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अलविदा नामवर सिंह

डॉ. पल्लव
नामवर सिंह नहीं रहे। जनवरी की १५ तारीख को वे नींद में गिर पडे, जिससे उन्हें गम्भीर चोटें लगीं और उन्हें अस्पताल ले जाना पडा। यह अस्पताल प्रवास उनके जीवन का अंतिम अध्याय बनकर आया और १९ फरवरी की देर रात उन्होंने अंतिम साँस ली। नामवर सिंह को अंतिम आलोचक कहा गया, तो उन्हें हिन्दी की अंतिम सार्वजनिक उपस्थिति भी कहा गया। यह बात अतिश्योक्ति हैं, किन्तु उनके महत्त्व को बताने वाली हैं। नामवर के सम्बन्ध में प्रथम बातें अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। वे पहले हिन्दी लेखक और अध्यापक थे, जिनकी बुद्धिमता को हिन्दी से बाहर तमाम ज्ञानानुशासनों में आदर के साथ स्वीकार किया गया। वे पहले हिन्दी लेखक थे, जिनके व्याख्यानों को सुनने के लिए लोग दूर-दूर से आते थे। हिन्दी अध्यापक की ऐसी विराट सार्वजनिक उपस्थिति पहले कभी नहीं थी।

१९२६ में बनारस के निकट जीयनपुर गाँव में पैदा हुए नामवर ने काशी विश्वविद्यालय से पढाई की और वहीं अध्यापक के रूप में उनकी नियुक्ति हो गई। लेकिन कम्युनिस्ट पार्टी की तरफ से लोकसभा का चुनाव लडने के कारण उन्हें विश्वविद्यालय की नियुक्ति से हटा दिया गया। जिसके बाद १९५९-६० में वे सागर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में सहायक प्राध्यापक बनें। यहाँ भी उनके विरुद्ध षड्यंत्र हुआ और उन्हें बहुत जल्दी हटा दिया गया। इसके बाद उन्हने १९६० से १९६५ तक बनारस म रहकर स्वतंत्र लेखन किया। १९६५ में ’जनयुग‘ साप्ताहिक के सम्पादक के रूप में दिल्ली में कार्य किया। इस दौरान दो वर्षों तक वह राजकमल प्रकाशन (दिल्ली) के साहित्यिक सलाहकार भी रहे। उन्होंने १९६७ से ’आलोचना‘ त्रैमासिक का सम्पादन प्रारम्भ किया। बाद में वह १९७० में जोधपुर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष पद पर प्रोफेसर के रूप में नियुक्त हुए। वर्ष १९७१ में ’कविता के नए प्रतिमान‘ पर उन्हें साहित्य अकादेमी का पुरस्कार मिला। १९७४ में थोडे समय के लिए वह कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी हिन्दी विद्यापीठ, आगरा के निदेशक भी रहे। उसी वर्ष जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (दिल्ली) के भारतीय भाषा केन्द्र में हिन्दी के प्रोफेसर के रूप में उन्हें नियुक्ति मिली और १९८७ में वहीं से सेवामुक्त हुए। अगले पाँच वर्षों के लिए वहीं उनकी पुनर्नियुक्ति हुई। वह १९९३ से १९९६ तक राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउण्डेशन के अध्यक्ष रहे। बाद में वह महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलाधिपति बने। ’हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योग‘ और ’पृथ्वीराज रासो की भाषा‘ उनकी शोधपरक रचनाएँ हैं। उन्होंने ’आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ‘, ’छायावाद‘, ’इतिहास और आलोचना‘, ’कहानी ः नयी कहानी‘, ’कविता के नये प्रतिमान‘, ’दूसरी परम्परा की खोज‘ और ’वाद-विवाद संवाद‘ शीर्षक से आलोचना पुस्तकें लिखीं। इन पुस्तकों के अलावा २०१० से उनके असंकलित लिखी सामग्री और व्याख्यानों की अनेक पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं, जो लगातार हिन्दी समाज में चर्चा का विषय बनी रही हैं। उनके विद्यार्थियों ने उनके क्लासरूम नोट्स को भी पुस्तकाकार प्रकाशित करवाया है। २०१८ में उनकी ऐसी पाँच नई किताबें आईं जो राजकमल प्रकाशन के अनुसार इस साल उनकी छह नयी किताबें आने वाली हैं। प्रचुर मात्रा में लेखन और उदात्त सार्वजनिक जीवन नामवर सिंह को हमारे समय का सबसे बडा आलोचक बनाता था।

२००७-२००८ की बात है, तब भारत के पहले स्वाधीनता संग्राम १८५७ की डेढ सौ वीं जयन्ती मनाने की धूम देशभर में थी। इतिहास का विषय होने पर ऐसे एक आयोजन में केवल नामवर सिंह को बोलने के लिए कोटा में बुलाया गया था। इस क्रांति और इसके प्रभावों के साथ ही नामवर ने समकालीन परिदृश्य पर मंडरा रहे खतरों की ओर संकेत किया था। उनका वह व्याख्यान बताता था कि एक आलोचक को इतिहास, राजनीति और समाज का भी कितना गहरा जानकार होना चाहिए। मुझे लगता है कि यही बात नामवर को अपने पूर्ववर्तियों और समकालीनों में विशिष्ट बनाने वाली हैं। साहित्य केवल व्याख्या का क्षेत्र नहीं है, जहाँ अपनी पसन्द-नापसन्द से रचनाओं को उत्कृष्ट या रद्दी बता दिया जाए। असल में यहाँ रचनाओं का सही-सटीक विश्लेषण समय और समाज के व्यापक परिदृश्य में रखकर ही सम्भव है, वरना क्या कारण है कि जिस छायावाद क तरह-तरह की बूझ-अबूझ परिभाषाओं में उलझाया जा रहा है उसे नामवर सिंह ने अपनी पुस्तक छायावाद में दिखाया कि छायावाद राष्ट्रीय जागरण की काव्यात्मक अभिव्यक्ति है, जो एक ओर पुरानी रूढयों से मुक्ति पाना चाहता था और दूसरी ओर विदेशी पराधीनता से। नामवर से अपनी पुस्तक-रचना पर विचार जानने की आकांक्षा किसी स्टार आलोचक-लेखक से प्रमाण पत्र पाने की लालसा नहीं है, जो हमारे समय के नए-पुराने रचनाकारों में लगातार रही अपितु यह किसी भी आलोचक की विश्वसनीयता का सबसे बडा प्रमाण था। नामवर ने देशभर में घूम-घूमकर सैकडों व्याख्यान दिए। खगेन्द्र ठाकुर ने इस बारे में ठीक ही कहा था, ’’नामवर सिंह ने देशभर में विशेषकर हिन्दी क्षेत्र में घूम- घूमकर क्रांतिकारी विचारों के बीज बोये हैं... नामवर ने जिस तरह से जिन विचारों के बीज बोये हैं, वे इतिहास से सम्बन्ध रखते हुए भी भारतीय विचार-परम्परा का अंग होते हुए भी इसलिए महत्त्वपूर्ण हैं कि वे वर्तमान में वैचारिक लडाई में शामिल हैं। उनका व्याख्यान कराना वास्तव में लडाई का मोर्चा खोलना है।‘‘ जिस देश में बडी आबादी उन लोगों की हो, जिनकी पहुँच पढाई-लिखाई तक मुमकिन नहीं, वहाँ ऐसे व्याख्यान क्या असर कर सकते हैं, यह सहज अनुमान का विषय है। यदि उन्हें समकालीन समाज में जनता का शिक्षक कहा गया तो यह अनुचित नहीं था।

नामवर के लेखन को पुस्तकाकार तैयार करने वाले बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के आचार्य और पुस्तकों के सम्पादक आशीष त्रिपाठी ने उन्हें अप्रतिहत वैचारिक योद्धा कहते हुए लिखा था कि अपने हजारों व्याख्यानों के माध्यम से नामवर सिंह नवजागरण की चेतना को आगे बढा रहे हैं। उन्होंने साहित्यिक कृतियों, साहित्यकारों और साहित्यिक प्रवृत्तियों के विश्लेषण द्वारा जहाँ समाज के अँधकार के खिलाफ रोशनी के दिए जलाए हैं, वहीं सचेतन विधि से समाज को नई दुनिया में समतावादी सपनों के साथ प्रवेश दिलाने की कोशिश की है। आलोचना और लेखन के साथ नामवरजी के कृतित्व के जिस एक और पक्ष की तरफ ध्यान आवश्यक है, वह है हिन्दी अध्यापन में उनका मौलिक अवदान। यदि नामवरजी ने इस क्षेत्र में बडी लडाइयाँ ना की होती, तो हिन्दी साहित्य के अध्ययन-अध्यापन के अप्रासंगिक होते जाने का अंदेशा था। यह लडाई भले उन्होंने जे.एन.यू. से लडी हो, पर शुरुआत असल में जोधपुर से हो गई थी। अपनी पुस्तक ’जमाने से दो दो हाथ‘ में एक जगह उन्होंने लिखा था, ’तो क्या, ’धर्मरक्षक‘ शब्द और ’आनन्ददाता प्रभो‘ से ज्ञान माँगने के कारण ऐसी प्रार्थनाएँ पाठ्यपुस्तकों से हटा दी जाएँ? उचित तो यह है कि प्रार्थना भी रहे, धर्म की बात भी रहे, लेकिन बुनियादी वस्तु है कि छात्रों में खुलापन, जिज्ञासा, आलोचना बुद्धि विकसित हो।‘ आलोचना बुद्धि के विकास के लिए उन्होंने हिन्दी के जड- अप्रासंगिक पाठ्यक्रमों को बदल कर उनमें नयी प्राणवायु का संचार किया। वरना अभी भी हिन्दी की दुनिया जाने किन मतों-वादों-रसों में भटक रही होती। यदि आज हिन्दी के बुद्धिजीवी का बौद्धिक संसार में कोई महत्त्व बन पाया है तो इसमें हिन्दी अध्यापन की यह विधि और संस्कार की भूमिका है। यह तथ्य है कि २०१० से उनका यह असंकलित लिखा-बोला पुस्तकाकार आना प्रारम्भ हुआ और २०१२ तक ऐसी आठ किताबें आईं। २०१८ में फिर उनकी पाँच किताबें आई, जो निश्चय ही हिन्दी संसार के लिए आकर्षण का विषय बनी। इन किताबों में पहली है - ’पूर्वरंग‘, इसमें नामवर का प्रारम्भिक आलोचना लेखन है, जिसे पढते हुए उनके बुनियादी सरोकारों और रुचियों का पता चलता है। १९५९ में एक व्याख्यान में उनकी कही यह बात कितनी प्रासंगिक है, ’’आधुनिक साहित्य जितना जटिल नहीं है, उससे कहीं अधिक उसकी जटिलता का प्रचार है और जिनके ऊपर इस भ्रम को दूर करने की जिम्मेदारी थी, उन्होंने भी इसे बढाने में योग दिया।‘‘ यहाँ वे ’साधारणीकरण‘ की चर्चा करते हुए कहते हैं, ’’नये आचार्यों ने इस शब्द को लेकर जाने कितनी शास्त्रीय बातों की उद्धरणी की, और नतीजा? विद्यार्थियों पर उनके आचार्यत्व की प्रतिष्ठा भले हो गई हो, नई कविता की एक भी जटिलता नहीं सुलझी।‘‘ नामवर की मेधा और बौद्धिक क्षमता इन प्रारम्भिक लेखों में भी दिखाई पडती है। नई कविता पर यहाँ चार-पाँच आलेख हैं, जिनमें उन स्थापनाओं के बीज मिलते हैं, जो ’कविता के नये प्रतिमान‘ में आकार ले रही थीं। पुस्तक के दूसरे खण्ड में विष्णुचन्द्र शर्मा की पत्रिका ’कवि‘ के लिए छद्मनाम ’कविमित्र‘ से लिखी अनेक छोटी-बडी टिप्पणियाँ हैं। १९५५ की एक टिप्पणी द्रष्टव्य है, ’’मुझे यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं है कि चित्र-चयन और चित्र-रचना अर्थात् चित्रों द्वारा उपयुक्त रागबोध के पैटर्न के निर्माण की जैसी क्षमता केदारनाथ सिंह में है, वैसी आज किसी कवि में नहीं है।‘‘ इस खण्ड में मुक्तिबोध, भवानीप्रसाद मिश्र, एकांत श्रीवास्तव, भालचन्द्र नेमाडे पर आलेख हैं, जो इन रचनाकारों के महत्त्व का सिंहावलोकन हैं। वहीं रघुवीर सहाय की कविता ’वसंत‘ और हजारीप्रसाद द्विवेदी के उपन्यास ’बाणभट्ट की आत्मकथा‘ की नायिका ’निपुणिका‘ पर स्वतंत्र आलेख भी आलोचक के विश्वस्त बयान हैं। अंतिम खण्ड में ’जनयुग‘ के लिए तत्कालीन देश-समाज और राजनीति पर टिप्पणियाँ हैं। दूसरी किताब, ’आलोचना और संवाद‘ में अलग-अलग विषयों पर नामवर के पच्चीस लेख हैं, जिनका लेखन काल फैला हुआ है और विषय वैविध्य भी चौंकाने वाला है। पहला आलेख विश्व साहित्य की रूपरेखा पर है, तो आगे एक आलेख बीसवीं शताब्दी के भारतीय साहित्य पर भी हैं। इस पुस्तक में अमीर खुसरो, राहुल सांकृत्यायन, अम्बेडकर, फिराक गोरखपुरी, अज्ञेय, श्रीलाल शुक्ल, शमशेर बहादुर सिंह, पाश, शानी जैसे रचनाकारों पर आलेख हैं, तो भारत-भारती और मलयज की डायरी पर स्वतंत्र विवेचन भी। यह किताब भाषा और साहित्य के अनेक प्रसंगों से जुडे आलेखों को भी पढने का अवसर देती है तथा संस्कृत और उर्दू से जुडे भाषा-साहित्य प्रसंगों पर भी विशेष आलेख यहाँ मौजूद हैं। ’शमशेर के साथ आखिरी मुलाकात‘ शीर्षक आलेख अपनी प्रकृति में संस्मरण के नजदीक हो गया है और नामवर अपने प्रिय कवि को सचमुच मन की गहराई से याद करते हैं। मध्यकालीन कवियों की सामाजिक जागरूकता पर भी एक आलेख यहाँ है। भूमिका म आशीष त्रिपाठी ने उचित ही लिखा है कि ’निबन्धों की इस श्ाृंखला में कोई आंतरिक अन्विति नहीं है। ये किसी एक विषय या विषय-श्ाृंखला पर केन्दि्रत नहीं है। किसी एक साहित्यिक विधा तक भी ये सीमित नहीं हैं। इसलिए इस संकलन को ’इतिहास और आलोचना‘ तथा ’वाद-विवाद संवाद‘ के क्रम में देखा-पढा जाना चाहिए।‘ खास बात यह है कि इस पुस्तक में एक भी आलेख ऐसा नहीं है जो नामवर सिंह ने लिखित रूप से तैयार न किया हो। तीसरी पुस्तक ’द्वाभा‘ में नामवर द्वारा लिखे-बोले कुछ आलेख हैं, जो खण्डों में बाँट दिए गए हैं। पहले खण्ड में संस्कृति, भाषा, साहित्य और इतिहास पर आलेख हैं तो दूसरे खण्ड में अनेक रचनाकारों पर छोटे-छोटे आलेख इन रचनाकारों के महत्त्व का अंकन ही है। नामवर संस्कृति में बहुलतावाद के पक्षधर रहे हैं। उनके लिखे-बोले की बडी चिंताओं में सांस्कृतिक बहुलतावाद है। इस पुस्तक का पहला आलेख इसी विषय पर है, जो अभी हाल २०१५ में दिए गए एक व्याख्यान का लिखित रूप है। यहाँ उन्होंने कहा है कि ’सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से हमारे देश की सांस्कृतिक बहुलता को जितना खतरा है, उतना ही, बल्कि उससे ज्यादा खतरा है - उस बहुराष्ट्रीय पूँजीवाद से बनने वाली बाजार की संस्कृति से, जिसे उपभोक्ता संस्कृति भी कहते हैं। ...खतरा इसलिए ज्यादा है कि ऊपर से विविधता, सतह पर विविधता और मूल तत्त्व उसका एकरूपता का है। माल एक ब्रांड अलग-अलग।‘‘ पहले खण्ड में हिन्दी कहानी के इतिहास से सम्बन्धित दो आलेख हैं, जो कहानी के सम्बन्ध में नामवर की सामान्य अवधारणाओं की भूमिका भी प्रस्तुत करते हैं। प्रगतिशील आंदोलन से जुडे तीन आलेख भी यहाँ हैं, जो भक्ति आंदोलन के बाद भारत में हुए सबसे बडी सांस्कृतिक आंदोलन का उज्ज्वल पक्ष दर्शाते हैं। यही नहीं, उन्होंने नवगीत जैसी उपेक्षित माने जाने वाली विधा पर भी एक आलेख दिया है। दूसरे खण्ड में रचनाकारों पर आए आलेखों में मीराँ, रहीम, तुकाराम, गालिब, प्रेमचन्द, राहुल सांकृत्यायन, शिवपूजन सहाय, सज्जाद जहीर, हजारीप्रसाद द्विवेदी, महादेवी वर्मा, त्रिलोचन, हरिशंकर परसाई, श्रीलाल शुक्ल, विष्णुकांत शास्त्री, राजेन्द्र यादव, मार्कण्डेय, निर्मला जैन, दुष्यंत कुमार, कुबेर दत्त और राजनेता चन्द्रशेखर पर छोटी-छोटी टिप्पणियाँ हैं। ये टिप्पणियाँ जहाँ सम्बन्धित के प्रदेय का महत्त्व बताती हैं, वहीं अनेक स्थलों पर नामवर की संस्मृतियाँ देखते ही बनती हैं। पुस्तक का शीर्षक ’द्वाभा‘ उचित ही है, स्मृतियों और साहित्य विवेचन की दो आभाएँ। छायावाद ः प्रसाद, निराला, महादेवी और पंत‘ शीर्षक से आई पुस्तक नामवर की प्रसिद्ध पुस्तक ’छायावाद‘ के बाद में लिखे-कहे से छायावाद सम्बन्धी आलोचना का संकलन है। इस पुस्तक की प्रासंगिकता इस बात में है कि १९५५ में ’छायावाद‘ पर सुव्यवस्थित पुस्तक के बाद इस विषय पर उनके विचारों का सम्यक संकलन यहाँ एक साथ हो पाया है। डेढ दर्जन आलेखों के साथ यहाँ किरन सिंह द्वारा लिया गया छायावाद विषयक एक साक्षात्कार भी है। पुस्तक में कामायनी, रूपाभ और प्रलय की छाया जैसी रचनाओं पर स्वतंत्र आलेख हैं, वहीं ’छायावाद‘ के विभिन्न पक्षों पर विचार करने के साथ नामवर ने जिन छायावादी रचनाकारों पर लिखा है, वे सभी आलेख यहाँ आ गए हैं। नामवर की बारीक निगाह इन रचनाकारों की भाषा पर भी गई है। वे लिखते हैं, ’प्रसाद रुचिर गद्य के शिल्पी थे। भूसाभरी उनके यहाँ कहीं न मिलेगी।‘ आगे ’निराला की भाषा निराला के गद्य से आई है; कुल्लीभाट से आई है, जो छोटे-छोटे वाक्यों में हैं। निराला गद्य तोड रहे थे और दूसरी ओर कविता को गद्य की नई भाषा दे रहे थे।‘ महादेवी के सम्बन्ध में, ’महादेवी ने रहस्य से ज्यादा सत्य के बारे में लिखा है। महादेवी का साहित्य लडाकू साहित्य है, संघर्ष का साहित्य है।‘ और ’विचारधारा किस तरह कविता को क्षति पहुँचाती है, पंत का परवर्ती काव्य उसके प्रमाणों में से है।‘ पुस्तक में छायावादी आलोचना पर भी एक लेख आ गया है, जो इस विषय की जरूरत को पूरा करने वाला है। अंतिम पुस्तक है ’रामविलास शर्मा‘, मूर्धन्य वैचारिक रामविलास शर्मा पर उनके समस्त लिखे का एक संकलन। जाहिर है यह संकलन पूर्व प्रकाशित पुस्तकों से सामग्री चुनकर तैयार किया गया है। हिन्दी के साहित्य संसार में रामविलास शर्मा और नामवरसिंह को दो ध्रुवों में बाँटकर देखने और व्यवहार करने का चलन बन गया है, लेकिन क्या वाकई ऐसा है? नामवरसिंह की यह पुस्तक रामविलास पर श्रद्धाभाव से भरे आलेख ’केवल जलती मशाल‘ से प्रारम्भ होकर ’इतिहास की शव-साधना‘ पर पूरी होती है। एक दर्जन से अधिक आलेख यहाँ रामविलास शर्मा और उनसे जुडे प्रसंगों पर हैं। तो परिशिष्ट रूप में साक्षात्कारों में रामविलास पर नामवर द्वारा कही गई बातों को भी छाँटकर दे दिया गया है। दोनों आलोचकों में सहमति-असहमति के अनेक पक्षों को देखती-समझती यह पुस्तक हिन्दी आलोचना के भव्य वितान को उपस्थित करने वाली है। नामवर जैसा कि एक साक्षात्कार में कहते हैं कि वारिस होने के नाते मैंने रामविलास पर सवाल उठाए हैं, क्योंकि रामविलास का लेखन हमारी सांस्कृतिक विरासत है।

विख्यात कथाकार स्वयंप्रकाश ने अपनी पुस्तक ’हमसफरनामा‘ में नामवर पर लिखे रेखाचित्र में कहा है, ’मैं सचमुच नहीं सोच पाता कि नामवर नहीं होते तो मुक्तिबोध, रघुवीर सहाय और धूमिल को आज भी देश में कितने पाठक नसीब होते... हम सब आज भी नामवर का ही मुँह देखते हैं। इसका मतलब क्या है? इसका मतलब यही है कि नामवर हिन्दी आलोचना की एक इतनी बडी लकीर है कि उन्हें छोटा करने के लिए उससे बडी किसी लकीर के बगैर काम नहीं चलेगा।‘ सचमुच नामवर बहुत बडी लकीर खींच गए हैं।

हिन्दी कथा आलोचना के प्रमुख हस्ताक्षर के साथ पल्लव ’बनास जन‘ के संपादक भी हैं।