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युद्ध और शान्ति में देश का जीवन

कश्मीर उप्पल
हमारे अपने देश के अच्छे समय में किसी दूसरे देश के बुरे समय के बारे में पढी हुई किताब अन्ततः अपने देश के बुरे समय में ही समझ आती है। ऐसे समय में किसी दूसरे देश के लोगों का भोगा हुआ यथार्थ हमारा अपना यथार्थ बन जाता है। किसी अन्य की पीडा हमारी अपनी पीडा में रूपान्तरित हो जाती है। ऐसे समय में किसी अन्य देश की पृष्ठभूमि हमारी ही मातृभूमि बनकर खडी हो जाती है। प्रेमचन्द के उपन्यास ’गोदान‘ का किसान सारी दुनिया का किसान और गोर्की की ’माँ‘ सारी दुनिया के लोगों की माँ बन जाती है।
लेव तोलस्तोय का उपन्यास ’युद्ध और शान्ति‘ चार खण्डों तथा लगभग डेढ हजार पृष्ठों में फैला उपन्यास है। इस उपन्यास के सृजन में उन्हें छह से अधिक वर्ष लगे। लेव तोलस्तोय ने यह स्पष्ट किया है कि युद्ध का सारे समाज, जीवन के सभी पक्षों, सभी वर्गों और श्रेणियों में लोगों पर क्या प्रभाव पडता है। इस महान उपन्यास के हिन्दी अनुवादक डॉ. मदनलाल ’मधु‘ के अनुसार ’इसमें जहाँ वीरता, आत्मरक्षा, देश रक्षा के लिए न्यौछावर किए जाने वाले वीरों का गान है, वहाँ युद्ध के भयानक परिणामों, व्यक्तियों और पूरे समाज के जीवन की नींव हिला देने वाले टकरावों के विरुद्ध शान्ति का प्रबल आह्वान भी है।
महात्मा गाँधी की जीवनी लिखने वाले फ्रांस के लेखक रोमां रोलां के अनुसार इस उपन्यास का ’जीवन की भाँति न तो आरम्भ है और न अन्त। यह तो शाश्वत गतिशीलता में स्वयं जीवन है।‘ उपन्यास की यही गतिशीलता अठारहवीं शताब्दी से बहती हुई हमारी इक्कीसवीं शताब्दी में हमें भी युद्धों के विरुद्ध जागरूक और सजग कर रही है। लेव तोलस्ताय की सन् १९६० में पचासवीं पुण्यतिथि पर जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि ’’जीवन का सुख इसी में है कि लेव तोलस्तोय की भाँति पृथ्वी पर लोगों की स्वतंत्रता तथा सौभाग्य के लिए संघर्ष किया जाए।‘‘ हमारे देश में लोगों की स्वतंत्रता और सौभाग्य के लिए संघर्ष करने का समय आ गया है। इस समय राजनेताओं द्वारा युद्ध सम्बन्धी गतिविधियों को अपनी सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि बताया जा रहा है। देश में होने वाले संसदीय चुनावों की वेला में एक युद्धाकांक्षी राष्ट्रवाद का उन्माद फैलाया जा रहा है।
इस चुनाव के समय देश में ऐसा वातावरण बना दिया गया है कि संशय होता है कि हम चुनाव के मुहाने पर नहीं बल्कि युद्ध के मुहाने पर खडे देश हैं। इस तरह युद्धोन्मादी राष्ट्रवाद के समय में यह संशय भी हो रहा है कि हम अपने जनप्रतिनिधि चुनने जा रहे हैं या अपने योद्धा। यह स्पष्ट है कि युद्धोन्मादी-राष्ट्रवाद का अर्थ राजनेताओं द्वारा अपनी जनता के प्रति प्रतिबद्धता के सवालों से बचना है।
ऐसे समय में लेव तोलस्तोय का उपन्यास ’युद्ध और शान्ति‘ हमें एक प्रकाश स्तम्भ के रूप में खडा नजर आता है। विश्व के कुछ अध्येताओं का मत है कि शान्ति के पर्यायवाची रूसी शब्द ’मीर‘ से तोलस्तोय का अभिप्राय शान्ति नहीं बल्कि लोग, जनता या पूरा समाज है। इस महान उपन्यास के विचारों की समकालीनता हमारे लिए बढती ही जा रही है। इसलिए एक भारतीय की दृष्टि से ’युद्ध और शान्ति‘ का भारतीय संदर्भों और परिवेश में पाठ जरूरी हो जाता है।
तोलस्तोय के अनुसार राष्ट्र प्रमुखों के ऐतिहासिक तर्क-वितर्क के इतनी लचीले धागे को जब और अधिक खींचना सम्भव नहीं रहता तो इतिहासकार अपने बचाव की ’महानता‘ सम्बन्धी धारणा को आगे बढा देते हैं। महानता तो मानो भले और बुरे को परखने की कसौटी ही समाप्त कर देती है। महान व्यक्ति तो कोई बुराई कर ही नहीं सकता। कोई भी अपराध ऐसा नहीं है, जिसके लिये महान व्यक्ति को दोषी ठहराया जा सके। वे आगे लिखते हैं कि महानता और हास्यास्पदता में केवल एक ही कदम का फासला है। किसी के मन में यह विचार तक नहीं आया कि भलाई और बुराई की कसौटी पर खरी न उतरने वाली महानता को मान्यता देना अपनी तुच्छता और असीम छोटेपन को स्वीकार करना ही है। जहाँ सरलता, भलाई और सच्चाई नहीं है, वहाँ महानता नहीं हो सकती है।
हम अपने देश के कुछ नेताओं में प्रिंस वसीली की चारित्रिक विशेषताएँ देख सकते हैं, क्योंकि वह बहुत सोच-समझकर अपनी भावी योजनाएँ नहीं बनाता था। अपने फायदे के लिए दूसरों का बुरा करने की और वह और भी कम सोचता था। वह तो सिर्फ ऊँची सोसायटी का आदमी था जिसमें उसे कामयाबी हासिल हुई थी। परिस्थितियों और लोगों की निकटता के अनुसार निरन्तर उसकी योजनाएँ और मंसूबे बनते रहते थे, जिनके सम्बन्ध में वह खुद भी अच्छी तरह से सोच-विचार नहीं करता था, किन्तु वही उसके जीवन की दिलचस्पी होते थे। एक वक्त में उसकी एक ही योजना का मंसूबा नहीं, बल्कि दसियों योजनाएँ और मंसूबे होते थे, जिनमें से कुछ जन्म ही लेने लगते थे, कुछ सिरे चढने और कुछ नष्ट किये जाने वाले होते थे।
हम सत्ता की बात बहुत अधिक करते हैं पर सत्ता क्या है? इसका उत्तर हमारे पास नहीं है। तोलस्तोय सत्ता की विस्तृत चर्चा करते हुए कहते हैं कि सत्ता जनसाधारण की प्रकट या मौन सहमति से उनके द्वारा चुने गए शासकों को सौंपी जाती है। वे आगे कहते हैं कि शासकों को किन्हीं स्पष्ट एवं निश्चित शर्तों पर जनसाधारण की इच्छा सौंपी जाती है और यह दर्शाकर कि सत्ता के सभी संकटों, टकरावों और उसके विनाश तक का कारण यह होता है कि शासक उन शर्तों का जिन पर उन्हें सत्ता सौंपी गई थी, पालन नहीं करते। हम सत्ता के आदेशों की बात तो करते हैं पर अनुभव हमें दर्शाता है कि चाहे कोई भी घटना क्यों न घटी हो, वह सदा एक या कुछ लोगों की इच्छा के साथ जुडी रहती है, जो यह आदेश देते हैं कि ऐसा किया जाए।
हमारे जमाने में भावना रखने वाला कोई आदमी शांत कैसे रह सकता है? युद्ध का सबसे अधिक प्रभाव घर की महिलाओं के जीवन पर पडता है। समझ में नहीं आता, बिल्कुल समझ नहीं आता कि पुरुष जंग के बिना रह ही क्यों नहीं सकते? नारियाँ ऐसा कुछ नहीं चाहती, ऐसा कुछ भी नहीं चाहिए। ऐसा लगता है मानव जाति दिव्य उद्धारक के प्यार और दिल को लगने वाली ठेसों के लिए क्षमा के सिद्धान्तों को भूल गई है और एक दूसरे की हत्या की कला को ही अपना सबसे बडा गुण मानती है।
देशभर के गाँव-गाँव से युवा युद्ध के लिए जाते हैं। उन्हें विदा करते हुए उनके परिवार वालों का बुरा हाल रहता है। यही नहीं जब राजकुमार अन्द्रेई भी युद्ध में शामिल होने जाते हैं तो राजकुमारी लीजा के चेहरे का रंग उड जाता है और वह बेहोश होकर गिर पडती है। ऐसे में सामान्य जनों के परिवारों की कल्पना सहज ही की जा सकती है। आजकल राजनेता बात-बात पर किसी देश की सीमा रेखा को लाँघने की बात करते हैं। इनके समर्थन में अपने घरों में सुरक्षित बैठे लोग भी नारे लगाते हैं। वे बार-बार उत्तेजना से भर देशों की सीमाओं के मध्य स्थित सीमा रेखा को लाँघने की बात करते हैं। वे ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि वे नहीं जानते कि इस रेखा के उस पार क्या है
तोलस्तोय बताते हैं कि इस रेखा से, जीवितों को मृतकों से अलग करने वाली इस रेखा से एक कदम आगे बढाने पर अज्ञातता, पीडा और मृत्यु है। इस मैदान, इस पेड और धूप से चमचमाती छत के पीछे क्या है, कोई नहीं जानता और जानने की बडी इच्छा होती है। दो देशों के सैनिक आमने-सामने होते हैं। उनके बीच अस्पष्टता और भय की रेखा, मानों जीवितों को मृतकों से अलग करने वाली रेखा ही विद्यमान रहती है। सभी लोग इस रेखा को अनुभव करते रहे हैं और यह प्रश्न कि वे इस रेखा को लाँघ सकेंगे या नहीं और कैसे लाँघ पायेंगे, उन्हें विह्वल करता है।
इस सीमा रेखा को लाँघने का अर्थ ही है मृत्यु से घिर जाना। युद्ध के जीत के बाद भी निरन्तर आगे बढने का मन होता है। ऐसे ही समय एक सैनिक चाहे वह कितना ही बडा अधिकारी हो, अपने अन्तरमन से बात करता है। उसका मन प्रश्न करता है अगर ऐसा होने के पहले ही तुम दस बार घायल नहीं हो जाओगे, मारे नहीं जाओगे, या छले नहीं जाओगे तो इसके बाद क्या होगा? इस प्रश्न के बाद वह अपने आपको जवाब देता है मृत्यु, घाव, परिवार की क्षति मुझे किसी भी चीज का भय नहीं। अनेक व्यक्ति मुझे प्रिय हैं, अच्छे लगते हैं - पिता, बहन, पत्नी - ये मुझे सबसे अधिक प्यारे हैं - फिर भी यह इतना भयानक और अस्वाभाविक प्रतीत होने के बावजूद, मैं इन सभी को ख्याति के एक क्षण लोगों के दिलों पर अपनी विजय, अपने प्रति लोगों के प्यार के लिए न्यौछावर कर दूँगा जिन्हें मैं जानता तक नहीं और जानूँगा भी नहीं, इन लोगों के प्यार के लिए।
किसी भी सैनिक को युद्ध के मैदान में प्रकृति के दृश्य भी भावुक बना देते हैं। आकाश में तैरते बादल सैनिकों के मन में युद्ध की व्यर्थता और शान्ति की महानता का बोध जगा देते हैं। कितने भिन्न ढंग से तैर रहे हैं इस ऊँचे और असीम आकाश में बादल! यह कैसे हुआ कि मैंने इस ऊँचे आकाश को पहले कभी नहीं देखा और कितना सौभाग्यशाली हूँ मैं कि मैंने इसे देख लिया है। हाँ! इस ऊँचे आकाश के सिवा सब कुछ बेमानी है, सब धोखा है। इसके सिवा कुछ भी, कुछ भी तो नहीं। किन्तु वह भी नहीं, शान्ति और नीरवता के सिवा कुछ भी नहीं। शुक्र है भगवान का! युद्धरत सैनिकों को प्रकृति के दृश्यों को देखकर युद्ध बेमानी बात लगता है। ठीक इसी तरह हमारे समाज के वे लोग भी युद्धोन्मादी बन जाते हैं, जिन्होंने कभी प्रकृति की लीला को नहीं देखा, समझा होता है। विश्वभर में एक सी फैली प्रकृति के समान विश्वभर के लोगों के दुःख-दर्द भी एक जैसे ही होते हैं। पूरे विश्व में युद्ध मानव के विवेक तथा मानवीय प्रकृति के सर्वथा प्रतिकूल घटना है।
तोलस्तोय के अनुसार हर इंसान की जंदगी के दो पहलू हैं - एक पहलू तो उसका व्यक्तिगत जीवन है, जिसमें वह अपनी रुचियों की अमूर्तत्ता के अनुवाद में स्वतंत्र होता है। उसके जीवन का दूसरा पक्ष दलगत है, जिसमें वह अनिवार्य रूप से उन नियमों का अनुकरण करता है जो उसके लिए पहले से निर्धारित कर दिये जाते हैं। इसी तरह हमारे देश में भी लोग यह समझ नहीं पा रहे हैं कि उनके व्यक्तिगत जीवन को कैसे दलगत जीवन में बदल दिया जा रहा है। चेतन रूप से मानव अपने लिए जीता है, किन्तु अचेतन रूप से वह ऐतिहासिक यानि सामाजिक लक्ष्यों की प्राप्ति का साधन बनता है।
वर्तमान में हमारे देश का व्यक्ति अपने व्यक्तिगत जीवन और दलगत जीवन के इन अन्तर्विरोधों का ही सामना कर रहा है। आम लोग अपने व्यक्तिगत जीवन को दलगत जीवन में ढाल लेते हैं। लोगों को आभास ही नहीं होता कि उनका व्यक्तिगत जीवन कब तिरोहित हो गया और वे कब किसी दूसरे के द्वारा अपने हित में संचालित जीवन जीने लगे हैं। व्यक्तिगत जीवन के दलगत जीवन में बदल जाने से ही व्यक्ति भीड का हिस्सा बन जाता है। इसमें लोग एक-दूसरे के विरुद्ध अनगिनत अपराध करते हैं, क्योंकि वे दलगत जीवन जीने लगते हैं।
तोलस्तोय कहते हैं ’बादशाह‘ गुलाम है इतिहास का। इतिहास - यानी मानव जाति का अचेतन, सार्विक, दलगत जीवन ’बादशाह‘ के जीवन के हर पल का अपने लक्ष्यों के साधन के रूप में उपयोग करता है। एक देश की सेना का दूसरे देश की सीमा में घुसना केवल इसलिए किया जाता है कि बल के आधार पर शान्ति प्राप्त की जाए। प्रिंस अन्द्रेई युद्ध के मैदान में निरन्तर युद्ध के औचित्य पर चिंतन करता है। युद्ध शिष्टता प्रदर्शन नहीं बल्कि जीवन में सबसे घिनौनी चीज है। इसे समझना चाहिए और इसके साथ खिलवाड नहीं करना चाहिये। इस भयानक अनिवार्यता के प्रति कठोर और गम्भीर रवैया अपनाना चाहिए। कुल मिलाकर यह कि हमें ढोंग को एक तरफ हटाकर युद्ध को युद्ध के रूप में स्वीकार करना चाहिये, खिलवाड के रूप में नहीं। अन्यथा युद्ध - यह काहिल और चंचल प्रवृत्ति वाले लोगों का मनपसन्द मनोरंजन बन जाता है।
सामयिक विषयों पर इनकी टिप्पणियों का हिन्दी परिदृश्य में सम्मान हैं।