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संवाद निरन्तर

हमें पाठकों/लेखक/अन्य सुधीजनों से अपेक्षा है कि वे इस कॉलम के
लिए विश्लेषणात्मक टिप्पणी ही भेजें, प्रशंसात्मक नहीं।
सम्पादक जी,
’मधुमती‘ के जनवरी २०१९ अंक का अध्ययन किया। आफ शोध लेख ज्ञानवर्द्धक हैं। प्रथम शोध लेख ’मारवाड में साहित्य संरक्षण एवं संवर्द्धन की परम्परा‘ में मारवाडी साहित्य का विस्तृत विवरण इस साहित्य की महानता को भी दर्शाता है। लेखक डॉ. मोहनलाल जी गुप्ता को बधाई! पर एक उलाहना भी, लेखक ने उन्नीसवीं सदी के उद्भट लेखक महाराजा मानसिंह (ई. १८०३-४३) में पाँचवी पंक्ति में ’स्फुट साहित्य लिखकर राजस्थानी और ब्रज साहित्य के भण्डार को समृद्ध किया‘। इस मारवाडी साहित्य को राजस्थानी साहित्य लिखना लेखक की समयानुकूल इच्छा प्रतीत होती है। अन्य शोध लेख ज्ञानवर्धक रहे हैं। पर ’प्रवासी कथा साहित्य के संदर्भ में स्त्री‘ की लेखिका अलका जी ने भारतीय नारी विदेशों में पहुँच कर वैसी हो जाती है, का सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत किया है। इसके मूल कारण प्रकृति की अनदेखी है। भारत खण्ड में हंस पक्षी जीवन एक बार जोडी बनाते हैं। एक मर जावे तो दूसरा साथी जीवनभर अकेला रहता है। शेरनी शिकार करती है, पर पहले शेर खाता है और यूरोप व अमेरिका मूल की कुतिया एक प्रसव के लिए भी कई साथी ढूँढ लेती है। यह सब प्रकृति से नियंत्रित होता है, चाहे कोई स्त्री-पुरुषों की प्रधानता पर कितनी ही भडास निकाल ले।
लघुकथाएँ तो हितोपदेश का बदला रूप ही प्रतीत होती हैं, पर है रोचक भी। अंतर्भारती की कहानी विभिन्न भाषी क्षेत्रों के जनजीवन के परिचय का सुंदर कार्यक्रम है।
मुख्य पृष्ठ पर सरस्वती देवी के सुन्दर चित्र के लिए पुनः बधाई।
- लादुराम जेवलिया, नोहर
आदरणीय सम्पादक महोदय,
सादर प्रणाम। अत्र कुशलम् तत्रास्तु। अपरंच मधुमती माह मार्च २०१९ का अंक मिला। आकर्षक मुखपृष्ठ व अच्छे कागज की छपाई के साथ। नए प्रधान सम्पादक श्रीमान् देथा जी का हार्दिक स्वागत। अज्ञेय जी के निर्वाण दिवस पर स्मरणांजली के रूप में उनका पुण्य स्मरण उनकी रचनाओं के साथ करना गरिमापूर्ण है। साक्षात्कार आलेख में वरिष्ठ साहित्यकार सुधा अरोडा जी से नीलिमा टिक्कू की बातचीत प्रभावशाली एवं प्रेरणादायक है। इस प्रकार के आलेख से वरिष्ठ साहित्यकारों के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की जानकारी नये पाठकों हेतु लाभप्रद है। साहित्य की समस्त विधाओं का संतुलित समावेश करते हुए पत्रिका का प्रकाशन समन्वय की भावना का संदेश देता है। सांचीहर जी की कविताएँ सरल, प्रेरणादायी एवं बोधगम्य है। डॉ. सोहन वैष्णव का यात्रा संस्मरण पाठकों को बिना किराया खर्च किये यात्रा कराता हुआ प्रतीत होता है। डॉ. प्रियंका शर्मा का शोध-आलेख बहुत ही रोचक, जानकारीवर्द्धक एवं मातृभाषा के प्रति सद्भावना जगाने वाला है।
- हजारीराम बागाणी, जोधपुर
’मधुमती‘ मार्च २०१९ का अंक छाया चौबीसा के ’रावण‘ गद्य लघुकथा में चौबीसा जी ने असभ्य, अमानवीय, पापियों एवं निर्दयों के लिए लेखनी को खडग बनाकर सटीक निशाना बनाया है। सचमुच ’रावण‘ जलाने वालों में कितने रावण हैं? यह चिंतनीय ही नहीं, अपने आप को टटोलने की जरूरत है।
आज पापा-दादी के वे प्रेरक-सहिष्णु प्रसंग प्रासंगिक नहीं रहे। आदर्श से दूर बहुत दूर चले गये। यही तो विडम्बना है।
कलानाथ शास्त्री का लेख ’वैदिक ज्ञान की व्यापक प्रस्तुति करता ग्रंथ‘ प्र्रस्तुत लेख आडम्बर- अंधविश्वासों पर एक तीखा प्रहार है। हमारी संस्कृति वेदान्तमय होते हुए भी हम अंधविश्वासों के गर्त में सीढयों नीचे जा रहे हैं। ’वेदान्त‘ वैज्ञानिक, कसौटीपरक ज्ञान है। शास्त्री जी ने अंधविश्वासों की अनावश्यकता बताई है। मिथ्या भविष्यवाणियों पर प्रहार किया है। वेदान्त आज के अंधविश्वास, श्राद्ध एवं मूर्तिपूजा को स्वीकार नहीं करता है। वेदान्त सर्वश्रेष्ठ एवं परिमार्जित ज्ञान है, यही हमारी संस्कृति का अतुल्य दस्तावेज है।
नीता चौबीसा जी का लेख ’जैसे सहरा में रात फूलों की‘ में लालित्य, वाक्य गुंफन, भाव सौंदर्य, शब्द-विन्यास एवं वैदर्भी शैली ने तो हमें मंत्रमुग्ध कर दिया। वास्तव में साहित्य सरोवर में आपकी गहरी डूबकी ही नहीं, मोतियों की मुट्ठी भी भरी हुई है। आपकी ललित शैली की प्रशंसा के लिए हमारे पास कोई शब्द नहीं है। यह वास्तव में ’गूंगे का गुड‘ ही है। मुझे गर्व है हमारी सरस्वती रूपा बहना पर।
एक ’कमल‘ पुष्प। ढेर सारी जानकारियाँ, अन्तर्कथाएँ, मुहावरे, धार्मिक, आध्यात्मिक एवं राजनीति के प्लेटफार्म पर ’कमल‘ शहनशाह है। तीनों लोकों में पूज्य। वास्तव में हम इसे जानते हुए भी नहीं जानते हैं।
- इन्द्रलाल आमेटा, मावली, जि. उदयपुर
ई. सन् २०१९ का तीसरा महीना मार्च २०१९ और मधुमती का अंक ३ की सामग्री एक सुखद अहसास करा गई। आवरण पर अज्ञेय की १०८वीं जयन्ती तिथि ७ मार्च १९११ तथा अंदर अज्ञेय की तीन कविताएँ टेर रहा सागर, चिडया ने ही कहा व रात और दिन मणि कांचन का संयोग ही तो है। अच्छा लगा। यह लेख (पृ. १६-२४) संदर्भ योग्य है। डॉ. नामदेव जासूद का धन्यवाद। मैं भी अभी वय अस्सी में चल रहा हूँ। मेरे समकालीन रचनाधर्मी कविवर डॉ. महेन्द्र भानावत, डॉ. पुरुषोत्तम छंगाणी तथा श्री कुशल करण ’सांचीहर‘ की कविताएँ पढकर तो ऐसा लगा मानो ये सम्मुख काव्य पाठ कर रहे हैं। ’कविता की प्रासंगिकता का सवाल‘ लेख में डॉ. हुसैनी बोहरा ने ठीक लिखा है कि... ’’आज की कविता के सामने जो सवाल मौजूद है, वे केवल कविता की दुनिया से सरोकार नहीं रखते, बल्कि उनका सामाजिक संदर्भ भी है।‘‘
वरिष्ठ कवि, साहित्यकार डॉ. उदयवीर शर्मा पर लिखा शेध लेख डॉ. प्रियंका शर्मा का (पृ.. १३३ से १३८) पढा। साथ ही मैं सहृदय वरिष्ठ पत्रकार, व्यंग्यकार और सहजबोध के कविवर श्री फारूख अफरीदी से विगत कई वर्षों से परिचित हूँ। मधुमती मार्च २०१९ अंक में उनके काव्य संग्रह ’शब्द कभी बाँझ नहीं होते‘ पर पुस्तक समीक्षा (पृ. १४८ से १४९-१५०) तक पढी। पुस्तक पढने की जिज्ञासा हुई।
- स्वामी खुशालनाथ ’धीरी‘, बाडमेर