प्रासंगिक स्थलों का अवलोकन, भौगोलिक परिवेश की समझ, आवश्यक सामग्री का संकलन, उपयुक्त मॉडल का चयन, तदनुरूप रेखांकन, अनुभवी लोगों के सुझावों पर विचार-विमर्श, वांछित संशोधन और अंतिम स्पर्श से पूर्व तत्कालीन महाराणा फतेहसिंह जी की सहमति... ये सब ऐसे चरण थे, जिनमें काफी धैर्य व सजगता का निर्वाह जरूरी था। महाराणा की हार्दिक इच्छा थी कि वीर शिरोमणि प्रताप की छवि उनके मूल शिरस्त्राण, जिरह-बख्तर और हथियारों के साथ ही चित्रित होगी। इसलिए २२ अप्रैल को राजा रवि वर्मा स्वयं एक अनुभवी दरबारी के साथ मेवाड स्टेट के शस्त्रागार पहुँचे और पुरानी तलवार समेत उन विशेष वस्तुओं को निकट से देखा, जिनका प्रताप ने कभी उपयोग किया था।
अब आया वह दिन (२ मई) जब एक राजपूत युवक सामने खडा था। चित्रकार ने उसकी शारीरिक संरचना को बडी बारीकी से समझा और आखिर रेखांकन की शुरुआत हुई। छोटे भाई राजा वर्मा ने अपनी डायरी में एक स्थान पर लिखा भी है, ’’फतेहलाल जी सुबह आए थे। साथ में शिरस्त्राण, जिरह-बख्तर और एक लम्बे-चौडे राजपूत मॉडल को लाए। हमने उनका रेखांकन किया और वे पूरी तरह पुराने जमाने के वीर की तरह नजर आने लगे।‘‘
अगले ही दिन वही युवक पुनः हवेली पहुँचा और वर्मा बंधुओं ने उसके रेखाचित्र के साथ प्रताप के चेहरे को उकेरकर वह सम्पूर्ण स्वरूप प्रदान किया, जिसकी अपेक्षा राज-दरबार द्वारा की गई थी। अब फलक पर विद्यमान थी एक चश्म मुद्रा में भव्य आदमकद आकृति, उन्नत भाल, उस पर शिरस्त्राण व पगडी, भरी-भरी नुकीली मूँछ, विशाल वक्षस्थल, एक हाथ में लम्बा-भारी भाला, कमर पर सज्जित म्यान-तलवारें और भी बहुत कुछ। यह वह आन-बान-शान वाली छवि थी, जो आज भी देशवासियों के मानस में बसी हुई है। इसी कडी में २३ मई को रवि वर्मा ने समीप की पहाडयों पर पहुँचकर आसपास का दृश्यावलोकन किया और रूपाकृति की पृष्ठभूमि का अंकन कर कलाकृति को अंतिम स्पर्श दे दिया।
राजा वर्मा की डायरी से ज्ञात होता है कि इसी दौर में महाराणा फतेहसिंह की तस्वीर भी निर्मित हुई, जिसके लिए रवि वर्मा को समय-समय पर राजभवन जाना पडा और महाराणा साहब को भी पूरी वेश-भूषा में उनके सामने बैठना पडता। डायरी के पन्नों से पता चलता है कि दोनों भाई चित्र-सृजन में किस तरह ताल-मेल बिठाते थे और यदा-कदा उन्हें किस प्रकार की असुविधाओं से गुजरना पडता था। मगर उन्होंने जो रचा, वह आज भी बरबस ही कलाप्रेमियों को मोह लेता है। सच ही है कि यह सृजन अद्भुत एवं अद्वितीय रहा।
कहते हैं, २९ जून १९०१ को राजा रवि वर्मा और उनके दोनों सहयोगी कलाकारों को महाराणा फतेहसिंह के हाथों मोतियों के हार, विशिष्ट पहनावे और पारिश्रमिक स्वयप ५५०० रुपए भेंट किए गए। अगले ही दिन राजा रवि वर्मा ने भी स्मृति-उपहार स्वरूप महाराणा जी को उनका सुंदर चित्र तथा राजा वर्मा द्वारा रचित ’लेंडस्केप‘ (दृश्य चित्र) भेंट किया और मेवाड राज्य का १०७ दिन (१६ मार्च से ३० जून) का आतिथ्य स्वीकार कर तीनों एक जुलाई को झीलों की नगरी उदयपुर से प्रस्थान कर गए।
राजा रवि वर्मा की चित्रण शैली भले ही पाश्चात्य कला से प्रभावित रही, लेकिन उन्होंने भारतीय संस्कृति के प्रति निष्ठा को कभी कोई आँच नहीं आने दिया। वे निरन्तर कलाकृतियाँ रचते रहे और भारतीय संस्कृति के वैभव को विस्तार देते रहे। ऐसे ही सृजन के चलते वे २ अक्टूबर १९०६ को महाप्रयाण कर गए।
कलानुरागी, लेखक श्री गौतम कोटा में रहते हैं।