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नैरेटिव टेक्नीक और हिन्दी कहानी

तथ्यों की भाषा में कहा जाए, तो हिन्दी कहानी का इतिहास एक शताब्दी पार कर चुका है, विकास के हिसाब से स्थिति यहाँ अधिक उत्साहवर्धक ही रही है। इसका मुख्य कारण आरम्भिक चरण में ही ’उसने कहा था‘ जैसी मजबूत कहानी और प्रेमचन्द और प्रसाद जैसे परिपक्व कहानीकारों का साथ रहा, जिन्होंने कहानी की विकास-यात्रा में ’लीप‘ का कार्य किया। आरम्भिक प्रयास ही भविष्य के लिए प्रतिमान गढते हैं। यही प्रतिमान परवर्ती रचनाकारों के प्रेरणास्रोत और चुनौती बनते हैं। इस दृष्टि से हिन्दी कहानी सौभाग्यशाली रही। न सिर्फ संवेदना अपितु रूप के स्तर पर भी हिन्दी कहानी ने कम समय में अधिक सफर तय किया। किन्तु एक समस्या निरन्तर बनी रही, जो कहानी की आलोचना के स्तर पर थी। हिन्दी कहानी को व्यवस्थित रूप से कहानी-आलोचक नहीं मिल पाए। स्वतंत्रता-पूर्व हिन्दी साहित्य में जहाँ प्रेमचन्द, जयशंकर प्रसाद, जैनेन्द्र कुमार, अज्ञेय, यशपाल आदि सहित अन्य मुख्य कथाकारों ने कविता के आधिपत्य को तोडते हुए कथा-साहित्य के लिए स्थान बनाया, वहीं आलोचना-जगत में ऐसा सम्भव नहीं हो सका और लम्बे समय तक कविता ही आलोचना के केन्द्र में रही। स्थिति में सुधर ’नई कहानी‘ आंदोलन के समय देखने में मिला, जिसमें पहली बार व्यापक व व्यवस्थित रूप से कहानी सम्बन्धी आलोचना की माँग शुरू हुई। नामवर सिंह ने लिखा, ’’कहानी समीक्षा की एक व्यापक और निश्चित ’भाषा‘ का निर्माण भी होना चाहिए। मेरी अपनी सीमा यह है कि मैं अब तक मुख्यतः काव्य का पाठक रहा हूँ। कहानिय मैंने कम पढी हैं और उनमें अंतर्निहित सत्य को समझने और व्यक्त करने की ’भाषा‘ को अब तक नहीं तय कर पाया हूँ।‘१ कहने का आशय यह है कि इस प्रक्रिया में राजेन्द्र यादव, नामवर सिंह, सुरेन्द्र चौधरी समेत कई साहित्य-विद्वान् कहानी सम्बन्धी आलोचना में प्रवृत्त हुए और भिन्न-भिन्न दृष्टियों से कहानी को देखने की व्यवस्थित आलोचना की शुरुआत हुई। कहानी-आलोचना में तब से उतार-चढाव भले ही देखने को मिले हो, परन्तु युगानुरूप और आवश्यकतानुसार नई-नई दृष्टियों से कहानी को देखने का प्रचलन चल पडा। इसी क्रम में इधर साहित्य में संरचनागत पहलुओं को एक नए ढंग से देखा गया, जिसे ’नैरेटिव टेक्नीक अर्थात् आख्यान तकनीक‘ कहा गया।
नैरेटिव टेक्नीक को मूलतः शिल्प के ही विकसित रूप से समझा जा सकता है, किन्तु शिल्प-विवेचन के साथ एक समस्या रही। पहले कहानी को संवेदना और शिल्प रूपी दो भागों और फिर उसे भी कथानक, पात्र, संवाद, वातावरण, भाषा-शैली आदि में बाँटकर देखने का अध्यापकीय प्रचलन रहा है। वक्त के साथ यह महसूस किया जाने लगा कि यह कहानी के संवेदनामूलक और संरचनागत पहलुओं के विवेचन, उनके आपसी सम्बन्ध और रचनात्मक स्तर पर कहानी की सफलता का मुकम्मल आधार नहीं हैं। नामवर सिंह ने इस पर आपत्ति दर्ज कराते हुए ’कहानी नई कहानी‘ में लिखा कि कहानी आलोचना ने कहानी को अनुभूति की एक इकाई के रूप में देखना छोड दिया है और कहानी शिल्प सम्बन्धी आलोचनाओं ने कहानी की जीवनशक्ति को नष्ट करने का कार्य किया है। उन्हीं के शब्दों में कहा जाए तो कहानी-आलोचकों ने ’कहानी के कहानीपन की समझ खो दी।‘ नैरेटिव टेक्नीक एक ऐसा साहित्यिक उपकरण है, जो कहानी को उसके कहानीपन के साथ देखने की समझ देता है। इसके अनुसार कहानी-यात्रा पर विचार करने से पहले इसे समझना जरूरी होगा।
प्रायः आख्यान का अर्थ वृत्तांत, कथा२ से लिया जाता है और कभी-कभी इसका अर्थ ऐतिहासिक एवं पौराणिक कथा के रूप में भी लिया जाता है, किन्तु आख्यान सम्बन्धी गम्भीर चिंतन से इस अवधारणा में बदलाव हुआ। आख्यान का अर्थ ’घटनाओं की तर्कसम्मत क्रमबद्धता के निरूपण‘ से लिया जाने लगा।३ यानी इस हिसाब से अमूमन साहित्यगत विधाओं की कृतियाँ आख्यान ठहरती हैं। बहरहाल इस पर स्वतंत्र रूप से चर्चा अन्यथा की जा सकती है। यहाँ आख्यान तकनीक मुख्य है और आख्यान को निर्मित करने एवं उसमें अर्थ-संधान (मिलाने, जोडने) करने वाली विधियाँ आख्यान तकनीक कहलाती हैं। घटनाओं का संयोजन, कालक्रम का सृजन, कथाकाल और घटनाकाल का सम्बन्ध, दृश्यात्मक और परिदृश्यात्मक तकनीक, कथावाचक का प्रयोग आदि प्रस्तुति-युक्तियाँ ही आख्यान तकनीक हैं। विशेषज्ञों ने इनके लिए विभिन्न पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग किया है। उदाहरण के तौर पर जेरार्ड जेनेट द्वारा प्रथम पुरुषवाचक और तृतीय पुरुषवाचक के लिए क्रमशः प्रयुक्त ’इंट्राडाइजेटिक‘ और ’एक्स्ट्राडाइजेटिक‘ को देखा जा सकता है। इसी प्रकार पर्सी लुब्बक ’परिदृश्यात्मक प्रविधि‘ (पैनॉरमिक टेक्नीक) और ’दृश्यात्मक प्रविधि‘ (सीनिक टेक्नीक) जैसी शब्दावली को प्रयोग में लाते हैं। इस लेख में मुख्यतः प्रेमचन्द, जैनेन्द्र कुमार, निर्मल वर्मा, मन्नू भंडारी और उदयप्रकाश के कहानी-संसार को आधार बनाया गया है, क्योंकि हिन्दी कहानी की यात्रा में शिल्पगत परिवर्तन के अनुसार इनकी कहानियाँ मुकम्मल ठिकाने हैं और लेख की सीमा बहुत-से रचनाकारों की कहानियों को आधार-स्वरूप रखने की छूट भी नहीं देती। केवल प्रेमचन्द का कहानी-संसार ही इतना व्यापक है कि एक विशद ग्रंथ तैयार हो जाए। इस दिशा में कुछ काम हुए भी। गौतम सान्याल ने अपने ग्रंथ ’आख्यानशास्त्र‘ में इस दृष्टि से उनकी कुछ कहानियों का जो पाठ किया है, उसका एक अंश उल्लेख्य है - ’’प्रेमचन्द के आख्यानों को तनिक अदल-बदल लें तो अपेक्षित ग्रैंड नैरेटिव हमें दिखने लगेगा। उदाहरण के लिए क्या देखें कि होरी (गोदान) के पास तनिक जमीन है, उसके पास किसानों के तनिक संस्कार (जैसे गोदान की आस) बचे हुए हैं, मगर वह कर्ज के अंतहीन सागर में डूब-उथला रहा है। होरी का पुत्र (या अगली पीढी) ’हल्कू‘ (पूस की रात) है। वह जाडे की रात में फसल की रखवाली कर रहा है। यह फसल बडे परिश्रम से उसी ने उगाई है। अंततः इस फसल पर हकदारी किसकी है? इसका नगण्य अंश उसे मिलने वाला है, जबकि जमीन उसके पिता या दादा (होरी) की थी। तो उसके मन में श्रम के प्रति चरम विरक्ति उपजती है; क्योंकि उसे अपनी मेहनत का उचित मुआवजा नहीं मिल रहा। वह ’धत्त तेरे की‘ कहकर सो जाता है। घीसू और माधव - हल्कू की ही अगली पीढी है, हल्कू की ही संतान हैं। श्रम के प्रति चरम विरक्ति ने ही उन्हें अमानुष बना दिया है। समस्त नैतिकता को तिलांजलि दे दी गई है। मानवता मर चुकी है। मानवता की भस्म लगाए ये जीवित प्रेत हैं। जलते-बुझते अलाव पर बैठे हुए ये बाप-बेटे नहीं, बल्कि पशुवत् प्रतिद्वंद्वी हैं - भूख को कब तक भला, तसल्ली से बहलाओगे/और थोडा सब्र कर लो, जानवर हो जाओगे।‘‘४
कथानक का संयोजन, महत्त्व और प्रकृति आख्यान तकनीक का अंग है। मोटे तौर पर इस दृष्टि से कथानक के महत्त्व सम्बन्धी तीन प्रकार सुनिश्चित किये जा सकते हैं। पहला जिसमें परिणति-पक्ष का, दूसरे में प्रक्रिया-पक्ष का और तीसरे में दोनों का महत्त्व हो।५ परिणति-पक्ष वाली कहानी से अभिप्राय एक निश्चित बिंदु पर जाकर ’बनने‘ वाली कहानी से है। ’बनने‘ का प्रयोग यहाँ इस संदर्भ में किया गया है कि जब पाठक को लगे कि कहानी इस एक बिंदु पर आकर बनी है अर्थात् कहानी में वर्णित घटनाक्रम इसी बिंदु पर पहुँचने के लिए रचा गया था। ’पंच परमेश्वर‘ में नतीजे का क्षण और ’बडे घर की बेटी‘ में अंत में परिवार का मनभेद दूर होना ऐसे ही बिंदु हैं। दूसरी प्रकार की कहानियों में वे आती हैं, जिनके ’बनने‘ का कोई एक बिंदु निश्चित नहीं किया जा सकता। ऐसी कहानियों में प्रयुक्त घटनाओं का अपना महत्त्व होता है। उनका प्रयोग किसी एक बिंदु तक पहुँचने भर के लिए नहीं किया जाता है। ऐसी कहानियों का महत्त्व उनकी पूरी प्रक्रिया में ही निहित होता है। ’परिंदे‘, ’दोपहर का भोजन‘, ’यही सच है‘, ’त्रिशंकु‘ आदि ऐसी ही कहानियाँ हैं। ’पूस की रात‘, ’तिरिछ‘ आदि ऐसी कहानियाँ हैं, जिनमें कथानक के प्रक्रिया और परिणति, दोनों पक्ष बराबर महत्त्व रखते हैं। हिन्दी कहानी की यात्रा परिणति से प्रक्रिया-पक्ष की ओर या दोनों को बराबर महत्त्व देने की ओर जाने वाली रही है। अलबत्ता ऐसा नहीं है कि बाद में परिणति-पक्ष की कहानियाँ नहीं लिखी गई (उदाहरणार्थ - मन्नू भंडारी कृत ’दो कलाकार‘) किन्तु यह स्पष्ट है कि ऐसी कहानियाँ अपनी मात्रा और महत्त्व में अपेक्षाकृत कम होती गईं। आरम्भ में ऐसी कहानियों के सूत्र को ’कथा‘ में ढूँढा जा सकता है। पारम्परिक कथाओं में सम्पूर्ण घटना-संयोजन किसी पूर्व-निर्धारित नैतिक शिक्षा को उजागर करने के लिए किया जाता था। ऐसे में अपने आरम्भिक दौर में हिन्दी कहानी द्वारा सोद्देश्यता के प्रति अति आग्रह के कारण या महज मनोरंजनपरक होने के कारण घटनाक्रम के परिणति की ओर बढने पर ही ध्यान दिया गया। इसका दूसरा कारण यह भी हो सकता है कि आरम्भिक कहानीकारों के सामने एक चुनौती पारम्परिक किस्से-कथाओं और तिलिस्मी-जादुई पाठ के अभ्यस्त पाठकों को सामाजिक जीवन से संपृक्त साहित्य तक कैसे लाया जाए? ऐसे में रचनाकार के पास शिल्प के प्रति एकदम नया नजरिया रखने की स्वतंत्रता नहीं रही होगी।
’दृश्यात्मक‘ और ’परिदृश्यात्मक‘ तकनीक, जिसे सामान्यतः ’कहानी दिखाने‘ और ’कहानी बताने‘ के अंतर के माध्यम से समझा जा सकता है, के संयोग से ही प्रायः हर कहानी बनती है। (कुछ परन्तु कम ही कहानियाँ (जैसे कृष्णा सोबती कृत ’ऐ लडकी‘ केवल संवादात्मक होने के कारण) इस मत का प्रतिकार करती हैं, फिर भी उन्हें अपवाद ही समझा जाना चाहिए।) किन्तु दोनों का सापेक्षिक महत्त्व हिन्दी कहानी की परम्परा में बदलता रहा। मसलन कि सामान्यतः प्रेमचन्द-पूर्व और प्रेमचन्द-युग में ’परिदृश्यात्मक प्रविधि‘ का अधिक प्रयोग किया और नई कहानी के दौर में ’दृश्यात्मक प्रविधि‘ का। जबकि उदयप्रकाश के यहाँ यही ’परिदृश्यात्मक प्रविधि‘ एक नये रूप में बदले हुए तेवर के साथ अहम भूमिका में दिखाई पडती है। उनका ’कहानी बताना‘ पात्र-परिचय, चरित्र-उद्घाटन, लेखकीय मत या घटनाओं को संक्षेप में प्रस्तुत कर आगे बढाने के लिए ही प्रयुक्त नहीं होता अपितु पाठक का ध्यान केन्द्रित करता है। एक तुलनात्मक उदाहरण द्रष्टव्य है - प्रेमचन्द की ’बडे घर की बेटी‘ और उदयप्रकाश की ’और अंत में प्रार्थना‘, दोनों ऐसी कहानियाँ हैं, जिनकी शुरुआत रचनाकार द्वारा कहानी कहने से होती है। परंतु दोनों का स्पष्ट अंतर इन अंशों से आसानी से प्रकट होता है -
’’बेनीमाधव सिंह गौरीपुर गाँव के जमींदार और नंबरदार थे। उनके पितामह किसी समय बडे धन-धान्य सम्पन्न थे। गाँव का पक्का तालाब और मंदिर, जिनकी अब मरम्मत भी मुश्किल थी, उन्हीं के कीर्ति-स्तम्भ थे। कहते हैं, इस दरवाजे पर हाथी झूमता था, अब उनकी जगह एक बूढी भैंस थी, जिसके शरीर में अस्थि-पंजर के सिवा और कुछ शेष न रहा था; पर दूध शायद बहुत देती थी; क्योंकि एक-न-एक आदमी हाँडी लिए उसके सिर पर सवार ही रहता था।‘‘ (’बडे घर की बेटी‘ - प्रेमचन्द)६
’’अब इसका क्या किया जाए कि डॉक्टर दिनेश मनोहर वाकणकर किसी कहानी या उपन्यास के पात्र नहीं हैं। उन्हें किसी कहानीकार की कल्पना ने नहीं पैदा किया है। डॉक्टर वाकणकर किसी कहानीकार या रचना के होने या न होने के बावजूद हैं। ...कुछ-कुछ उसी तरह जैसे हम और आप हैं। क्या हमें होने के लिए किसी रचना के होने की जरूरत है? ...डॉ. दिनेश मनोहर वाकणकर की उम्र अडतालीस वर्ष की है।‘‘ (’और अंत में प्रार्थना‘ - उदयप्रकाश)७
उद्धृत अंश में प्रेमचन्द का मुख्य उद्देश्य अपने पाठक-वर्ग का पात्र के इतिहास और वर्तमान से परिचय कराना है जबकि उदयप्रकाश महज इतना ही नहीं चाहते। उनकी कहानी का वाचक न तो कहानी का पात्र ही है और न ही पाठक के लिए रचनाकार से अभिन्न हो पाता है, क्योंकि रचनाकार ने तो कहानी के मुख्य शीर्षक के नीचे कोष्ठक में सूचना दी है कि ’इस कहानी के सभी पात्र काल्पनिक हैं‘ और यह वाचक तो कह रहा है कि वाकणकर को किसी कहानीकार की कल्पना ने पैदा नहीं किया है। वाचक की सत्ता यहाँ अलग से रेखांकित हो रही हैं, जो पाठ के भीतर की सत्ता है और पाठ के भीतर ही अपना वजूद पाने वाला यह वाचक पूछ रहा है कि, ’क्या हमें होने के लिए किसी रचना के होने की जरूरत है?‘ यहाँ कहानी को बनाने में ये टिप्पणियाँ अपरिहार्य हो जाती हैं। अतः स्पष्ट है कि दोनों ही रचनाकारों द्वारा प्रयुक्त विधियों में तात्त्विक समानता होते हुए भी इनके स्वरूप में अंतर है। इसके अलावा अन्य रचनाकारों में भी काल-क्रमानुसार इसके परिवर्तन को चिह्वित किया जा सकता है।
जैनेन्द्र कुमार ने अपनी कहानियों में दृश्यात्मक तकनीक का अधिक इस्तेमाल किया है। ’पत्नी‘ तो इस प्रकार की असाधारण कहानी ही है। उसके अलावा ’एक कैदी‘, ’तत्सत्‘ आदि कहानियाँ भी इसका उदाहरण हैं। प्रेमचन्द और जैनेन्द्र द्वारा प्रयुक्त तकनीकों की भिन्नता के कारण को उनके वर्ण्य-विषय की प्रकृति से समझा जा सकता है। सामाजिक जीवन और ग्रामीण परिवेश (जिसके मूल में ही सामूहिक जीवन पद्धति होती है) को अत्यधिक महत्त्व देने वाले प्रेमचन्द को परिदृश्यात्मक तकनीक का इस्तेमाल करना ही पडता, क्योंकि कहानी जैसी छोटी विधा में रचनाकार द्वारा किये जाने वाले वर्णनों या अंकन की अपनी सीमाएँ होती हैं। इसी प्रकार प्रेमचन्द द्वारा बीच-बीच में की जाने वाली टिप्पणियाँ, चरित्र-उद्घाटन आदि भी इसके अन्य कारण हैं। यह अकारण नहीं है कि अपनी अंकन-प्रधान कहानियों (’पूस की रात‘ आदि) में प्रेमचन्द ने अपेक्षाकृत कम घटनाओं, कम पात्रों और न्यून समाज चित्रण का प्रयोग किया है।
यदि रचनाकार विशेष की कहानियों में सर्वाधिक मुखरता से दृश्यात्मक तकनीक के प्रयोग की बात की जाए, तो निर्मल वर्मा की कहानियाँ इसका सबसे मुकम्मल पता है। उनमें कहानी को कहने की कोई जल्दबाजी नहीं है, बल्कि एक प्रकार का अपार धैर्य ही है। वे बहुत-सी घटनाओं के द्वारा कहानी को रचने की बजाय मनःस्थितियों को ज्यादा महत्त्व देते हैं। शायद इसी को लक्षित करते हुए नामवर सिंह ने लिखा है, ’’कहानी के लिए अब जीवन का एक कतरा काटते समय उसके हर जीवंत रेशे को भी सुरक्षित रखने की कोशिश की जाती है। इसलिए सीधे-सीधे कहानी कहने अथवा एक विचार व्यक्त करने की अपेक्षा वास्तविकता के अधिक-से-अधिक स्तरों को उभारने की कोशिश हो रही है।‘‘८ ’परिन्दे‘, ’पिक्चर पोस्टकार्ड‘ आदि उनकी प्रतिनिधि कहानियाँ इसे प्रमाणित करती हैं।
अपनी कहानियों की सहजता के लिए प्रख्यात अमरकांत की ’दोपहर का भोजन‘ दृश्यात्मक प्रविधि का बेहतरीन उदाहरण है। पूरी कहानी में परिदृश्यात्मक प्रविधि के नाम पर महज तीन-चार सूचनाएँ हैं। लगता है कि पूरी कहानी सामने ही घटित हो रही है।
मन्नू भंडारी ’नई कहानी‘ के दौर में आख्यान तकनीक की दृष्टि से अलग तरह की रचनाकार हैं। उन्होंने अपनी कहानियों में बहुत तरह के शिल्पगत प्रयोग किये हैं। जैसे - ’यही सच है‘ डायरी की शैली में, ’स्त्री-सुबोधिनी‘ एकालाप और ’अकेली‘ तथा ’दो कलाकार‘ पारम्परिक व्यास शैली में रचित हैं, किन्तु शैली विशेष के आग्रह को अगर छोड दिया जाए तो उनमें भी दृश्यात्मक तकनीक का ही अधिक प्रयोग दिखाई पडता है। ’अकेली‘ कहानी इसका उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसकी शुरुआत तो पारम्परिक परिचयात्मक लहजे (परिदृश्यात्मक तकनीक) में होती है, किन्तु आगे कथा-संकुचन के बावजूद दृश्यात्मक तकनीक का ही प्रयोग किया गया है। यथा - ’’...राधा भाभी मन ही मन मुस्कुरा उठीं।‘‘
(इसके बाद छपाई में सायास ही अगले गद्यांश से पहले बीच में लगभग दो पंक्तियों जितनी जगह खाली छोडी गई है, जो इस बात का प्रतीक है कि कथा कुछ समय बाद से शुरू हो रही है।)
बुआ ने साडी में माँड लगाकर सुखा दिया...‘‘ इत्यादि।९
’नई कहानी‘ में दृश्यात्मक प्रविधि के अधिक प्रयोग का कारण भरे-पूरे श्ाृंखलाबद्ध प्लॉट का अभाव भी है। ऐसे में रचनाकार के पास कथानक के चरणों से गुजरने की बजाय कथा-स्थितियों पर ठहरकर उनका अंकन करने का अवसर आया। इसी प्रकार नए कहानीकारों ने कहानी में बाहर से टिप्पणी जडने पर भी अधिक ध्यान केन्द्रित नहीं किया, क्योंकि जब समय का यथार्थ जटिल और पाठक सचेत होंगे तो रचनाकार को सरलीकरण और व्यक्तिगत मत चिपका देने से बचना होगा।
विचारणीय है कि दृश्यात्मक और परिदृश्यात्मक प्रविधि का यह अंतर महज रचनाकारों के स्तर पर ही नहीं देखा जाता है बल्कि यह एक ही रचनाकार की विविध रचनाकारों में भी मौजूद हो सकता है। प्रेमचन्द की ही कहानियों को देखा जाए तो जहाँ ’बडे घर की बेटी‘, ’पंच परमेश्वर‘, ’बूढी काकी‘ और ’शतरंज के खिलाडी‘ में रचनाकार की मौजूदगी का गहरा अहसास होता है तो वहीं ’कफन‘, ’सद्गति‘ और विशेषतः ’पूस की रात‘ अंकन-प्रधान कहानियाँ हैं। ध्यातव्य है कि प्रेमचन्द की कहानियों के इस परिवर्तन में एक समानता है और वह है - प्रायः परिदृश्यात्मक से दृश्यात्मक तकनीक का बढता सापेक्षिक महत्त्व। यही प्रवृत्ति कहानी के आरम्भिक साठ वर्षों में दिखलाई पडती है। उसके बाद साठोत्तरी कहानी से पुनः परिदृश्यात्मक तकनीक का महत्त्व बढने लगता है, किन्तु बदले हुए तेवर के साथ। (जिसकी ओर ऊपर संकेत किया जा चुका है।)
आख्यान तकनीक का एक अंग कथावाचक भी है। कथावाचक के संदर्भ में विविध प्रकार के प्रयोग किये जाते रहे हैं। मसलन कि मन्नू भंडारी कृत ’मैं हार गई‘ में कथावाचक कहानी की प्रधान पात्र हैं तो अमरकांत की ’जिन्दगी और जोंक‘ में कथावाचक एक नैरेटिंग एजेंट की भूमिका में आता है। मन्नू भंडारी कृत ’स्त्री-सुबोधिनी‘, ’त्रिशंकु‘ और प्रेमचन्द कृत ’गिला‘, तीनों ही कहानियाँ आत्मकथात्मक हैं, किन्तु फिर भी अंतर भंडारी की दोनों कहानियों का सम्बन्ध जहाँ कथावाचक से ही है तो वहीं ’गिला‘ एक पत्नी द्वारा बताई गई प्रधानतः अपने पति की कहानी है। यहाँ एक और रोचक बात उल्लेखनीय है - ’गिला‘ और ’स्त्री-सुबोधिनी‘ दोनों में स्त्री पात्र ही कथावाचक की भूमिका में हैं और लगभग पच्चीस वर्ष से भी अधिक के अंतराल के बावजूद दोन की तकनीक में बहुत साम्य है।
इस बात का उल्लेख कर देना आवश्यक है कि ऐसा नहीं है कि किसी भी समय में एक ही तरह की कहानियाँ लिखी गई हैं। आचार्य शुक्ल का हिन्दी काव्यधाराओं के संदर्भ में कहा गया यह कथन सहज ही स्मरण आता है - ’’हिन्दी साहित्य के इतिहास की एक विशेषता यह भी रही कि एक विशिष्ट काल में किसी रूप की जो काव्यसरिता वेग से प्रवाहित हुई, वह यद्यपि आगे चलकर मंद गति से बहने लगी, पर नौ सौ वर्षों के हिन्दी साहित्य के इतिहास में हम उसे कभी सर्वथा सूखी नहीं पाते।‘‘१० हिन्दी कहानी के संदर्भ में भी यह ध्यातव्य है कि किसी भी दौर में अनेक तरह की कहानियाँ लिखी जाती रही हैं परन्तु उपरोक्त विश्लेषण उन कहानियों के आधार पर किया गया है, जो अपने दौर की प्रतिनिधि कहानियाँ बनीं।
इस लेख के संदर्भ में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक ही होगा कि क्या वाकई हमें इस दृष्टि की आवश्यकता है? क्या यह एकदम रूपवादी नहीं? किन्तु बात उतनी सीधी है नहीं, जितनी सतह से लग सकती है। असल में संरचना और संवेदना का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध होता है। इसे महज संयोग नहीं माना जा सकता है कि सामाजिक प्रश्नों को उठाने वाले प्रेमचंद के यहाँ कहानियों में अधिक घटनाएँ और पात्र दिखलाई पडते हैं जबकि मन की गुत्थियों में उलझे जैनेन्द्र इस मामले में मितव्ययी हैं। इसी तरह आख्यान तकनीक का गहरा संबंध संवेदना से होता है और संवेदना का अपने युग तथा युगीन यथार्थ से। तभी तो रचनाकार के लिए जब एक पात्र और विभिन्न परिस्थितियों के प्रति उस पात्र के दृष्टिकोण का उद्घाटन अहम हो जाता है तो वह ’मैं‘ शैली का उपयोग करता है। उदाहरण के लिए मन्नू भंडारी अपनी कहानी ’मैं हार गई‘ में रचना-प्रक्रिया और रचनाकार के सम्बन्ध को दिखाने के लिए इसके प्रयोग द्वारा अर्थ-संधान करती हैं। इसी तरह प्रेमचन्द कृत ’पंच परमेश्वर‘ सभी पात्रों को समान महत्त्व देते हुए तृतीय पुरुष की शैली में लिखी गई कहानी है। प्रेमचन्द ’सद्गति‘ में जहाँ लेखकीय मत व टिप्पणियाँ प्रस्तुत करते हैं तो वहीं निर्मल वर्मा को जब व्यक्ति के अकेलेपन, निरर्थकता बोध और इनसे उपजे संत्रास को प्रकट करना होता है तो वे कहानी में ’दृश्यात्मक प्रविधि‘ का अधिक उपयोग करते हुए ’परिदृश्य‘ लिखते हैं। इस तरह आख्यान तकनीक हमें रचना के बहुत-से नए पहलुओं को समझने की प्रक्रिया में सहायक सिद्ध होगी और हमारे क्षितिज का विस्तार करेगी। यह लेख आख्यान तकनीक के माध्यम से हिन्दी कहानी सम्बन्धी विभिन्न प्रश्नों को उठाने और उनके आयामों को प्रकट करने का एकदम परिचयात्मक प्रयास भर है, जबकि यह तो विशद विवेचन का विषय है जो बहुत-से प्रश्नों से संपृक्त हैं। मसलन कि आखिर ऐसी कौनसी वजहें थीं, जिनके कारण ’नई कहानी‘ में एक विशेष प्रकार की कहन-कृपणता परिलक्षित होती है? क्या प्रेमचन्द द्वारा प्रयुक्त ’परिदृश्यात्मक प्रविधि‘ और उदयप्रकाश द्वारा किए गए इसके उपयोग में कोई भिन्नता है? और अगर है, तो वो कौन-से लेखकीय प्रयोजन या युगीन कारण हैं जो इसके मूल में है? एक महिला कथाकार और पुरुष कथाकार द्वारा अपनाई गई एक ही आख्यान तकनीक में किस तरह फर्क आता है? कैसे विविध प्रस्तुति-युक्तियाँ टेक्स्ट में नए अर्थ भरती हैं? या विषय के हिसाब से आख्यान तकनीक किस तरह बदलती है? और अगर हिन्दी कहानी के ’क्लासिक्स‘ किसी और तकनीक में लिखे जाते, तो क्या फिर भी इनकी वही ख्याति होती, जो आज है? आदि-आदि। उम्मीद है कि आख्यान तकनीक पर काम करने की दिशा में हमारा हिन्दी साहित्य जगत प्रवृत्त होगा और कहानी संसार में गुणात्मक अंतर उत्पन्न करने की ओर उन्मुख होगा।