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उत्तर आधुनिकता : आधुनिक परिवेश के संदर्भ में

रमेश ऋषिकल्प
आज हम इक्कीसवीं शती के आरम्भिक दौर में जी रहे हैं। यह वह दौर है, जिसमें हम अपने चारों तरफ एक नई दुनिया पा रहे हैं। इस नई सदी की दहलीज पर हम एक तरफ तो अपने आप को अपार सुख-सुविधाओं की सामग्री से घिरा हुआ पा रहे हैं तो दूसरी ओर हमारे अन्तर्मन में एक ऐसा खालीपन है, जिसमें हमारे अंदर की बेचैनी और अतृप्ति लगातार बढती जा रही है। हमारा अतीत जैसे किसी कोहरे में विलुप्त होता जा रहा है और भविष्य जैसे कह रहा है कि बस अब रुको मत, आगे और आगे बढे चले आओ। लेकिन सोचने की बात यह है कि यह भविष्य जो लगातार हमें आगे बढे चले आने की हाँक लगा रहा है, आखिर वो हमें कहाँ ले जाना चाहता है? हम सबको इस बात की निश्चय ही जानकारी होगी कि छठे दशक में हमारे जीवन में आधुनिकता ने प्रवेश किया और हम उसमें लिपटते चले गए। यह आधुनिकता साहित्य, चिंतन, टेक्नोलॉजी और जीवन सम्बन्धों में सभी जगह हमें लपेटती चली गई। इस आधुनिकता को हम जीने तो लगे पर हम ठीक से समझ नहीं पा रहे थे। हम एक द्वंद्व में थे कि यह जो आधुनिकता हमें लपेट रही है, कहाँ तक सही और सार्थक, या यह हमें कहाँ ले जा रही है, हम कहाँ पहुँचेगें। १९५८ में हन्ना एरेंड्ट ने अपनी किताब ‘The Human Condition' में लिखा कि ’आधुनिक युग जो मनुष्य की सृजनात्मक शक्ति की इतनी अपूर्व और उत्साहपूर्ण उपलब्धियों से आरम्भ हुआ, उसका अंत इतनी निरर्थक तथा घातक निष्क्रियता में हुआ कि इतिहास में इसका दूसरा उदाहरण मिलना मुश्किल है।‘ मित्रों मेरे मन में अक्सर यह सवाल पैदा होता है कि जो हन्ना एरेंड्ट १९५१ में 'The Origins of Totalitarianism' में नाजीवाद के बाद एक नयी रोशनी की तलाश कर रही थीं। वह १९५८ में आकर आधुनिकता से इतनी निराश क्यों हुई? खासतौर से जबकि साम्यवाद पूरी दुनिया को बदलने का दावा कर रहा था और लग रहा था कि अब पूरी दुनिया मनुष्यता के मूल्यों को हासिल करने जा रही है। मित्रों! यह वह समय था जब आधुनिकता एक विद्रोह और नवीनता का आंदोलन थी। आधुनिकता में कार्ल-माक्र्स, फ्रॉयड, सार्त्र जैसे लोगों का नया चिंतन और सोच की नई शैली दी। कहा जाता था कि आधुनिकता भविष्य की ओर खुलने वाली एक खूबसूरत दुनिया है। आधुनिकता का यह दौर आधिभौतिकता, रोमांटिकता, यहाँ तक कि यथार्थवाद को भी रिजेक्ट करती थी। इस आधुनिकता ने धर्म, प्रकृति, नैतिकता, प्रतिबद्धता, आस्था, मूल्यों और प्रत्येक प्रचलित विचार और वस्तु को चुनौती दी थी। हर जगह आधुनिकता, आधुनिकता और आधुनिकता थी। यानी Modernity, Modernity और Modernity।
आज आप और हम जिस समय में जी रहे हैं, वह आधुनिकता से आगे का समय माना जा रहा है। पर क्या वह वास्तव में आधुनिकता से आगे का समय है? क्या हकीकत में इस समय को आधुनिक न कह कर उत्तर आधुनिक कहना चाहिए। पश्चिम में और काफी हद तक भारत के अकादेमिक संसार में अब उत्तर आधुनिकता (Post Modernism) की खूब चर्चा हो रही है। पर क्या वाकई हम उत्तर आधुनिक हो गए हैं या यह आज भी आधुनिकता की प्रक्रिया में हम जी रहे हैं। कम से कम भारत के संदर्भ में तो यह प्रश्न और भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है। कहीं ऐसा तो नहीं कि उत्तर आधुनिकता महज एक cult है। क्योंकि १९८८ में ही जां फ्रांस्वा लियोतार ने अपनी किताब ’द इनह्यूमन‘ में यह साफ कह दिया था कि ’उत्तर आधुनिकता एक नया युग नहीं है। अपितु वह आधुनिकता के कुछ तत्त्वों - जिन्हें आधुनिकता अपनी विशिष्टताओं में शामिल होने का दावा करती है - को दोबारा लिख रही है। इन सबसे पहले आधुनिकता का यह दावा है कि वह विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के द्वारा समग्र रूप से मानवता की मुक्ति की प्रयोजना को स्वीकृत कराने में सफल हुई है। पुनर्लेखन की इस प्रक्रिया को जिससे आधुनिकता गुजर रही है, अब काफी समय हो चुका है।‘ असल में लियोतार का मन यह मानने को तैयार नहीं है कि उत्तर आधुनिकता का अखिल आधुनिकता से काट कर देखा जा सकता है। वो तो यही मानते हैं कि ’उत्तर आधुनिकता, आधुनिकता को दुबारा लिख रही है या यह कि उत्तर आधुनिकता, आधुनिकता का पुनर्लेखन है‘। लियोतार का यह विचार काफी चर्चित रहा है और इस पर काफी लिखा भी गया है। उत्तर आधुनिकता पर गहन विचार करने के बाद कई बार यह लगता है कि उत्तर आधुनिकता में आधुनिकता का सतत प्रवाह जारी है, यानी उत्तर आधुनिकता में आधुनिकता का अंत नहीं है, भले ही कहा गया हो कि इतिहास का अंत हो गया है, लेखक का अंत हो गया है। लियोतार ’रिराइटिंग माडर्निटी‘ पर विचार करते हुए लिखते हैं कि ’कोई कलाकृति उस समय आधुनिक हो सकती है, जब वह पहले उत्तर आधुनिक हो। इस दृष्टि से देखें तो उत्तर आधुनिकता की शुरुआत है और यह स्थिति सदैव रहती है‘ (लियोतार, १९८३)। उत्तर आधुनिकता कोई ऐसा दर्शन नहीं है जो नितांत नया और आश्चर्यजनक हो। यह सही मायने में आधुनिकता का विकास है, जो एक स्वाभाविक विकास प्रक्रिया के तहत अपना काम कर रही है। आप लोग शायद यह जानने को उत्सुक होंगे कि आखिर उत्तर आधुनिकता की आत्मा क्या है? उत्तर आधुनिकता की आत्मा आधुनिकता के ही शरीर में है। Ihab Hassan ने अपनी किताब 'The Postmodern Turn' जो कि १९८७ में छपी थी, कहा कि उत्तर आधुनिक की आत्मा आधुनिकता के महान मृत शरीर में कुण्डली मारे बैठी है‘ असल में हमें यह भी समझ लेना चाहिए कि Ihab Habib Hassan अरब-अमेरिकन जीमवतपेज है और उनका जन्म म्हलचज में हुआ। वो आधुनिकता और उत्तर आधुनिकता को ठीक वैसे ही नहीं देखते, जिस प्रकार यूरोप और अमेरिकी Post Modernist Thinker देखते हैं। उनके लिए Egypt और अरब की जिंदगी के महत्त्वपूर्ण सवाल भी Post Modern Thinking के दायरे में आते हैं। (१० सितम्बर, २०१५ . क्मंजी) इहाब हसन के विचार को देखकर लगता है कि अब हमारे सामने दो ही रास्ते हैं। पहला रास्ता तो यह है कि आधुनिकता के पुराने शरीर में नई सोच को दाखिल कर दें या उत्तर आधुनिकता की आत्मा के लिए कोई नया ढाँचा तैया करें। असल में बीसवीं शताब्दी में मनुष्य इतनी दहशत में जिया है, उसने इस शताब्दी में विचारधाराओं की और जीवनमूल्यों की इतनी मौतें देखी हैं कि भविष्य उसके लिए बेहद डराने वाली चीज बन गई है। बीसवी शताब्दी के मनुष्य ने न केवल दो-दो भयंकर महायुद्धों का सामना किया, उसने अच्छाई और मनुष्यता में अपनी आस्था भी खो दी है। मनुष्य आज भी धरती पर भयंकर दहशत में जी रहा है। विलियम फॉकनर ने एक जगह लिखा है, ’’आज हर व्यक्ति के सामने एक ही प्रश्न कि मैं कब कहाँ भक से उड जाऊँगा।‘ आपको नहीं लगता कि विलियम फॉकनर की यह दहशत आज भारत के संदर्भ में कितनी सटीक बैठ रही है। आतंकवाद के अलावा भी आज भारत में हम नहीं जानते कि और अनेक हादसों में हम कब फक से उड जाएँगे। स्कूल जाने वाला बच्चा कब कहाँ मार दिया जाए, नहीं कह सकते। भारत में स्त्रियाँ इतनी असुरक्षित है कि उनका सडकों पर चलना मुहाल हो गया है। अभी इक्कीसवीं सदी की शुरुआत है और सब कुछ वही दहशतपूर्ण है जो बीसवीं शताब्दी में था। इस पूरी विभीषिका और भयंकरता को देखते हुए ही उत्तर आधुनिक विचारकों का स्वर अनास्थावादी बन गया और यह स्वाभाविक ही था कि वो ऐसा सोचें। एक के बाद एक ऐसी रचनाएँ आने लगीं, जिनमें भविष्य एक कंकाल की तरह हमारे सामने खडा दिखने लगा। हर प्रकार की आइडियोलॉजी हमें फरेब लगने लगी। बीसवीं शताब्दी के खत्म होते-होते मानवीय जीवन में अनास्था के बादल ऐसे उमडने लगे कि उसकी चेतना के अंत हो जाने का बोध और भय इस कदर हावी हो गया कि उसे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में यह घोषणा करनी पडी कि उत्तर आधुनिकता में सब कुछ का अंत हो गया है, या अब सब कुछ पोस्ट हो गया है या चीजों की मृत्यु हो गई है। १९६८ में रोला बार्थ ने ’लेखक की मृत्यु‘ की घोषणा कर दी और फिर ’डिकन्स्ट्रक्शन‘ का तूफान शुरू हो गया, जिसने साहित्य की जडें हिला दीं। इसी तरह १९६८ में ही फ्रेंक कर्मोड ने घोषणा की कि हमारा युग मृत्युबोध से होकर गुजर रहा है। १९६० में डेनियल बेल ने जब आइडियोलॉजी के अंत की घोषणा की तो जैसे हर वस्तु और विचार के अंत का सिलसिला ही शुरू हो गया। मिशेल फूको ने लिखा कि ’सागर के किनारे रेत पर बनाये गए चेहरे की भाँति मनुष्य का निशान मिट जाएगा।‘ इस तरह आप समझ रहे होंगे कि उत्तर आधुनिकता की उपलब्धियों के गलियारों में से होकर गुजर रहे हैं, लेकिन भविष्य मानवीय मूल्यों और मानवीय चेतना से रहित दिखाई देता है। यह एक निश्चय ही भयावह स्थिति है। जहाँ तक साहित्य का सम्बन्ध है तो उसके अंत की घोषणा तो कई बार हो चुकी है। बहुत पहले टी.एस. ईलियट ने ही कहा था कि ’उपन्यास की मौत हो चुकी है।‘ एडमंड विल्सन ने कहा कि ’कविता एक मरती हुई विधा है।‘ इससे पहले डी.एच. लारेंस ने कहा था कि ’मानव सम्बन्धों का साहित्य मर गया है।‘ १९९० में अल्विन कर्नान ने अपनी किताब ’दि डैथ ऑफ लिटरेचर‘ लिखीं, जिसमें उन्होंने अमेरिकी साहित्य के खत्म होने की बात कही। उन्होंने कहा कि सामाजिक और तकनीकी तब्दीली ने यह काम किया है, जिसे हम उत्तर आधुनिकता के नाम से जानते हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि उत्तर आधुनिकता के चिंतकों ने इतिहास, लेखक, साहित्य, आइडियोलॉजी आदि सबका अंत घोषित कर दिया। उत्तर आधुनिकता के चिंतक बहुत गम्भीरता से बदलती हुई दुनिया को देख रहे थे और नई दुनिया की नई संरचना को उगता हुआ देख रहे थे। इसमें कोई संदेह नहीं कि आज हम जिस टेक्नोलॉजी और सम्बन्धहीनता के समय से घिरे हुए हैं, उसने उन तमाम एलिमेंट्स को हमसे बहुत-बहुत दूर कर दिया है। अगर साहित्य, लेखक, इतिहास को ही लें तो वो आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक पोलिटिकल एजेंडा बन कर रह गया है। अब दर्शन जैसा विषय भी पोलिटिकल हो गया। एक प्रोपोगेंडा, जिसे पाठक अब छूना नहीं चाहता। साहित्य, दर्शन, और इतिहास जैसे विषय अब अपनी टोटिलिटी में मर से गए हैं। कई बार लगता है कि अब हम और साहित्य, दर्शन आदि सब समय की अंधेरी सुरंग में घुसना नहीं चाहते। सब कुछ जैसे पोलिटिक्स हो रह गया है। मुझे इस संदर्भ में, Antonio Gramsci की याद आ रही है, जिसने साफ-साफ लिखा है कि 'Everything is political, even philosophy and philosophies. In the realm of culture and of thought each production exists not only to earn a place for itself but to displace win out over others' - Anotonio Gramsci.
जब भारत की राजनीतिक और सामाजिक स्थिति को आज हम देखते हैं तो यकीन नहीं होता कि किस प्रकार भारत की राजनीति ने भारत के हर व्यक्ति को महज एक वोट में रूपांतरित करके रख दिया है। आजादी के बाद से ही भारतीय जीवन, उसका साहित्य और उसकी संस्कृति अपनी स्वायत्तता छोडकर राजनीति की पिछलग्गू बन गई और वह भी घटिया और चरित्रहीन राजनीति की। आजादी के बाद से ही सब कुछ राजनीति होता चला गया, एक विकृत और समाज विरोधी राजनीति। हम देखने लगे कि अब लेखक का लेखक वाकई मर गया है। धर्म की धार्मिकता पूरी तरह मर चुकी है। भारत में धर्म राजनीति और पूँजीपतियों का एक ऐसा गठबंधन बन गया है, जिसमें अध्यात्म की वैज्ञानिकता और सामाजिक मूल्यों की ईमानदारी पूरी तरह खत्म हो गई है। भारत के विश्वविद्यालय शिक्षा के केन्द्र न रहकर विकृत राजनीति के केन्द्र बनते जा रहे हैं। यह सब क्या है? सब कुछ का विकृत राजनीति में बदलते जाना निश्चय ही बहुत कुछ चीजों का अंत होते जाना है। शायद इस सबको देखकर ही उत्तर आधुनिकता के चिंतकों ने विश्व के परिदृश्य में यह माना कि अब लेखक का अंत हो गया है, इतिहास का अंत हो गया, साहित्य का अंत हो गया है और सब कुछ राजनीति में बदल गया है। लेकिन इन सबमें सबसे ज्यादा चिंता का विषय है ’लेखक की मौत‘। मित्रों आज लेखक की मौत गरीबी या भूखमरी से नहीं हो रही है, आज लेखक की मौत बेहद सुविधाओं से, सत्ता और पद की लोलुपता से हो रही है। कलाकृतियाँ धनाढ्य वर्ग के जन्मदिन की पार्टियों में नीलाम होती हैं। पुस्तक और पुस्तक मेलों को खास इलिटीसन से जोडा जा रहा है। लेखक की मौत अब सब कुछ पा जाने की वजह से हो रही है और अपनी अंतरआत्मा को खो देने की वजह से हो रही हैं। भारतीय परिप्रेक्ष्य में जब मैं साहित्य पर विचार करता हूँ तो मुझे लगता है कि साहित्य में साम्यवादी चिंतन ने विचारधाराओं के साहित्य को संदिग्ध बना लिया है। न केवल साम्यवादी चिंतन ने बल्कि फार्मूलाबद्ध साहित्य ने भी साहित्य को जनजीवन से काटा है। मैं यह भी महसूस करता हूँ कि भारत में साहित्यकार और साहित्य का रूप काफी गिरा है। टेक्नोलॉजी व अन्य कारणों से साहित्यकार और साहित्य जनता के केन्द्र से कटकर हाशिये पर आ गया है। लायनल ट्रिलिंग ने कहा है कि कलाकार और रचनाकार को अपने समय की सीमाओं को पार कर लेना चाहिए, क्योंकि यदि वह ऐसा नहीं करता है तो यह सम्भावना हमेशा बनी रहेगी कि उसकी रचना का मुहावरा विचारधारा और वादों से विकृत होकर रह जाएगा। हिन्दी साहित्य में पश्चिम की तर्ज पर हम उत्तर आधुनिकता को नहीं देख सकते और न ही इसकी कोई आवश्यकता है और न ही मैं इसे कोई अच्छी आदत मानता हूँ कि हम कला और साहित्य के लिए यूरोप और अमेरिकी आंदोलनों को अपने साहित्य और चिंतन पर घटायें। वहाँ का समाज और वहाँ की स्थितियाँ भारत से काफी और काफी अलग हैं। मुझे तो कई बार यह लगता है कि भारत में तो अभी पूरी तरह आधुनिकता भी नहीं आई है, उत्तर आधुनिकता तो अभी काफी दूर है और फिर उत्तर आधुनिकता यहाँ आए ही, यह जरूरी भी नहीं। अगर जबरन हम अपने आपको उत्तर आधुनिकता में लपेटेंगे तो शायद कुछ नुकसान ही होगा। पश्चिम में भी अब उत्तर आधुनिकता अब ढलान पर है और फिर एक बार इस ढंग से सोचा जा रहा है कि साहित्य का कोई बना-बनाया विषय नहीं होता। साहित्य का विषय स्वयं साहित्य ही होता है, जिसे स्वयं लेखक भी नहीं जानता। असल में हुआ यह कि १९६० के बाद दुनियाभर में साहित्य और कला पर जो संकट मंडराया, आधुनिकतावाद ने इस संकट के प्रति सबको आगाह किया, लेकिन अचानक उत्तर आधुनिकता इस पर हावी हो गई और उसने यह घोषणा कर दी कि अब सुधार सम्भव नहीं है। सब कुछ का अंत निश्चित है और घोषणा का नतीजा हमारे सामने है कि आने वाले समय में कला और साहित्य पर मास मीडिया की भोग और लिप्सायुक्त संस्कृति हावी होने के लिए तैयार है, बल्कि काफी हद तक हो भी गई है। अब वेद, पुराण, माइथोलॉजी, आर्केलॉजी, इतिहास, धर्म, योग, उपनिषद, सोश्योलॉजी सब को मास मीडिया ने अपनी गिरफ्त में ले लिया है। काई बडी बात नहीं कि साहित्य पुस्तकालयों में और कला गैलेरीज में बंद होकर रह जाएगी। कला, मनोरंजन और पाप्यूलर कल्चर में कोई अंतर नहीं रह जाएगा और यह सब कुछ एक ऐसी दुनिया का निर्माण करेगा, जिसमें सब कुछ होगा फिर भी कुछ नहीं होगा। बाल्टर बैंजामिन ने सही सवाल किया था कि ’जब समस्त संसार मृत्यु की गिरफ्त में है तो प्रगति के बारे में बात करने का औचित्य क्या है?‘ पर मुझे लगता है कि हमें प्रगति के बारे में बात करनी चाहिए, क्योंकि यह हमारी नियति भी है और जरूरत भी। सिर्फ समझना यह होगा कि प्रगति की हम क्या परिभाषा तय करें। समय जिस तेजी से परिवर्तित हो रहा है, उससे मुझे लगता है कि एक नया युग जन्म लेने वाला है, जिसमें सभी मौजूदा Institutions का अंत भले ही हो जाए, लेकिन फिर से हम एक नई दुनिया में अपने आपको पा सकते हैं। स्त्री-पुरुष सम्बन्ध नया रूप लेंगे, हो सकता है विवाह संस्था, विश्वविद्यालय, शिक्षा तंत्र मौजूदा रूप में मर जाएँ पर उनका नया प्रारूप अब हमारे सामने उगने लगा है और यह प्रारूप उत्तर आधुनिकता से आगे की चीज होगी। मौजूदा समय भारतीय समाज और विश्व समाज के सामने एक चुनौती है। यह चुनौती कभी समाप्त नहीं होगी। चुनौती एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसका अंत नहीं होगा। लेकिन यह चुनौती मानव विवेक की टेक्नोलॉजी और पापुलेरिटी को होगी, जिसने आज साहित्य, इतिहास, कला को सही संदर्भों से काटकर उसे एक सिंथेटिक कल्चर में रूपायित कर दिया है। इसी समस्या से आधुनिकतावाद और उत्तर आधुनिकतावाद को गुजरना पडा है। आधुनिकतावाद विवेक को खोते जा रहे जिस मनुष्य से आशंकित था, उत्तर आधुनिकता ने उस मनुष्य के अंत की घोषणा कर दी। बहुत पहले ज्ण्ैण् म्सपवज ने अपनी कविता 'The Hollow Men' में मानव विवेक पर मंडराती छाया को पहचाना था। उनकी ये पंक्तियाँ थीं*-
Between the Idea
And the Reality
Between the Motion
And the Act
Falls the Shadow.
लगता है कि मानव विवेक को मिलने वाली यह चुनौती उत्तर आधुनिकता में और बढ गई है, क्योंकि जब मानव विवेक जीवन से साथ छोडने लगे तो किसी भी चीज का अंत होना लाजमी है, लेकिन हमें पूरा यकीन है कि हम मनुष्यता और उसके नष्ट होते जा रहे विवेक की तरफ लौटेंगे अपनी पूरी मानवीय सम्पन्नता के साथ।
कवि, समीक्षक और अध्येता प्रो. रमेश ऋषिकल्प बेल्जियम के गेन्त वि.वि. विजिटिंग प्रोफेसर हैं।